Saturday, January 25, 2020


गणतन्त्र दिवस की सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ

प्यारे देशवासियो! यह दिवस नाच-गान का दिन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का दिन है। क्या हम आत्म चिंतन करेंगे कि-
  1. देश को स्वतंत्र कराने में कितने वीर वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की आहुति दी? क्या हमने उनके बलिदान को मिथ्या अहिंसा से आजादी मिली, ऐसे मिथ्या पागलपन भरे प्रचार से अपमानित नहीं किया है? 
  2. क्या हम उन वीर बलिदानियों के बलिदान एवं जेलों में कठोर यातनाएं पाने वाले वीरों को गाली देने वालों को अपना नेता मानने का अपराध करते रहेंगे? यदि हाँ, देश के लिए कौन बलिदान करेगा?
  3. क्या आज देश सेना के शौर्य व पराक्रम से ही सुरक्षित नहीं है? क्या प्रत्येक सैनिक प्रत्येक देशवासी के लिए सम्मान का पात्र नहीं होता है? यदि हाँ, तो क्या सेनापति व सेना का अपमान करने वालों को दंडित नहीं किया जाना चाहिए? 
  4. क्या हम आज पूर्णरूपेण स्वतंत्र हैं? क्या हम अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष व विश्व बैंक की छाया में अपनी आर्थिक नीतियां बनाने को विवश नहीं है? क्या हम अपनी सामरिक नीतियां बनाने में पूर्णतः स्वतंत्र हैं? यदि नहीं, तो यह कैसी स्वतंत्रता है? 
  5. क्या हमारा संविधान, शिक्षा एवं अन्य परम्पराएँ विदेशी दासता की छाया तले नहीं जी रही हैं? 
  6. क्या हम सामाजिक जातिवाद, राजनीतिक व प्रशासनिक जातिवाद, सामाजिक साम्प्रदायिकता, राजनीतिक व संवैधानिक साम्प्रदायिकता के दलदल में निरन्तर अधिकाधिक नहीं धंसते जा रहे हैं? कौन वीर देशभक्त है, जो आज स्वयं को केवल भारतीय कहने व दूसरों को भी केवल भारतीय मानने का साहस रखता है? कौन है, जो जाति व सम्प्रदाय के नाम पर प्रतिष्ठा व लाभ नहीं लेना चाहता है? यदि नहीं, तो समानता व सेकुलरिज्म का मिथ्या नाटक क्यों?
  7. क्या आपने कभी सोचा है कि देश को स्वतन्त्र कराने का स्वप्न सर्वप्रथम महर्षि दयानन्द सरस्वती ने देखा और आर्य समाज एवं इसके नेता स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती ने कांग्रेस को इसकी प्रेरणा दी तथा आर्य समाज की शक्ति के कारण ही कांग्रेस इसमें सफल भी हुई परंतु कांग्रेस अथवा देश ने महर्षि दयानंद सरस्वती एवं आर्य समाज को क्यों भुला दिया?
  8. क्या देश को स्वतन्त्र कराने में नेताजी सुभाषचंद्र बोस व उनकी आजाद हिन्द फौज की सबसे बड़ी क्रांतिकारी भूमिका नहीं थी? क्या स्वतंत्र भारत ने नेताजी को इसके लिए कभी समुचित सम्मान दिया? वे देश छोड़ने को विवश क्यों हुए? क्यों उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़ने को विवश किया? क्या यह घोर अपराध नहीं था?
  9. क्या लोकतंत्र में संसद का स्थान सर्वोपरि नहीं है? यदि हाँ, तो आज क्यों कुछ नेता व उनके द्वारा शासित राज्य संसद से पारित कानून की होली जला रहे हैं? क्यों देश में मिथ्या आशंकाओं के आधार पर देश में आग लगाई जा रही है? क्यों भारत को बर्बाद करने और असम को भारत से काटने के संकल्प लिए जा रहे हैं?
  10. क्या सर्वोच्च न्यायालय के तर्कसंगत निर्णयों की भी नेता सड़कों पर होली जलाने, दंगे कराने के लिए स्वच्छंद हैं? क्यों संसद ऐसे कानूनों को मिटाने हेतु तत्काल कानून बनाती है और निर्लज्ज निर्णयों पर मौन साध लेती है और देश भी मौन रहता है। 
  11. क्या नेताओं को यह भी अधिकार है कि वे पाकिस्तान व उसके आतंकवादियों को सम्मान दें, और उससे भारतीय प्रधानमंत्री को हटाने में सहयोग मांगें?
  12. क्या उन्हें यह भी अधिकार है कि आतंकवादियों तथा पाकिस्तान द्वारा किसी आतंकवादी हमले की जिम्मेदारी लेने के उपरांत भी पाकिस्तान में आतंकवादियों को निर्दोष बताएं और अपनी ही सरकार अथवा किसी अपने ही संगठन को उस आतंकवादी घटना का दोषी बता दें?
  13. क्या भारत पर चार बार आक्रमण करने वाला, पिछले लगभग 72 वर्षों से आतंकवाद फैलाकर लाखों निर्दोषों का खून बहाने वाला, पाकिस्तान में करोड़ों हिंदुओं को नष्ट करने अथवा उन्हें मुस्लिम बनाने वाला, अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों को पालने वाला, गरीब, निरक्षर व क्रूर पाकिस्तान हमारे देश के कुछ लोगों व नेताओं के लिए आदर्श बन गया है? यदि वह आदर्श है, तो क्यों न वे वहीं जाकर रहें? 
  14. यदि सेकुलरिज्म के नाम पर उन्हें पाकिस्तानी मुस्लिमों को भी भारत की नागरिकता देना उचित लगता है, तो फिर भारत का विभाजन ही क्यों किया? क्यों न वे पाकिस्तान, भारत व बांग्लादेश को मिलाकर एक अखण्ड भारत बनाने का प्रयास करते? 
  15. सैक्यूलर नेता क्यों समान नागरिक कानून बनाने के लिए आगे नहीं आते? 
  16. क्यों देश को मजहब के नाम पर बांटा, फिर राज्यों को भाषा के नाम पर बांटा? हिंदी भाषा का विरोध करने वाले क्यों विदेशी भाषा अंग्रेजी को गले से लगाने में लज्जा का अनुभव नहीं करते? क्या वे बता सकते हैं कि हिंदी बोलने व समझने वालों से अधिक और किस भाषा को बोलने व समझने वाले इस देश में रहते हैं? 
  17. क्यों देश का नागरिक देश से अधिक अपनी पार्टी, मजहब व जाति को महत्व दे रहा है? क्यों वह अपने नेताओं की बौद्धिक दासता से ग्रस्त हो गया है? 
  18. क्यों हम भारतीयता को भूलकर विदेशी बौद्धिक दासता में फंसे होने पर भी स्वयं को प्रबुद्ध व प्रगतिशील मानने का पागलपन कर रहे हैं? 
  19. क्यों हम स्वतंत्र देश को विदेशी कम्पनीज् के हाथों बेच रहे हैं और गांधी जी की मूर्तियों पर माला चढ़ा रहे हैं?
  20. जो हिंदू मुस्लिम एकता की बात करते हैं व करते रहे हैं, उनके पास इसके लिए कौन सा न्यायसंगत फार्मूला है? क्यों नहीं वे हिंदू मुस्लिम अथवा दलितोद्धार के लिए आर्य समाजी नेता स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती जैसे देवपुरुष से कुछ सीखते?
  21. हिंदू आतंकवाद की बात करने वाले क्या स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में अब तक हुए सांप्रदायिक दंगों की जांच कराएंगे कि किसके शासन में कितने संप्रदायिक दंगे हुए और उनमें दोषी कौन थे? क्या यह भी जांच कोई करेगा कि हिंदू बहुल क्षेत्र में ईसाई व मुस्लिम कैसे रहते हैं और ईसाई व मुस्लिम बहुल क्षेत्र में हिंदू कैसे रहते हैं? 
  22. क्या हिंदुओं, पारसियों, जैनों व सिखों का कोई और देश है, जहाँ वे जाकर सुख शांति से रह सकें? जबकि मुसलमान व ईसाइयों के अनेक देश इस संसार में है? 
  23. क्या मुसलमानों को गाली देने वाले और उन्हें ही हिंदुओं के विनाश का उत्तरदायी मानने वाले विचारेंगे कि वे हिंदुओं को एक करने के लिए क्या बलिदान कर सकते हैं? उनके संगठन ने देश की स्वतंत्रता के लिए क्या किया? सभी हिंदू नेता व धर्माचार्य जातिवाद त्याग कर क्या दलितों को बराबरी का सम्मान देने का साहस करेंगे? 
  24. क्या आप नहीं जानते कि जिस देश का इतिहास मिट जाता है, वह देश अधिक दिन जीवित नहीं रह सकता, तब भी क्या इस देश के इतिहास को विदेशियों अथवा उनके बौद्धिक दासों के हवाले किए रहोगे? 
  25. जिस देश के पास अपनी शिक्षा व्यवस्था नहीं होती, वह देश भी कभी अधिक समय तक सम्प्रभु व स्वतंत्र नहीं रह सकता, तब आप इस देश को क्यों मैकाले की शिक्षा प्रणाली का सशक्त विकल्प देने के लिए कोई प्रयास करते अथवा ऐसा प्रयास करने वालों का क्यों सहयोग नहीं करते?
  26. क्या आप कभी सोचेंगे कि यह देश विदेशी आक्रान्ताओं के शक्ति के कारण नहीं, बल्कि अपने देश के गद्दारों के कारण हारा है, तब क्या फिर भी आज गद्दारों को ही अपना आदर्श मानकर फिर देश को हराकर टुकड़े करना चाहोगे? 
प्रश्न अनेक हैं परंतु अभी इतने ही। मेरे देशवासियो! देश का भविष्य आपसे ये सारे प्रश्न पूछेगा और ऐसा समय आएगा, जब इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए आप बचेंगे ही नहीं। कोई तिरंगा फहराने वाला रहेगा नहीं। इसलिए जागो! आत्मनिरीक्षण करो, एक रहो अन्यथा एक साथ मिट अवश्य जाओगे। यह देश उन सबका है, जिनके पूर्वज इस देश में जन्मे थे और जो सदियों पूर्व विदेशों से आकर बस गए, अब वे भी इसी देश के नागरिक हैं। उन्हें बाहर भगाने का स्वप्न मत देखो। हाँ, अवैध घुसपैठियों को बाहर करने का कोई न्यायसंगत मार्ग अपनाना होगा। उठो! और अपने धर्म व कर्तव्य को समझो। 

आचार्य अग्निव्रत ✍️

Friday, January 17, 2020

मूर्खता अथवा षड्यन्त्र?



आजकल तिल का तेल निकालने हेतु बैल के स्थान पर मोटरसाईकिल के प्रयोग को कानूनसम्मत एवं अहिंसक बताया जा रहा है। यह हमारे अभागे देश के कानून और कानूनवेत्ताओं की मूर्खता का परिचायक है। जब कोल्हू, हल एवं बैलगाड़ी में बैलों का उपयोग करना बन्द हो जायेगा, तब क्या बैलों को कानून के रखवाले पालेंगे अथवा वे बैल सड़कों, गलियों वा खेतों में भूखे-प्यासे भटकने को विवश होंगे? जो सभी जगह लाठियां खाते घायल होते रहेंगे। तब कसाई लोग ऐसे बैलों को बूचड़खानों में ले जायेंगे, जहाँ उनका निर्मम वध होगा। उन कसाइयों को सरकार अनुदान देगी, ताकि वे अधिक से अधिक पशुओं को मार कर मांस उत्पादन कर सकें। आश्चर्य है कि किसान अथवा मजदूर बैल आदि पशु से काम ले, तो पशुक्रूरता निवारण अधिनियम आकर उसे रोकता है और जब बड़े-बड़े अरबपति कसाई बूचड़खाने में एक-एक दिन में लाखों पशुओं का खून बहाएं, तो उन्हें अनुदान मिले और पशुक्रूरता निवारण हेतु बनाया कानून कोई काम न आए। यह क्या बुद्धिमानों का कानून हो सकता है? क्या किसान व मजदूर के विनाश तथा कसाइयों के उत्कर्ष के लिए यह कानून नहीं है? अथवा क्या कसाइयों एवं पैट्रोलियम कम्पनीज् की मिलीभगत से देश के किसानों व मजदूर के समूल विनाश का यह घातक षड्यन्त्र तो नहीं है? यहाँ कोई पर्यावरणवादी भी नहीं बोलता है। 

आजकल कुछ पर्यावरणवादियों को पशु भी पर्यावरण के लिए हानिकारक दिखाई देते हैं। सर्वत्र वेद, गौ एवं ऋषियों की सभ्यता व संस्कृति के विनाश का षड्यन्त्र चल रहा है, जिसे हमारे राष्ट्रवादी शासक भी नहीं समझा पा रहे है। जब पैट्रोलियम समाप्त हो जायेगा और बैल भी समाप्त हो जायेंगे, तब यह मानव स्वयं भूखा-प्यासा मर जायेगा। संसार के कृषि वैज्ञानिको! मैं आपको सचेत कर रहा है कि ट्रैक्टर आदि यन्त्रों पर आधारित कृषि एवं बीजों से छेड़छाड़ अन्ततः भूमि की उर्वरा शक्ति को नष्ट कर देगी, पर्यावरण को नष्ट-भ्रष्ट कर देगी, तब आपको मेरी चेतावनी अवश्य याद आयेगी परन्तु तब तक बहुत देर हो जायेगी? मैं मानवता वा राष्ट्रवाद के ध्वजवाहकों को भी चेतावनी दे रहा हूँ कि यदि गौ आदि पशुओं व भूमि की उर्वरा शक्ति को न बचाया गया, तो राष्ट्र व मानवता दोनों में से कोई भी नहीं बचेगा। वस्तुतः वेदविद्या बिना विपरीत बुद्धि होकर यह मानव जाति विनाश के पथ पर अग्रसर है।

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Friday, January 10, 2020

हम नहीं सुधरे...



