Tuesday, July 23, 2019

भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (1)



भूमिका-1

भगवान् महादेव शिव एक ऐतिहासिक महापुरुष थे, जो देव वर्ग में उत्पन्न हुए थे। कैलाश क्षेत्र इनकी राजधानी थी। आज श्रावणमास के प्रारम्भ से ही देश व विदेश के शिवालयों में पूजा, कीर्तन, कथाएं, शिवलिगं की अश्लील पूजा, जो शिवपुराण में वर्णित दारुवन कथा पर आधारित है तथा इस कथा को कोई सभ्य व सुसंस्कृत महिला वा पुरुष सुन भी नहीं सकते हैं। शिवलिंग पर दूध चढ़ाना, जो बहकर नालियों में जाकर पर्यावरण को प्र्रदूषित करता है, क्या सच्ची पूजा का स्वरूप है? कहीं आम्ररस का अभिषेक ग्रीष्म ऋतु में करते देखा व सुना है? आश्चर्य है कि भगवान् शिव के इस अभागे राष्ट्र में करोड़ों बच्चे वा बूढ़े भरपेट रोटी के लिए तड़पते हों, उस देश में इस प्रकार से दूध बहाना क्या स्वयं उन भूखे नर-नारियों के साथ स्वयं भगवान् शिव का अपमान नहीं है? कितने शिवभक्त भगवान् शिव के विमल व दिव्य चरित्र, शौर्य, ईश्वरभक्ति, योगसाधना एवं अद्भुत ज्ञान-विज्ञान से परिचित हैं? यह आप स्वयं आत्मनिरीक्षण करें। भगवान् शिव कैसे थे, उनकी क्या प्रतिभा थी, उनके क्या उपदेश थे, यह जानने-समझने का न तो किसी के पास अवकाश है और न समझ। इस कारण हम आज से सम्पूर्ण श्रावण मास तक एक श्रंखला के रूप में उनके गम्भीर उपदेशों व ज्ञान विज्ञान को महाभारत ग्रन्थ के आधार पर प्रस्तुत करना प्रारम्भ कर रहे हैं। यह वर्णन भीष्म पितामह के उन उपदेशों, जो उन्होंने शरशय्या पर धर्मराज युधिष्ठिर को दिए थे, में मिलता है। आज यह बड़ी विडिम्बना है कि पौराणिक (कथित सनातनी) भाइयों ने भगवत्पाद महादेव शिव को अत्यन्त अश्लील, चमत्कारी व काल्पनिक रूप में चित्रित किया है, जबकि आर्य समाजी बन्धुओं ने मानो उन्हें कचरे पात्र में फेंक दिया है। ऐसे में उनका यथार्थ चित्रण संसार सम्मुख नितान्त ओझल हो गया है।

पौराणिक बन्धु धर्म नाम से प्रचालित विभिन्न मान्यताओं व कथाओं को बुद्धि के नेत्र बन्द करके अक्षरशः सत्य मान लेते हैं और कोई मिथ्या बातों का खण्डन करे, तो उसे हिन्दूविरोधी कह कर झगडे़ को उद्यत रहते हैं। वे यह भी नहीं सोचते कि मिथ्या कथाओं व अंधविश्वासों के कारण इस भारत और हिन्दू जाति की यह दुर्गति हुई है, भारत का इतिहास और ज्ञान-विज्ञान नष्ट हुआ है, भारत सैकड़ों वर्षों तक विदेशियों का दास रहा है। उधर आर्य समाजी बन्धु बिना गम्भीर चिन्तन व स्वाध्याय के पुराणों के साथ साथ महाभारत, वाल्मीकि रामायण की भी सभी अथवा अधिकांश बातों को गप्पें मानकर खण्डन करने में तत्पर रहते हैं, भले ही उन्हें महादेव, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र जैसे भगवन्तों को ही भूलने का पाप क्यों न करना पड़े, वे खण्डन करने को ही आर्यतव समझ लेते हैं। व नहीं सोचते कि यदि मिथ्या कथाओं का खण्डन करना है, तो इन देवों का सत्य इतिहास तो जाना व जनाया अनिवार्य है।

पाठकों से आग्रह है कि वे इन्हें पढ़ें, विचारें तथा उन पर आचरण करके वास्तविक शिवभक्त बनने का प्रयास करें। ईश्वर हम सबको ऐसा सच्चा शिवभक्त बनने की बुद्धि व शक्ति प्रदान करें, यही कामना है।

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

हनुमान् जी वाले मेरे वीडियो पर उठाए गये प्रश्नों का उत्तर


श्री हनुमान् जी के उड़ कर न जा सकने की हठ से आर्यत्व का कोई भला होने वाला नहीं है। बिना गम्भीर स्वाध्याय के इस विषय पर बालवत् दुराग्रह उचित नहीं। वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड प्रथम सर्ग के श्लोक 211 व 212 में श्री हनुमान् जी के लंका प्रवेश से जुड़े दो श्लोक दिये हैं। वे इस प्रकार हैं-

ततः स लम्बस्य गिरेः समृद्धे विचित्रकूटे निपपात कूटे।
सकेतकोद्दालकनारिकेले महाभ्रकूटप्रतिमो महात्मा।। 211।।

ततस्यु सम्प्राप्य समुद्रतीरं समीक्ष्य लङ्का गिरिवर्यमूध्र्नि।
कपिस्तु तस्मिन् निपपात पर्वते विधूय रूपं व्यथयन्मृगद्विजान्।। 212।।

इन दोनों श्लोकों में ‘निपपात’ पद यह स्पष्ट घोषित करता है कि वे आकाश मार्ग से समुद्र के किनारे स्थित पर्वत पर उतर गये। यदि वे वहाँ तैर रहे होते, तो ‘निपपात’ पद का प्रयोग नहीं होता, बल्कि वहाँ समुद्र तल से पर्वत के ऊपर चढ़ने का वर्णन होता, जबकि कहीं भी चढ़ने का वर्णन नहीं, क्या यही दो प्रमाण पर्याप्त नहीं? यदि वे उड़ नहीं सकते थे, तब संजीवनी लेने क्या पैदल चल कर गये थे? पहाड़ उठा लाने व सूर्य को मुख में रख लेने जैसी बातें हमारे लिए प्रमाण नहीं। वे उड़े भी तैरे भी, इस पर भी प्रश्न? अरे यह तो बच्चे भी जानते हैं कि बतख उड़ती भी है, तैरती भी है और पैरों से चलती भी है। अब कोई बालक उसे पूछे कि जब वह उड़ सकती है, तो तैरती क्यों हैं, चलती क्यों है? तो बतख भी उस बच्चे पर हंसेगी। महर्षियों के ग्रन्थों का अनादर करके अपने मन से शंकाएं वा कुतर्क प्रस्तुत करना आर्यों को उचित नहीं। आर्य समाज के चतुर्थ नियम का पालन अब आर्यों में नहीं रहा। जो युवा वा प्रौढ़ विद्वान् अपने अहंकारवश इतना श्रम अनावश्यक हठ मेें करते हैं, उतना यदि वेदादि शास्त्रों के गम्भीर ज्ञान को समझने में करते, तो आर्य समाज आज कहाँ पहुँच गया होता?

