कारणरूप मूल प्रकृति से परम चेतन सत्ता परमेश्वर ने अपने असीम ज्ञान और बुद्धिपूर्वक संयोग के द्वारा जिस समग्र व्यवस्था की रचना की है, वह 'सृष्टि' कहलाती है। इस दृश्य-अदृश्य ब्रह्माण्ड के भीतर अथवा इसके परे जो भी जड़-चेतन तत्त्व कभी भी आविर्भूत या उत्पन्न हुआ है, वह अनिवार्य रूप से इसी विशाल सृष्टि का अभिन्न अङ्ग है। वर्तमान में प्रायः यह प्रश्न उठाया जाता है कि भौतिक सृष्टि के विज्ञान को समझना एक आध्यात्मिक साधक के लिए क्यों आवश्यक है? इसका उत्तर अत्यन्त व्यावहारिक और प्रत्यक्ष है।
कल्पना कीजिए कि यदि कोई मनुष्य अपने परिवार में माता, पिता, भ्राता, भगिनी, पत्नी अथवा सन्तान जैसे मूलभूत सम्बन्धों के यथार्थ स्वरूप को न जाने, तो वह न तो सुचारु रूप से गृहस्थ धर्म का निर्वाह कर सकता है और न ही यह निर्णय कर सकता है कि किसके साथ किस मर्यादा में व्यवहार करना चाहिए। इसी भाँति जो व्यक्ति अपने स्थूल शरीर की संरचना, कार्यप्रणाली और आवश्यकताओं से सर्वथा अनभिज्ञ है, वह कभी भी निरोग, सन्तुष्ट और दीर्घायु नहीं रह सकता। प्रशासनिक स्तर पर यदि किसी जनपद के जिलाधिकारी को यह बोध ही न हो कि उसके प्रशासनिक तन्त्र में कौन-कौन से अधिकारी हैं और जनसाधारण के प्रति उसका क्या उत्तरदायित्व है, तो वह अपने पदीय कर्त्तव्यों का सम्यक् निर्वहन कदापि नहीं कर सकता। बिना मार्ग और वाहन की तकनीक को समझे यात्रा आरम्भ करने वाला अथवा नवीन भवन में विद्युत-संयंत्रों की कार्यविधि जाने बिना उनका अनियन्त्रित उपभोग करने वाला व्यक्ति सदैव प्राणघातक दुर्घटनाओं को आमन्त्रित करता है।
हम इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में कोई पृथक् अथवा स्वतन्त्र सत्ता नहीं हैं। यद्यपि जीवात्मा तत्त्वतः स्वतन्त्र है, किन्तु भौतिक शरीर धारण करते ही वह प्रकृति और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के ताने-बाने से प्रत्यक्षतः आबद्ध हो जाती है। हम अपने कक्ष में बैठकर भी केवल उस सीमित स्थान से ही प्रभावित नहीं होते, अपितु बाह्य वायुमण्डल, सौर-विकिरण, आकाशीय तरंगों तथा सम्पूर्ण समष्टि से सतत ऊर्जा का आदान-प्रदान करते हैं। यहाँ तक कि हमारे मन के सूक्ष्म विचार और तरंगें भी सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित करती हैं और परिवेश की तरंगों से स्वयं प्रभावित होते हैं। अतः समष्टि के इस विशाल तन्त्र का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है।
अनेक लोगों का यह एकाङ्गी विचार होता है कि मानव-जीवन का चरम लक्ष्य केवल 'ईश्वर-प्राप्ति' है, अतः भौतिक जगत् के प्रपंच को जानने की कोई आवश्यकता नहीं। किन्तु विचारणीय तथ्य यह है कि जब तक हम कार्य-रूप सृष्टि को नहीं समझेंगे, तब तक कारण-रूप परमेश्वर के अस्तित्व और उसकी महिमा का अनुमान कैसे सम्भव होगा? किसी मृत अथवा जीवित व्यक्ति की पहचान करने के लिए हम सीधे आत्मा का साक्षात्कार नहीं करते, अपितु शरीर की गति, श्वास-प्रश्वास, नाड़ी-स्पन्दन, हृदय की धड़कन और मस्तिष्क की सक्रियता रूपी जड़ लक्षणों को देखकर ही चेतन आत्मा की उपस्थिति का निश्चय करते हैं। ठीक इसी प्रकार, कार्य-सृष्टि को देखकर ही उसके रचयिता की सर्वज्ञता और सर्वशक्तिमत्ता का बोध होता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी द्वारा 'सत्यार्थ प्रकाश' में वर्णित पञ्चकोश-विवेक भी वस्तुतः स्थूल से सूक्ष्म सृष्टि को क्रमिक रूप से जानने की ही एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जो