हमने इस्लामी आक्रान्ताओं के खूनी खेल देखे, हमने अंग्रेजों का बर्बर अत्याचार देखा। हम पिटे, मरे, जेलों में सड़े, परन्तु फिर भी नहीं सुधरे। हमारे ही कुछ धूर्त भाई विदेशी दुष्टों के दलाल व जासूस बने। अल्प स्वार्थ के लिए देश को विदेशियों का दास बना दिया। आज विदेशों की जासूसी व दलाली का घृणित रूप हमारे पढ़े लिखें मूर्खों (बौद्धिक दास) में पुनः उभर रहा है। उनकी भारत व भारतीयता से घृणा सड़कों पर देशद्रोह का खुला खेल खेल रही है। केन्द्र सरकार दुर्बल सिद्ध हो रही है, देशभक्त सो रहे हैं, देशद्रोही हुडदंग कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि पुनः यह देश विदेशी दासता के जाल में फसने जा रहा है।

मेरे देशवासियो! यदि आपको पुनः विदेशियों की मार नहीं खानी है और जरा भी आत्मसम्मान आपमें बचा है, तो एक होकर इस भारत को बचा लो, अन्यथा रोने के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगेगा।

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Tuesday, September 3, 2019

वैदिक भौतिकी के पुनरुत्थान जैसे इस महान् कार्य में किस प्रकार सहयोग कर सकते हैं-


1. सोशल मीडिया पर प्रचार करके
हमारी पोस्ट को विभिन्न वेबसाइट और ऐप्स पर अधिक से अधिक प्रचारित कर सकते हैं।


2. स्वयं आर्थिक सहयोग करके एवं दूसरों से कराके
आप अपने सामथ्र्य के अनुसार एवं न्यास की अनैतिक व्यवसाय से अर्जित धन न लेने की शर्त को ध्यान में रखते हुए हमारी वेबसाइट पर जाकर दान दे सकते हैं और अपने सगे सम्बन्धियों को इस राष्ट्रीय एवं वैदिक यज्ञ में आहुति देने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

3. हमारे साहित्य का प्रचार करके
आप पूज्य आचार्य श्री की अत्यन्त महत्वपूर्ण पुस्तकों (‘वेदविज्ञान-आलोकः’, ‘बोलो! किधर जाओगे?’, ‘मांसाहार - धर्म, अर्थ एवं विज्ञान के आलोक में’, ‘सत्यार्थ प्रकाश उभरते प्रश्न - गरजते उत्तर’, ‘विज्ञान क्या है?’) को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचा कर।


4. वैदिक भौतिकी पर कार्यक्रम आयोजित करा कर 
हमसे सम्पर्क करके अपने आसपास अति प्रबुद्ध, विशेषकर विज्ञान के उच्च स्तरीय छात्रों के मध्य करा सकते हैं।


5. सोशल मीडिया, पत्रिका आदि में हमारे कार्य पर लेख लिख कर
हमारे कार्य को अच्छी तरह से समझकर विभिन्न विषयों पर सरल भाषा में जनसाधारण के लिए सोशल मीडिया एवं पत्रिका आदि में लेख लिख सकते हैं।


6. हमारे कार्य पर वीडियो बनाकर प्रचार करके
हमारे कार्य को अच्छी तरह से समझकर विभिन्न विषयों पर सरल भाषा में जनसाधारण के लिए विडियो बना सकते हैं।


7. बौद्धिक सहयोग दे कर 
नए मौलिक अनुसंधानों की जानकारी अथवा इस अद्भुत कार्य को आगे बढ़ाने हेतु सुझाव हमें मेल द्वारा दे सकते हैं।

8. सरकारी सहायता के लिए प्रयास करके
हमारे कार्य का जानकारी माननीय प्रधानमंत्री महोदय तक पहुँचा कर उनसे इस कार्य के लिए सहयोग और संरक्षण का निवेदन कर सकते हैं।


9. हमारे वेद विज्ञान के अन्तिम लक्ष्य - अर्थात् भारत और विश्व को वेदोक्त आदर्शों पर चला कर सम्पूर्ण मानवजाति के साथ-साथ प्राणिमात्र का कल्याण, में सहयोग के लिए अपने जीवन के एक या अधिक दोषों को त्याग कर और किसी अच्छाई को अपना कर।

10. हमारे सैद्धान्तिक भौतिकी को जनोपयोगी बनाने के लिए इसके आधार पर तकनीक एवं गणित का विकास करने का प्रयास करके।


11. वेद विरोधियों अथवा जिज्ञासुओं को उत्तर देकर
वेदादि शास्त्रों पर हो रहे मिथ्या आक्षेपों अथवा वास्तविक जिज्ञासुओं को, जो भी आपने अबतक समझा है, के आधार पर उत्तर देकर आचार्य श्री का बहुमूल्य समय बचा सकते हैं।



- विशाल आर्य

Related image

#SocialMedia #VaidicPhysics #Donation #Support #Videos #Technology #VaidicScience #SpreadVaidicScience  #Science

Sunday, August 11, 2019

अहिंसा परमो धर्म:


ईश्वर कृपा से धरती के सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य में इतना विवेक जग जाए कि वह संसार के सभी प्राणियों के प्रति दया व प्रेम का व्यवहार करना सीख जाए। जरा विचारें कि वह कोई कसाई किसी पशु को मारता है, चाहे वह धर्म के नाम पर, स्वाद के लिए, व्यापार के लिए अथवा उदरपूर्ति के लिए, उस समय कसाई वा मांस बेचने व खाने वाले प्रसन्न होते हैं और मूक निरीह पशु करुण क्रन्दन करते हैं, छटपटाते हैं, खून के नाले बहते हैं, कौवे, गिद्ध व कुत्ते आदि भी मांस के लालच में दौड़-2 कर आते हैं, मक्खियां भिनभिनाती हैं। कहीं हड्डियां बिखरी होती हैं, कहीं चमड़ा, कहीं मांस के लोथड़े, कहीं गोबर व मूत्र, कहीं शरीर के भीतरी अंग। कितना घृणित व गन्दा दृश्य होता है, परन्तु मांस खाने वाला मसाले व तेल मिलाकर उसे चटरवारे के साथ खाता है, तो कोई इससे ईश्वर वा खुदा को प्रसन्न होता मानकर स्वयं को धर्मात्मा मानता है। धर्म के नाम पर पशु मारने व मांस खाने पर वे भी बधाई देते हैं, जो कभी न तो मांस खाते हैं और न मांसाहार के समर्थक हैं। क्या करें धर्म के नाम पर बुद्धिहीनता का यह खेल निराला है। क्या वह प्राणी भी उसी परमात्मा, जिसने हम सबको पैदा किया, का ही पुत्र नहीं है? तब क्या सभी प्राणी भाई-भाई नहीं है? अहो! सोचो? उसका भाई ही भाई के रक्त का प्यासा हो गया। 

हे बुद्धिवाले मेरे प्यारे मानव विचारो! अपने अन्तरात्मां से विचारों कि क्या मांसाहार व पशुबलि वास्तव में धर्म है अथवा घोर पाप? मुझे विश्वास है कि आपका निर्मल आत्मा सत्य को स्वयं प्रकट कर देगा। पशुओं के शरीर से निकलने वाली पेन वेब्स न केवल वायुमण्डल अपितु सम्पूर्ण पृथिवी व ब्रह्माण्ड को प्रभावित करती हैं। इस प्रभाव से पर्यावरण क्षत-विक्षत होता है, नाना प्राकृतिक प्रकोप आते हैं, नाना रोंगों का जन्म होता है, मन में काम, क्रोध, हिंसा के भाव उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार मांसाहार इस पृथिवी के सर्वाधिक दुःख देने वाला एवं अशान्ति का ताण्डव पैदा करने वाला है। अहो! किसी भूत प्राणी को हम एक मिनट के लिए भी जीवित नहीं कर सकते, तब उसे मारने का हमें क्या अधिकार है?


- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Tuesday, July 23, 2019

भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (1)



भूमिका-1

भगवान् महादेव शिव एक ऐतिहासिक महापुरुष थे, जो देव वर्ग में उत्पन्न हुए थे। कैलाश क्षेत्र इनकी राजधानी थी। आज श्रावणमास के प्रारम्भ से ही देश व विदेश के शिवालयों में पूजा, कीर्तन, कथाएं, शिवलिगं की अश्लील पूजा, जो शिवपुराण में वर्णित दारुवन कथा पर आधारित है तथा इस कथा को कोई सभ्य व सुसंस्कृत महिला वा पुरुष सुन भी नहीं सकते हैं। शिवलिंग पर दूध चढ़ाना, जो बहकर नालियों में जाकर पर्यावरण को प्र्रदूषित करता है, क्या सच्ची पूजा का स्वरूप है? कहीं आम्ररस का अभिषेक ग्रीष्म ऋतु में करते देखा व सुना है? आश्चर्य है कि भगवान् शिव के इस अभागे राष्ट्र में करोड़ों बच्चे वा बूढ़े भरपेट रोटी के लिए तड़पते हों, उस देश में इस प्रकार से दूध बहाना क्या स्वयं उन भूखे नर-नारियों के साथ स्वयं भगवान् शिव का अपमान नहीं है? कितने शिवभक्त भगवान् शिव के विमल व दिव्य चरित्र, शौर्य, ईश्वरभक्ति, योगसाधना एवं अद्भुत ज्ञान-विज्ञान से परिचित हैं? यह आप स्वयं आत्मनिरीक्षण करें। भगवान् शिव कैसे थे, उनकी क्या प्रतिभा थी, उनके क्या उपदेश थे, यह जानने-समझने का न तो किसी के पास अवकाश है और न समझ। इस कारण हम आज से सम्पूर्ण श्रावण मास तक एक श्रंखला के रूप में उनके गम्भीर उपदेशों व ज्ञान विज्ञान को महाभारत ग्रन्थ के आधार पर प्रस्तुत करना प्रारम्भ कर रहे हैं। यह वर्णन भीष्म पितामह के उन उपदेशों, जो उन्होंने शरशय्या पर धर्मराज युधिष्ठिर को दिए थे, में मिलता है। आज यह बड़ी विडिम्बना है कि पौराणिक (कथित सनातनी) भाइयों ने भगवत्पाद महादेव शिव को अत्यन्त अश्लील, चमत्कारी व काल्पनिक रूप में चित्रित किया है, जबकि आर्य समाजी बन्धुओं ने मानो उन्हें कचरे पात्र में फेंक दिया है। ऐसे में उनका यथार्थ चित्रण संसार सम्मुख नितान्त ओझल हो गया है।

पौराणिक बन्धु धर्म नाम से प्रचालित विभिन्न मान्यताओं व कथाओं को बुद्धि के नेत्र बन्द करके अक्षरशः सत्य मान लेते हैं और कोई मिथ्या बातों का खण्डन करे, तो उसे हिन्दूविरोधी कह कर झगडे़ को उद्यत रहते हैं। वे यह भी नहीं सोचते कि मिथ्या कथाओं व अंधविश्वासों के कारण इस भारत और हिन्दू जाति की यह दुर्गति हुई है, भारत का इतिहास और ज्ञान-विज्ञान नष्ट हुआ है, भारत सैकड़ों वर्षों तक विदेशियों का दास रहा है। उधर आर्य समाजी बन्धु बिना गम्भीर चिन्तन व स्वाध्याय के पुराणों के साथ साथ महाभारत, वाल्मीकि रामायण की भी सभी अथवा अधिकांश बातों को गप्पें मानकर खण्डन करने में तत्पर रहते हैं, भले ही उन्हें महादेव, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र जैसे भगवन्तों को ही भूलने का पाप क्यों न करना पड़े, वे खण्डन करने को ही आर्यतव समझ लेते हैं। व नहीं सोचते कि यदि मिथ्या कथाओं का खण्डन करना है, तो इन देवों का सत्य इतिहास तो जाना व जनाया अनिवार्य है।

पाठकों से आग्रह है कि वे इन्हें पढ़ें, विचारें तथा उन पर आचरण करके वास्तविक शिवभक्त बनने का प्रयास करें। ईश्वर हम सबको ऐसा सच्चा शिवभक्त बनने की बुद्धि व शक्ति प्रदान करें, यही कामना है।

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

हनुमान् जी वाले मेरे वीडियो पर उठाए गये प्रश्नों का उत्तर


श्री हनुमान् जी के उड़ कर न जा सकने की हठ से आर्यत्व का कोई भला होने वाला नहीं है। बिना गम्भीर स्वाध्याय के इस विषय पर बालवत् दुराग्रह उचित नहीं। वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड प्रथम सर्ग के श्लोक 211 व 212 में श्री हनुमान् जी के लंका प्रवेश से जुड़े दो श्लोक दिये हैं। वे इस प्रकार हैं-

ततः स लम्बस्य गिरेः समृद्धे विचित्रकूटे निपपात कूटे।
सकेतकोद्दालकनारिकेले महाभ्रकूटप्रतिमो महात्मा।। 211।।

ततस्यु सम्प्राप्य समुद्रतीरं समीक्ष्य लङ्का गिरिवर्यमूध्र्नि।
कपिस्तु तस्मिन् निपपात पर्वते विधूय रूपं व्यथयन्मृगद्विजान्।। 212।।

इन दोनों श्लोकों में ‘निपपात’ पद यह स्पष्ट घोषित करता है कि वे आकाश मार्ग से समुद्र के किनारे स्थित पर्वत पर उतर गये। यदि वे वहाँ तैर रहे होते, तो ‘निपपात’ पद का प्रयोग नहीं होता, बल्कि वहाँ समुद्र तल से पर्वत के ऊपर चढ़ने का वर्णन होता, जबकि कहीं भी चढ़ने का वर्णन नहीं, क्या यही दो प्रमाण पर्याप्त नहीं? यदि वे उड़ नहीं सकते थे, तब संजीवनी लेने क्या पैदल चल कर गये थे? पहाड़ उठा लाने व सूर्य को मुख में रख लेने जैसी बातें हमारे लिए प्रमाण नहीं। वे उड़े भी तैरे भी, इस पर भी प्रश्न? अरे यह तो बच्चे भी जानते हैं कि बतख उड़ती भी है, तैरती भी है और पैरों से चलती भी है। अब कोई बालक उसे पूछे कि जब वह उड़ सकती है, तो तैरती क्यों हैं, चलती क्यों है? तो बतख भी उस बच्चे पर हंसेगी। महर्षियों के ग्रन्थों का अनादर करके अपने मन से शंकाएं वा कुतर्क प्रस्तुत करना आर्यों को उचित नहीं। आर्य समाज के चतुर्थ नियम का पालन अब आर्यों में नहीं रहा। जो युवा वा प्रौढ़ विद्वान् अपने अहंकारवश इतना श्रम अनावश्यक हठ मेें करते हैं, उतना यदि वेदादि शास्त्रों के गम्भीर ज्ञान को समझने में करते, तो आर्य समाज आज कहाँ पहुँच गया होता?

कौन सिद्धियों का प्रयोग करता है, कौन नहीं, यह व्यक्ति पर निर्भर होता है। महर्षि दयानन्द विभूतियों को सत्य मानते थे परन्तु उनके प्रदर्शन को उचित नहीं मानते थे। वैसा ही ऋषियों के विषय में कहा जा सकता है। फिर महर्षि वाल्मीकि के प्रमाण के पश्चात् कुछ भी कहना उचित नहीं। वस्तुतः ये सिद्धियां प्राण विज्ञान का प्रायोगिक रूप प्रतीत होती हैं, कोई योगी अवश्य ही इन्हें करे, यह कोई अनिवार्यता नहीं है। दुर्भाग्य से आर्य समाज में इन विभूतियों को नकारने वाले भी हैं। योगदर्शन व महाभारत के सम्बंध की मेरी चर्चा पर प्रश्न उठाने वाले बच्चों के समान प्रश्न कर रहे हैं। क्या ‘योगदर्शन’ नामक ग्रन्थ लिखे जाने से पूर्व योगी नहीं थे? अतः यह प्रश्न निरर्थक है। हमने महर्षि वाल्मीकि को प्रमाण मानकर श्री हनुमान् जी का उड़ना माना, इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रक्षिप्त श्लोकों को भी प्रमाण मान लें। प्रक्षेप जानने की कसौटी के लिए हमारे ग्रन्थ ‘वेदविज्ञान-आलोकः’ की पूर्वपीठिका पढनीय है।

मैं अपने बहुत बड़े अभियान में लगा हूँ, इस कारण बच्चों के साथ अनावश्यक विवाद में पड़ना नहीं चाहता। ये युवा जो अच्छा कार्य कर रहे हैं, इसकी मैं सराहना भी करता हूँ। जिस कार्य को करने के बारे में अभी तक किसी ने साहस करना तो दूर, सोचा भी नहीं, उसे मैंने किया और आगे भी इसी दिशा में बढ़ रहा हूँ। मैं तो सभी आर्य समाजियों से आग्रह करता हूँ कि वे अनावश्यक खण्डन से बचें, वैदिक विज्ञान को कुछ समझने का प्रयास करें, हाँ, आवश्यक होने पर मिथ्या का खण्डन अवश्य करें। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो हम वेद व आर्य समाज की हानि ही करेंगे, लाभ नहीं।

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Sunday, July 21, 2019

हाँ, हम ऋषियों की सन्तान हैं।



अपनी स्पष्टवक्ता के लिए विद्वान् सांसद श्री डॉक्टर सत्यपाल सिंह जी भूरिशः बधाई व धन्यवाद।

शोक है कि विज्ञान के नाम पर अनेक अंधविश्वास भी आज संपूर्ण विश्व में पनप रहे हैं। विज्ञान की मान्यताएं निरंतर परिवर्तित हो रही हैं, पुनरपि उन्हें कट्टरता से पकड़े रहना बौद्धिक दासता के अतिरिक्त और क्या हैं? डार्विन के विरोध में देश विदेश के अनेक वैज्ञानिकों द्वारा भी बहुत कुछ लिखा हुआ होने पर भी बंदर आदि जानवरों का वंशज होने पर कोई गर्व करें, तो वह स्वतंत्र है। हमें तो महान् प्रज्ञापुरूषों के वंशज होने पर गर्व है। कभी ऐसे अंधविश्वासियों की बुद्धि को भी यथार्थ विज्ञान अवश्य होगा कि वे हमारी भाँति महान् प्रज्ञापुरूष ऋषियों के वंशज हैं। इससे उनमें पावन प्रेरणा जगेगी, भला पशुओं का वंशज होने से कोई क्या प्रेरणा ले सकता है?

