Thursday, June 27, 2019

सावधान! शेर को जीवित मत करो।


चार सिद्ध पुरुष जंगल में अपनी राह चले जा रहे थे। उन्हें मार्ग में एक बब्बर शेर का बिखरा हुआ कंकाल मिला। एक सिद्ध पुरुष बोला, मैं इस कंकाल को यथावत् जोड़ सकता हूँ और उसने जोेड़ कर दिखा भी दिया। कुछ वनवासी लोगों, जिन्होंने शेर को कभी देखा नहीं था, यह देख कर आश्चर्य व प्रसन्नता व्यक्त की। दूसरा सिद्ध पुरुष बोला कि मैं इस पर उपयुक्त मांस पेशियां व अन्य शरीरांगों को उत्पन्न कर सकता हूँ। यह सुनकर वनवासी लोग उत्सुक हो उठे, तब उस सिद्ध पुरुष ने ऐसा चमत्कार कर दिखाया। अब तीसरे सिद्ध पुरुष ने कहा कि मैं इसकी चमड़ी, आँख व पंजे आदि को बिल्कुल वास्तविक रूप में उत्पन्न कर सकता हूँ और उसने ऐसा करके भी दिखा दिया। इस पर तीनों सिद्ध पुरुष एक दूसरे की प्रशंसा करने लगे तथा वनवासी बन्धुओं ने उस शेर के शरीर को मनोरंजक का बहुत बड़ा साधन समझकर अति हर्ष का अनुभव किया। वे उससे खेलने लगे। तभी चैथे सिद्ध पुरुष ने कहा कि मैं शेर के इस शरीर में जान डाल सकता हूँ, इस पर सभी आश्चर्य करने लगे और उसकी क्षमता पर शंका करने लगे। इस पर वह सिद्ध पुरुष उस शरीर में जान डालने का अपना अभियान प्रारम्भ करने लगा। सभी सोच रहे थे, बहुत अच्छा रहेगा, शेर उछलता, कूदता, गर्जता अच्छा दिखाई देगा। किसी को शेर के खतरे का आभास नहीं था। सिद्ध पुरुष अपनी-2 सिद्धियों को प्रदर्शित करने के अहंकार में डूबे थे और वनवासी बन्धु अपने मनोरंजन की प्यास में। तभी उन वनवासियों में से एक अनुभवी वृद्ध ने दूर से पुकारा, ‘ओ! सिद्ध पुरुषो!’ अपनी सिद्धियों का इस प्रकार दुरूपयोग मत करो, इन पर अहंकार मत करो, अपने यश की कामना में अपनी तथा इन वनवासी अबोध जनों, जिन्होंने कभी शेर को देखा व जाना नहीं है, की मृत्यु को आमन्त्रित मत करो। शेर कोई गाय, बकरी अथवा भैंस नहीं है, जो इन्हें दूध देेगा और न यह खरगोश वा मोर है, जिससे इनका मनोरंजन होगा। शेर साक्षात्-मृत्यु का रूप है, इस कारण इसके शरीर में जान मत डालो, परन्तु उस वृद्ध वनवासी की हितकारी बात न तो चारों सिद्ध पुरुषों, जो अपनी प्रतिभा के मद में डूबे परन्तु वस्तुतः मूर्ख थे, ने सुनी और न मनोरंजन की तृष्णा के अबोध वनवासियों ने। शेर के शरीर में जान डाल दी। शेर तुरन्त गुर्राया और उन सिद्ध पुरुषों को मार कर खा गया और अनेक वनवासियों को घायल कर दिया, तो कुछ भाग गये।