कौन सिद्धियों का प्रयोग करता है, कौन नहीं, यह व्यक्ति पर निर्भर होता है। महर्षि दयानन्द विभूतियों को सत्य मानते थे परन्तु उनके प्रदर्शन को उचित नहीं मानते थे। वैसा ही ऋषियों के विषय में कहा जा सकता है। फिर महर्षि वाल्मीकि के प्रमाण के पश्चात् कुछ भी कहना उचित नहीं। वस्तुतः ये सिद्धियां प्राण विज्ञान का प्रायोगिक रूप प्रतीत होती हैं, कोई योगी अवश्य ही इन्हें करे, यह कोई अनिवार्यता नहीं है। दुर्भाग्य से आर्य समाज में इन विभूतियों को नकारने वाले भी हैं। योगदर्शन व महाभारत के सम्बंध की मेरी चर्चा पर प्रश्न उठाने वाले बच्चों के समान प्रश्न कर रहे हैं। क्या ‘योगदर्शन’ नामक ग्रन्थ लिखे जाने से पूर्व योगी नहीं थे? अतः यह प्रश्न निरर्थक है। हमने महर्षि वाल्मीकि को प्रमाण मानकर श्री हनुमान् जी का उड़ना माना, इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रक्षिप्त श्लोकों को भी प्रमाण मान लें। प्रक्षेप जानने की कसौटी के लिए हमारे ग्रन्थ ‘वेदविज्ञान-आलोकः’ की पूर्वपीठिका पढनीय है।

मैं अपने बहुत बड़े अभियान में लगा हूँ, इस कारण बच्चों के साथ अनावश्यक विवाद में पड़ना नहीं चाहता। ये युवा जो अच्छा कार्य कर रहे हैं, इसकी मैं सराहना भी करता हूँ। जिस कार्य को करने के बारे में अभी तक किसी ने साहस करना तो दूर, सोचा भी नहीं, उसे मैंने किया और आगे भी इसी दिशा में बढ़ रहा हूँ। मैं तो सभी आर्य समाजियों से आग्रह करता हूँ कि वे अनावश्यक खण्डन से बचें, वैदिक विज्ञान को कुछ समझने का प्रयास करें, हाँ, आवश्यक होने पर मिथ्या का खण्डन अवश्य करें। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो हम वेद व आर्य समाज की हानि ही करेंगे, लाभ नहीं।

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Sunday, July 21, 2019

हाँ, हम ऋषियों की सन्तान हैं।



अपनी स्पष्टवक्ता के लिए विद्वान् सांसद श्री डॉक्टर सत्यपाल सिंह जी भूरिशः बधाई व धन्यवाद।

शोक है कि विज्ञान के नाम पर अनेक अंधविश्वास भी आज संपूर्ण विश्व में पनप रहे हैं। विज्ञान की मान्यताएं निरंतर परिवर्तित हो रही हैं, पुनरपि उन्हें कट्टरता से पकड़े रहना बौद्धिक दासता के अतिरिक्त और क्या हैं? डार्विन के विरोध में देश विदेश के अनेक वैज्ञानिकों द्वारा भी बहुत कुछ लिखा हुआ होने पर भी बंदर आदि जानवरों का वंशज होने पर कोई गर्व करें, तो वह स्वतंत्र है। हमें तो महान् प्रज्ञापुरूषों के वंशज होने पर गर्व है। कभी ऐसे अंधविश्वासियों की बुद्धि को भी यथार्थ विज्ञान अवश्य होगा कि वे हमारी भाँति महान् प्रज्ञापुरूष ऋषियों के वंशज हैं। इससे उनमें पावन प्रेरणा जगेगी, भला पशुओं का वंशज होने से कोई क्या प्रेरणा ले सकता है?

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Saturday, July 20, 2019

​वेद भक्त निराश न हो


मेरी प्रिय वेद भक्त महानुभावो! यदि आपको कहीं कोई व्यक्ति वेदों के मिथ्या अर्थ करके वेद की निंदा व अपमान करता हुआ प्रतीत होता है, तो आप उसकी सूचना प्रसिद्ध आर्य विद्वानों अथवा अन्य जो भी वैदिक विद्वान् हों, उनको देने का कष्ट करें। मुझे प्रतीत होता है वे उचित समाधान कर देंगे।

मैं अति व्यस्तता के कारण और किसी विशेष अभियान में लगा होने के कारण ही ऐसा आग्रह कर रहा हूँ, किंतु जब कहीं से भी कोई समाधान प्राप्त न हो सके, तब आप मुझे ऐसी समस्याएँ भेज सकते हैं। कृपया सीधा मुझे नहीं भेजें। अन्त में जब मुझे आप समस्या भेजेंगे, तो मैं उसके समाधान का पूर्ण प्रयास करूँगा।

आशा है आप मेरी विवशता को अवश्य समझेंगे परन्तु मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि आपको इस विषय में निराश होने की कदापि आवश्यकता नहीं है। कोई भी बुद्धिमान् एवं निष्पक्ष व्यक्ति वेद की निंदा नहीं कर सकता।

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Sunday, July 14, 2019

वेद के अध्येता सावधान



(लेखक - आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक)

सोशल मीडिया के एक जागरूक पाठक प्रिय तनिष्क अहलूवालिया ने अपने किसी मुस्लिम मित्र द्वारा ऋग्वेद के दो मंत्रों का निम्नानुसार भाष्य मेरे पास भेजा है।

1. अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान्पिबसि त्वमेषाम्। पचन्ति ते वृषभाँ अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः।। ऋ. 10.28.3

अर्थात् हे इन्द्र! अन्न की कामना से तुम्हारे लिए जिस समय हवन किया जाता है, उस समय यजमान पत्थर के टुकड़ों पर शीघ्रतिशीघ्र सोमरस (शराब) तैयार करते हैं, उसे तुम पीते हो, यजमान बैल पकाते है और उसे तुम खाते हो।

2. उक्ष्णो हि मे प´चदश साकं पचन्ति विंशतिम्। उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ।। ऋ. 10. 86. 14

अर्थात् इन्द्राणी द्वारा प्रेरित यज्ञकत्र्ता मेरे लिए 15-30 बैल काटकर पकाते हैं, जिन्हें खाकर में मोेटा होता हूँ। वे मेरी कुक्षियों को सोम (शराब) से भी भरते हैं।

निश्चित ही ऐसे अर्थों से कोई भी वेदभक्त दुःखी होगा, यही स्थिति श्री तनिष्क अहलूवालिया की हुई है। इस प्रकार का अनुवाद और भी कोई लाकर दे देगा, मैं किस-2 का उत्तर दूँ? यह समस्या है। वास्तव में इसके लिए उनका मुस्लिम मित्र दोषी नहीं है और न वेद की दुर्गति के लिए वामपंथी नास्तिक दोषी हैं, न कोई ईसाई वा अन्य मजहब का व्यक्ति। आज यह दुःखद परम्परा चल रही है कि कोई व्यक्ति हमारी कमियों को दर्शाये, तो हम उनके लिए उसी व्यक्ति व किसी अन्य व्यक्ति, समूह, मजहब वा किसी देश को दोषी ठहरा कर स्वयं को निर्दोष सिद्ध करना चाहतेे हैं।

मेरे प्यारे मित्रो! वेद की दुर्दशा वेद के उन अध्येताओं ने की है, जो संस्कृत भाषा, व्याकरण आदि के तो महान् विद्वान् थे परन्तु वेदादि शास्त्रों के यथार्थ विज्ञान से नितान्त दूर थे। जब ऐसे लोगों ने वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ आदि महान् ग्रन्थों का भाष्य किया, तो उन्होंने ऐसे ही अर्थ निकाले, जैसा कि ऊपर दिखाया गया है। स्वयं को सनातनी कहने वाले पौराणिक हिन्दुओं में प्रसिद्ध वेदभाष्यकार माने जाने वाले आचार्य सायण, महीधर आदि के वेदभाष्यों में ऐसे मिथ्या व पापपूर्ण भाष्यों की भरमार है। इन्हीं भाष्यकारों का अनुकरण विदेशी भाष्यकारों ने भी किया है, जिन्हें पढ़कर भारत के कथित बुद्धिजीवी वेद का उपहास करते हैं। इन मंत्रों का आचार्य सायण आदि ने जो भाष्य किया है, उसमें भी यही पाप विद्यमान है। दुर्भाग्य यह है कि कथित हिन्दू समाज इन भाष्यकारों को छोड़ने तथा महर्षि दयानन्द सरस्वती एवं आर्य विद्वानों के भाष्यों को स्वीकार करने को आज तक उद्यत नहीं है। यह बड़े शोक का विषय है कि जिस देश को अपनी वेदविद्या से भूमण्डल में महान् भौतिक व अध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान का प्रकाश करना था और वह महाभारत तक ऐसा करने के कारण जगद्गुरु कहलाता भी था, उसने ही संसार भर को मांसाहार, पशुबलि, मदिरापान व दुराचार जैसे पाप भी सिखाये हैं। इतने पर भी मूर्खतापूर्वक इन सबका दोष केवल विदेशियों एवं वामपंथियों के सिर मढ़ देते हैं।