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Saturday, July 20, 2019

​वेद भक्त निराश न हो


मेरी प्रिय वेद भक्त महानुभावो! यदि आपको कहीं कोई व्यक्ति वेदों के मिथ्या अर्थ करके वेद की निंदा व अपमान करता हुआ प्रतीत होता है, तो आप उसकी सूचना प्रसिद्ध आर्य विद्वानों अथवा अन्य जो भी वैदिक विद्वान् हों, उनको देने का कष्ट करें। मुझे प्रतीत होता है वे उचित समाधान कर देंगे।

मैं अति व्यस्तता के कारण और किसी विशेष अभियान में लगा होने के कारण ही ऐसा आग्रह कर रहा हूँ, किंतु जब कहीं से भी कोई समाधान प्राप्त न हो सके, तब आप मुझे ऐसी समस्याएँ भेज सकते हैं। कृपया सीधा मुझे नहीं भेजें। अन्त में जब मुझे आप समस्या भेजेंगे, तो मैं उसके समाधान का पूर्ण प्रयास करूँगा।

आशा है आप मेरी विवशता को अवश्य समझेंगे परन्तु मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि आपको इस विषय में निराश होने की कदापि आवश्यकता नहीं है। कोई भी बुद्धिमान् एवं निष्पक्ष व्यक्ति वेद की निंदा नहीं कर सकता।

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Sunday, July 14, 2019

वेद के अध्येता सावधान



(लेखक - आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक)

सोशल मीडिया के एक जागरूक पाठक प्रिय तनिष्क अहलूवालिया ने अपने किसी मुस्लिम मित्र द्वारा ऋग्वेद के दो मंत्रों का निम्नानुसार भाष्य मेरे पास भेजा है।

1. अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान्पिबसि त्वमेषाम्। पचन्ति ते वृषभाँ अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः।। ऋ. 10.28.3

अर्थात् हे इन्द्र! अन्न की कामना से तुम्हारे लिए जिस समय हवन किया जाता है, उस समय यजमान पत्थर के टुकड़ों पर शीघ्रतिशीघ्र सोमरस (शराब) तैयार करते हैं, उसे तुम पीते हो, यजमान बैल पकाते है और उसे तुम खाते हो।

2. उक्ष्णो हि मे प´चदश साकं पचन्ति विंशतिम्। उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ।। ऋ. 10. 86. 14

अर्थात् इन्द्राणी द्वारा प्रेरित यज्ञकत्र्ता मेरे लिए 15-30 बैल काटकर पकाते हैं, जिन्हें खाकर में मोेटा होता हूँ। वे मेरी कुक्षियों को सोम (शराब) से भी भरते हैं।

निश्चित ही ऐसे अर्थों से कोई भी वेदभक्त दुःखी होगा, यही स्थिति श्री तनिष्क अहलूवालिया की हुई है। इस प्रकार का अनुवाद और भी कोई लाकर दे देगा, मैं किस-2 का उत्तर दूँ? यह समस्या है। वास्तव में इसके लिए उनका मुस्लिम मित्र दोषी नहीं है और न वेद की दुर्गति के लिए वामपंथी नास्तिक दोषी हैं, न कोई ईसाई वा अन्य मजहब का व्यक्ति। आज यह दुःखद परम्परा चल रही है कि कोई व्यक्ति हमारी कमियों को दर्शाये, तो हम उनके लिए उसी व्यक्ति व किसी अन्य व्यक्ति, समूह, मजहब वा किसी देश को दोषी ठहरा कर स्वयं को निर्दोष सिद्ध करना चाहतेे हैं।

मेरे प्यारे मित्रो! वेद की दुर्दशा वेद के उन अध्येताओं ने की है, जो संस्कृत भाषा, व्याकरण आदि के तो महान् विद्वान् थे परन्तु वेदादि शास्त्रों के यथार्थ विज्ञान से नितान्त दूर थे। जब ऐसे लोगों ने वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ आदि महान् ग्रन्थों का भाष्य किया, तो उन्होंने ऐसे ही अर्थ निकाले, जैसा कि ऊपर दिखाया गया है। स्वयं को सनातनी कहने वाले पौराणिक हिन्दुओं में प्रसिद्ध वेदभाष्यकार माने जाने वाले आचार्य सायण, महीधर आदि के वेदभाष्यों में ऐसे मिथ्या व पापपूर्ण भाष्यों की भरमार है। इन्हीं भाष्यकारों का अनुकरण विदेशी भाष्यकारों ने भी किया है, जिन्हें पढ़कर भारत के कथित बुद्धिजीवी वेद का उपहास करते हैं। इन मंत्रों का आचार्य सायण आदि ने जो भाष्य किया है, उसमें भी यही पाप विद्यमान है। दुर्भाग्य यह है कि कथित हिन्दू समाज इन भाष्यकारों को छोड़ने तथा महर्षि दयानन्द सरस्वती एवं आर्य विद्वानों के भाष्यों को स्वीकार करने को आज तक उद्यत नहीं है। यह बड़े शोक का विषय है कि जिस देश को अपनी वेदविद्या से भूमण्डल में महान् भौतिक व अध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान का प्रकाश करना था और वह महाभारत तक ऐसा करने के कारण जगद्गुरु कहलाता भी था, उसने ही संसार भर को मांसाहार, पशुबलि, मदिरापान व दुराचार जैसे पाप भी सिखाये हैं। इतने पर भी मूर्खतापूर्वक इन सबका दोष केवल विदेशियों एवं वामपंथियों के सिर मढ़ देते हैं।

मित्रो! वेद को समझने की एक अपनी प्रक्रिया है। यह कोई सामान्य संस्कृत भाषा का काव्य नहीं है, जो कोई भी उसका किसी भी भाषा में अपनी इच्छा व भावना से अनुवाद कर दे। वेद को समझने के लिए पाणिनीय व्याकरण ही पर्याप्त नहीं है, अपितु इसके साथ ही निरुक्त, दर्शन, ब्राह्मणग्रन्थ, उपनिषद्, छन्द शास्त्र आदि अनेक आर्ष ग्रन्थों का गम्भीर ज्ञान आवश्यक है और इसके लिए उचित वैज्ञानिक तर्क व ऊहा से सम्पन्न प्रतिभाशाली सात्विकी बुद्धि का होना, परमेश्वर की कृपा व विश्वास, उसकी यथार्थ उपासना, निष्काम जीवन व पूर्ण सतोगुणी भोजन तथा ब्रह्मचर्यादि व्रतों का सेवन भी आवश्यक है। ध्यातव्य है कि सुतर्क व ऊहा से युक्त वैज्ञानिकता, पूर्ण सदाचार तथा निष्कामता के बिना आर्ष ग्रन्थों का भी विज्ञान कभी भी नहीं हो सकता।

ऐसे में कोई तामसी, मांसाहारी, मूढ़मति अपने संस्कृत भाषा के ज्ञान के अहंकार में भरकर वेद आदि शास्त्रों का भाष्य करेगा, वह बन्दर के हाथ में उस्तरा देकर हजामत कराने जैसी मूर्खता होगी। दुर्भाग्यवश आज यही हो रहा है और इसका अनुचित लाभ डाॅ. जाकिर नाइक जैसे चतुर वेदविरोधी लोग तथा राष्ट्रविरोधी व नास्तिक वामपंथी विचारक उठाकर हिन्दुओं को वेदमार्ग के साथ-2 भारतीय जीवन मूल्यों से भी दूर कर रहे हैं।

मैं वेद के सभी पाठकों से आग्रह करता हूँ कि वे वेद पर कुछ भी विचार करने से पूर्व महर्षि दयानन्दकृत सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, मेरी पुस्तक ‘’बोलो! किधर जाओगे?’’ का अध्ययन अवश्य करें। यदि आप उच्च शिक्षित वैज्ञानिक मेधा से सम्पन्न हैं, तब मेरे ग्रन्थ ‘वेदविज्ञान-आलोकः’ को ध्यान से पढ़ें, उसके पश्चात् ही वेद का मर्म समझ में आयेगा। इस बार तो मैंने उत्तर दे दिया है, परन्तु अब आगे मैं इस प्रकार के किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दूंगा। इसमें मेरा बहुत समय व्यर्थ व्यतीत होता है। कोई भी व्यक्ति किसी भी वेदमंत्र का किसी भी मूर्ख द्वारा किया हुआ अनुवाद अथवा भाष्य लाकर मुझसे शिकायत करेगा, तो उसका मैं कब तक उत्तर दूंगा? जब तक प्रश्नकत्र्ता मेरे द्वारा सुझाये गये ग्रन्थों को पढ़ नहीं ले, तब तक में उत्तर नहीं दे पाऊंगा।

अब मैं उपर्युक्त मंत्रों के विभिन्न भाष्य उद्घृत करता हूँ-

आचार्य सायण भाष्य-

1. अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान्पिबसि त्वमेषाम्। पचन्ति ते वृषभां अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः।। ऋ. 10.28.3

हे इन्द्र ते त्वदर्थं मंदिनो मादयितं¤स्तूयानविलंबितान्सोमानद्रिणाभिषवग्राव्णा सुन्वंति। यजमाना अभिषुण्वंति। एषामत्मदादियजमानानां संबंधिनः सोमांस्त्वं पिबसि। किंच त्वदर्थं वृषभान्पशून्ये च यजमानाः पचंति तेषां संबंधिनो हविर्भूतान्पशूनत्सि। भक्षयसि। हे मघवन्धनवन्निंद्र त्वं यदा पृक्षेण हविर्भूतेनान्नेन निमित्तेन हूयमानः यजमानैर्हूयसे तदेति पूर्वेण संबंधः।।

2. उक्ष्णो हि मे प´चदश साकं पचन्ति विंशतिम्। उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ।। ऋ. 10. 86. 14

अथेंद्रो ब्रवीति। मे मदर्थं पंचदश पंचदशसंख्याकान् विंशतिं विंशतिसंख्याकांश्चोक्ष्णो वृषभान् साकं सह मम भार्ययंेेद्रण्या प्रेरिता यष्टारः पचंति। उतापि चाहमùि। तान्भक्षयामि। जग्ध्वा चाहं पीव इत् स्थूल एव भवामीति शेषः। किंच मे ममोभोभौ कुक्षो पृणंति। सोमेन पूरयंति यष्टारः। सोऽहमिंद्रः सर्वस्मादुत्तरः।।
इन दोनों ही भाष्यों में वही मांसभक्षण व हिंसा का पाप विद्यमान है, जिसको लेकर कोई भी वेद की निन्दा कर सकता है। आचार्य सायणदि के भक्त मेरे पौराणिक बन्धु, जो स्वयं को व्यर्थ ही सनातनी कहते हैं, क्या इस मांसभक्षण व गोहत्या के पाप से बचने हेतु महर्षि दयानन्द जी की शैली को अपनाने की इच्छा करेंगे?

आर्यविद्वान् स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक कृत भाष्य-

1. अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान्पिबसि त्वमेषाम्। पचन्ति ते वृषभाँ अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः।। ऋ. 10.28.3

संस्कृतान्वयार्थः- (इन्द्र) हे आत्मन्! राजन्! वा (ते) तुभ्यम् (अद्रिणा) श्लोककृता प्रशंसकेन वैद्येन पुरोहितेन वा प्रेरिता ‘‘अद्रिरसि श्लोककृत्’’ {काठ. 1/5} (मन्दिनः) तव हर्षयितारः पारिवारिका जना राजकर्मचारिणो वा (तूयान् सोमान् सुन्वन्ति) जलमयान् रसमयान् ‘‘तूयम् उदकनाम’’ {निघं. 1/6} सोमरसान् सम्पादयन्ति (तेषां पिबसि) तान् त्वं पिबेः ‘‘लिङर्थें लेट्’’ {अष्टा 3/4/7} अथ (ते) तुभ्यम् (वृषभान् पचन्ति) सुखरसवर्षकान् ‘‘वृषभः-यो वर्षति सुखानि सः’’ {ऋ. 1/31/5 दयानन्दः} ‘‘वृषभः-वर्षिताऽपाम्’’ {निरु. 4/8} सम्पादयन्ति (मघवन्) पृक्षेण हूयमानः। हे आत्मन् राजन् वा स्नेहसम्पर्केणाहूयमानो निमन्त्रयमाणः (तेषाम्-‘अत्सि) तान् त्वं भुङ्क्ष्व-भुङ्क्षे।। 3 ।।
भाषान्वयार्थ- (इन्द्र) हे आत्मन् या राजन्। (ते) तेरे लिये (अद्रिणा) प्रशंसक वैद्या या पुरोहित से प्रेरित (मन्दिनः) तेरे प्रसन्न करने वाले पारिवारिक जन या राजकर्मचारी (तूयान् सोमान् सुन्वन्ति) रसमय सोमों को तय्यार करते हैं (तेषां पिबसि) उनको तू पी और (ते) तेरे लिए (वृषभान् पचन्ति) सुख बरसाने वाले भोगों को तय्यार करते हैं (मघवन् पृक्षेण हूयमानः) हे आत्मन्! या राजन्! स्नेह सम्पर्क से निमन्त्रित किया जाता हुआ (तेषाम्-अत्सि) उन्हें तू भोग।। 3 ।।

भावार्थ- आत्मा जब शरीर में आता है, तब उसे अनुमोदित करने वाले वैद्य और प्रसन्न करने वाले पारिवारिक जन अनेक रसों और योग्य पदार्थों को उसके लिये तैयार करते हैं और स्नेह से खिलाते पिलाते हैं, जिससे कि शरीर पुष्ट होता चला जावे तथा राजा राजपद पर विराजमान होता है, तब उसके प्रशंसक पुरोहित और प्रसन्न करने वाले राजकर्मचारी सोमादि औषधियों के रस और भोगों को तैयार करते है, वह स्नेह से आदर पाया हुआ उनका सेवन करता है।। 3 ।।

2. उक्ष्णो हि मे प´चदश साकं पचन्ति विंशतिम्। उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ।। ऋ. 10. 86. 14

भाषान्वयार्थ- (मे हि प´चदश साकं विंशतिम्) मेरे लिये ही पन्द्रह और साथ बीस अर्थात् पैंतीस (उक्ष्णः पचन्ति) ग्रहों को प्राकृतिक नियम सम्पन्न करते हैं (उत-अहम्-अद्मि) हाँ मैं उन्हें खगोल में ग्रहण करता हूँ (पीवः) इसलिये मैं प्रवृद्ध हो गया हूँ (मे-उभा कुक्षी-इत् पृणन्ति) मेरे दोनों पाश्र्व अर्थात् उत्तर गोलार्ध दक्षिण गोलार्धों को उन ग्रह उपग्रहों से प्राकृतिक नियम भर देते हैं।।

आर्य विद्वान् आचार्य वैधनाथ शास्त्री कृत भाष्य-

1. अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान्पिबसि त्वमेषाम्। पचन्ति ते वृषभां अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः।। ऋ. 10.28.3

पदार्थ- (इन्द्र) हे राजन्!(ते) तेरे लिए (मन्दिनः) हर्षदायक (तूयान्) शीघ्र पचने वाले (सोमान्) सोम आदि औषधियों को (अद्रिणा) पाषाण आदि के साधनों से (सुन्वन्ति) वैद्यजन तैयार करते हैं, (एषाम्) इन सोम आदिकों को (त्वम्) तू (पिबसि) पीता है, हे धन के स्वामिन्! (पृक्षेण) स्नेह से (हूयमानः) बुलाये गए आप (ते) वे वैद्यजन (वृषभान्) वृषभ नाम की बलदायक औषधियों को (पचन्ति) पकाते हैं (तेषाम्) उनकी इन औषधियों को (अत्सि) खाते हो।
भावार्थ- हे राजन्! प्रेम से बुलाये गए आप वैद्य जनों द्वारा तैयार किये गये सोम आदि औषध और उनके द्वारा पकाये गये बलदायक ‘वृषभ’ नामक औषध को पीते और खाते हो।। 3 ।।

2. उक्ष्णो हि मे प´चदश साकं पचन्ति विंशतिम्। उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ।। ऋ. 10. 86. 14

