Thursday, March 28, 2019

परिवर्तनशील वर्तमान विज्ञान



वर्तमान विज्ञान अपने ही तथ्यों को बार-2 पलटने को ही अपनी शक्ति मानते हुए उसे सगर्व Dynamic कहता है। यह कथित Dynamic विज्ञान अर्धसत्य तथ्यों को वैज्ञानिक सत्य मानकर उनके आधार पर टैक्नोलॉजी का आविष्कार करता है। वहाँ भी कुछ तो अपनी Dynamics के अहंकार में, तो कुछ व्यावसायिकता के जाल में फंसकर जन साधारण को सुख सुविधाओं का लालच देकर ऐसी टैक्नोलॉजी का आविष्कार करता है, जिससे कुछ साल पश्चात् घातक परिणाम दिखाई देते हैं।
पहले तो हानिकारक टैक्नोलॉजी के अनुसंधान में भारी धन व समय व्यय होता है, पुनः उसके दुष्परिणामों के अनुसंधान में धन व समय का व्यय किया जाता है। उसके पश्चात् पुनः दूसरी टैक्नोलॉजी के अनुसंधान में ऐसा ही व्यय, उसके दुष्परिणामों को खोजने में ऐसा ही व्यय। यह दुश्चक्र सदियों से चल रहा है और वर्तमान में तो अर्धसत्यों पर आधारित यह घातक टैक्नोलॉजी सुविधाओं के साथ-2 ऐसे पर्यावरणीय संकट खड़ा कर रही है, जिसके कारण प्राणिमात्र का इस धरती पर रह पाना आगामी 100-200 वर्षों में असम्भव सा हो जायेगा। विज्ञान की यह कैसी Dynamics है? यह कैसी Power है, विज्ञान की?
वस्तुतः वर्तमान विज्ञान उस बालक की भांति व्यवहार कर रहा है, जो किसी बात को सुने बिना दौड़ जाता है परन्तु लक्ष्य तक पहुँचने से ठीक पूर्व उसे यह ध्यान आता है कि मैं यहाँ क्यों भेजा गया हूँ, यह तो सुना ही नहीं। इस कारण पुनः प्रेषक के पास वापस दौड़ता है। उसे अन्य उदाहरण से इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि वर्तमान विज्ञान घनघोर जंगल में मार्ग खोजते उस भ्रान्त व्यक्ति के समान है, जो किसी अनुभवी व्यक्ति, जो तनिक चिन्तन-मात्र से मार्ग का अनुमान लगाने में समर्थ है, की बात को प्रमाण न मानकर स्वयं ही अपने साधनों के बल पर मार्ग खोजता रहता है। अनेक बार मार्ग भटकता है, तो कभी कभी मार्ग मिल भी जाता है, इतने पर भी वह इस भटकने व सुधरने को ही अपनी बुद्धिमत्ता मानता है।

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Wednesday, March 27, 2019

बोलो, किस नाव में बैठोगे?

मुद्र के किनारे दो नौकाएं खड़ी थीं। एक नौका का नाविक अपने साथियों के साथ किनारे पर खड़ा यात्रियों की प्रतीक्षा कर रहा था। वह नाविक बड़ा धीर, वीर, गम्भीर तथा नौकायन में ऐसा निपुण था कि समुद्र में नौकायन करने वाले बड़े-2 शूरमा उसका सम्मान करते थे। वह यदि कभी उनके देश में जाता, तो उस नाविक की जय जयकार होने लगती। वह नाविक अपने साथ जाने वाले सुरक्षा सैनिकों को बड़ा सम्मान देेता और वे भी समुद्री लुटेरों को मारने में बड़े निपुण थे, आखिर नाविक ने उन्हें पूर्ण अधिकार व वित्तीय संसाधन दे रखे थे। यात्री लोग उसकी नौका में बड़ी सुरक्षा व शान्ति के साथ यात्रा किया करते थे।