हे विश्व के वैज्ञानिको! हे नाना तकनीकों के विशेषज्ञो! मैं जानना चाहता हूँ कि आप नयी-2 टैक्नोलाॅजी बना कर विश्व को चमत्कृत कर सकते हो, मनुष्यों को विलासी जीवन दे सकते हो और ऐसा करके आप अकूत यश व धन पा सकते हो। अनेक व्यवसायिक कम्पनीज् को व्यापार का बड़ा साधन दे सकते हो, परन्तु मेरे मित्रो! स्मरण रखो, अति टैक्नोलाॅजी वह जीवित खूंखार शेर है, जो सम्पूर्ण पर्यावरण को खा जायेगा, जल व वायु का गंभीर संकट उत्पन्न कर देगा, सभी प्राकृतिक संसाधनों को समाप्त कर देगा, प्राणिमात्र के प्राणों को संकट में डाल देगा, मानव मानवता से दूर होकर निरा हिंसक, स्वार्थी व कामी पशु बन जायेगा, रोजगार का संकट बढ़ कर युवापीढ़ी अराजक व अवसादग्रस्त हो जायेगी, स्थिति ऐसी बन जायेगी कि विश्व के बड़े-2 राजसिंहासनों को ध्वस्त करके पारस्परिक मारकाट, भुखमरी, लूट-मार जैसे अपराधों की बाढ़ आ जायेगी। इस लिए विज्ञान को प्राणियों की मौत का साधन बनाने से बचो।

हे विश्व के राजनेताओ! आप विकास के पागलपन में विनाश के ज्वालामुखी को मत जगाओ! मैं वृद्ध वनवासी की तरह आप सबको तथा विश्व के विकास के इच्छुक प्रत्येक मनुष्य को सचेत कर रहा हूँ। यदि इस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया गया, तो बाद में पश्चाताप करने योग्य भी हम नहीं रहेंगे। इसलिए वैदिक मार्ग की ओर चलो, अपनी जीवन पद्धति बदलो, प्राकृतिक संसाधनों को पूरा का पूरा निगल जाने का पागलपन मत करो, तभी सब बचेगा अन्यथा सब भस्म हो जायेगा।

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Sunday, June 9, 2019

विनाश की क्रान्तियां



🔘हरितक्रान्ति ने हमारी परम्परागत एवं स्वास्थ्यवर्धक कृषि का विनाश किया एवं पृथिवी पर सर्वत्र विष घोला।

🔘श्वेतक्रान्ति ने हमारी देशी नस्ल की गौओं को समाप्त किया एवं विदेशी व संकर नस्ल की गायों के रोगकारक दूध का प्रचार किया।

🔘रेड एवं पिंक क्रान्ति हमारे पालतू पशुओं को मौत के घाट उतार कर हमें क्रूर व मांसाहारी बना रही है।

🔘ब्लू क्रान्ति समुद्री जीवों की हत्या करके समुद्री तूफानों की भयानक्ता को बढ़ा रही है।

🔘रजत क्रान्ति पक्षियों के भ्रूणों (अण्डों) को खाकर पेट को कचरा पात्र बना रही है।

🔘औद्योगिक क्रान्ति सम्पूर्ण पर्यावरण को नष्ट भ्रष्ट करके सम्पूर्ण प्राणिजगत् को विनाश की ओर ले जा रही है।

🔘डिजीटल क्रान्ति सम्पूर्ण स्पेस को प्रदूषित करके जीवों के अस्तित्व के लिए गम्भीर संकट उत्पन्न कर रही है।

ये सभी क्रान्तियां अपने प्राचीन वैदिक ज्ञान-विज्ञान को भूल कर विदेशों की अंधी बौद्धिक दासताजन्य मूर्खता का परिणाम है। हमारा राष्ट्र उस भयानक मार्ग पर चल रहा है, जहाँ मृत्यु के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है। वस्तुतः जब तक ऋषियों की वेदोक्त महती विद्या का अनुसंधान, प्रचार व प्रसार नहीं होगा, तब तक केवल भारत ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व नाना प्रकार के रोग, अपराध एवं प्राकृतिक प्रकोपों के भयंकर जाल में फंस कर सम्पूर्ण विनाश के भयानक मार्ग पर चलता ही रहेगा। इसलिए आओ! प्यारे मानव! वेद पर चल कर विश्व-मानवता के जीवन को बचाने का संकल्प करें। सम्पूर्ण व्यवस्था को बदलने के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करें। वैदिक मार्ग के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं। आज कोई सोचने के लिए तैयार नहीं कि भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान पर गम्भीर अनुसंधान करके भारत के आर्थिक वैभव को प्राप्त करने का प्रयास किया जा सकता है।