पदार्थ- (पंचदश) दश प्राण और पंचभूत ये पन्द्रह पदार्थ, (मे) मेरे द्वारा बनाये गये (उक्ष्णः) सुखों के वर्षक शरीरों के (विंशतिम्) 20 अंगों को (साकम् हि) साथ ही (पचन्ति) पका कर पुष्ट करते हैं (उत) और (मे) मेरे द्वारा प्रदत्त शरीर के (उभाकुक्षी) दोनों पाश्र्वों को (पृणन्ति) पूर्ण करते हैं। (अहम्) मैं (पीव इत्) सर्वदा परिपुष्ट इस सबको प्रलयकाल में (अद्मि) अपने अन्दर समा लेता हूँ, (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् प्रभु (विश्वस्मात्) सब पदार्थों से सूक्ष्म और उत्कृष्ट है।

भावार्थ- दश प्राण और पंचभूत परमेश्वर द्वारा बनाए गए शरीरों के बीस अंगों को साथ ही परिपक्व करके पुष्ट करते हैं और मेरे द्वारा प्रदत्त दोनों पाश्र्वों को भी परिपूर्ण करते हैं। मैं सर्वदा परिपुष्ट इन्द्र = परमेश्वर इन सबको प्रलयकाल में अपने अन्दर समेट लेता हूँ। परमैश्ववर्यवान् प्रभू सब पदार्थों से सूक्ष्म और उत्कृष्ट है।। 14 ।। 

चतुर्वेदभाष्यकार पं. जयदेव शर्मा ‘मीमांसातीर्थ’ का भाष्यकार कृत भाष्य-

1. अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान्पिबसि त्वमेषाम्। पचन्ति ते वृषभां अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः।। ऋ. 10.28.3

भाष्य- हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवान्! (मन्दिनः) स्तुतिशील (ते) तेरे लिए (अद्रिणा) विदीर्ण न होने वाले दृढ़ क्षात्र बल से (तूयान्) आशुगामी (सोमान्) वीर पुरुषों का (सुन्वन्ति) अभिषेक करते हैं। (त्वम् एषाम्) तू इनका (पिबसि) पालन करता है। (ते) तेरे लिए वे (वृषभान्) बलवान् पुरुषों को (पचन्ति) दृढ़ करते हैं, हे (मघवन्) ऐश्वर्यवान्! तू (हूयमानः) आदरपूर्वक प्रार्थना किया जाकर (तेषाम पृक्षेण) उनके स्नेह से (अत्सि) ऐश्वर्य का भोग करता है।

2. उक्ष्णो हि मे प´चदश साकं पचन्ति विंशतिम्। उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ।। ऋ. 10. 86. 14

भाष्य- (मे) मेरे (पंचदश उक्ष्णः) 15 प्राणों को, (पंचदश) और हाथ पैर की 20 अंगुलियों के समान शरीर के भीतर 20 अंगों को विद्वान् लोग (साकं पचन्ति) एक साथ परिपाक, ज्ञान और अभ्यास से दृढ़ करते हैं। (उत्) और मे (पीवः) परिपुष्ट होकर (अद्मि) उन सब का भोग करता हूँ। वे प्राण (मे) मेरे (कुक्षी) दोनों पाश्र्वों में (पृणन्ति) देह के दायें बायें ओर अपने 2 स्थान पर अंग-प्रत्यंग में व्यापते हैं। वह (इन्द्रः) अद्भुत शक्तिशाली प्रभु (विश्वस्मात् उत्तरः) सबसे ऊपर है। उसकी देेह-रचना का कौशल अविज्ञेय है।

इस ऋचा का ऋषि वसुक्रः है। (वसुक्रः = ब्रह्म वै वसुक्रः) (ऐ. आ. 1.2.2), ब्रह्म = प्राणा-पानौ ब्रह्म (गो. पू. 2.11)
इसका तात्पर्य यह है कि इस छन्द रश्मि की उत्पत्ति प्राण व अपान के मिथुन से होती है। इसका देवता इन्द्र होने से इसके दैवत प्रभाव से इन्द्र तत्व अर्थात् तीक्ष्ण विद्युत् तरंगें समृद्ध होती हैं। इसका छन्द आर्षी निचृत् त्रिष्टुप् है। इसके छान्दस प्रभाव से इन्द्र तत्व तीक्ष्ण तेज व बल से युक्त होता है।


इस सबके पश्चात् मैं इन दोनों मंत्रों का तीन प्रकार का भाष्य प्रस्तुत करता हूँ।

अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान्पिसि त्वमेषाम्।
पचन्ति ते वृषभां अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः।। ऋ. 10.28.3

आधिदैविक भाष्य- यहाँ संवाद की शैली में सृष्टि विद्या को समझाया गया है। यहाँ छन्द रश्मि का ऋषिरूप प्राण-अपान युग्म इन्द्र तत्व अर्थात् तीक्ष्ण विद्युत् आवेशित तरंगों से कहता है- (इन्द्र) हे इन्द्र तत्व अर्थात् तीक्ष्ण विद्युत् तरंगो! (ते) तुम्हारे लिए (अद्रिणा) {आद्रिः = अद्रिरसि श्लोककृत् (का.1.5), मेघनाम (निघं. 1.10), यो अत्ति अदन्ति यत्रेति वा स अद्रिः (उ.को. 4.66) (श्लोकः = वाङ्नाम) (निघं. 1.11)} काॅस्मिक मेघों के अन्दर (यहाँ सप्तमी अर्थ में तृतीया का प्रयोग है।) विभिन्न वाग् रश्मियों को उत्पन्न करने वाली सूक्ष्म प्राणादि रश्मियों से प्रेरित किंवा उनके सहयोग से (मन्दिनः) नाना प्रकार की कमनीय छन्द रश्मियां (तूयान् सोमान्) {तूयम् क्षिप्रनाम (निघं. 2.15), उदकनाम (निघं. 1.12)} शीघ्र गमन करने वाली तथा सम्पूर्ण काॅस्मिक मेघ को सिचत् करने वाली सोम रश्मियों को (सुन्वन्ति) उत्पन्न करती हैं किंवा उस काॅस्मिक मेघस्थ पदार्थ को सम्पीडित करके मानो उससे सूक्ष्म सोम रश्मियों को निचोड़ती हैं। (त्वं, तेषां पिबसि) हे इन्द्र तत्व अर्थात् बलवती तीक्ष्ण विद्युदावेशित तरंगो! तुम उन सोम रश्मियों को पीओ अर्थात् अवशोषित करो। (ते) तुम्हारे लिए (वृषभान्) {वृषभः = स एव (आदित्यः) सप्तरश्मिर्वृषभस्तुुुविष्मान् (जै. उ. 1.28.2) (तुविरिति बलनाम - निघं. 3.1)} उस काॅस्मिक मेघ में अनेकों प्रकार के बहु आकर्षण बलयुक्त आदित्यलोकों अर्थात् विशालतारों को (पचन्ति) परिपक्व करते हैं अर्थात् सोम रश्मि से समृद्ध इन्द्र तत्व अर्थात् तीक्ष्ण विद्युदावेशित तंरगें उन विशाल तारों को उत्पन्न व परिपक्व करती हैं। (मघवन्) {मघवान् = स उ एव मखः स विष्णुः। ततः इन्द्रो मखवान् अभवत् मखवान् है वै तं मघवान मित्याचक्षते परोक्षम् (श. 14.1.1.13) (मखः = यज्ञनाम) (निघं. 3.17), यज्ञो वै मखः (तै. ब्रा. 3.2.8.3) एष वै मखो य एष (सूर्यः) तपति (श. 14.1.3.5)} विभिन्न प्रकार की संयोग-वियोगादि क्रियाओं एवं नाना प्रकार की प्रकाश तरंगों से परिपूर्ण सूर्यादि तारा (पृक्षेण) { पृक्ष = अन्ननाम (निघं. 2.7) संयोज्य कणों की असंख्य धाराओं के द्वारा (हूयमानः) अनेक प्रकार के संघर्षण एवं तज्जन्य नाना उच्च ध्वनियों को उत्पन्न करता हुआ वह विशाल काॅस्मिक मेघ (तेषाम्-अत्सि) उन सूर्यादि तारों को अपने अन्दर निगले रहते हैं अर्थात् अपने गर्भ में समाए रहते हैं।

भावार्थ- जब विशाल काॅस्मिक मेघ के अन्दर विद्यमान् सूक्ष्म प्राण रश्मियों से प्रेरित होकर विभिन्न छन्द रश्मियों के द्वारा उस काॅस्मिक मेघ का सम्पीडन होना प्रारम्भ होता है, उस समय उस विशाल मेघ रूप पदार्थ में उन छन्द व प्राण रूप रश्मियों से सोम अर्थात् सूक्ष्म मरुद् रश्मियां उत्पन्न होने लगती हैं। जब उस काॅस्मिक मेघ में व्याप्त विद्युदावेशित तरंगें उन सोम रश्मियों को अवशोषित करती हैं, तब वे तीव्र बल व ऊर्जा से सम्पन्न होने लगती हैं। इसके पश्चात् उस काॅस्मिक मेघ में नाना प्रकार से सम्पीडन क्रिया प्रारम्भ होकर सम्पीडन के अनेक केन्द्रों की उत्पत्ति होने लगती है। इसके साथ उन केन्द्रों के आस-पास विभिन्न प्रकार के आयन्स की धाराएं बहने लगती हैं। इससे सम्पूर्ण काॅस्मिक मेघ में नाना प्रकार के गम्भीर उच्च घोष उत्पन्न होने लगते हैं। इस प्रकार उस सम्पूर्ण मेघ रूप पदार्थ में अनेंकों सूर्यों का गर्भ पल रहा होता है।

इस ऋचा (छन्द रश्मि) का सृष्टि प्रक्रिया पर प्रभाव- इसके प्रभाव से काॅस्मिक मेघ में विद्युदावेशित कणों की अनेकों धाराएं बहने लगती हैं, जो वहाँ विद्यमान् सूक्ष्म छन्द वा मरुद् रश्मियों को अवशोषित करके तीव्रतर रूप को प्राप्त होती हैं। इन धाराओं से युक्त काॅस्मिक मेघ अपने गुरुत्व बल एवं नाना छन्द व प्राण रश्मियों के प्रभाव से सम्पीडत होने लगता है और इस सम्पीडन क्रिया के समय ही उस विशाल मेघ के अन्दर विभिन्न तारों के केन्द्रों का निर्माण होकर उनका गर्भ पलने लगता है।

आधिभौतिक भाष्य- (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवान् राजन् (ते) तेरे लिए (अद्रिणा) {अद्रिरसि श्लोककृत् (का.1.5)} तेरी प्रशंसा करने वाले हितैषी वैद्यादि जनों से प्रेरित (मन्दिनः) तुझे चाहने व प्रसन्न करने वाले परिवारी जन अथवा राष्ट्र के नागरिक (तूयान् सोमान्) {सोमः पशुर्वै प्रत्यक्षं सोमः (श.5.1.3.7) यशो वै सोमः (श.4.2.4.9) सोम ओषधीनामधिराजः (गो. उ. 1.17), अन्नं सोमः (कां. 9.9)} शीघ्रगामी अश्वादि पशुओं को, तेरे यश व प्रतिष्ठा को, तेरे लिए उत्तम अन्न व औषधियों को (सुन्वन्ति) प्रदान करते हैं, उत्पन्न करते हैं। हे राजन्! (तेषां, पिबसि) तुम उन अश्वादि पशुओं का संरक्षण करो {यहाँ ध्यान रहे कि ‘पा’ पाने धातु का अर्थ पीना के साथ-2 संरक्षण करना भी है। प्रकरण के अनुसार सोम का अर्थ पशु ग्रहण करने पर ‘पा’ धातु का अर्थ संरक्षण करना ग्रहण करना चाहिए। इस धातु के अर्थ के लिए देखें-संस्कृत-धातु-कोष-पं. युधिष्ठिर मीमांसाक} तथा उत्तम अन्न व औषधि आदि रसों का संरक्षण भी करो और उनका पान करो। इसके साथ ही अपने राष्ट्र के नागरिकों द्वारा जो सम्मान व प्रतिष्ठा प्राप्त हो रही है, उसका भोग करते हुए ऐसे कार्य करो कि उस यश का सदैव संरक्षण ही होवे, न कि उसमें किसी प्रकार की न्यूनता आने पावे।

(ते) हे राजन्! तेरे लिए (वृषभान् पचन्ति) वैद्यजन वृषभ नामक ऋषभकन्द औषधि एवं वीर्यवर्धक अनेक अन्न व औषधियों को पकाते हैं। { श्री वैंकटेश्वर प्रेस, मुम्बई में छपे औषधियों में अनेक वनस्पतियों के नाम पशु संज्ञक दिए हैं। पढ़ें- मेरे द्वारा लिखित मांसाहार-धर्म, अर्थ और विज्ञान के आलोक में} (मघवन्) हे धनैश्वर्यवान् राजन्! (पृक्षेण) अपने स्नेह सम्पर्क के द्वारा (हूयमानः) अपने प्रजाजनों के साथ मधुर संवाद व व्यवहार करते हुए (तेषाम्-अत्सि) उनके द्वारा प्रदत्त कर आदि का उपयोग कर किंवा उनके साथ आनन्द का भोग कर।

भावार्थ- किसी राष्ट्र के राजा के हितैषी वैद्य वा राजपरिवारी जन राजा के लिए उत्तम अन्न औषधियों को तैयार करते रहें। उस राष्ट्र के नागरिकों के मन में अपने राजा के प्रति यश व सम्मान का भाव होवे तथा वह राजा भी अपने प्रजाजनों के साथ निरन्तर स्नेह संपर्क के द्वारा मधुर व्यवहार करते हुए उचित मात्रा में करों का संग्रहण करके उनके साथ मिलकर आनन्द व ऐश्वर्य का भोग करे अर्थात् प्रजा को दुःखी करके राजा कभी व्यक्तिगत सुख की आकांशा नहीं करे और न जन सामान्य से कठोर व्यवहार करे।

आध्यात्मिक भाष्य- (इन्द्र) हे जीवात्मन् वा योगसाधक! (ते) तेरे लिए (अद्रिणा) अपने अन्तः करण में वेद की ऋचाओं को धारण करने वाले ऋषियों द्वारा प्रेरित (मन्दिनः) तेरा प्रिय चाहने वाले ईश्वर के स्तोता आचार्य अपनी शिक्षा के द्वारा (तूयान् सोमान्) {सोमः = सत्यं श्रीज्र्योतिः सोमः (श. 5.1.2.10) प्राणः सोमः (श. 7.3.1.2), तूर्यम् = सुखकरम् (म.द.ऋ.मा.3.52.8)} सत्य स्वरूप एवं प्राणों के प्राण परमेश्वर की आनन्द ज्योति को (सुन्वन्ति) प्रकट कराते हैं। (तेषां, पिबसि) हे योगिजनो! तुम उस परमानन्द रूपी रस का पान करो। (ते) वे योगी आचार्य तुम्हारे लिए (वृषभान् पचन्ति) आपके आत्मा व अन्तःकरण में ब्रह्मानन्द की वर्षा कराने वाली दिव्य ज्योति को विकसित व परिपक्व करते हैं अर्थात् उनके मार्गदर्शन में की गयी योगसाधना से समाधिजन्य प्रज्ञा व आनन्द की पुष्टि होती है। (मघवन्) हे योगधन से युक्त योगसाधक (पृक्षेण) अपने आत्मा व अन्तःकरण में प्राण व वेद की ऋचाओं की सुखद वृष्टि के द्वारा (हूयमानः) परब्रह्म का आह्वान करते हुए (तेषाम् अत्सि) उस परमानन्द की वृष्टि एवं प्राण ऊर्जा का उपभोेेग करके अपने आत्मा व अन्तःकरण के बल को बढ़ाता रहा।