उसकी लोकप्रियता से अन्य नाविकों में बड़ी भारी ईर्ष्या होती थी। वे उस नाविक की नौका न चल सके, इसके लिए विचार करने लगे। यद्यपि वे सभी नाविक स्वार्थी, यहाँ तक कि यात्रियों की जेब भी काट लेेते थे। यात्रियों के लिए वर्षों से एक दूसरे के विरुद्ध लड़ते-झगड़ते थे। वे सभी किसी न किसी आरोप में फंसे हुए थे, फिर भी स्वयं को एक सज्जन नाविक सिद्ध करने का प्रयास कर रहे थे। उनमें से कुशल चालक कोई भी न था, कोई-2 तो बिल्कुल नादान बालबुद्धि प्रतीत हो रहा था। वे सब भिन्न-2 विचारों के होने पर भी उस नाविक के विरुद्ध एकजुट होकर समुद्र के किनारे एक नाव को ले आये और यात्रियों की प्रतीक्षा करने लगेे। वे सभी नाविक थे, कोई अपने को किसी का सहायक नहीं मानता था, बल्कि सभी नाविक की भूमिका निभाने को तैयार थे।

उन दोनों नौकाओं को समुद्र में खड़ा देखकर यात्रीगण आने लगे। उन्होंने एक नाव के पास एकमात्र नाविक को चप्पू हाथ में लिए खड़ा देखा, साथ में सहायक खड़े थे, तथा सुरक्षा सैनिक पूर्ण सशस्त्र होकर आत्मविश्वास के साथ खड़े थे। उधर दूसरी नाव के पास कई लोग अपने-2 हाथ में चप्पू लिए खड़े थे। यह नहीं पता लग रहा था कि नाव का मुख्य नाविक कौन होगा? वे सभी नाविक की भूमिका अदा करने को तत्पर दूसरी नाव के नाविक को गालियां दे रहे थे, कोई चीख रहा था, कोई आँखे मार-2 कर संकेत कर रहा था, कोई उसे समुद्री लुटेरों से भी बड़ा लुटेरा बता रहा था, तो वे कभी समुद्री लुटेरों की प्रशंसा कर रहे थे, कोई सुरक्षा सैनिकों को झूठा व गुण्डा कह रहे थे। उन्होंने अपनी नाव में एक ऊँट को बिठा रखा था, उसी नाव में एक बन्दर भी बैठा था। वे सभी उस ऊँट और बन्दर को भांग की पत्तियां खिला रहे थे तथा स्वयं भी भांग पी रहे थे। वे ग्राहकों को लुभाने के लिए कभी सस्ते किराये पर, तो कभी निःशुल्क यात्रा कराने का प्रलोभन दे रहे थे, जिससे एक बार यात्री नाव पर बैठें तो सही, बाद में देखा जायेगा, कम से कम दूसरी नाव मैं तो नहीं बैठेंगे।

यह दृश्य देख समझदार यात्री विचार करने लगे कि जिस नाव में कई नाविक हों, और उनमें से कोई नाव चलाने में कुशल भी न हो, उनके सुरक्षा सैनिक दीन-हीन दिखाई दे रहे हों, जिस नाव में बन्दर व ऊँट बैठे हों, तथा वे भी सब भांग के नशे में, सभी कथित नाविक भी मांग के नशे में हों तथा केवल दूसरी नाव के नाविक के प्रति ईर्ष्या के कारण ही सभी परस्पर मतभेदों को भुलाकर एकजुट हुए हों, वह नाव अवश्य डूबेगी। एक बुद्धिमान् यात्री दूसरे यात्रियों से कहने लगा कि जैसे ही हम नाव पर बैठेंगे, वैसे ही प्रथम तो कौन चप्पू चलायेगा, इस बात को लेकर इन सब में विवाद होगा। फिर ये सभी भांग पिये हैं। देखो! बन्दर वैसे भी चंचल होता है, उस पर भी भांग पी रखी है, तब निश्चित ही यह भारी उत्पात मचायेगा। इसके उत्पात से ऊँट, जो स्वयं भी भांग खाये हुए है, निश्चित ही भड़क उठेगा। इससे नाव में अफरा-तफरी मचेगी। तब नाव डूबने लगेगी। उधर समुद्री लुटेरे भी हमें आकर लूट सकते हैं। सभी यात्रियों को ऐसा लग रहा था कि इस नाव के सभी नाविक तो नाव को निश्चित ही डुबोएंगे, तथा नाव डुबोकर स्वयं तो तैर कर बाहर आ जायेंगे और हमारी जेबें भी काट लेंगे, इसके साथ ही हम डूब कर मर जायेंगे। उधर दूसरी नाव का नाविक अकेला अपने साथियों को लेकर शान्ति से उन ईर्ष्यालु नाविकों की धींगामस्ती को देख रहा था।