मित्रो! वेद को समझने की एक अपनी प्रक्रिया है। यह कोई सामान्य संस्कृत भाषा का काव्य नहीं है, जो कोई भी उसका किसी भी भाषा में अपनी इच्छा व भावना से अनुवाद कर दे। वेद को समझने के लिए पाणिनीय व्याकरण ही पर्याप्त नहीं है, अपितु इसके साथ ही निरुक्त, दर्शन, ब्राह्मणग्रन्थ, उपनिषद्, छन्द शास्त्र आदि अनेक आर्ष ग्रन्थों का गम्भीर ज्ञान आवश्यक है और इसके लिए उचित वैज्ञानिक तर्क व ऊहा से सम्पन्न प्रतिभाशाली सात्विकी बुद्धि का होना, परमेश्वर की कृपा व विश्वास, उसकी यथार्थ उपासना, निष्काम जीवन व पूर्ण सतोगुणी भोजन तथा ब्रह्मचर्यादि व्रतों का सेवन भी आवश्यक है। ध्यातव्य है कि सुतर्क व ऊहा से युक्त वैज्ञानिकता, पूर्ण सदाचार तथा निष्कामता के बिना आर्ष ग्रन्थों का भी विज्ञान कभी भी नहीं हो सकता।

ऐसे में कोई तामसी, मांसाहारी, मूढ़मति अपने संस्कृत भाषा के ज्ञान के अहंकार में भरकर वेद आदि शास्त्रों का भाष्य करेगा, वह बन्दर के हाथ में उस्तरा देकर हजामत कराने जैसी मूर्खता होगी। दुर्भाग्यवश आज यही हो रहा है और इसका अनुचित लाभ डाॅ. जाकिर नाइक जैसे चतुर वेदविरोधी लोग तथा राष्ट्रविरोधी व नास्तिक वामपंथी विचारक उठाकर हिन्दुओं को वेदमार्ग के साथ-2 भारतीय जीवन मूल्यों से भी दूर कर रहे हैं।

मैं वेद के सभी पाठकों से आग्रह करता हूँ कि वे वेद पर कुछ भी विचार करने से पूर्व महर्षि दयानन्दकृत सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, मेरी पुस्तक ‘’बोलो! किधर जाओगे?’’ का अध्ययन अवश्य करें। यदि आप उच्च शिक्षित वैज्ञानिक मेधा से सम्पन्न हैं, तब मेरे ग्रन्थ ‘वेदविज्ञान-आलोकः’ को ध्यान से पढ़ें, उसके पश्चात् ही वेद का मर्म समझ में आयेगा। इस बार तो मैंने उत्तर दे दिया है, परन्तु अब आगे मैं इस प्रकार के किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दूंगा। इसमें मेरा बहुत समय व्यर्थ व्यतीत होता है। कोई भी व्यक्ति किसी भी वेदमंत्र का किसी भी मूर्ख द्वारा किया हुआ अनुवाद अथवा भाष्य लाकर मुझसे शिकायत करेगा, तो उसका मैं कब तक उत्तर दूंगा? जब तक प्रश्नकत्र्ता मेरे द्वारा सुझाये गये ग्रन्थों को पढ़ नहीं ले, तब तक में उत्तर नहीं दे पाऊंगा।

अब मैं उपर्युक्त मंत्रों के विभिन्न भाष्य उद्घृत करता हूँ-

आचार्य सायण भाष्य-

1. अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान्पिबसि त्वमेषाम्। पचन्ति ते वृषभां अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः।। ऋ. 10.28.3

हे इन्द्र ते त्वदर्थं मंदिनो मादयितं¤स्तूयानविलंबितान्सोमानद्रिणाभिषवग्राव्णा सुन्वंति। यजमाना अभिषुण्वंति। एषामत्मदादियजमानानां संबंधिनः सोमांस्त्वं पिबसि। किंच त्वदर्थं वृषभान्पशून्ये च यजमानाः पचंति तेषां संबंधिनो हविर्भूतान्पशूनत्सि। भक्षयसि। हे मघवन्धनवन्निंद्र त्वं यदा पृक्षेण हविर्भूतेनान्नेन निमित्तेन हूयमानः यजमानैर्हूयसे तदेति पूर्वेण संबंधः।।

2. उक्ष्णो हि मे प´चदश साकं पचन्ति विंशतिम्। उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ।। ऋ. 10. 86. 14

अथेंद्रो ब्रवीति। मे मदर्थं पंचदश पंचदशसंख्याकान् विंशतिं विंशतिसंख्याकांश्चोक्ष्णो वृषभान् साकं सह मम भार्ययंेेद्रण्या प्रेरिता यष्टारः पचंति। उतापि चाहमùि। तान्भक्षयामि। जग्ध्वा चाहं पीव इत् स्थूल एव भवामीति शेषः। किंच मे ममोभोभौ कुक्षो पृणंति। सोमेन पूरयंति यष्टारः। सोऽहमिंद्रः सर्वस्मादुत्तरः।।
इन दोनों ही भाष्यों में वही मांसभक्षण व हिंसा का पाप विद्यमान है, जिसको लेकर कोई भी वेद की निन्दा कर सकता है। आचार्य सायणदि के भक्त मेरे पौराणिक बन्धु, जो स्वयं को व्यर्थ ही सनातनी कहते हैं, क्या इस मांसभक्षण व गोहत्या के पाप से बचने हेतु महर्षि दयानन्द जी की शैली को अपनाने की इच्छा करेंगे?

आर्यविद्वान् स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक कृत भाष्य-

1. अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान्पिबसि त्वमेषाम्। पचन्ति ते वृषभाँ अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः।। ऋ. 10.28.3

संस्कृतान्वयार्थः- (इन्द्र) हे आत्मन्! राजन्! वा (ते) तुभ्यम् (अद्रिणा) श्लोककृता प्रशंसकेन वैद्येन पुरोहितेन वा प्रेरिता ‘‘अद्रिरसि श्लोककृत्’’ {काठ. 1/5} (मन्दिनः) तव हर्षयितारः पारिवारिका जना राजकर्मचारिणो वा (तूयान् सोमान् सुन्वन्ति) जलमयान् रसमयान् ‘‘तूयम् उदकनाम’’ {निघं. 1/6} सोमरसान् सम्पादयन्ति (तेषां पिबसि) तान् त्वं पिबेः ‘‘लिङर्थें लेट्’’ {अष्टा 3/4/7} अथ (ते) तुभ्यम् (वृषभान् पचन्ति) सुखरसवर्षकान् ‘‘वृषभः-यो वर्षति सुखानि सः’’ {ऋ. 1/31/5 दयानन्दः} ‘‘वृषभः-वर्षिताऽपाम्’’ {निरु. 4/8} सम्पादयन्ति (मघवन्) पृक्षेण हूयमानः। हे आत्मन् राजन् वा स्नेहसम्पर्केणाहूयमानो निमन्त्रयमाणः (तेषाम्-‘अत्सि) तान् त्वं भुङ्क्ष्व-भुङ्क्षे।। 3 ।।
भाषान्वयार्थ- (इन्द्र) हे आत्मन् या राजन्। (ते) तेरे लिये (अद्रिणा) प्रशंसक वैद्या या पुरोहित से प्रेरित (मन्दिनः) तेरे प्रसन्न करने वाले पारिवारिक जन या राजकर्मचारी (तूयान् सोमान् सुन्वन्ति) रसमय सोमों को तय्यार करते हैं (तेषां पिबसि) उनको तू पी और (ते) तेरे लिए (वृषभान् पचन्ति) सुख बरसाने वाले भोगों को तय्यार करते हैं (मघवन् पृक्षेण हूयमानः) हे आत्मन्! या राजन्! स्नेह सम्पर्क से निमन्त्रित किया जाता हुआ (तेषाम्-अत्सि) उन्हें तू भोग।। 3 ।।