भावार्थ- परब्रह्म के साक्षात्कृतधर्मा एवं वेद की ऋचाओं को अपने अन्तःकरण में बसाने वाले ऋषियों से प्रेरित योग के आचार्य अपने योगसाधक शिष्य को परब्रह्म का साक्षात्कार कराते हैं। वे आचार्य अपने शिष्यों के भीतर ब्रह्म की ज्योेेेेति का प्रकाश कराके उसे पुष्ट भी करते हैं। इस कारण वे योगसाधक शिष्य परमेश्वर की दिव्य ज्योति एवं प्राण ऊर्जा को प्राप्त करके अपने आत्मा व अन्तःकरण को बलवान् बनाने में सक्षम होते हैं।

इस ऋचा का ऋषि वृषाकपिरिन्द्र इन्द्राणी है, इसका तात्पर्य है कि इस छन्द रश्मि की उत्पत्ति विशेष बलशाली व विभिन्न रश्मियों को कम्पाने वाले सूत्रात्मा वायु के विशेष रूप से होती है। (देखें- वेदविज्ञान-आलोकः - पृ. 1462) इसका देवता इन्द्र होने से इन्द्र तत्व अर्थात् सूर्य लोक एवं उसके अन्दर विद्यमान तीक्ष्ण विद्युदावेशित तरंगें तीव्रता को प्राप्त होती हैं। इसका छन्द पंक्ति होने से सूर्यादि तारों के अन्दर विभिन्न प्रकार की संयोजन व वियोजनादि विस्तार को प्राप्त करती हैं।

आधिदैविक भाष्य- (मे हि प´चदश साकं विंशतिम्) मेरे अर्थात् पूर्वोक्त विशेष सूत्रात्मा वायु के द्वारा {तृतीयार्थ में चतुर्थी का प्रयोग है।} ही पन्द्रह अर्थात् प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त एवं धनंजय ये दस प्राथमिक प्राण तथा सूत्रात्मा वायु, भूः, भुवः, स्वः एवं हिम् अथवा पंच महाभूत ये पांच मिलाकर पन्द्रह प्राथमिक सूक्ष्म रश्मि आदि पदार्थों के साथ-2 बीस अर्थात् 12 मास, 6 ऋतु रश्मियां, मनस्तत्व एवं ओम् रश्मि अथवा 12 मास एवं गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप्, जगती के अतिरिक्त अतिच्छन्द रश्मियां, ये 20 प्रकार की रश्मियां, इस प्रकार कुल 35 प्रकार के रश्मि आदि पदार्थ (उक्ष्णः) {उक्षा = उक्षतेर्वृद्धिकर्मणः उक्षन्त्युदकेनेति वा (निघं. 12.9)} वर्षा आदि के द्वारा सींचने में समर्थ अथवा प्रकाशादि किरणों के द्वारा विभिन्न लोकों को प्रकाशित करने में समर्थ विशाल सूर्यादि लोकों को (पचन्ति) परिपक्व वा पुष्ट करते हैं अर्थात् उपर्युक्त पैंतीस प्रकार के रश्मि आदि पदार्थों के द्वारा ही विशाल काॅस्मिक मेघों में विभिन्न तारों का निमार्ण होता है। (उत) और (अहम्) मैं अर्थात् इस छन्द रश्मि के ऋषिरूप सूत्रात्मा वायु का विशेष स्वरूप (अद्मि) इन सभी पैंतीस रश्मि आदि पदार्थों का भक्षण करता है अर्थात् सबको एकसूत्र में बांधकर सूर्य लोकादि विभिन्न लोकों को भी अपने अन्दर समाहित कर लेता है। (पीवः) इस प्रक्रिया के समय वह सूत्रात्मा वायु अति विस्तृत रूप धारण करके सम्पूर्ण सौरमण्डल, गैलेक्सी आदि में व्याप्त हो जाता है। (मे) मेरे अर्थात् उस विशेष सूत्रात्मा वायु के (उभा) दोनों रूप अर्थात् सम्पूर्ण लोकों को आच्छादित करने वाले तथा विभिन्न सूक्ष्म कणों व रश्मियों को ढकने वाले दोनों रूप सम्पूर्ण काॅस्मिक मेघ, गैलेक्सी, सौरमण्डल आदि के अन्दर व बाहर सर्वत्र व्याप्त हो जाते हैं। (इन्द्रः) वह इन्द्र अर्थात् विद्युत चुम्बकीय तंरगें, विद्युदावेशित तरंगें तथा सूर्यादि लोक अन्य लोकों से उत्कृष्ट स्वरूप को प्राप्त करते हैं।

भावार्थ- जब किसी काॅस्मिक मेघ के अन्दर दस प्राथमिक प्राण, पंच महाभूत अथवा सूत्रात्मा , हिम् , भूः, भुवः व स्वः, ये सब पन्द्र्र्र्र्रह पदार्थों के साथ 8 प्रकार की छन्द व 12 प्रकार की मास रश्मियां मिल कर अर्थात् कुल 35 प्रकार के रश्मि आदि पदार्थ विशेष सक्रिय होते हैं, उस समय उस विशाल मेघ के अन्दर नाना प्रकार के तारों का जन्म होने लगता है। उस समय सूत्रात्मा वायु अति विस्तृत होकर सभी पदार्थों के साथ-2 सम्पूर्ण काॅस्मिक मेघ को अपने अन्दर व्याप्त कर लेता है। इन सभी लोकों में सूत्रात्मा वायु रश्मियों के दोनों रूप अर्थात् एक वह रूप, जो सूक्ष्म रश्मियों वा कणों को परस्पर जोड़ने में सहायक होता है और दूसरा, जो विभिन्न लोकों के गुरुत्वाकर्षण बल का एक महत्वपूर्ण भाग बनकर उन्हें थामे व जोड़े रखता है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सक्रिय होते हैं। इससे विभिन्न प्रकार के विकिरण व लोकों को उत्कृष्ट स्वरूप प्राप्त होता है।

आधिभौतिक भाष्य- (मे हि पंचदश साकं विंशतिम्) मैं अर्थात् राजा अपने पांच प्राण, पांच ज्ञानेन्द्रियांे व पांच कर्मेन्द्रियों को वश में करके दश कामज व्यसन { अक्ष अर्थात् चैपड़ खेलना, जुवा खेलना, दिन में सोना, कामकथा वा दूसरे की निन्दा किया करना, स्त्रियों का अति संग, मादकद्रव्य अर्थात् मद्य, अफीम, भाँग, गाँजा, चरस आदि का सेवन, गाना बजाना, नाचना व नाच कराना, सुनना और देखना, वृथा इधर-उधर घूमते रहना।- मनुस्मृति- सत्यार्थ प्रकाश के षष्ठ समुल्लास से उद्घृत} व आठ क्रोधज व्यसन { पैशुन्यम् अर्थात् चुगली करना, बिना विचारे बलात्कार से किसी की स्त्री से बुरा काम करना, द्रोह रखना, ईष्र्या अर्थात् दूसरे की बड़ाई वा उन्नति देख कर जला करना, असूया दोषों में गुण, गुणों में दोषारोपण करना, अर्थदूषण अर्थात् अधर्मयुक्त बुरे कामों में धनादि का व्यय करना, कठोर वचन बोलना और बिना अपराध कड़ा वचन वा विशेष दण्ड देना।- मनुस्मृति- सत्यार्थ प्रकाश के षष्ठ समुल्लास से उद्घृत} अविद्या व प्रमाद, इन बीस दुव्र्यसनों को जीत कर (उक्ष्णः) प्रजा के लिए अपने सुख व पराक्रम वर्षक स्वरूप को (पचन्ति) परिपक्व करता है {यहाँ बहुवचन प्रयोग व्यत्यय से हुआ है।} (उत) और (अहम्) मैं सुखवर्षक राजा (अद्मि) सम्पूर्ण राष्ट्र के दुःख, अविद्या, दरिद्रता, अशान्ति एवं असुरक्षा आदि को नष्ट करता हूँ, (पीवः) ऐसा करके मैं अपने राष्ट्र का विकास करता हूँ, (मे) मेेरे (उभा कुक्षी) सज्जन प्रजाजन हेतु स्नेह व दुर्जनों हेतु उचित दण्ड, ये दोनों स्वरूप वा व्यवहार (इत् पृणन्ति) सम्पूर्ण राष्ट्र को सुख व शान्ति से समृद्ध करते हैं।

भावार्थ- जो अपने प्राणों व इन्द्रियों को वश करके अविद्या, प्रमाद व सभी कामज तथा क्रोधज दोषों को जीत लेेता है, वह सम्पूर्ण राष्ट्र को नाना प्रकार के सुख-ऐश्वर्यों से भर देेेता है। ऐसा राजा सज्जनों को संरक्षण व दुष्टोें को उचित दण्ड के द्वारा अपने राष्ट्र को सर्वविध संरक्षित व सुखी करता है।

आध्यात्मिक भाष्य- (मे हि) मैं योग साधक (पंचदश साकं विंशतिम्) मोक्ष के चार साधन, जिनमें प्रथम विवेेक के बारह प्रकार अर्थात् शरीर के अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय व आनन्दमय कोष, तीन अवस्था-जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, चार शरीर-स्थूल, सूक्ष्म, कारण एवं तुरीय वा स्वाभाविक को यथावत् जानना, ये बारह प्रकार के विवेक, द्वितीय वैराग्य अर्थात् ज्ञान की पराकाष्ठा, तृतीय षट्क सम्पत्ति (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा व समाधान), चैथा मुमुक्षुत्व अर्थात् मुक्ति की तीव्र इच्छा, ये कुल मिलाकर मुक्ति के बीस साधनों के साथ यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि, इन आठों योगांगों से प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, इन तीन प्रमाण, विपर्पय, विकल्प, निद्रा व स्मृति, इन सात प्रकार की वृत्तियों का निरोध करके अर्थात् कुल पैंतीस प्रकार के साधनोपसाधनों के द्वारा (उक्ष्णः पचन्ति) सुख व आनन्द की वृष्टि करने हारे परब्रह्म परमात्मा को साक्षात् करने की प्रक्रिया को परिपक्व करता हूँ। (उत) और (अहम्) मैं योगमार्ग का पथिक (अद्मि) उस परमानन्द व पावनी शान्ति का भक्षण करता हूँ अर्थात् उसका आस्वादन अनुभव करता हूँ और ऐसा करके (पीवः) अपने आत्मिक बल व पवित्रता को समृद्ध करता हूँ। (मे) मेरे (उभा कुक्षी) लौकिक व परलौकिक दोनों ही सुख (इत्, पृणन्ति) मुझे पूर्ण तत्व करते हैं।

भावार्थ- कोई भी योगी जब विवेक, वैराग्य, षट्क सम्पत्ति, मुमुक्षुत्व के साथ अष्टांग योग की साधना करता है, उस समय वह सृष्टि के सम्पूर्ण विज्ञान के साथ-2 परब्रह्म परमेश्वर एवं स्वयं के यथार्थ स्वरूप को जानकर परमानंद को प्राप्त करता है। इसके साथ वह इस लोक में भी सभी सुखों को प्राप्त करने में समर्थ होता है।

अब विज्ञ पाठक स्वयं विचार कर सकते हैं कि महर्षि दयानन्द सरस्वती की परम्परा का कोई भी भाष्यकार वेदों में मांसाहार, पशुबलि आदि पापों को कभी स्वीकार नहीं कर सकता है। इसमें उनका कोई पूर्वाग्रह नहीं है, बल्कि वेद का वास्तविक स्वरूप ही ऐसा है, जहाँ ऐसे पापों का कोई स्थान नहीं है। मैंने अपना भाष्य मात्र अपनी ऊहा के बल पर नहीं किया है, बल्कि उसका एक आधार है- विभिन्न वैदिक ग्रन्थों के प्रमाण एवं उनकी वैज्ञानिकता। पाठक मेरे भाष्य की अन्य भाष्यों से तुलना स्वयं करके यह जान सकते हैं कि यदि इसी प्रकार चारों वेदों का भाष्य किया जाए, तो संसार में कौन ऐसा मूर्ख होगा, जो वेद का उपहास करने की कल्पना भी कर सकेगा? दुर्भाग्य से ऋषि दयानन्द जी को विस्तार से वेद भाष्य करने का समय नहीं मिला।

उक्ष्णो हि मे प´चदश साकं पचन्ति विंशतिम्।
उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र
उत्तरः ।। ऋ. 10. 86. 14

अन्त में यही कहना चाहूँगा कि जो पाठक शुद्ध हृदय एवं वास्तव में जिज्ञासु होंगे, वे मेरे भाष्य से वैज्ञानिक व आध्यात्मिक आनन्द उठाने के साथ-2 लोक व्यवहार में भी इसकी उपादेयता को अनुभव करेंगे और जो तामसी बुद्धि के पूर्वाग्रही व दुराग्रही व्यक्ति होंगे, वे पशु मारने में ही अपना पाण्डित्य अथवा वेद की निन्दा में ही अपना समय व्यर्थ गंवाने का पाप करेंगे। कुछ ऐसे भी वैदिक विद्वान् हो सकते है , जो वेद में मांसाहार आदि को तो स्वीकार नहीं करेंगे परन्तु उन्हें ईष्र्या-द्वेषवश मेरा भाष्य भी स्वीकार नहीं होगा, भले ही वे स्वयं भाष्य करने में समर्थ न हों। कोई बात नहीं मैं ऐसे कथित विद्वानों को इस विषय में स्वतंत्र छोड़ता हूँ। मैं अपने पाठकों से आग्रह करता हूँ कि अब वे इस प्रकार के प्रश्न मुझे नहीं भेजें। इस लेख से ही वेददूषकों की योग्यता तथा वेद के वास्तविक स्वरूप एवं मेरे विचारों का अनुमान कर लें।

Thursday, July 11, 2019

भगवान् श्रीराम के मृग का पीछा करने का सच


जब मारीच स्वर्णमृग के रूप में सीताजी को दिखाई दिया और उन्होंने श्रीरामजी तथा लक्ष्मणजी को उसे दिखाया। देखते ही लक्ष्मणजी ने कहा-

‘‘अहं मन्ये मारीचं राक्षसं मृगम्
अनेन निहता राम राजानः कामरूपिणा।’’ 
                                (अरण्य काण्ड 34.5,6)

अर्थात् यह मृग के रूप में राक्षस मारीच आया है, ऐसा मैं मानता हूँ। इसी इच्छाधारी राक्षस ने अनेक राजाओं का वध किया है। सीताजी ने उसे जीवित पकड़ कर लाने का आग्रह किया था, न कि मारकर लाने के लिये। यदि कहें कि जीवित ही पकड़ना था, तो धनुष बाण ले जाने की क्या आवश्यकता थी? इस विषय में मेरा मानना है कि मृग को दौड़कर हाथों से नहीं पकड़ा जा सकता, बल्कि मोहनास्त्र आदि के द्वारा बांध कर ही पकड़ा जा सकता है। इस कारण धनुष बाण लेकर गये। इसके साथ ही क्षत्रिय को निरस्त्र, निःशस्त्र रहना भी नहीं चाहिये। फिर उन्हें यह आशंका थी ही कि मृग मारीच है, तब तो सशस्त्र होकर जाना अनिवार्य ही था। यद्यपि वाल्मीकि रामायण में उसे जीवित न पकड़ पाने की स्थिति में ही मारकर लाने की बात कही गई है और उसका हेतु यह दिया है कि सीताजी उसकी चमड़ी से आसन बनाना चाहती थीं। मैं पूछता हूं कि यदि चर्म के आसन एवं बिस्तर से ही प्रीति होती, तो वे स्थान-2 पर पर्ण, घास, पुष्पों की शय्यायें नहीं बनाते। क्या उन्हें जंगल में कहीं कोई सुन्दर जानवर मिले ही नहीं थे। इतने सुन्दर नहीं भी मिले हों, तो भी जंगल में अनेक सुन्दर हिरण, बाघ, चीता आदि सुन्दर चमड़ी वाले जानवर मिले ही होंगे। तब क्यों नहीं उनकी चमड़ी के लिये किसी को मारा? श्रीरामजी ने कई स्थानों पर लक्ष्मणजी से फूल, घास, लकड़ी, पत्ते लाकर बिस्तर बनाने का आदेश दिया है। क्यों नहीं किसी जानवर को मारकर चमड़ा लाने का आदेश दिया? इससे आरामदायक बिस्तर, आसन बन सकते थे। जब श्रीरामजी उस मृग के पीछे चलने को उद्यत होते हैं, तब उन्होंने लक्ष्मणजी से कहा-