मेरे प्यारे भारतीयो! बोलो! इस मां भारती की नाव किस नाविक को सौंपना चाहोगे? कौन सी नाव में बैठना चाहोगे? इस मां भारती को डुबाओगे वा तारोगे? सब आपके ऊपर निर्भर है।

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Tuesday, March 26, 2019

शिकारियों के जाल



एक शिकारी प्रतिदिन पक्षियों का शिकार करने निकलता, उससे पूर्व कभी मन्दिर, तो कभी मस्जिद, कभी चर्च, तो कभी गुरुद्वारे में जाकर प्रार्थना करता कि मेरे जाल में आज अधिक से अधिक पक्षी फंसे। वह कभी गंगा नहाता, गंगाजल पीता, तो कभी कब्रों पर चद्दर चढ़ाता। यह देखकर पक्षी सोचते कि देखो! यह व्यक्ति कितना धर्मात्मा है! सभी धर्मस्थलों पर जा-जाकर भगवान् की पूजा कर रहा है, पवित्र गंगा में स्नान कर रहा है, आचमन कर रहा है। फिर वह शिकारी जंगल में जाकर अनाज के दाने बिखेरता और जाल बिछाता। अनाज के दाने देखकर पक्षी उसकी दयालुता के कायल हो जाते, और वह शिकारी कहीं छिप जाता।
पक्षी विचारते कि देखो! यह कितना निष्काम व्यक्ति है, जो हमें दाना डालकर स्वयं दूर चला गया है। हमारी कृतज्ञता लेने की इच्छा भी नहीं करता। पक्षी एक दूसरे से उस शिकारी की प्रशंसा करते और झुण्ड के झुण्ड उन दानों को चुगने आते। दाने चुगते और उसकी प्रशंसा करते जाते, उसके भक्त बन जाते। दाने चुग कर ज्यों ही वे उड़ने को तैयार होते, तो उड़ नहीं पाते, क्योंकि वे स्वयं को जाल में फंसा हुआ पाते। जब सब पक्षी जाल में फंस जाते, तब शिकारी आता और सबको पकड़ कर घर ले जाता। फिर सभी को गर्दन मरोड़-मरोड़ कर मारता। कभी झटके से मरोड़ देता, तो कभी हलाल करके तड़पा तड़पा कर मारता। उस समय उन मूर्ख व लोभी पक्षियों को उस शिकारी का वास्तविक रूप दिखाई देता और अपनी मूर्खता व लोलुपता पर पश्चाताप होता। परन्तु तब वे कुछ कर नहीं सकते, सिवाय मरने के। वे उस शक्तिशाली शिकारी से लड़ भी नहीं सकते, इस कारण मरते रहते।
आज देश में राजनेताओं द्वारा शिकारी की तरह ही इधर-उधर पूजा स्थलों पर पूजा, इबादत, प्रार्थनाएं की जा रही हैं। नदियों व सरोवरों में पवित्र होने का अभिनय हो रहा है, चुनावी घोषणाओं के दाने मतदातारूपी पक्षियों को लुभाने के लिए बिखेरे जा रहे हैं। ऐसे अनेक शिकारी विदेशी भी आये, इस्लामी शिकारी आये, अंग्रेज शिकारी आये। प्रारम्भ में उन्होंने भी शिकारी की भाँति दाने डाले, प्रलोभन दिये, जाल बिछाये, फिर जमकर जन संहार किया, धर्मान्तरण किया, परन्तु यह मन्दबुद्धि भारतीय फिर भी नहीं समझा और लगभग नौ सौ वर्ष गुलाम रहा, कोड़ों, लाठियों, लात व घूंसों की मार खाता रहा, फिर भी उनके तलुवे चाटता रहा। अपने देश के देशभक्त वीरों के साथ विश्वासघात करता रहा, विदेशियों के प्रलोभन में फंसता रहा, नहीं सुधरा। अनेक साधु-सन्त भी इसे सुधारने आए परन्तु उनकी भी बातें नहीं सुनीं। उनका भक्त भी बना, परमपिता परमात्मा की उपासना को छोड़कर उन सन्तों को ही ईश्वर मान कर चित्र पूजने में लग गया परन्तु उनकी बात कोई नहीं मानी और विदेशियों की दासता सहता रहा।