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Friday, June 7, 2019

क्रूरता व निर्लज्जता की पराकाष्ठा


अलीगढ़ में ढाई वर्ष की बच्ची के साथ हुए नृशंस काण्ड ने दर्शा दिया कि मनुष्य शरीरधारी प्राणी भेड़ियों से भी अधिक क्रूर हो सकता है। ऐसी घटना शायद पहले कभी नहीं सुनी गयी। आश्यर्च है कि इस धटना पर सामाजिक कार्यकर्ता, मानवाधिकारवादी व बुद्धिजीवी कहाने वाले, जो बात-2 पर अपने सम्मान लौटाते, कैंडल मार्च निकालते एवं सड़कों पर कोहराम मचाते हैं, वे आज किस बिल में छुप कर बैठे हैं? क्या उस बच्ची का हिन्दू होना ही उनके मौन का कारण है? कठुआ की घटना पर आँसू बहाने वालों की आँखों में आज आँसू क्यों नहीं है?

अपराधी को सार्वजनिक रूप से ऐसा दण्ड देना कि कोई भी दुष्ट ऐसा पाप करने का दुःसाहस नहीं कर सके, यह तो अनिवार्य है, परन्तु आज इस प्रकार की घटनाएं क्यों हो रही हैं, इसको विचारने का न किसी के पास समय है और न सात्विकी बुद्धि। जिनके पास है, वे असमर्थ हैं। सर्वत्र कामुकता को बढ़ाने वाले साधन, चलचित्र व इण्टरनेट, पत्र-पत्रिकाएं, सभी कामुकता की आग को प्रज्ज्वलित करके निरन्तर बढ़ाते जा रहे हैं। आधुनिक शिक्षा ने मनुष्य को भोगवाद की आग में झोंक दिया है, स्वच्छन्दता अपना नग्न ताण्डव मचा रही है, मांस-मछली मदिरा एवं अन्य अनेक प्रकार के नशे, अति तीखे व तमोगुणी भोजन, जो न केवल स्वादलोलुपतावश खाये जाते हैं, अपितु अपनी कामवासना को तीव्र से तीव्रतम करने के लिए खाये जाते हैं। यह खान पान फिर टी.वी. पर अश्लील व हिंसक दृश्य व श्रव्य, उन्हें नरपिशाच बनाने का पूरा उद्योग कर रहे हैं। देश के नीतिनिर्धारकों, शिक्षाविदों, समाज शास्त्रियों व मनोवैज्ञानिकों को सद्बुद्धि देने वाले कहाँ हैं? धर्म के नाम पर दुकान चलाने वाले भी अनेक कथित धर्मगुरु यौन अपराध के कारण कुछ जेल में है, तो कुछ अभी छुपे हुये हैं। लोकतन्त्र की स्वच्छन्दता ने युवा पीढ़ी को कामी व पागल बना दिया है। सबको स्वतन्त्रता (वास्तव में स्वच्छन्दता) की भूख है।