‘‘यदि वायं यथा यन्मां भवेद् वदसि लक्ष्मण। 
मायैषा राक्षसस्येति कत्र्तव्योऽस्य वधो मया।। 
एतेन हि नृशंसेन मारीचेना कृतात्मना।
वने विचरता पूर्वं हिंसिता मुनिपुंगवाः।’’
                                                    (अरण्य काण्ड 34.38,39)

अर्थात् हे लक्ष्मण! तुम मुझसे जैसा कह रहे हो, यदि वैसा ही यह मृग हो, यदि राक्षसी माया ही हो, तो इसे मारना मेरा कर्तव्य है। क्योंकि इस दुष्ट ने मुनियों की हत्या की है। इससे स्पष्ट है कि श्रीरामजी ने उस जानवर को मारीच ही समझा था न कि स्वर्णमृग। हमें यह विचारना चाहिये कि लक्ष्मणजी उनके साथ सेवा हेतु ही आये थे। वे ही स्थान-स्थान पर कुटी व शय्या तैयार करते हैं, जल, कन्द, मूल, फल लाते हैं। तब यदि वह जानवर ही पकड़ना वा मारना था, तो क्या यह कार्य लक्ष्मणजी नहीं कर सकते थे? जो लक्ष्मणजी बड़े-बड़े योद्धाओं से घोर युद्ध करने में समर्थ थे, वे उस मृग को मार वा पकड़ नहीं सकते थे? तब क्यों श्रीरामजी यह साधारण काम करने हेतु स्वयं गये और लक्ष्मणजी को वहां सीताजी की रक्षार्थ नियुक्त किया? क्यों नहीं, सदैव सेवातत्पर अनुज लक्ष्मणजी को यह कार्य सौंपा? इससे स्पष्ट है कि श्रीरामजी स्थिति की गम्भीरता समझ रहे थे। मारीच के पराक्रम व माया को जानकर, लक्ष्मणजी को भेजकर, उन्हें संकट में नहीं डालना चाहते थे। उन्हें गम्भीर परिस्थितियों में अपने पौरुष का विश्वास था। इस प्रकार की परिस्थिति उस समय भी आयी थी, जब खर और दूषण ने 14 हजार राक्षसों की सेना लेकर आक्रमण कर दिया था। उस समय श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी को युद्ध का आदेश न देकर स्वयं ही युद्ध किया था और लक्ष्मणजी को सीताजी की रक्षार्थ नियुक्त किया था। इसी प्रकार यहां भी यही परिस्थिति बनी थी। इस सब पर गम्भीरता से विचारने पर यह सिद्ध होता है कि श्रीरामजी शिकार हेतु नहीं बल्कि उसे मारीच जानकर घोर युद्ध करने गये थे। हम इस विषय की यथार्थता जानने हेतु रामायण के अन्य प्रसंगों पर भी दृष्टि डालें, तो पायेंगे कि उस काल में किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं होती थी, सिवा दुष्ट दमनार्थ युद्ध के। जिस समय महात्मा भरतजी चित्रकूट में श्रीरामजी से मिलने आते हैं, तब श्रीरामजी ने मिलते ही उन्हें कुशलक्षेम पूछते हुये सम्पूर्ण राजनीति का उपदेश किया है। उसमें एक बिन्दु आता है, जिसमें अयोध्या ‘हिंसाभिरभिवर्जितः’ कहा है (अयो. कां.100वां सर्ग, श्लोक 44)।

अर्थात् अयोध्या हिंसा से पूर्ण मुक्त थी, तब शिकार कैसे किया जा सकता है? जब श्रीराम का राजतिलक होने वाला था, तब महाराज दशरथजी ने श्रीरामजी को उपदेश देते हुये 18 व्यसनों से दूर रहने को कहा था, ये 18 व्यसन भगवान् मनुप्रोक्त कामज व क्रोधज व्यसन हैं, जिनमें शिकार खेलना राजाओं के लिये प्रथम दुव्र्यसन बताया है। तब श्रीरामजी व दशरथजी का शिकार खेलना, हिंसा करना कैसे सिद्ध हो सकता है? यदि कोई यह प्रश्न करे कि जब श्रीरामजी शिकार खेलते ही नहीं थे, तब उन्हें उपदेश देकर निषेध करने की आवश्यकता कैसे पड़ी? इसका उत्तर स्वयं दशरथजी के वचनों से ही मिल जाता है। वे कहते हैं-

‘‘कामतस्वं प्रकृत्यैव निर्णीतो गुणवानिति।
गुणवत्यपि तु स्नेहात् पुत्र वक्ष्यामि ते हितम्।।’’
                                         (अयो. कां. सर्ग 3.41)

अर्थात् यद्यपि तुम स्वभाव से ही गुणवान् हो और तुम्हारे विषय में सबका यही निर्णय है, तथापि मैं स्नेहवश सद्गुणसम्पन्न होने पर भी तुम्हें हित की बातें कहता हूँ। इससे स्पष्ट है कि श्रीरामजी में उपर्युक्त व्यसन नहीं होने पर भी पिता होने के नाते उपदेश करना कर्तव्य समझ कर ही ऐसा कहा था।

‘मांसाहार (संशोधित संस्करण)’ से उद्घृत - लेखक: आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Thursday, June 27, 2019

सावधान! शेर को जीवित मत करो।


चार सिद्ध पुरुष जंगल में अपनी राह चले जा रहे थे। उन्हें मार्ग में एक बब्बर शेर का बिखरा हुआ कंकाल मिला। एक सिद्ध पुरुष बोला, मैं इस कंकाल को यथावत् जोड़ सकता हूँ और उसने जोेड़ कर दिखा भी दिया। कुछ वनवासी लोगों, जिन्होंने शेर को कभी देखा नहीं था, यह देख कर आश्चर्य व प्रसन्नता व्यक्त की। दूसरा सिद्ध पुरुष बोला कि मैं इस पर उपयुक्त मांस पेशियां व अन्य शरीरांगों को उत्पन्न कर सकता हूँ। यह सुनकर वनवासी लोग उत्सुक हो उठे, तब उस सिद्ध पुरुष ने ऐसा चमत्कार कर दिखाया। अब तीसरे सिद्ध पुरुष ने कहा कि मैं इसकी चमड़ी, आँख व पंजे आदि को बिल्कुल वास्तविक रूप में उत्पन्न कर सकता हूँ और उसने ऐसा करके भी दिखा दिया। इस पर तीनों सिद्ध पुरुष एक दूसरे की प्रशंसा करने लगे तथा वनवासी बन्धुओं ने उस शेर के शरीर को मनोरंजक का बहुत बड़ा साधन समझकर अति हर्ष का अनुभव किया। वे उससे खेलने लगे। तभी चैथे सिद्ध पुरुष ने कहा कि मैं शेर के इस शरीर में जान डाल सकता हूँ, इस पर सभी आश्चर्य करने लगे और उसकी क्षमता पर शंका करने लगे। इस पर वह सिद्ध पुरुष उस शरीर में जान डालने का अपना अभियान प्रारम्भ करने लगा। सभी सोच रहे थे, बहुत अच्छा रहेगा, शेर उछलता, कूदता, गर्जता अच्छा दिखाई देगा। किसी को शेर के खतरे का आभास नहीं था। सिद्ध पुरुष अपनी-2 सिद्धियों को प्रदर्शित करने के अहंकार में डूबे थे और वनवासी बन्धु अपने मनोरंजन की प्यास में। तभी उन वनवासियों में से एक अनुभवी वृद्ध ने दूर से पुकारा, ‘ओ! सिद्ध पुरुषो!’ अपनी सिद्धियों का इस प्रकार दुरूपयोग मत करो, इन पर अहंकार मत करो, अपने यश की कामना में अपनी तथा इन वनवासी अबोध जनों, जिन्होंने कभी शेर को देखा व जाना नहीं है, की मृत्यु को आमन्त्रित मत करो। शेर कोई गाय, बकरी अथवा भैंस नहीं है, जो इन्हें दूध देेगा और न यह खरगोश वा मोर है, जिससे इनका मनोरंजन होगा। शेर साक्षात्-मृत्यु का रूप है, इस कारण इसके शरीर में जान मत डालो, परन्तु उस वृद्ध वनवासी की हितकारी बात न तो चारों सिद्ध पुरुषों, जो अपनी प्रतिभा के मद में डूबे परन्तु वस्तुतः मूर्ख थे, ने सुनी और न मनोरंजन की तृष्णा के अबोध वनवासियों ने। शेर के शरीर में जान डाल दी। शेर तुरन्त गुर्राया और उन सिद्ध पुरुषों को मार कर खा गया और अनेक वनवासियों को घायल कर दिया, तो कुछ भाग गये।

हे विश्व के वैज्ञानिको! हे नाना तकनीकों के विशेषज्ञो! मैं जानना चाहता हूँ कि आप नयी-2 टैक्नोलाॅजी बना कर विश्व को चमत्कृत कर सकते हो, मनुष्यों को विलासी जीवन दे सकते हो और ऐसा करके आप अकूत यश व धन पा सकते हो। अनेक व्यवसायिक कम्पनीज् को व्यापार का बड़ा साधन दे सकते हो, परन्तु मेरे मित्रो! स्मरण रखो, अति टैक्नोलाॅजी वह जीवित खूंखार शेर है, जो सम्पूर्ण पर्यावरण को खा जायेगा, जल व वायु का गंभीर संकट उत्पन्न कर देगा, सभी प्राकृतिक संसाधनों को समाप्त कर देगा, प्राणिमात्र के प्राणों को संकट में डाल देगा, मानव मानवता से दूर होकर निरा हिंसक, स्वार्थी व कामी पशु बन जायेगा, रोजगार का संकट बढ़ कर युवापीढ़ी अराजक व अवसादग्रस्त हो जायेगी, स्थिति ऐसी बन जायेगी कि विश्व के बड़े-2 राजसिंहासनों को ध्वस्त करके पारस्परिक मारकाट, भुखमरी, लूट-मार जैसे अपराधों की बाढ़ आ जायेगी। इस लिए विज्ञान को प्राणियों की मौत का साधन बनाने से बचो।

हे विश्व के राजनेताओ! आप विकास के पागलपन में विनाश के ज्वालामुखी को मत जगाओ! मैं वृद्ध वनवासी की तरह आप सबको तथा विश्व के विकास के इच्छुक प्रत्येक मनुष्य को सचेत कर रहा हूँ। यदि इस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया गया, तो बाद में पश्चाताप करने योग्य भी हम नहीं रहेंगे। इसलिए वैदिक मार्ग की ओर चलो, अपनी जीवन पद्धति बदलो, प्राकृतिक संसाधनों को पूरा का पूरा निगल जाने का पागलपन मत करो, तभी सब बचेगा अन्यथा सब भस्म हो जायेगा।

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Sunday, June 9, 2019

विनाश की क्रान्तियां



🔘हरितक्रान्ति ने हमारी परम्परागत एवं स्वास्थ्यवर्धक कृषि का विनाश किया एवं पृथिवी पर सर्वत्र विष घोला।

🔘श्वेतक्रान्ति ने हमारी देशी नस्ल की गौओं को समाप्त किया एवं विदेशी व संकर नस्ल की गायों के रोगकारक दूध का प्रचार किया।

🔘रेड एवं पिंक क्रान्ति हमारे पालतू पशुओं को मौत के घाट उतार कर हमें क्रूर व मांसाहारी बना रही है।

🔘ब्लू क्रान्ति समुद्री जीवों की हत्या करके समुद्री तूफानों की भयानक्ता को बढ़ा रही है।

🔘रजत क्रान्ति पक्षियों के भ्रूणों (अण्डों) को खाकर पेट को कचरा पात्र बना रही है।

🔘औद्योगिक क्रान्ति सम्पूर्ण पर्यावरण को नष्ट भ्रष्ट करके सम्पूर्ण प्राणिजगत् को विनाश की ओर ले जा रही है।

🔘डिजीटल क्रान्ति सम्पूर्ण स्पेस को प्रदूषित करके जीवों के अस्तित्व के लिए गम्भीर संकट उत्पन्न कर रही है।

ये सभी क्रान्तियां अपने प्राचीन वैदिक ज्ञान-विज्ञान को भूल कर विदेशों की अंधी बौद्धिक दासताजन्य मूर्खता का परिणाम है। हमारा राष्ट्र उस भयानक मार्ग पर चल रहा है, जहाँ मृत्यु के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है। वस्तुतः जब तक ऋषियों की वेदोक्त महती विद्या का अनुसंधान, प्रचार व प्रसार नहीं होगा, तब तक केवल भारत ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व नाना प्रकार के रोग, अपराध एवं प्राकृतिक प्रकोपों के भयंकर जाल में फंस कर सम्पूर्ण विनाश के भयानक मार्ग पर चलता ही रहेगा। इसलिए आओ! प्यारे मानव! वेद पर चल कर विश्व-मानवता के जीवन को बचाने का संकल्प करें। सम्पूर्ण व्यवस्था को बदलने के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करें। वैदिक मार्ग के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं। आज कोई सोचने के लिए तैयार नहीं कि भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान पर गम्भीर अनुसंधान करके भारत के आर्थिक वैभव को प्राप्त करने का प्रयास किया जा सकता है।

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Friday, June 7, 2019

क्रूरता व निर्लज्जता की पराकाष्ठा


अलीगढ़ में ढाई वर्ष की बच्ची के साथ हुए नृशंस काण्ड ने दर्शा दिया कि मनुष्य शरीरधारी प्राणी भेड़ियों से भी अधिक क्रूर हो सकता है। ऐसी घटना शायद पहले कभी नहीं सुनी गयी। आश्यर्च है कि इस धटना पर सामाजिक कार्यकर्ता, मानवाधिकारवादी व बुद्धिजीवी कहाने वाले, जो बात-2 पर अपने सम्मान लौटाते, कैंडल मार्च निकालते एवं सड़कों पर कोहराम मचाते हैं, वे आज किस बिल में छुप कर बैठे हैं? क्या उस बच्ची का हिन्दू होना ही उनके मौन का कारण है? कठुआ की घटना पर आँसू बहाने वालों की आँखों में आज आँसू क्यों नहीं है?

अपराधी को सार्वजनिक रूप से ऐसा दण्ड देना कि कोई भी दुष्ट ऐसा पाप करने का दुःसाहस नहीं कर सके, यह तो अनिवार्य है, परन्तु आज इस प्रकार की घटनाएं क्यों हो रही हैं, इसको विचारने का न किसी के पास समय है और न सात्विकी बुद्धि। जिनके पास है, वे असमर्थ हैं। सर्वत्र कामुकता को बढ़ाने वाले साधन, चलचित्र व इण्टरनेट, पत्र-पत्रिकाएं, सभी कामुकता की आग को प्रज्ज्वलित करके निरन्तर बढ़ाते जा रहे हैं। आधुनिक शिक्षा ने मनुष्य को भोगवाद की आग में झोंक दिया है, स्वच्छन्दता अपना नग्न ताण्डव मचा रही है, मांस-मछली मदिरा एवं अन्य अनेक प्रकार के नशे, अति तीखे व तमोगुणी भोजन, जो न केवल स्वादलोलुपतावश खाये जाते हैं, अपितु अपनी कामवासना को तीव्र से तीव्रतम करने के लिए खाये जाते हैं। यह खान पान फिर टी.वी. पर अश्लील व हिंसक दृश्य व श्रव्य, उन्हें नरपिशाच बनाने का पूरा उद्योग कर रहे हैं। देश के नीतिनिर्धारकों, शिक्षाविदों, समाज शास्त्रियों व मनोवैज्ञानिकों को सद्बुद्धि देने वाले कहाँ हैं? धर्म के नाम पर दुकान चलाने वाले भी अनेक कथित धर्मगुरु यौन अपराध के कारण कुछ जेल में है, तो कुछ अभी छुपे हुये हैं। लोकतन्त्र की स्वच्छन्दता ने युवा पीढ़ी को कामी व पागल बना दिया है। सबको स्वतन्त्रता (वास्तव में स्वच्छन्दता) की भूख है।

उधर न्यायालयों में न्याय समय पर नहीं मिलता। पापी को क्रूर दण्ड देने पर मानवाधिकारवादी कोहराम मचाने को तत्पर रहते हैं। हमारे कानून व न्यायालयों के कुछ निर्णय भी जब कामुकी स्वच्छन्दता को संरक्षण देने वाले हो जायें, तब कौन रक्षा करेगा, इन पापों से? ऐसे में जब भाँग कूए में नहीं, अपितु समुद्रों में घोल दी गयी हो, तब धरती से पाप को मिटाना कैसे होगा? हे मानवता के प्रेमी जनो! आप क्या इस विषय में कुछ विचार करेंगे? जब तक वैदिक शिक्षा का प्रचार नहीं होगा, तब तक दानवता का खेल यूं ही चलता रहेगा। पुनरपि अपराधी को भयंकर दण्ड तुरन्त देना ही होगा। अपराधियों को सार्वजनिक रूप से अत्यन्त कष्टकारी मृत्यु दण्ड नहीं दिया जायेगा, तब तक अपराधियों में भय होगा ही नहीं। जो मजहब देखकर ही कैंडल मार्च निकालते हैं, उनकों भी दण्डित करना आवश्यक है।

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Wednesday, June 5, 2019

जागो! वेद के विरुद्ध षड्यन्त्र को पहचानों...