भावार्थ- आत्मा जब शरीर में आता है, तब उसे अनुमोदित करने वाले वैद्य और प्रसन्न करने वाले पारिवारिक जन अनेक रसों और योग्य पदार्थों को उसके लिये तैयार करते हैं और स्नेह से खिलाते पिलाते हैं, जिससे कि शरीर पुष्ट होता चला जावे तथा राजा राजपद पर विराजमान होता है, तब उसके प्रशंसक पुरोहित और प्रसन्न करने वाले राजकर्मचारी सोमादि औषधियों के रस और भोगों को तैयार करते है, वह स्नेह से आदर पाया हुआ उनका सेवन करता है।। 3 ।।

2. उक्ष्णो हि मे प´चदश साकं पचन्ति विंशतिम्। उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ।। ऋ. 10. 86. 14

भाषान्वयार्थ- (मे हि प´चदश साकं विंशतिम्) मेरे लिये ही पन्द्रह और साथ बीस अर्थात् पैंतीस (उक्ष्णः पचन्ति) ग्रहों को प्राकृतिक नियम सम्पन्न करते हैं (उत-अहम्-अद्मि) हाँ मैं उन्हें खगोल में ग्रहण करता हूँ (पीवः) इसलिये मैं प्रवृद्ध हो गया हूँ (मे-उभा कुक्षी-इत् पृणन्ति) मेरे दोनों पाश्र्व अर्थात् उत्तर गोलार्ध दक्षिण गोलार्धों को उन ग्रह उपग्रहों से प्राकृतिक नियम भर देते हैं।।

आर्य विद्वान् आचार्य वैधनाथ शास्त्री कृत भाष्य-

1. अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान्पिबसि त्वमेषाम्। पचन्ति ते वृषभां अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः।। ऋ. 10.28.3

पदार्थ- (इन्द्र) हे राजन्!(ते) तेरे लिए (मन्दिनः) हर्षदायक (तूयान्) शीघ्र पचने वाले (सोमान्) सोम आदि औषधियों को (अद्रिणा) पाषाण आदि के साधनों से (सुन्वन्ति) वैद्यजन तैयार करते हैं, (एषाम्) इन सोम आदिकों को (त्वम्) तू (पिबसि) पीता है, हे धन के स्वामिन्! (पृक्षेण) स्नेह से (हूयमानः) बुलाये गए आप (ते) वे वैद्यजन (वृषभान्) वृषभ नाम की बलदायक औषधियों को (पचन्ति) पकाते हैं (तेषाम्) उनकी इन औषधियों को (अत्सि) खाते हो।
भावार्थ- हे राजन्! प्रेम से बुलाये गए आप वैद्य जनों द्वारा तैयार किये गये सोम आदि औषध और उनके द्वारा पकाये गये बलदायक ‘वृषभ’ नामक औषध को पीते और खाते हो।। 3 ।।

2. उक्ष्णो हि मे प´चदश साकं पचन्ति विंशतिम्। उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ।। ऋ. 10. 86. 14

पदार्थ- (पंचदश) दश प्राण और पंचभूत ये पन्द्रह पदार्थ, (मे) मेरे द्वारा बनाये गये (उक्ष्णः) सुखों के वर्षक शरीरों के (विंशतिम्) 20 अंगों को (साकम् हि) साथ ही (पचन्ति) पका कर पुष्ट करते हैं (उत) और (मे) मेरे द्वारा प्रदत्त शरीर के (उभाकुक्षी) दोनों पाश्र्वों को (पृणन्ति) पूर्ण करते हैं। (अहम्) मैं (पीव इत्) सर्वदा परिपुष्ट इस सबको प्रलयकाल में (अद्मि) अपने अन्दर समा लेता हूँ, (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् प्रभु (विश्वस्मात्) सब पदार्थों से सूक्ष्म और उत्कृष्ट है।

भावार्थ- दश प्राण और पंचभूत परमेश्वर द्वारा बनाए गए शरीरों के बीस अंगों को साथ ही परिपक्व करके पुष्ट करते हैं और मेरे द्वारा प्रदत्त दोनों पाश्र्वों को भी परिपूर्ण करते हैं। मैं सर्वदा परिपुष्ट इन्द्र = परमेश्वर इन सबको प्रलयकाल में अपने अन्दर समेट लेता हूँ। परमैश्ववर्यवान् प्रभू सब पदार्थों से सूक्ष्म और उत्कृष्ट है।। 14 ।। 

चतुर्वेदभाष्यकार पं. जयदेव शर्मा ‘मीमांसातीर्थ’ का भाष्यकार कृत भाष्य-

1. अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान्पिबसि त्वमेषाम्। पचन्ति ते वृषभां अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः।। ऋ. 10.28.3

भाष्य- हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवान्! (मन्दिनः) स्तुतिशील (ते) तेरे लिए (अद्रिणा) विदीर्ण न होने वाले दृढ़ क्षात्र बल से (तूयान्) आशुगामी (सोमान्) वीर पुरुषों का (सुन्वन्ति) अभिषेक करते हैं। (त्वम् एषाम्) तू इनका (पिबसि) पालन करता है। (ते) तेरे लिए वे (वृषभान्) बलवान् पुरुषों को (पचन्ति) दृढ़ करते हैं, हे (मघवन्) ऐश्वर्यवान्! तू (हूयमानः) आदरपूर्वक प्रार्थना किया जाकर (तेषाम पृक्षेण) उनके स्नेह से (अत्सि) ऐश्वर्य का भोग करता है।

2. उक्ष्णो हि मे प´चदश साकं पचन्ति विंशतिम्। उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ।। ऋ. 10. 86. 14

भाष्य- (मे) मेरे (पंचदश उक्ष्णः) 15 प्राणों को, (पंचदश) और हाथ पैर की 20 अंगुलियों के समान शरीर के भीतर 20 अंगों को विद्वान् लोग (साकं पचन्ति) एक साथ परिपाक, ज्ञान और अभ्यास से दृढ़ करते हैं। (उत्) और मे (पीवः) परिपुष्ट होकर (अद्मि) उन सब का भोग करता हूँ। वे प्राण (मे) मेरे (कुक्षी) दोनों पाश्र्वों में (पृणन्ति) देह के दायें बायें ओर अपने 2 स्थान पर अंग-प्रत्यंग में व्यापते हैं। वह (इन्द्रः) अद्भुत शक्तिशाली प्रभु (विश्वस्मात् उत्तरः) सबसे ऊपर है। उसकी देेह-रचना का कौशल अविज्ञेय है।

इस ऋचा का ऋषि वसुक्रः है। (वसुक्रः = ब्रह्म वै वसुक्रः) (ऐ. आ. 1.2.2), ब्रह्म = प्राणा-पानौ ब्रह्म (गो. पू. 2.11)
इसका तात्पर्य यह है कि इस छन्द रश्मि की उत्पत्ति प्राण व अपान के मिथुन से होती है। इसका देवता इन्द्र होने से इसके दैवत प्रभाव से इन्द्र तत्व अर्थात् तीक्ष्ण विद्युत् तरंगें समृद्ध होती हैं। इसका छन्द आर्षी निचृत् त्रिष्टुप् है। इसके छान्दस प्रभाव से इन्द्र तत्व तीक्ष्ण तेज व बल से युक्त होता है।


इस सबके पश्चात् मैं इन दोनों मंत्रों का तीन प्रकार का भाष्य प्रस्तुत करता हूँ।

अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान्पिसि त्वमेषाम्।
पचन्ति ते वृषभां अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः।। ऋ. 10.28.3