उधर न्यायालयों में न्याय समय पर नहीं मिलता। पापी को क्रूर दण्ड देने पर मानवाधिकारवादी कोहराम मचाने को तत्पर रहते हैं। हमारे कानून व न्यायालयों के कुछ निर्णय भी जब कामुकी स्वच्छन्दता को संरक्षण देने वाले हो जायें, तब कौन रक्षा करेगा, इन पापों से? ऐसे में जब भाँग कूए में नहीं, अपितु समुद्रों में घोल दी गयी हो, तब धरती से पाप को मिटाना कैसे होगा? हे मानवता के प्रेमी जनो! आप क्या इस विषय में कुछ विचार करेंगे? जब तक वैदिक शिक्षा का प्रचार नहीं होगा, तब तक दानवता का खेल यूं ही चलता रहेगा। पुनरपि अपराधी को भयंकर दण्ड तुरन्त देना ही होगा। अपराधियों को सार्वजनिक रूप से अत्यन्त कष्टकारी मृत्यु दण्ड नहीं दिया जायेगा, तब तक अपराधियों में भय होगा ही नहीं। जो मजहब देखकर ही कैंडल मार्च निकालते हैं, उनकों भी दण्डित करना आवश्यक है।

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Wednesday, June 5, 2019

जागो! वेद के विरुद्ध षड्यन्त्र को पहचानों...



एक जागरूक वेदभक्त सुगन्धा शर्मा जी ने इंस्टाग्राम पर मोहम्मद सुजात समीर अली द्वारा डाली गयी एक पोस्ट की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है।

मैं दृढ़तापूर्वक कहना चाहता हूँ कि किसी भी विदेशी वेदभाष्यकार की यह योग्यता नहीं कि वह वेद पर कलम भी चला सके। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि दोष केवल विदेशी भाष्यकारों का ही नहीं है, अपितु महर्षि दयानन्द सरस्वती के अतिरिक्त अथवा कुछ अंश तक उनकी शैली का अनुसरण करने वाले कुछ विद्वानों के अतिरिक्त सभी वेदभाष्यकार वेदविद्या की दृष्टि से बच्चे ही हैं। उपर्युक्त वेदमंत्र पर मैं अपना तीन प्रकार का भाष्य यहाँ संक्षेम में लिख रहा हूँ। घ्यान रहे कि तमोगुणी प्रवृत्ति के लोग अर्थात् मांस-मछली आदि अभक्ष्य पदार्थों को खाने वाले, ब्रह्मचर्यादि व्रतों से कोसों दूर रहने वाले, धन-पद-यश के लोभ से ग्रस्त, अतपस्वी, ईष्र्या, पक्षपात आदि से ग्रस्त तथा आध्यात्मिक साधना से विहीन लोग वेदादि शास्त्रों को कभी नहीं समझ सकते। 

ऋग्वेद 9.13.9 वेदमंत्र पर मेरा तीन प्रकार का भाष्य

असित काश्यपो देवलो वा ऋषिः। पवमानः सोमो देवता यवमध्या गायत्री।
अपघ्नन्तो अराव्णः पवमानाः स्वर्दृशः योनौवृतस्य सीदत।। (ऋग्वेद 9.13.9)

अराव्णः = रा दाने (अदा.) धातोर्वनिप्। न´् समासःस्वर्दृक् = असौ (सूर्यः) वाव स्वर्दृक् (ऐ. 4.10), सूर्यदृशः (निरु 1.23)अप + हन् = हटाना, नष्ट करना, दूर करनादेवलः = दीव्यत्यधार्मिणो विजिगीषतीति 
कश्यपो वै कूर्मः (श. 7.5.1.5

कूर्म प्राण से उत्पन्न बन्धन में न आनेवाले तथा धारक बलों से विहीन पदार्थों को नियंत्रित करने वाले सूक्ष्म प्राण विशेष से इस ऋचा रूपी छन्दरश्मि की उत्पत्ति होती है। इसका देवता सोम तथा छन्द गायत्री होने से सोम रश्मियां तेज व बल से विशेष युक्त होती हैं।