एक जागरूक वेदभक्त सुगन्धा शर्मा जी ने इंस्टाग्राम पर मोहम्मद सुजात समीर अली द्वारा डाली गयी एक पोस्ट की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है।

मैं दृढ़तापूर्वक कहना चाहता हूँ कि किसी भी विदेशी वेदभाष्यकार की यह योग्यता नहीं कि वह वेद पर कलम भी चला सके। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि दोष केवल विदेशी भाष्यकारों का ही नहीं है, अपितु महर्षि दयानन्द सरस्वती के अतिरिक्त अथवा कुछ अंश तक उनकी शैली का अनुसरण करने वाले कुछ विद्वानों के अतिरिक्त सभी वेदभाष्यकार वेदविद्या की दृष्टि से बच्चे ही हैं। उपर्युक्त वेदमंत्र पर मैं अपना तीन प्रकार का भाष्य यहाँ संक्षेम में लिख रहा हूँ। घ्यान रहे कि तमोगुणी प्रवृत्ति के लोग अर्थात् मांस-मछली आदि अभक्ष्य पदार्थों को खाने वाले, ब्रह्मचर्यादि व्रतों से कोसों दूर रहने वाले, धन-पद-यश के लोभ से ग्रस्त, अतपस्वी, ईष्र्या, पक्षपात आदि से ग्रस्त तथा आध्यात्मिक साधना से विहीन लोग वेदादि शास्त्रों को कभी नहीं समझ सकते। 

ऋग्वेद 9.13.9 वेदमंत्र पर मेरा तीन प्रकार का भाष्य

असित काश्यपो देवलो वा ऋषिः। पवमानः सोमो देवता यवमध्या गायत्री।
अपघ्नन्तो अराव्णः पवमानाः स्वर्दृशः योनौवृतस्य सीदत।। (ऋग्वेद 9.13.9)

अराव्णः = रा दाने (अदा.) धातोर्वनिप्। न´् समासःस्वर्दृक् = असौ (सूर्यः) वाव स्वर्दृक् (ऐ. 4.10), सूर्यदृशः (निरु 1.23)अप + हन् = हटाना, नष्ट करना, दूर करनादेवलः = दीव्यत्यधार्मिणो विजिगीषतीति 
कश्यपो वै कूर्मः (श. 7.5.1.5

कूर्म प्राण से उत्पन्न बन्धन में न आनेवाले तथा धारक बलों से विहीन पदार्थों को नियंत्रित करने वाले सूक्ष्म प्राण विशेष से इस ऋचा रूपी छन्दरश्मि की उत्पत्ति होती है। इसका देवता सोम तथा छन्द गायत्री होने से सोम रश्मियां तेज व बल से विशेष युक्त होती हैं।

आधिदैविक भाष्य - (पवमानाः स्वर्दृशः) सूर्य की ओर आकर्षित होती संयोगोन्मुख सोम रश्मियां (मरुद् वा प्राण रश्मियां अथवा इलेक्ट्राॅन्स की धाराएं) (अपघ्नन्तो अराव्णः) संयोग में बाधक रश्मि आदि पदार्थों को दूर हटाती वा नष्ट करती हैं। (योनौ + ऋतस्य सीदत) ऐसी वे रश्मियां व इलेक्ट्राॅन्स (अग्निर्वा ऋतम्) अग्नि (ऊर्जा) की उत्पत्ति के स्थान अर्थात् सूर्य के केन्द्रीय भाग में प्रतिष्ठित हो जाती हैं। 

भावार्थ - सूर्य के केन्द्रीय भाग की ओर धनायनों को ले जाने के लिए अनेक प्रकार की प्राण व मरुद् रश्मियां सूर्य के केन्द्रीय भाग की ओर प्रवाहित होती हैं, जिनके कारण इलेक्ट्राॅन्स की धाराएं भी उसी ओर प्रवाहित होने लगती हैं। फलतः धनायनों का भी प्रवाह भी उसी ओर होने लगता है।

सृष्टि प्रक्रिया पर प्रभाव - सूर्य के अन्दर विद्यमान एवं उसके बाहरी भाग में स्थित विभिन्न प्राण व मरुद् रश्मियां सूर्य के केन्द्रीय भाग की ओर प्रवाहित होने हेतु प्रेरित होती हैं। इसके कारण इलेक्ट्राॅन्स की धाराएं भी केन्द्रीय भाग की ओर प्रवाहित होती हुई अपने साथ प्रोटोन्स वा अन्य धनायनों को आकृष्ट करके ले जाती हैं। इस प्रक्रिया में जो भी बाधक रश्मि आदि पदार्थ हों, उन्हें दूर हटाती हुई ये धाराएं केन्द्रीय भाग में प्रतिष्ठित हो जाती हैं। 

आधिभौतिक भाष्य - (पवमानः) संगठन की पवित्र भावना वाला शान्ति का विधायक विद्वान् वा राजा (स्वर्दृशः) ज्ञान की ज्योति को चाहता वा पाता हुआ (अराव्णः) कंजूस, सामाजिक कार्यों के प्रति त्याग की भावना से रहित करें की चोरी करने वाले समाजकण्टकों को (अपघ्नन्तः) दूर करता एवं आवश्यक होने पर उन्हें नष्ट भी करता हुआ (योनौ $ ऋतस्य) सत्य, न्याय व अनुशासन के कारण रूप उत्तम व्यवहार में (सीदत) स्थित रहता है।

भावार्थ - राष्ट्र को सुरक्षित व अखण्ड बनाने हेतु राजा एवं विद्वान् लोग सब में विद्या का प्रकाश करते हुए चोरों व कृपण लोगों को सुधार कर अथवा दण्डित करके सदैव न्याययुक्त व्यवहार के द्वारा प्रजा को सुखी करता है।

अध्यात्मिक भाष्य - (पवमानः) यम-नियमों की साधना से पवित्र हुए अन्तःकरण से युक्त योगी (स्वर्दृशः) परमपिता परमात्मा की पवित्र ज्याति को देखता अर्थात् परब्रह्म का साक्षात्कार करता हुआ (अराव्णः) ब्रह्म-साक्षात्कार में बाधक वृत्तियों को (अपघ्नन्तः) दूर हटाता हुआ (योनौ + ऋतम्) सम्पूर्ण ऋत वा सत्य ज्ञान विज्ञान व आनन्द के स्रोत अर्थात् ब्रह्म में (सीदत) प्रतिष्ठित हो जाता है।

भावार्थ - अन्तःकरण को पवित्र बनाता हुआ योगी ब्रह्म साक्षात्कार करता है। इसके लिए वह मन में उत्पन्न होने वाली मलीन वृत्तियों को दूर हटाता हुआ परम ब्रह्म के आनन्द में रमण करता है।

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

यदि आपको हमारा लेख पसंद आया तो इसे सभी वाट्सएप ग्रुपो, फेसबुक और वेबसाइटों पर शेयर करे।

Monday, May 27, 2019

वैज्ञानिक भाष्य - वेदों में मांसाहार का भ्रम


एतद्वा उ स्वादीयो यदधिगवं क्षीरं वा मांसं वा तदेव नाश्नीयात्।। 9।।
                                                                                                        (अथर्व.का. 9, पर्याय-3, सूक्त 6 मं.9)

इस मंत्र पर आचार्य सायण ने भाष्य नहीं किया है।

पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर भाष्य
पदार्थ- एतत् वै उ स्वादीयः = वह जो स्वादयुक्त है यत् अधिगवं क्षीरं वा मांसं वा= जो गौ से प्राप्त होने वाले दूध या अन्य मांसादि पदार्थ हैं तत् एव न आश्नीयात्= उसमें से कोई पदार्थ अतिथि के पूर्व भी न खावे।।9।।

इस पर मेरा मत
इसके भाष्य में आर्य विद्वान् प्रो. विश्वनाथ विद्यालंकार ने यहा मांस का अर्थ पनीर किया है, तो पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी ने मनन साधक (बुद्धिवर्धक) पदार्थ को मांस कहा है। सभी ने इस मंत्र तथा सूक्त के अन्य मंत्रों का विषय अतिथि सत्कार बताया है। इस मंत्र का देवता पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी की दृष्टि में अतिथि व अतिथिपति है, जबकि पं. सातवलेकर ने अतिथि विद्या माना है। पं. सातवलेकर ने इसका ऋषि ब्रह्मा माना है। छन्द पिपीलिका मध्या गायत्री है। {ब्रह्मा = मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा (श.14.6.1.7), प्रजापतिर्वै ब्रह्मा (गो.उ.5.8)। अतिथिः = यो वै भवति यः श्रेष्ठतामश्नुते स वा अतिथिर्भवति (ऐ.आ.1.1.1)। अतिथिपतिः = अतिथिपतिर्वावातिथेरीशे (क.46.4 - ब्रा.उ.को. से उद्धृत)। पिपीलिका = पिपीलिका पेलतेर्गतिकर्मणः (दै.3.9)। स्वादु = प्रजा स्वादु (ऐ.आ.1.3.4), प्रजा वै स्वादुः (जै.ब्रा.2.144), मिथुनं वै स्वादु (ऐ.आ.1.3.4)। क्षीरम् = यदत्यक्षरत् तत् क्षीरस्य क्षीरत्वम् (जै.ब्रा.2.228)। मांसम् = मांसं वै पुरीषम् (श.8.6.2.14), मांसं माननं वा मानसं वा मनोऽस्मिन् सीदतीति वा (नि.4.3), मांसं सादनम् (श.8.1.4.5)}

मेरा आधिदैविक भाष्य
(एतत् वा स्वादीयः) ये अतिथि अर्थात् सतत गन्त्री प्राण, व्यान रश्मियां एवं अतिथिपति अर्थात् प्राणोपान रश्मियों की नियन्त्रक सूत्रात्मा वायु रश्मियां स्वादुयुक्त होती हैं अर्थात् ये विभिन्न छन्दादि रश्मियों के मिथुन बनाकर नाना पदार्थों को उत्पन्न करने में सहायक होती हैं। (यत्) जो प्राणव्यान व सूत्रात्मा वायु रश्मियां (अधिगवं क्षीरं वा मांसं वा) गो अर्थात् ‘ओम्’ छन्द रश्मि रूपी सूक्ष्मतम वाक् तत्व में आश्रित होती हैं, साथ ही अपने पुरीष= पूर्ण संयोज्य बल {पुरीषम्= पूर्णं बलम् (म.द.य.भा.12.46), ऐन्द्रं हि पुरीषम् (श.8.7.3.7), अन्नं पुरीषम् (श.8.1.4.5)} के साथ निरन्तर नाना रश्मि वा परमाणु आदि पदार्थों के ऊपर झरती रहती हैं। इन ‘ओम्’ रश्मियों का झरना ही क्षीरत्व तथा पूर्ण संयोज्यता ही मांसत्व कहलाता है। यहाँ ‘मांस’ शब्द यह संकेत देता है, कि ये ‘ओम्’ रश्मियां मनस्तत्व से सर्वाधिक रूप से निकटता से सम्बद्ध होती हैं किंवा मनस्तत्व इनमें सर्वाधिक मात्रा में बसा हुआ रहता है। ये ‘ओम्’ रश्मियां प्राणव्यान एवं सूत्रात्मा वायु रश्मियों के ऊपर झरती हुई अन्य स्थूल पदार्थों पर गिरती रहती हैं। (तत् एव न अश्नीयात्) इस कारण से विभिन्न रश्मि वा परमाणु आदि पदार्थों के मिथुन बनने की प्रक्रिया नष्ट नहीं होती। यह प्रक्रिया अतिथिरूप प्राणव्यान के मिथुन बनने किंवा इनके द्वारा विभिन्न मरुदादि रश्मियों को आकृष्ट करने की प्रक्रिया शान्त होने से पूर्व नष्ट नहीं होती है, बल्कि उसके पश्चात् अर्थात् दो कणों के संयुक्त होने के पश्चात् और मिथुन बनने की प्रक्रिया नष्ट वा बन्द हो सकती है, यह जानना चाहिए।

इस ऋचा का सृष्टि पर प्रभाव-
आर्ष व दैवत प्रभाव- इसका ऋषि ब्रह्मा होने से संकेत मिलता है कि इसकी उत्पत्ति मन एवं ‘ओम्’ रश्मियों के मिथुन से ही होती है। यह मिथुन इस छन्द रश्मि को निरन्तर व निकटता से प्रेरित करता रहता है। इसके दैवत प्रभाव से प्राण, व्यान तथा सूत्रात्मा वायु रश्मियां विशेष सक्रिय होकर नाना संयोग कर्मों को समृद्ध करती हैं।

छान्दस प्रभाव- इसका छन्द पिपीलिका मध्या गायत्री होने से यह छन्द रश्मि विभिन्न पदार्थों के संयोग के समय उनके मध्य तीव्र तेज व बल के साथ सतत संचरित होती है। इससे उन पदार्थों के मध्य विभिन्न पदार्थ तेज एवं बल को प्राप्त होते रहते हैं।

ऋचा का प्रभाव- जब दो कणों का संयोग होता है, तब उनके मध्य प्राण, व्यान व सूत्रात्मा वायु रश्मियों का विशेष योगदान होता है। ये रश्मियां विभिन्न मरुद् रश्मियों द्वारा आकुंचित आकाश तत्व को व्याप्त कर लेती हैं। इसी समय इन रश्मियों के ऊपर सूक्ष्म ‘ओम्’ रश्मियां अपना सेचन करके इन्हें अधिक बल से युक्त करती हैं। इससे दोनों कणों के मध्य फील्ड निरन्तर प्रभावी होता हुआ उन दोनों कणों को परस्पर संयुक्त कर देता है।

मेरा आधिभौतिक भाष्य
(एतत् वा स्वादीयः) ये जो स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ होते हैं। (यदधिगवं क्षीरं वा) जो गाय से प्राप्त होने वाले दूध, घृत, मक्खन, दही आदि पदार्थ हैं अथवा (मांसम् वा) मनन, चिन्तन आदि कार्यों में उपयोगी फल, मेवे आदि पदार्थ। (तदेव न अश्नीयात्) उन पदार्थों को अतिथि के खिलाने से पूर्व न खावे अर्थात् अतिथि को खिलाने के पश्चात् ही खाना चाहिए। यहाँ अतिथि से पूर्व न खाने का प्रसंग इसके पूर्व मंत्र से सिद्ध होता है, जहाँ लिखा है- ‘‘अशितावत्यतिथावश्नीयात्’’ = अशितावति अतिथौ अश्नीयात्। इस प्रकरण को पूर्व आधिदैविक भाष्य में भी समझें।
..................................................................