आधिदैविक भाष्य- यहाँ संवाद की शैली में सृष्टि विद्या को समझाया गया है। यहाँ छन्द रश्मि का ऋषिरूप प्राण-अपान युग्म इन्द्र तत्व अर्थात् तीक्ष्ण विद्युत् आवेशित तरंगों से कहता है- (इन्द्र) हे इन्द्र तत्व अर्थात् तीक्ष्ण विद्युत् तरंगो! (ते) तुम्हारे लिए (अद्रिणा) {आद्रिः = अद्रिरसि श्लोककृत् (का.1.5), मेघनाम (निघं. 1.10), यो अत्ति अदन्ति यत्रेति वा स अद्रिः (उ.को. 4.66) (श्लोकः = वाङ्नाम) (निघं. 1.11)} काॅस्मिक मेघों के अन्दर (यहाँ सप्तमी अर्थ में तृतीया का प्रयोग है।) विभिन्न वाग् रश्मियों को उत्पन्न करने वाली सूक्ष्म प्राणादि रश्मियों से प्रेरित किंवा उनके सहयोग से (मन्दिनः) नाना प्रकार की कमनीय छन्द रश्मियां (तूयान् सोमान्) {तूयम् क्षिप्रनाम (निघं. 2.15), उदकनाम (निघं. 1.12)} शीघ्र गमन करने वाली तथा सम्पूर्ण काॅस्मिक मेघ को सिचत् करने वाली सोम रश्मियों को (सुन्वन्ति) उत्पन्न करती हैं किंवा उस काॅस्मिक मेघस्थ पदार्थ को सम्पीडित करके मानो उससे सूक्ष्म सोम रश्मियों को निचोड़ती हैं। (त्वं, तेषां पिबसि) हे इन्द्र तत्व अर्थात् बलवती तीक्ष्ण विद्युदावेशित तरंगो! तुम उन सोम रश्मियों को पीओ अर्थात् अवशोषित करो। (ते) तुम्हारे लिए (वृषभान्) {वृषभः = स एव (आदित्यः) सप्तरश्मिर्वृषभस्तुुुविष्मान् (जै. उ. 1.28.2) (तुविरिति बलनाम - निघं. 3.1)} उस काॅस्मिक मेघ में अनेकों प्रकार के बहु आकर्षण बलयुक्त आदित्यलोकों अर्थात् विशालतारों को (पचन्ति) परिपक्व करते हैं अर्थात् सोम रश्मि से समृद्ध इन्द्र तत्व अर्थात् तीक्ष्ण विद्युदावेशित तंरगें उन विशाल तारों को उत्पन्न व परिपक्व करती हैं। (मघवन्) {मघवान् = स उ एव मखः स विष्णुः। ततः इन्द्रो मखवान् अभवत् मखवान् है वै तं मघवान मित्याचक्षते परोक्षम् (श. 14.1.1.13) (मखः = यज्ञनाम) (निघं. 3.17), यज्ञो वै मखः (तै. ब्रा. 3.2.8.3) एष वै मखो य एष (सूर्यः) तपति (श. 14.1.3.5)} विभिन्न प्रकार की संयोग-वियोगादि क्रियाओं एवं नाना प्रकार की प्रकाश तरंगों से परिपूर्ण सूर्यादि तारा (पृक्षेण) { पृक्ष = अन्ननाम (निघं. 2.7) संयोज्य कणों की असंख्य धाराओं के द्वारा (हूयमानः) अनेक प्रकार के संघर्षण एवं तज्जन्य नाना उच्च ध्वनियों को उत्पन्न करता हुआ वह विशाल काॅस्मिक मेघ (तेषाम्-अत्सि) उन सूर्यादि तारों को अपने अन्दर निगले रहते हैं अर्थात् अपने गर्भ में समाए रहते हैं।

भावार्थ- जब विशाल काॅस्मिक मेघ के अन्दर विद्यमान् सूक्ष्म प्राण रश्मियों से प्रेरित होकर विभिन्न छन्द रश्मियों के द्वारा उस काॅस्मिक मेघ का सम्पीडन होना प्रारम्भ होता है, उस समय उस विशाल मेघ रूप पदार्थ में उन छन्द व प्राण रूप रश्मियों से सोम अर्थात् सूक्ष्म मरुद् रश्मियां उत्पन्न होने लगती हैं। जब उस काॅस्मिक मेघ में व्याप्त विद्युदावेशित तरंगें उन सोम रश्मियों को अवशोषित करती हैं, तब वे तीव्र बल व ऊर्जा से सम्पन्न होने लगती हैं। इसके पश्चात् उस काॅस्मिक मेघ में नाना प्रकार से सम्पीडन क्रिया प्रारम्भ होकर सम्पीडन के अनेक केन्द्रों की उत्पत्ति होने लगती है। इसके साथ उन केन्द्रों के आस-पास विभिन्न प्रकार के आयन्स की धाराएं बहने लगती हैं। इससे सम्पूर्ण काॅस्मिक मेघ में नाना प्रकार के गम्भीर उच्च घोष उत्पन्न होने लगते हैं। इस प्रकार उस सम्पूर्ण मेघ रूप पदार्थ में अनेंकों सूर्यों का गर्भ पल रहा होता है।

इस ऋचा (छन्द रश्मि) का सृष्टि प्रक्रिया पर प्रभाव- इसके प्रभाव से काॅस्मिक मेघ में विद्युदावेशित कणों की अनेकों धाराएं बहने लगती हैं, जो वहाँ विद्यमान् सूक्ष्म छन्द वा मरुद् रश्मियों को अवशोषित करके तीव्रतर रूप को प्राप्त होती हैं। इन धाराओं से युक्त काॅस्मिक मेघ अपने गुरुत्व बल एवं नाना छन्द व प्राण रश्मियों के प्रभाव से सम्पीडत होने लगता है और इस सम्पीडन क्रिया के समय ही उस विशाल मेघ के अन्दर विभिन्न तारों के केन्द्रों का निर्माण होकर उनका गर्भ पलने लगता है।

आधिभौतिक भाष्य- (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवान् राजन् (ते) तेरे लिए (अद्रिणा) {अद्रिरसि श्लोककृत् (का.1.5)} तेरी प्रशंसा करने वाले हितैषी वैद्यादि जनों से प्रेरित (मन्दिनः) तुझे चाहने व प्रसन्न करने वाले परिवारी जन अथवा राष्ट्र के नागरिक (तूयान् सोमान्) {सोमः पशुर्वै प्रत्यक्षं सोमः (श.5.1.3.7) यशो वै सोमः (श.4.2.4.9) सोम ओषधीनामधिराजः (गो. उ. 1.17), अन्नं सोमः (कां. 9.9)} शीघ्रगामी अश्वादि पशुओं को, तेरे यश व प्रतिष्ठा को, तेरे लिए उत्तम अन्न व औषधियों को (सुन्वन्ति) प्रदान करते हैं, उत्पन्न करते हैं। हे राजन्! (तेषां, पिबसि) तुम उन अश्वादि पशुओं का संरक्षण करो {यहाँ ध्यान रहे कि ‘पा’ पाने धातु का अर्थ पीना के साथ-2 संरक्षण करना भी है। प्रकरण के अनुसार सोम का अर्थ पशु ग्रहण करने पर ‘पा’ धातु का अर्थ संरक्षण करना ग्रहण करना चाहिए। इस धातु के अर्थ के लिए देखें-संस्कृत-धातु-कोष-पं. युधिष्ठिर मीमांसाक} तथा उत्तम अन्न व औषधि आदि रसों का संरक्षण भी करो और उनका पान करो। इसके साथ ही अपने राष्ट्र के नागरिकों द्वारा जो सम्मान व प्रतिष्ठा प्राप्त हो रही है, उसका भोग करते हुए ऐसे कार्य करो कि उस यश का सदैव संरक्षण ही होवे, न कि उसमें किसी प्रकार की न्यूनता आने पावे।

(ते) हे राजन्! तेरे लिए (वृषभान् पचन्ति) वैद्यजन वृषभ नामक ऋषभकन्द औषधि एवं वीर्यवर्धक अनेक अन्न व औषधियों को पकाते हैं। { श्री वैंकटेश्वर प्रेस, मुम्बई में छपे औषधियों में अनेक वनस्पतियों के नाम पशु संज्ञक दिए हैं। पढ़ें- मेरे द्वारा लिखित मांसाहार-धर्म, अर्थ और विज्ञान के आलोक में} (मघवन्) हे धनैश्वर्यवान् राजन्! (पृक्षेण) अपने स्नेह सम्पर्क के द्वारा (हूयमानः) अपने प्रजाजनों के साथ मधुर संवाद व व्यवहार करते हुए (तेषाम्-अत्सि) उनके द्वारा प्रदत्त कर आदि का उपयोग कर किंवा उनके साथ आनन्द का भोग कर।