वस्तु विकृत अथवा रचित होती है, वह कभी नित्य नहीं हो सकती। यदि कोई अज्ञानी व्यक्ति सूर्य का आकार केवल कुछ मीटर अथवा किसी भवन जितना माने, तो वह इस विराट् सृष्टि के पीछे कार्य कर रही अनन्त शक्ति की कल्पना भी नहीं कर सकता। जब आधुनिक खगोल-विज्ञान और वैदिक ज्ञान यह स्पष्ट करते हैं कि हमारा सूर्य पृथ्वी से ३,३०,००० गुना भारी है, अन्तरिक्ष में उससे भी करोड़ों गुना विशाल तारे विद्यमान हैं और ऐसी ही अनन्त आकाशगङ्गाओं (गैलेक्सियों) का विस्तार फैला हुआ है, तब जाकर साधक के अन्तःकरण में उस परमेश्वर की असीम सामर्थ्य का वास्तविक विस्मय और श्रद्धाभाव जागृत होता है।
आज अध्यात्म और विज्ञान के मध्य जो कृत्रिम खाई उत्पन्न कर दी गई है, उसका निवारण अनिवार्य है। जब कोई जिज्ञासु 'वैदिक रश्मि सिद्धान्त' के आलोक में सूर्य के आन्तरिक मण्डल की प्रक्रियाओं, परमाणु संरचना तथा इलेक्ट्रॉन एवं सूक्ष्मातिसूक्ष्म मूलकणों के मूल उद्गम का अनुशीलन करता है, तब उसका अध्यात्म कोरे अन्धविश्वास अथवा अहंकार से मुक्त होकर यथार्थ बोध में परिणत हो जाता है। सृष्टि के नियमों को समझे बिना किया गया आध्यात्मिक पाखण्ड व्यक्ति में केवल दम्भ भरता है, जबकि यथार्थ ज्ञान मनुष्य को मर्यादावान् और ईश्वर-भीरु बनाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम और योगेश्वर श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण जीवन इसका ज्वलन्त उदाहरण है, जहाँ वे जीव, ईश्वर और प्रकृति इन तीनों अनादि सत्ताओं (त्रैतवाद) के यथार्थ भेद को समझकर प्रत्येक कर्म को समाधि की भाँति पवित्रता से सम्पन्न करते थे।
महर्षि दयानन्द के अनुसार सम्पूर्ण भौतिक और आध्यात्मिक विद्याओं का मूल स्रोत ईश्वरीय ज्ञान 'वेद' है। यदि कोई कहे कि वेदों का उद्देश्य केवल ओंकार-जप और मोक्ष तक सीमित है, तो उसे यह समझना होगा कि मुख्य साध्य की सिद्धि सदैव गौण साधनों के माध्यम से ही होती है। जिस प्रकार भोजन के मुख्य उद्देश्य की पूर्ति हेतु कृषि-कर्म, जल-सिंचन, फसल काटना, अनाज पीसना और पाक आदि क्रियाओं से होकर गुजरना अनिवार्य है अथवा किसी सुदूर गन्तव्य तक पहुँचने के लिए वाहन रूपी साधन का आश्रय लेना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार प्रकृति रूपी साधन के विज्ञान को जाने बिना साध्य-स्वरूप ईश्वर का साक्षात्कार असम्भव है।
महर्षि व्यास ने लगभग ५००० वर्ष पूर्व 'ब्रह्मसूत्र' के समन्वय-सिद्धान्त में यह स्पष्ट प्रतिपादित किया था कि जैसा नियम सृष्टि में दृष्टिगोचर होता है, वैसा ही सत्य वेदों में वर्णित है, क्योंकि दोनों का कर्त्ता एक ही सर्वज्ञ ईश्वर है। सृष्टि को जाने बिना वेद के मन्त्रों का और वेद को जाने बिना सृष्टि के गूढ़ रहस्यों का यथार्थ उद्घाटन नहीं हो सकता। प्राचीन काल में हमारे ऋषियों और तत्कालीन समाज के पास जो उन्नत प्रौद्योगिकी थी, वह पर्यावरण और प्रकृति के साथ पूर्णतः अनुकूल थी। इसके विपरीत, आज सृष्टि के आधे-अधूरे भौतिक ज्ञान पर आधारित अनियन्त्रित आधुनिक तकनीक ने सम्पूर्ण धरा को विनाश और प्रदूषण के कगार पर ला खड़ा किया है। यदि आध्यात्मिक समाज लौकिक विज्ञान से सर्वथा विमुख होकर केवल पलायनवादी बन जाएगा, तो वह भौतिक आवश्यकताओं के लिए सदैव इन्हीं विनाशकारी तकनीकों पर पराश्रित रहेगा। प्राचीन व्यवस्था में कृषि और वाणिज्य करने वाले वैश्य भी वेदों के प्रकाण्ड ज्ञाता होते थे, जिससे उनका उत्पादन पर्यावरण के सन्तुलन को नष्ट किए बिना सम्पूर्ण समाज का पोषण करता था।