{‘मांसम्’ पद की विवेचनाः- इस विषय में सर्वप्रथम आर्य विद्वान् पं. रघुनन्दन शर्मा कृत ‘‘वैदिक सम्पत्ति’’ नामक ग्रन्थ से आयुर्वेद के कुछ ग्रन्थों को उद्धृत करते हुए कहते हैं-

‘‘सुश्रुत में आम के फल का वर्णन करते हुए लिखा है कि-
अपक्वे चूतफले स्नाय्वस्थिमज्जानः सूक्ष्मत्वान्नोपलभ्यन्ते पक्वे त्वाऽविर्भूता उपलभ्यन्ते।
अर्थात् आम के कच्चे फल में नसें, हड्डियाँ और मज्जा आदि प्रतीत नहीं होती, किन्तु पकने पर सब आविर्भूत हो जाती हैं।

यहाँ गुठली के तन्तु रोम, गुठली हड्डियाँ, रेशे नसें और चिकना भाग मज्जा कहा गया है। इसी प्रकार का वर्णन भावप्रकाश में भी आया है। वहाँ लिखा है कि-
आम्रास्यानुफले भवन्ति युगपन्मांसास्थिमज्जादयो लक्ष्यन्ते न पृथक् पृथक् तनुतया पुष्टास्त एव स्फुटाः। 
एवं गर्भसमु˜वे त्ववयवाः सर्वे भवन्त्येकदा लक्ष्याः सूक्ष्मतया न ते प्र्रकटतामायान्ति वृद्धिग्ताः।
अर्थात् जिस प्रकार कच्चे आम के फल में मांस, अस्थि और मज्जादि पृथक्-पृथक् नहीं दिखलाई पड़ते, किन्तु पकने पर ही ज्ञात होते हैं उसी प्रकार गर्भ के आरम्भ में मनुष्य के अंग भी ज्ञात नहीं होते, किन्तु जब उनकी वृद्धि होती है, तब स्पष्ट हो जाते हैं।

इन दोनों प्रमाणों से प्र्रकट हो रहा है कि फलों में भी मांस, अस्थि, नाड़ी और मज्जा आदि उसी प्रकार कहे गये हैं, जिस प्रकार प्राणियों के शरीर में। वैद्यक के एक ग्रन्थ में लिखा है कि-
प्रस्थं कुमारिकामांसम्।
अर्थात् एक सेर कुमारिका का मांस। यहाँ घीकुवार को कुमारिका और उसके गूदे को मांस कहा गया है।

कहने का तात्पर्य यह कि जिस प्रकार औषधियों और पशुओं के नाम एक ही शब्द से रखे गये हैं उसी प्रकार औषधियों और पशुओं के शरीरावयव भी एक ही शब्द से कहे गये हैं। इस प्रकार का वर्णन आयुर्वेद के ग्रन्थों में भरा पड़ा है। श्रीवेंकटेश्वर प्रेस, मुम्बई में छपे हुए ‘औषधिकोष’ में नीचे लिखे समस्त पशुसंज्ञक नाम और अवयव वनस्पतियों के लिए भी आये हुए दिखलाये गये हैं। हम नमूने के लिए कुछ शब्द उद्धृत करते हैं-
वृषभ- ऋषभकन्द 
सिंही- कटेली, वासा 
हस्ति- हस्तिकन्द
श्वान- कुत्ताघास, ग्रन्थिपर्ण 
खर- खरपर्णिनी 
वपा-झिल्ली= बक्कल के भीतर का जाला
मार्जार- बिल्लीघास, चित्ता 
काक- काकमाची अस्थि- गुठली
मयूर- मयूरशिखा 
वाराह- वाराहीकन्द 
मांस- गूदा, जटांमासी 
बीछू- बीछूबूटी 
महिष- महिषाक्ष, गुग्गुल 
चर्म- बक्कल
सर्प- सर्पिणीबूटी 
श्येन- श्येनघंटी (दन्ती) 
स्नायु- रेशा
अश्व- अश्वगन्धा, अजमोदा 
मेष- जीवशाक 
नख- नखबूटी
नकुल- नाकुलीबूटी 
कुक्कुट (टी) शाल्मलीवृक्ष 
मेद-मेदा
हंस- हंसपदी 
नर- सौगन्धिक तृण 
लोम(शा)- जटामासी 
मत्स्य- मत्स्याक्षी 
मातुल- घमरा 
हृद- दारचीनी
मूषक- मूषाकर्णी 
मृग- सहदेवी, इन्द्रायण, जटामासी, कपूर 
पेशी- जटामासी 
गो- गौलोमी पशु- अम्बाड़ा, मोथा 
रुधिर- केसर 
महाज- बड़ी अजवायन 
कुमारी- घीकुमार 
आलम्भन- स्पर्श

इस सूची में समस्त पशु पक्षियों और उनके अवयवों के नाम तथा समस्त वनस्पतियों और उनके अवयवों के नाम एक ही शब्द से सूचित किये गये हैं। ऐसी दशा में किसी शब्द से पशु और उसका अवयव ही ग्रहण नहीं किया जा सकता।

विज्ञ पाठक यहाँ विचारें कि ऐसी स्थिति में यहाँ ‘मांसम्’ पद से गौ आदि पशुओं वा पक्षियों का मांस ग्रहण करना क्या मूर्खता नहीं है? यहाँ कोई पाश्चात्य शिक्षा से अभिभूत तथा वैदिक वा भारतीय संस्कृति व इतिहास का उपहासकर्ता कथित प्रबुद्ध किंवा मांसाहार का पोषक संस्कृत भाषा के ऐसे नामों पर व्यंग्य न करें, इस कारण हम उन्हें अंग्रेजी भाषा के भी कुछ उदाहरण देते हैं-

1. Lady Finger भिण्डी को कहते हैं। यदि भोजन विषय में कोई इसका अर्थ किसी महिला की अंगुली करे, तब क्या उसका अपराध नहीं होगा?
2. Vegetable किसी भी शाक वा वनस्पति को कहते हैं। उधर Chamber dictionary में इसका अर्थ dull understanding person भी दिया है। यदि Vegetable खाते हुए किसी व्यक्ति को देखकर कोई उसे मन्दबुद्धि मनुष्य को खाद्य पदार्थ कहे, तब क्या यह मूर्खता नहीं होगी।
3. आयुर्वेद में एक पौधा है, गोविष, जिसे हिन्दी में काकमारी तथा अंग्रेजी में Fish berry कहा जाता है। यदि कोई इसका अर्थ मछली का रस लगाये, तो उसे क्या कहा जाए?
4. Potato आलू को कहते हैं, उधर इसका अर्थ A mentally handicaped person भी होता है, तब क्या आलू खाने वाले को मानसिक रोगी मनुष्य को खाने वाला माना जाये?
5. Hag यह एक प्रकार का फल है, उधर An ugly old woman को भी hag कहा जाता है, तब क्या यहाँ भी कोई hag फल का अर्थ उलटा ही लगाने का प्रयास करेगा?

अब हम इस पर विचार करते हैं कि फलों के गूदे को मांस क्यों कहा? जैसा कि अपने आधिदैविक भाष्य में लिख चुके हैं कि पूर्णबलयुक्त वा पूर्णबलप्रद पदार्थ को मांस कहा जाता है। संसार में सभी मनुष्य फलों के गूदे का ही प्रयोग करते हैं, अन्य भागों का नहीं, क्योंकि फल का सार भाग वही है। वही भाग बल-वीर्य का भण्डार है अर्थात् उसके भक्षण से बल-वीर्य-बुद्धि आदि की वृद्धि होती है। अब कोई प्रश्न करे कि प्राणियों के शरीर का मांस क्यों मांस कहलाया? इसका उत्तर यह है कि किसी भी प्राणी के शरीर का बल उसकी मांसपेशियों के अन्तर्गत ही निहित है, इस कारण से यह भी मांस कहलाया जाता है। जैसे शाकाहारी प्राणी फलों के गूदे का ही विशेष भक्षण करते हैं, वैसे ही सिंहादि मांसाहारी प्राणी, प्राणी के मांस भाग को ही विशेष रूप से खाते हैं। यह दोनों में समानता है। जो स्थान फलों में गूदे का है, वही स्थान प्राणियों के शरीर में मांस का है। मनुष्य प्राकृतिक रूप से केवल शाकाहारी व दुग्धाहारी प्राणी है, इस कारण वेदादि शास्त्रों में प्राणियों के मांस खाने की चर्चा वेदादि शास्त्रों की परम्परा से सर्वथा अनभिज्ञता का परिचायक है। ऐसी चर्चा करने वाले कथित वेदज्ञ, चाहे विदेशी हों वा स्वदेशी, हमारी दृष्टि में वे वेदादि शास्त्रों की वर्णमाला भी नहीं जानते, भले वे व्याकरणादि शास्त्रों के कितने ही बड़े अध्येता-अध्यापक क्यों न हों। मांसाहार के विषय में हम पृथक् से एक ग्रन्थ लिखने पर फिर कभी विचार करेंगे, जिसमें विश्वभर के मांसाहारियों की सभी शंकाओं का समाधान होगा।

प्रश्न- वेद में ‘मांसम्’ पद का अर्थ प्राणियों का मांस कदापि नहीं हो सकता, इसे आपका पूर्वाग्रह क्यों न माना जाये; जो केवल शाकाहार के आग्रहवश ही किया गया है?

उत्तर- जिस परम्परा में सामान्य योगसाधक के लिए अहिंसा को प्रथम सोपान कहा गया हो, जहाँ मन, वचन, कर्म से कहीं भी व कभी भी सभी प्राणियों के प्रति वैर त्याग अर्थात् प्रीति का संदेश दिया गया हो, वहाँ सिद्धपुरुष योगियों एवं उसी क्रम में अपनी योगसाधना द्वारा ईश्वर व मंत्रों के साक्षात्कृतधर्मा महर्षियों, उनके ग्रन्थों एवं वेदरूप ईश्वरीय ग्रन्थों से हिंसा का संदेश देना मूर्खता व दुष्टता नहीं है, तो क्या है? जो विद्वान् वैदिक अहिंसा का स्वरूप देखना चाहे, वे पातंजल योगदर्शन के व्यासर्षि भाष्य को स्वयं पढ़ कर देखें। इस ऐतरेय ब्राह्मण में जहाँ प्रायः सभी भाष्यकारों ने पशुओं का नृशंस वध एवं उसके अंगों के भक्षण का विधान किया है, वहाँ हमने उसका कैसा गूढ़ विज्ञान प्रकाषित किया है, यह पाठक इस ग्रन्थ के सम्पूर्ण अध्ययन से जान सकते हैं। पाठकों की जानकारी के लिए हम वेद से ही कुछ प्रमाण देते हैं-

यदि नो गां हंसि यद्यश्वं यदि पूरुषम। तं त्वा सीसेन विध्यामः।। (अथर्व.1.16.4)

अर्थात् तू यदि हमारी गाय, घोड़ा वा मनुष्य को मारेगा, तो हम तुझे सीसे से बेध देंगे।

मा नो हिंसिष्ट द्विपदो मा चतुष्पदः।। (अथर्व.11.2.1)
अर्थात् हमारे मनुष्यों और पशुओं को नष्ट मत कर। अन्यत्र वेद में देखें-
इमं मा हिंसीद्र्विपाद पशुम्। (यजु.13.47)
अर्थात् इस दो खुर वाले पशु की हिंसा मत करो। 
इमं मा हिंसीरेकशफं पशुम्। (यजु.13.48)
अर्थात् इस एक खुर वाले पशु की हिंसा मत करो। 
यजमानस्य पशुन् पाहि। (यजु.1.1)
यजमान के पशुओं की रक्षा कर।
आप कहेंगे यह बात यजमान वा किसी मनुष्य विशेष के पालतू पशुओं की हो रही है, न कि हर प्राणी की।
इस भ्रम के निवारणार्थ अन्य प्रमाण-
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। (यजु.36.18)
अर्थात् मैं सब प्राणियों को मित्र की भांति देखता हूँ।
मा हिंसीस्तन्वा प्रजाः। (यजु.12.32)
इस शरीर से प्राणियों को मत मार।
मा स्रेधत। (ऋ.7.32.9) अर्थात् हिंसा मत करो।
महर्षि जैमिनी के पश्चात् सबसे महान् वेदवेत्ता महर्षि दयानन्द के मांसाहार के विषय में विचारों को भी पाठक पढ़ें-
‘‘मद्यमांसाहारी म्लेच्छ कि जिनका शरीर मद्यमांस के परमाणुओं से ही पूरित है, उनके हाथ का न खावें।’’
‘‘इन पशुओं को मारने वाले को सब मनुष्यों की हत्या करने वाले जानियेगा।’’
‘‘जब से विदेशी मांसाहारी इस देश में आकर गो आदि पशुओं को मारने वाले मद्यपायी राज्याधिकारी हुए हैं, तब से क्रमशः आर्यों के दुःख की सीमा बढ़ती जाती है। -सत्यार्थ प्रकाश, दशम समुल्लास

देखिये दया के सागर ऋषि दयानन्द क्या कहते हैं-

‘‘पशुओं के गले छुरे से काटकर जो अपना पेट भरते हैं, सब संसार की हानि करते हैं। क्या संसार में उनसे भी अधिक कोई विश्वासघाती, अनुपकारी, दुःख देने वाले पापीजन होंगे?’’
‘‘हे मांसाहारियो! तुम लोग जब कुछ काल के पश्चात् पशु न मिलेंगे, तब मनुष्यों का मांस भी छोड़ोगे वा नहीं?’’
‘‘हे धार्मिक लोगो! आप इन पशुओं की रक्षा तन, मन और धन से क्यों नहीं करते?’’ (गोकरुणानिधि) 
आशा है बुद्धिमान् एवं निष्पक्ष पाठकों की मांसाहार की भ्रांति निर्मूल हो चुकी होगी। 
...................................................................

मेरा आध्यात्मिक भाष्य
{मांसम् = मन्यते ज्ञायतेऽनेन तत् मांसम् (उ.को.3.64), मांसं पुरीषम् (श.8.7.4.19), (पुरीषम् = पुरीषं पृणातेः पूरयतेर्वा - नि.2.22; सर्वत्राऽभिव्याप्तम् - म.द.य.भा.38.21; यत् पुरीषं स इन्द्रः - श.10.4.1.7; स एष प्राण एव यत् पुरीषम् - श.8.7.3.6)}

(एतत् वा उ स्वादीयः) योगी पुरुष के समक्ष परमानन्द का आस्वादन कराने वाले ये पदार्थ विद्यमान रहते हैं, जिनके कारण जीव का परमात्मा के साथ सायुज्य रहता है, (यदधिगवं क्षीरं वा मांसं वा) वे पदार्थ योगी की मन आदि इन्द्रियों में प्रतिष्ठित होते हैं। वे पदार्थ क्या हैं, इसका उत्तर यह है कि सर्वत्र अभिव्याप्त परमैश्वर्य सम्पन्न इन्द्ररूप परमात्मा से झरने वाली ‘ओम्’ वा गायत्री आदि वेदों की ऋचाएं ही वे पदार्थ हैं, जो योगी की इन्द्रियों व अन्तःकरण में निरन्तर स्रवित होती रहती हैं। योगी उन आनन्दमयी ऋचाओं का रसास्वादन करने लगता है, तब वह परमानन्द का अनुभव करने लगता है। (तदेव न अश्नीयात्) योगी उन ऋचाओं के आनन्द को उस समय तक अनुभव नहीं कर पाता, जब तक कि अतिथिरूप प्राण तत्व, जो योगी के मस्तिष्क व शरीर में सतत संचरित होते हैं, उन ऋचाओं के साथ संगत नहीं होते हैं। यहाँ अतिथि से पूर्व का प्रकरण पूर्ववत् समझें।

भावार्थ- जब कोई योगी योगसाधना करता है और एतदर्थ प्रणव वा गायत्री आदि का यथाविध जप करता है, तब सर्वत्र अभिव्याप्त परमैश्वर्यवान् इन्द्ररूप ईश्वर से निरन्तर प्रवाहित ‘ओम्’ रश्मियां उस योगी के अन्तःकरण तथा प्राणों के अन्दर स्रवित होती रहती है। इससे वह योगी उन रश्मियों का रसास्वादन करता हुआ आनन्द में निमग्न हो जाता है।
                                         वेदविज्ञान-आलोकः से उद्घृत (पूर्वपीठिका - वेद का यर्थाथ स्वरूप, नवमोध्याय)


यदि आपको हमारा लेख पसंद आया तो इसे सभी वाट्सएप ग्रुपो, फेसबुक और वेबसाइटों पर शेयर करे।

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Recent post