आधिदैविक भाष्य - (पवमानाः स्वर्दृशः) सूर्य की ओर आकर्षित होती संयोगोन्मुख सोम रश्मियां (मरुद् वा प्राण रश्मियां अथवा इलेक्ट्राॅन्स की धाराएं) (अपघ्नन्तो अराव्णः) संयोग में बाधक रश्मि आदि पदार्थों को दूर हटाती वा नष्ट करती हैं। (योनौ + ऋतस्य सीदत) ऐसी वे रश्मियां व इलेक्ट्राॅन्स (अग्निर्वा ऋतम्) अग्नि (ऊर्जा) की उत्पत्ति के स्थान अर्थात् सूर्य के केन्द्रीय भाग में प्रतिष्ठित हो जाती हैं। 

भावार्थ - सूर्य के केन्द्रीय भाग की ओर धनायनों को ले जाने के लिए अनेक प्रकार की प्राण व मरुद् रश्मियां सूर्य के केन्द्रीय भाग की ओर प्रवाहित होती हैं, जिनके कारण इलेक्ट्राॅन्स की धाराएं भी उसी ओर प्रवाहित होने लगती हैं। फलतः धनायनों का भी प्रवाह भी उसी ओर होने लगता है।

सृष्टि प्रक्रिया पर प्रभाव - सूर्य के अन्दर विद्यमान एवं उसके बाहरी भाग में स्थित विभिन्न प्राण व मरुद् रश्मियां सूर्य के केन्द्रीय भाग की ओर प्रवाहित होने हेतु प्रेरित होती हैं। इसके कारण इलेक्ट्राॅन्स की धाराएं भी केन्द्रीय भाग की ओर प्रवाहित होती हुई अपने साथ प्रोटोन्स वा अन्य धनायनों को आकृष्ट करके ले जाती हैं। इस प्रक्रिया में जो भी बाधक रश्मि आदि पदार्थ हों, उन्हें दूर हटाती हुई ये धाराएं केन्द्रीय भाग में प्रतिष्ठित हो जाती हैं। 

आधिभौतिक भाष्य - (पवमानः) संगठन की पवित्र भावना वाला शान्ति का विधायक विद्वान् वा राजा (स्वर्दृशः) ज्ञान की ज्योति को चाहता वा पाता हुआ (अराव्णः) कंजूस, सामाजिक कार्यों के प्रति त्याग की भावना से रहित करें की चोरी करने वाले समाजकण्टकों को (अपघ्नन्तः) दूर करता एवं आवश्यक होने पर उन्हें नष्ट भी करता हुआ (योनौ $ ऋतस्य) सत्य, न्याय व अनुशासन के कारण रूप उत्तम व्यवहार में (सीदत) स्थित रहता है।

भावार्थ - राष्ट्र को सुरक्षित व अखण्ड बनाने हेतु राजा एवं विद्वान् लोग सब में विद्या का प्रकाश करते हुए चोरों व कृपण लोगों को सुधार कर अथवा दण्डित करके सदैव न्याययुक्त व्यवहार के द्वारा प्रजा को सुखी करता है।

अध्यात्मिक भाष्य - (पवमानः) यम-नियमों की साधना से पवित्र हुए अन्तःकरण से युक्त योगी (स्वर्दृशः) परमपिता परमात्मा की पवित्र ज्याति को देखता अर्थात् परब्रह्म का साक्षात्कार करता हुआ (अराव्णः) ब्रह्म-साक्षात्कार में बाधक वृत्तियों को (अपघ्नन्तः) दूर हटाता हुआ (योनौ + ऋतम्) सम्पूर्ण ऋत वा सत्य ज्ञान विज्ञान व आनन्द के स्रोत अर्थात् ब्रह्म में (सीदत) प्रतिष्ठित हो जाता है।

भावार्थ - अन्तःकरण को पवित्र बनाता हुआ योगी ब्रह्म साक्षात्कार करता है। इसके लिए वह मन में उत्पन्न होने वाली मलीन वृत्तियों को दूर हटाता हुआ परम ब्रह्म के आनन्द में रमण करता है।

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

यदि आपको हमारा लेख पसंद आया तो इसे सभी वाट्सएप ग्रुपो, फेसबुक और वेबसाइटों पर शेयर करे।

Recent post