भावार्थ- किसी राष्ट्र के राजा के हितैषी वैद्य वा राजपरिवारी जन राजा के लिए उत्तम अन्न औषधियों को तैयार करते रहें। उस राष्ट्र के नागरिकों के मन में अपने राजा के प्रति यश व सम्मान का भाव होवे तथा वह राजा भी अपने प्रजाजनों के साथ निरन्तर स्नेह संपर्क के द्वारा मधुर व्यवहार करते हुए उचित मात्रा में करों का संग्रहण करके उनके साथ मिलकर आनन्द व ऐश्वर्य का भोग करे अर्थात् प्रजा को दुःखी करके राजा कभी व्यक्तिगत सुख की आकांशा नहीं करे और न जन सामान्य से कठोर व्यवहार करे।

आध्यात्मिक भाष्य- (इन्द्र) हे जीवात्मन् वा योगसाधक! (ते) तेरे लिए (अद्रिणा) अपने अन्तः करण में वेद की ऋचाओं को धारण करने वाले ऋषियों द्वारा प्रेरित (मन्दिनः) तेरा प्रिय चाहने वाले ईश्वर के स्तोता आचार्य अपनी शिक्षा के द्वारा (तूयान् सोमान्) {सोमः = सत्यं श्रीज्र्योतिः सोमः (श. 5.1.2.10) प्राणः सोमः (श. 7.3.1.2), तूर्यम् = सुखकरम् (म.द.ऋ.मा.3.52.8)} सत्य स्वरूप एवं प्राणों के प्राण परमेश्वर की आनन्द ज्योति को (सुन्वन्ति) प्रकट कराते हैं। (तेषां, पिबसि) हे योगिजनो! तुम उस परमानन्द रूपी रस का पान करो। (ते) वे योगी आचार्य तुम्हारे लिए (वृषभान् पचन्ति) आपके आत्मा व अन्तःकरण में ब्रह्मानन्द की वर्षा कराने वाली दिव्य ज्योति को विकसित व परिपक्व करते हैं अर्थात् उनके मार्गदर्शन में की गयी योगसाधना से समाधिजन्य प्रज्ञा व आनन्द की पुष्टि होती है। (मघवन्) हे योगधन से युक्त योगसाधक (पृक्षेण) अपने आत्मा व अन्तःकरण में प्राण व वेद की ऋचाओं की सुखद वृष्टि के द्वारा (हूयमानः) परब्रह्म का आह्वान करते हुए (तेषाम् अत्सि) उस परमानन्द की वृष्टि एवं प्राण ऊर्जा का उपभोेेग करके अपने आत्मा व अन्तःकरण के बल को बढ़ाता रहा।

भावार्थ- परब्रह्म के साक्षात्कृतधर्मा एवं वेद की ऋचाओं को अपने अन्तःकरण में बसाने वाले ऋषियों से प्रेरित योग के आचार्य अपने योगसाधक शिष्य को परब्रह्म का साक्षात्कार कराते हैं। वे आचार्य अपने शिष्यों के भीतर ब्रह्म की ज्योेेेेति का प्रकाश कराके उसे पुष्ट भी करते हैं। इस कारण वे योगसाधक शिष्य परमेश्वर की दिव्य ज्योति एवं प्राण ऊर्जा को प्राप्त करके अपने आत्मा व अन्तःकरण को बलवान् बनाने में सक्षम होते हैं।

इस ऋचा का ऋषि वृषाकपिरिन्द्र इन्द्राणी है, इसका तात्पर्य है कि इस छन्द रश्मि की उत्पत्ति विशेष बलशाली व विभिन्न रश्मियों को कम्पाने वाले सूत्रात्मा वायु के विशेष रूप से होती है। (देखें- वेदविज्ञान-आलोकः - पृ. 1462) इसका देवता इन्द्र होने से इन्द्र तत्व अर्थात् सूर्य लोक एवं उसके अन्दर विद्यमान तीक्ष्ण विद्युदावेशित तरंगें तीव्रता को प्राप्त होती हैं। इसका छन्द पंक्ति होने से सूर्यादि तारों के अन्दर विभिन्न प्रकार की संयोजन व वियोजनादि विस्तार को प्राप्त करती हैं।

आधिदैविक भाष्य- (मे हि प´चदश साकं विंशतिम्) मेरे अर्थात् पूर्वोक्त विशेष सूत्रात्मा वायु के द्वारा {तृतीयार्थ में चतुर्थी का प्रयोग है।} ही पन्द्रह अर्थात् प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त एवं धनंजय ये दस प्राथमिक प्राण तथा सूत्रात्मा वायु, भूः, भुवः, स्वः एवं हिम् अथवा पंच महाभूत ये पांच मिलाकर पन्द्रह प्राथमिक सूक्ष्म रश्मि आदि पदार्थों के साथ-2 बीस अर्थात् 12 मास, 6 ऋतु रश्मियां, मनस्तत्व एवं ओम् रश्मि अथवा 12 मास एवं गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप्, जगती के अतिरिक्त अतिच्छन्द रश्मियां, ये 20 प्रकार की रश्मियां, इस प्रकार कुल 35 प्रकार के रश्मि आदि पदार्थ (उक्ष्णः) {उक्षा = उक्षतेर्वृद्धिकर्मणः उक्षन्त्युदकेनेति वा (निघं. 12.9)} वर्षा आदि के द्वारा सींचने में समर्थ अथवा प्रकाशादि किरणों के द्वारा विभिन्न लोकों को प्रकाशित करने में समर्थ विशाल सूर्यादि लोकों को (पचन्ति) परिपक्व वा पुष्ट करते हैं अर्थात् उपर्युक्त पैंतीस प्रकार के रश्मि आदि पदार्थों के द्वारा ही विशाल काॅस्मिक मेघों में विभिन्न तारों का निमार्ण होता है। (उत) और (अहम्) मैं अर्थात् इस छन्द रश्मि के ऋषिरूप सूत्रात्मा वायु का विशेष स्वरूप (अद्मि) इन सभी पैंतीस रश्मि आदि पदार्थों का भक्षण करता है अर्थात् सबको एकसूत्र में बांधकर सूर्य लोकादि विभिन्न लोकों को भी अपने अन्दर समाहित कर लेता है। (पीवः) इस प्रक्रिया के समय वह सूत्रात्मा वायु अति विस्तृत रूप धारण करके सम्पूर्ण सौरमण्डल, गैलेक्सी आदि में व्याप्त हो जाता है। (मे) मेरे अर्थात् उस विशेष सूत्रात्मा वायु के (उभा) दोनों रूप अर्थात् सम्पूर्ण लोकों को आच्छादित करने वाले तथा विभिन्न सूक्ष्म कणों व रश्मियों को ढकने वाले दोनों रूप सम्पूर्ण काॅस्मिक मेघ, गैलेक्सी, सौरमण्डल आदि के अन्दर व बाहर सर्वत्र व्याप्त हो जाते हैं। (इन्द्रः) वह इन्द्र अर्थात् विद्युत चुम्बकीय तंरगें, विद्युदावेशित तरंगें तथा सूर्यादि लोक अन्य लोकों से उत्कृष्ट स्वरूप को प्राप्त करते हैं।

भावार्थ- जब किसी काॅस्मिक मेघ के अन्दर दस प्राथमिक प्राण, पंच महाभूत अथवा सूत्रात्मा , हिम् , भूः, भुवः व स्वः, ये सब पन्द्र्र्र्र्रह पदार्थों के साथ 8 प्रकार की छन्द व 12 प्रकार की मास रश्मियां मिल कर अर्थात् कुल 35 प्रकार के रश्मि आदि पदार्थ विशेष सक्रिय होते हैं, उस समय उस विशाल मेघ के अन्दर नाना प्रकार के तारों का जन्म होने लगता है। उस समय सूत्रात्मा वायु अति विस्तृत होकर सभी पदार्थों के साथ-2 सम्पूर्ण काॅस्मिक मेघ को अपने अन्दर व्याप्त कर लेता है। इन सभी लोकों में सूत्रात्मा वायु रश्मियों के दोनों रूप अर्थात् एक वह रूप, जो सूक्ष्म रश्मियों वा कणों को परस्पर जोड़ने में सहायक होता है और दूसरा, जो विभिन्न लोकों के गुरुत्वाकर्षण बल का एक महत्वपूर्ण भाग बनकर उन्हें थामे व जोड़े रखता है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सक्रिय होते हैं। इससे विभिन्न प्रकार के विकिरण व लोकों को उत्कृष्ट स्वरूप प्राप्त होता है।