कहने को 1947 में देश स्वतन्त्र हुआ परन्तु रीति, नीति व संविधान वही रहा। वही शिकार का खेल देश के नेताओं द्वारा भी प्रारम्भ हो गया। देश के टुकड़े किए, लाखों हिन्दू व मुसलमानों का खून बहा, परन्तु शिकारियों को सत्ता का ही स्वार्थ था। उन्हें भारत विभाजन तथा लाखों नर संहार का कोई दुःख नहीं था। अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के नाम पर इन भारतीयों को बांटा, कथित जातियों के नाम पर विघ्वंसक कानून बने, महिला-पुरुष, बाल-युवा आदि के नाम पर परिवारों को तोड़ा। नेताओं ने सोचा कि कैसे भी भारतीय एकजुट न हो जाएं। वे देशभक्ति के संस्कारों को पास तक नहीं आने दें और ऐसा करके राजनैतिक शिकारियों द्वारा बिछाए जाल को मिलकर तोड़ न दें। इसके लिए जाल पर नाना प्रकार के दाने (लोभ) डालते रहे और भारतीय मदमस्त रहे। कभी गरीबी हटाओ के नारे लगे, कभी बेरोजगारी दूर करने के वादे हुए परन्तु न गरीबी हटी, न बेरोजगारी, 70-72 वर्ष हो गये, वादे आज भी दफन हुए पड़े हैं, परन्तु पक्षी अब तक भी नहीं समझे। वे शिकारियों के जाल तथा उनके उद्देश्य को आज तक नहीं समझे। अब 2019 चुनाव में यह खेल नाना रंगों में खेला जा रहा हैं। नेताओं को ज्ञात है कि यह भारतीय इतना लोभी व मूर्ख है, जो सदियों तक गुलाम रहने के पश्चात् भी अभी तक अज्ञानी व लोभी पक्षियों के स्तर की ही बुद्धि रखता है। इस कारण फिर सारे देश में जाल बिछ गया है, विभिन्न नेता शिकारी की भाँति अपने-2 ढंग से दाने डाल रहे हैं। शिकार अवश्य फंसेंगे। वस्तुतः कोई ऐसी पार्टी ही नहीं, जो झूठ के दाने न फैंकती हो, कोई कम तो कोई अधिक, तब भारतीय कहाँ जाएं? फिर आपसी ईर्ष्या द्वेष इतना है कि देश का भविष्य तो क्या, अपना भी भविष्य कौन सोचता है? उसे तो अपने-2 नेताओं में ही साक्षात् परब्रह्म दिखाई दे रहा है।
इन भारतीयों को इतना ज्ञान कहाँ है कि सबको जाल में फंसाकर कुछ नेता जब सत्ता प्राप्त करने में सफल होंगे, तब यहाँ साम्प्रदायिक हिंसा व वैमनस्य को बढ़ाने वाले तथा बहुसंख्यक को नष्ट करने वाले, ऐसे कानून बनेंगे, जो भारत के भाग्य को नष्ट करने में अपनी दुर्भाग्यपूर्ण भूमिका निभाएंगे। कथित जातियों को परस्पर लड़ाने वाले और अधिक घातक व पक्षपाती कानून बनेंगे, जगह-2 पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगेंगे और राज्यों की ओर से विद्रोही आवाज उठेगी, भाषा के नाम पर वैमनस्य होगा, राष्ट्रिय एकता की भावना समाप्त करने वाले कानून बनेंगे। देश के गांव-गांव, नगर-नगर एवं विद्यालयों से लेकर विश्वद्यिालयों, अनुसंधान संस्थानों, मीडिया एवं