ईशावास्योपनिषद् का अमर उद्घोष— "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्" स्पष्ट करता है कि इस गतिमान् ब्रह्माण्ड का कण-कण परमेश्वर की सर्वव्यापक सत्ता से ओतप्रोत है। प्रकृति, मन, प्राण, इन्द्रियाँ और पञ्चमहाभूत उसी की व्यवस्था के अंग हैं। 'वैशेषिक दर्शन' भी धर्म की व्याख्या करते हुए अभ्युदय (लौकिक उन्नति/भौतिक विज्ञान) और निःश्रेयस (आध्यात्मिक मुक्ति) दोनों को मोक्ष की अनिवार्य सीढ़ियाँ स्वीकार करता है। 'ब्रह्मसूत्र' का प्रथम सूत्र "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" के अनन्तर ही दूसरा सूत्र "जन्माद्यस्य यतः" आता है, जो यह घोषणा करता है कि ब्रह्म को जानने की जिज्ञासा रखने वाले को सर्वप्रथम इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के विज्ञान को समझना होगा।
यही कारण है कि जब महर्षि ब्रह्मा के निर्देश पर महर्षियों ने भगवान् मनु से वर्णाश्रम-धर्म और मानव-कर्त्तव्यों का उपदेश देने की प्रार्थना की, तब भगवान् मनु ने उपदेश का आरम्भ सीधे नियमों से न करके, सृष्टि की उस मूल अव्यक्त, 'अतर्क्यम्' और महाप्रलय की अवस्था से किया जहाँ सम्पूर्ण प्रकृति सुषुप्तावस्था में थी। उन्होंने भवन की छत देखने से पूर्व उसकी नींव (मूल प्रकृति) को उद्घाटित किया। चारों वेदों में समाहित मन्त्र "विष्णोः कर्माणि पश्यत" मानव-जाति को यही सन्देश देता है कि उस सर्वव्यापक परमात्मा के सृष्टि-रूपी विराट् कर्मों को देखो, समझो और अनुभव करो कि वह किस प्रकार गैलेक्सियों को धारण किए हुए है और किस प्रकार वनस्पतियों की एक-एक कोशिका में रस का संचरण कर रहा है। उस परम शिल्पी की रचना को देखकर ही मनुष्य को अपने कर्मों को श्रेष्ठता और दक्षता से करने की प्रेरणा प्राप्त होती है।
ईश्वर के 'सर्वशक्तिमान्', 'सर्वज्ञ', 'सर्वव्यापक' और 'निर्लेप' जैसे अनन्त विशेषणों की यथार्थ व्याख्या सृष्टि के सन्दर्भ के बिना असम्भव है। जिस प्रकार किसी यन्त्र (जैसे मोबाइल) की व्यवस्थित कार्यप्रणाली को देखकर उसके निर्माता की बुद्धिमत्ता अकाट्य रूप से सिद्ध होती है, उसी प्रकार इस सुव्यवस्थित ब्रह्माण्ड को देखकर ही किसी नास्तिक को भी सृष्टिकर्त्ता के अस्तित्व का बोध कराया जा सकता है। जब एक साधक ध्यान की गहन अवस्था में उतरकर अपने शरीर के प्रत्येक परमाणु, तन्मात्राओं और वैदिक रश्मियों में 'ओ३म्' की अनुगूँज और परमात्मा की सर्वव्यापकता का साक्षात् अनुभव करता है, तब उसका सम्पूर्ण अंहकार समाप्त हो जाता है और जीवन में सत्य, अहिंसा तथा करुणा का वास्तविक प्रादुर्भाव होता है।
जैसे केवल एक पहिये पर कोई रथ अथवा बैलगाड़ी अग्रसर नहीं हो सकती, उसी प्रकार केवल भौतिकवादी विज्ञान अथवा केवल पलायनवादी अध्यात्म के एकाङ्गी मार्ग पर चलकर मानव-सभ्यता सुरक्षित नहीं रह सकती। दोनों ही स्थितियाँ विनाशकारी अन्धकार की ओर ले जाती हैं। सन्तुलित और सार्थक जीवन का एकमात्र मार्ग यही है कि हमारे एक हाथ में 'अपरा विद्या' (सृष्टि का भौतिक विज्ञान) हो और दूसरे हाथ में 'परा विद्या' (परमात्मा का आध्यात्मिक ज्ञान)। सृष्टि के समस्त जड़-चेतन संसाधनों का दोहन अथवा शोषण न करके, उनका यज्ञीय भावना से सदुपयोग करना और सम्पूर्ण प्राणिमात्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करते हुए समष्टि को एक परिवार के रूप में देखना ही मनुष्य का शाश्वत धर्म है।
–आचार्य अग्निव्रत
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