आधिभौतिक भाष्य- (मे हि पंचदश साकं विंशतिम्) मैं अर्थात् राजा अपने पांच प्राण, पांच ज्ञानेन्द्रियांे व पांच कर्मेन्द्रियों को वश में करके दश कामज व्यसन { अक्ष अर्थात् चैपड़ खेलना, जुवा खेलना, दिन में सोना, कामकथा वा दूसरे की निन्दा किया करना, स्त्रियों का अति संग, मादकद्रव्य अर्थात् मद्य, अफीम, भाँग, गाँजा, चरस आदि का सेवन, गाना बजाना, नाचना व नाच कराना, सुनना और देखना, वृथा इधर-उधर घूमते रहना।- मनुस्मृति- सत्यार्थ प्रकाश के षष्ठ समुल्लास से उद्घृत} व आठ क्रोधज व्यसन { पैशुन्यम् अर्थात् चुगली करना, बिना विचारे बलात्कार से किसी की स्त्री से बुरा काम करना, द्रोह रखना, ईष्र्या अर्थात् दूसरे की बड़ाई वा उन्नति देख कर जला करना, असूया दोषों में गुण, गुणों में दोषारोपण करना, अर्थदूषण अर्थात् अधर्मयुक्त बुरे कामों में धनादि का व्यय करना, कठोर वचन बोलना और बिना अपराध कड़ा वचन वा विशेष दण्ड देना।- मनुस्मृति- सत्यार्थ प्रकाश के षष्ठ समुल्लास से उद्घृत} अविद्या व प्रमाद, इन बीस दुव्र्यसनों को जीत कर (उक्ष्णः) प्रजा के लिए अपने सुख व पराक्रम वर्षक स्वरूप को (पचन्ति) परिपक्व करता है {यहाँ बहुवचन प्रयोग व्यत्यय से हुआ है।} (उत) और (अहम्) मैं सुखवर्षक राजा (अद्मि) सम्पूर्ण राष्ट्र के दुःख, अविद्या, दरिद्रता, अशान्ति एवं असुरक्षा आदि को नष्ट करता हूँ, (पीवः) ऐसा करके मैं अपने राष्ट्र का विकास करता हूँ, (मे) मेेरे (उभा कुक्षी) सज्जन प्रजाजन हेतु स्नेह व दुर्जनों हेतु उचित दण्ड, ये दोनों स्वरूप वा व्यवहार (इत् पृणन्ति) सम्पूर्ण राष्ट्र को सुख व शान्ति से समृद्ध करते हैं।

भावार्थ- जो अपने प्राणों व इन्द्रियों को वश करके अविद्या, प्रमाद व सभी कामज तथा क्रोधज दोषों को जीत लेेता है, वह सम्पूर्ण राष्ट्र को नाना प्रकार के सुख-ऐश्वर्यों से भर देेेता है। ऐसा राजा सज्जनों को संरक्षण व दुष्टोें को उचित दण्ड के द्वारा अपने राष्ट्र को सर्वविध संरक्षित व सुखी करता है।

आध्यात्मिक भाष्य- (मे हि) मैं योग साधक (पंचदश साकं विंशतिम्) मोक्ष के चार साधन, जिनमें प्रथम विवेेक के बारह प्रकार अर्थात् शरीर के अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय व आनन्दमय कोष, तीन अवस्था-जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, चार शरीर-स्थूल, सूक्ष्म, कारण एवं तुरीय वा स्वाभाविक को यथावत् जानना, ये बारह प्रकार के विवेक, द्वितीय वैराग्य अर्थात् ज्ञान की पराकाष्ठा, तृतीय षट्क सम्पत्ति (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा व समाधान), चैथा मुमुक्षुत्व अर्थात् मुक्ति की तीव्र इच्छा, ये कुल मिलाकर मुक्ति के बीस साधनों के साथ यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि, इन आठों योगांगों से प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, इन तीन प्रमाण, विपर्पय, विकल्प, निद्रा व स्मृति, इन सात प्रकार की वृत्तियों का निरोध करके अर्थात् कुल पैंतीस प्रकार के साधनोपसाधनों के द्वारा (उक्ष्णः पचन्ति) सुख व आनन्द की वृष्टि करने हारे परब्रह्म परमात्मा को साक्षात् करने की प्रक्रिया को परिपक्व करता हूँ। (उत) और (अहम्) मैं योगमार्ग का पथिक (अद्मि) उस परमानन्द व पावनी शान्ति का भक्षण करता हूँ अर्थात् उसका आस्वादन अनुभव करता हूँ और ऐसा करके (पीवः) अपने आत्मिक बल व पवित्रता को समृद्ध करता हूँ। (मे) मेरे (उभा कुक्षी) लौकिक व परलौकिक दोनों ही सुख (इत्, पृणन्ति) मुझे पूर्ण तत्व करते हैं।

भावार्थ- कोई भी योगी जब विवेक, वैराग्य, षट्क सम्पत्ति, मुमुक्षुत्व के साथ अष्टांग योग की साधना करता है, उस समय वह सृष्टि के सम्पूर्ण विज्ञान के साथ-2 परब्रह्म परमेश्वर एवं स्वयं के यथार्थ स्वरूप को जानकर परमानंद को प्राप्त करता है। इसके साथ वह इस लोक में भी सभी सुखों को प्राप्त करने में समर्थ होता है।

अब विज्ञ पाठक स्वयं विचार कर सकते हैं कि महर्षि दयानन्द सरस्वती की परम्परा का कोई भी भाष्यकार वेदों में मांसाहार, पशुबलि आदि पापों को कभी स्वीकार नहीं कर सकता है। इसमें उनका कोई पूर्वाग्रह नहीं है, बल्कि वेद का वास्तविक स्वरूप ही ऐसा है, जहाँ ऐसे पापों का कोई स्थान नहीं है। मैंने अपना भाष्य मात्र अपनी ऊहा के बल पर नहीं किया है, बल्कि उसका एक आधार है- विभिन्न वैदिक ग्रन्थों के प्रमाण एवं उनकी वैज्ञानिकता। पाठक मेरे भाष्य की अन्य भाष्यों से तुलना स्वयं करके यह जान सकते हैं कि यदि इसी प्रकार चारों वेदों का भाष्य किया जाए, तो संसार में कौन ऐसा मूर्ख होगा, जो वेद का उपहास करने की कल्पना भी कर सकेगा? दुर्भाग्य से ऋषि दयानन्द जी को विस्तार से वेद भाष्य करने का समय नहीं मिला।

उक्ष्णो हि मे प´चदश साकं पचन्ति विंशतिम्।
उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र
उत्तरः ।। ऋ. 10. 86. 14

अन्त में यही कहना चाहूँगा कि जो पाठक शुद्ध हृदय एवं वास्तव में जिज्ञासु होंगे, वे मेरे भाष्य से वैज्ञानिक व आध्यात्मिक आनन्द उठाने के साथ-2 लोक व्यवहार में भी इसकी उपादेयता को अनुभव करेंगे और जो तामसी बुद्धि के पूर्वाग्रही व दुराग्रही व्यक्ति होंगे, वे पशु मारने में ही अपना पाण्डित्य अथवा वेद की निन्दा में ही अपना समय व्यर्थ गंवाने का पाप करेंगे। कुछ ऐसे भी वैदिक विद्वान् हो सकते है , जो वेद में मांसाहार आदि को तो स्वीकार नहीं करेंगे परन्तु उन्हें ईष्र्या-द्वेषवश मेरा भाष्य भी स्वीकार नहीं होगा, भले ही वे स्वयं भाष्य करने में समर्थ न हों। कोई बात नहीं मैं ऐसे कथित विद्वानों को इस विषय में स्वतंत्र छोड़ता हूँ। मैं अपने पाठकों से आग्रह करता हूँ कि अब वे इस प्रकार के प्रश्न मुझे नहीं भेजें। इस लेख से ही वेददूषकों की योग्यता तथा वेद के वास्तविक स्वरूप एवं मेरे विचारों का अनुमान कर लें।