साहित्य के विभिन्न मंचों पर निर्ममतापूर्वक वेदादि शास्त्रों, सनातन वैदिक धर्म एवं हमारे महान् पूर्वजों, देवी-देवताओं एवं ऋषि-मुनियों को अपमानित किया जाएगा। देशद्रोह का कानून समाप्त किया जाएगा। आतंकवाद, पाकिस्तान व चीन इन सबसे बहुत आनन्दित होंगे। देश के विश्वविद्यालयों के हजारों कन्हैया कुमार जैसे देशद्रोही भारत के टुकड़े करने के मात्र नारे ही नहीं लगाएंगे, अपितु सांसद बनकर संसद में ऐसे नारे लगाएंगे। तब देश के टुकड़े करने के कानून बनाने से कौन रोकेगा? तब दानों के लोभ से जाल में फंसे भारतीयों को मेरी चेतावनी याद आयेगी, परन्तु वे कुछ कर नहीं सकेंगे।
उस समय भगतसिंह, सुभाष, बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद, रोशनसिंह, लाला लाजपतराय, ऊधमसिंह, अशफाक उल्ला जैसे क्रान्तिकारियों को आतंकवादी तथा हाफिज सईद, मसूद अजहर, दाऊद इब्राहीम जैसे आतंकवादियों को मासूम व निर्दोष बताया जायेगा। भारत पर चार बार आक्रमण करने वाले तथा आतंकवाद के माध्यम से हजारों-लाखों निर्दोष भारतीयों की हत्या करने वाला पाकिस्तान भारत सरकार को शान्तिप्रिय देश दिखाई देगा। भारतीय सेना के आत्मबल को नष्ट करके देश कई पाकिस्तानों का गर्भ, जो आज पल रहा है, जन्म लेकर कई पाकिस्तानों का जन्म होगा। भारतीय सेना के हाथ बांध दिए जाएंगे और वे देशद्रोहियों द्वारा पत्थर खाने को विवश होंगे, कोई उनके बलिदान को सम्मान नहीं देेगा, न कोई पाकिस्तान को दण्ड देगा, तब कौन माता अपने बैटे को सेना में भेजना चाहेगी, तब देश की सीमाएं कैसे सुरक्षित रहेंगी। पाकिस्तान व चीन के साथ सीमा पर तनाव के दिनों में चुप-चुप इन दोनों से सम्पर्क साधने वाले जब देश के कर्णधार बनेंगे, तब चीन व पाकिस्तान को भारत के टुकड़े करने के अभियान में कितनी सहायता मिलेगी?
यह सब सोचकर ही ऐसा प्रतीत होेता है कि यह देश पुनः अपने गुलामी के इतिहास को दोहरा सकता है। महर्षि दयानन्द व स्वामी श्रद्धानन्द जैसे महान् संन्यासियों के अनुयायी कहलाने वाले अनेक कथित आर्य आज इन्हें भूलकर कथित संन्यासी अग्निवेश के अनुयायी बन कर मेरे इन विचारों का भी विरोध करेंगे? मैं ऐसे महानुभावों से विनम्र निवेदन करता हूँ कि वे ईश्वर की साक्षी में विचारें कि क्या वे निष्पक्ष, सत्य व न्याय के मार्ग पर चलते रहे हैं? क्या वे कभी मिथ्या भाषण व पक्षपात नहीं करते हैं, क्या वे मेरी भाँति जीवन में स्वयं को सत्य वक्ता होने का दावा कर सकते हैं? यदि हाँ, तभी मेरे लेखों पर कोई विपरीत प्रतिक्रिया दें, अन्यथा मेरे विचारों पर गम्भीरता से विचार करें अन्यथा यह देश माँ-भारती के किसी भी उपासक के लिए रहने योग्य नहीं रहेगा। ईश्वर सब पर कृपा करें और भारतीयों में सद्बुद्धि आवे और यह देश बचा रहे, यही ईश्वर से प्रार्थना और आप सब से निवेदन है।