Thursday, July 11, 2019

भगवान् श्रीराम के मृग का पीछा करने का सच


जब मारीच स्वर्णमृग के रूप में सीताजी को दिखाई दिया और उन्होंने श्रीरामजी तथा लक्ष्मणजी को उसे दिखाया। देखते ही लक्ष्मणजी ने कहा-

‘‘अहं मन्ये मारीचं राक्षसं मृगम्
अनेन निहता राम राजानः कामरूपिणा।’’ 
                                (अरण्य काण्ड 34.5,6)

अर्थात् यह मृग के रूप में राक्षस मारीच आया है, ऐसा मैं मानता हूँ। इसी इच्छाधारी राक्षस ने अनेक राजाओं का वध किया है। सीताजी ने उसे जीवित पकड़ कर लाने का आग्रह किया था, न कि मारकर लाने के लिये। यदि कहें कि जीवित ही पकड़ना था, तो धनुष बाण ले जाने की क्या आवश्यकता थी? इस विषय में मेरा मानना है कि मृग को दौड़कर हाथों से नहीं पकड़ा जा सकता, बल्कि मोहनास्त्र आदि के द्वारा बांध कर ही पकड़ा जा सकता है। इस कारण धनुष बाण लेकर गये। इसके साथ ही क्षत्रिय को निरस्त्र, निःशस्त्र रहना भी नहीं चाहिये। फिर उन्हें यह आशंका थी ही कि मृग मारीच है, तब तो सशस्त्र होकर जाना अनिवार्य ही था। यद्यपि वाल्मीकि रामायण में उसे जीवित न पकड़ पाने की स्थिति में ही मारकर लाने की बात कही गई है और उसका हेतु यह दिया है कि सीताजी उसकी चमड़ी से आसन बनाना चाहती थीं। मैं पूछता हूं कि यदि चर्म के आसन एवं बिस्तर से ही प्रीति होती, तो वे स्थान-2 पर पर्ण, घास, पुष्पों की शय्यायें नहीं बनाते। क्या उन्हें जंगल में कहीं कोई सुन्दर जानवर मिले ही नहीं थे। इतने सुन्दर नहीं भी मिले हों, तो भी जंगल में अनेक सुन्दर हिरण, बाघ, चीता आदि सुन्दर चमड़ी वाले जानवर मिले ही होंगे। तब क्यों नहीं उनकी चमड़ी के लिये किसी को मारा? श्रीरामजी ने कई स्थानों पर लक्ष्मणजी से फूल, घास, लकड़ी, पत्ते लाकर बिस्तर बनाने का आदेश दिया है। क्यों नहीं किसी जानवर को मारकर चमड़ा लाने का आदेश दिया? इससे आरामदायक बिस्तर, आसन बन सकते थे। जब श्रीरामजी उस मृग के पीछे चलने को उद्यत होते हैं, तब उन्होंने लक्ष्मणजी से कहा-

‘‘यदि वायं यथा यन्मां भवेद् वदसि लक्ष्मण। 
मायैषा राक्षसस्येति कत्र्तव्योऽस्य वधो मया।। 
एतेन हि नृशंसेन मारीचेना कृतात्मना।
वने विचरता पूर्वं हिंसिता मुनिपुंगवाः।’’
                                                    (अरण्य काण्ड 34.38,39)

अर्थात् हे लक्ष्मण! तुम मुझसे जैसा कह रहे हो, यदि वैसा ही यह मृग हो, यदि राक्षसी माया ही हो, तो इसे मारना मेरा कर्तव्य है। क्योंकि इस दुष्ट ने मुनियों की हत्या की है। इससे स्पष्ट है कि श्रीरामजी ने उस जानवर को मारीच ही समझा था न कि स्वर्णमृग। हमें यह विचारना चाहिये कि लक्ष्मणजी उनके साथ सेवा हेतु ही आये थे। वे ही स्थान-स्थान पर कुटी व शय्या तैयार करते हैं, जल, कन्द, मूल, फल लाते हैं। तब यदि वह जानवर ही पकड़ना वा मारना था, तो क्या यह कार्य लक्ष्मणजी नहीं कर सकते थे? जो लक्ष्मणजी बड़े-बड़े योद्धाओं से घोर युद्ध करने में समर्थ थे, वे उस मृग को मार वा पकड़ नहीं सकते थे? तब क्यों श्रीरामजी यह साधारण काम करने हेतु स्वयं गये और लक्ष्मणजी को वहां सीताजी की रक्षार्थ नियुक्त किया? क्यों नहीं, सदैव सेवातत्पर अनुज लक्ष्मणजी को यह कार्य सौंपा? इससे स्पष्ट है कि श्रीरामजी स्थिति की गम्भीरता समझ रहे थे। मारीच के पराक्रम व माया को जानकर, लक्ष्मणजी को भेजकर, उन्हें संकट में नहीं डालना चाहते थे। उन्हें गम्भीर परिस्थितियों में अपने पौरुष का विश्वास था। इस प्रकार की परिस्थिति उस समय भी आयी थी, जब खर और दूषण ने 14 हजार राक्षसों की सेना लेकर आक्रमण कर दिया था। उस समय श्रीरामजी ने लक्ष्मणजी को युद्ध का आदेश न देकर स्वयं ही युद्ध किया था और लक्ष्मणजी को सीताजी की रक्षार्थ नियुक्त किया था। इसी प्रकार यहां भी यही परिस्थिति बनी थी। इस सब पर गम्भीरता से विचारने पर यह सिद्ध होता है कि श्रीरामजी शिकार हेतु नहीं बल्कि उसे मारीच जानकर घोर युद्ध करने गये थे। हम इस विषय की यथार्थता जानने हेतु रामायण के अन्य प्रसंगों पर भी दृष्टि डालें, तो पायेंगे कि उस काल में किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं होती थी, सिवा दुष्ट दमनार्थ युद्ध के। जिस समय महात्मा भरतजी चित्रकूट में श्रीरामजी से मिलने आते हैं, तब श्रीरामजी ने मिलते ही उन्हें कुशलक्षेम पूछते हुये सम्पूर्ण राजनीति का उपदेश किया है। उसमें एक बिन्दु आता है, जिसमें अयोध्या ‘हिंसाभिरभिवर्जितः’ कहा है (अयो. कां.100वां सर्ग, श्लोक 44)।

अर्थात् अयोध्या हिंसा से पूर्ण मुक्त थी, तब शिकार कैसे किया जा सकता है? जब श्रीराम का राजतिलक होने वाला था, तब महाराज दशरथजी ने श्रीरामजी को उपदेश देते हुये 18 व्यसनों से दूर रहने को कहा था, ये 18 व्यसन भगवान् मनुप्रोक्त कामज व क्रोधज व्यसन हैं, जिनमें शिकार खेलना राजाओं के लिये प्रथम दुव्र्यसन बताया है। तब श्रीरामजी व दशरथजी का शिकार खेलना, हिंसा करना कैसे सिद्ध हो सकता है? यदि कोई यह प्रश्न करे कि जब श्रीरामजी शिकार खेलते ही नहीं थे, तब उन्हें उपदेश देकर निषेध करने की आवश्यकता कैसे पड़ी? इसका उत्तर स्वयं दशरथजी के वचनों से ही मिल जाता है। वे कहते हैं-

‘‘कामतस्वं प्रकृत्यैव निर्णीतो गुणवानिति।
गुणवत्यपि तु स्नेहात् पुत्र वक्ष्यामि ते हितम्।।’’
                                         (अयो. कां. सर्ग 3.41)

अर्थात् यद्यपि तुम स्वभाव से ही गुणवान् हो और तुम्हारे विषय में सबका यही निर्णय है, तथापि मैं स्नेहवश सद्गुणसम्पन्न होने पर भी तुम्हें हित की बातें कहता हूँ। इससे स्पष्ट है कि श्रीरामजी में उपर्युक्त व्यसन नहीं होने पर भी पिता होने के नाते उपदेश करना कर्तव्य समझ कर ही ऐसा कहा था।

‘मांसाहार (संशोधित संस्करण)’ से उद्घृत - लेखक: आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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