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Monday, March 18, 2019

मैं और वर्तमान राजनीति



अभी दो दिन पूर्व फेसबुक पर एक पाठक प्रिय सुजीत चौहान ने मेरी पोस्ट ‘‘लोकसभा चुनाव-हमारा दायित्व’’ पर टिप्पणी करते हुए मुझे पक्षपाती तथा भाजपा का एजेण्ट लिखते हुए निम्नलिखित प्रश्न पूछे हैं-
१) एस. सी / एस. एसटी एक्ट में सर्वाैच न्यायालय के फैसले को सरकार द्वारा पलटने पर..... क्या इससे देश मजबूत होगा? 
२) प्रमोशन में आरक्षण से.... देश मजबूत होगा? 
३) १३ प्वांट रोस्टर पर सर्वाैच न्यायालय के फैसले को पलट कर २०० प्वांट रोस्टर का अध्यादेश लाने से.....देश मजबूत होगा ?


इस विषय में मेरा मत है कि केवल सुजीत चौहान ही नहीं अपितु अन्य भी कुछ पाठक मुझे वैदिक विज्ञान के मार्ग से भटक कर राजनीति करने वाला मान सकते हैं। इस कारण मेरा स्पष्टीकरण देना अनिवार्य प्रतीत होता है। जिस व्यक्ति ने जीवन में कभी मिथ्या-भाषण करने की इच्छा भी न की हो, किशोरावस्था में किसी दबाववश कुछ मिथ्या भाषण हुआ हो, उसके लिए कठोर प्रायश्चित स्वयं ही किया हो, जिसने अपने न्याय के मार्ग पर चलने का कठोर व्रत लिया हो तथा बाल्यकाल में भी कभी परिवार का भी मिथ्या पक्ष न लिया हो, अपनी हानि करने वाले किसी द्वेषी व्यक्ति का चेहरा भी कभी अपमानित व दुःखी देखने की इच्छा भी न की हो, कभी अपना स्वाभिमान न खोया हो तथा अन्यों के भी स्वाभिमान व सम्मान की रक्षा की हो, उस पर कोई किसी का एजेण्ट होने पर आरोप लगाये, यह सुजीत चौहान जैसे युवकों की नादानी ही कही जा सकती है, जो बिना मुझे जाने की गयी है। इन्होंने जातिगत आरक्षण पर मेरी राय चाही है, इस पर मैं इतना ही कहूँगा कि यदि यह मेरे वश में होता, तो एक कलम से मैं सभी प्रकार का आरक्षण साथ-साथ छूआछूत सम्पूर्ण देश से मिटा कर भगवान् मनु प्रोक्त वैदिक कर्मणा वर्णव्यवस्था को लागू कर देता। SC – ST Act के विषय में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय रद्दी की टोकरी में डालकर पुनः शाहबानों प्रकरण को दुहरा कर मोदी जी राजीव गाँधी बन गये। सम्पूर्ण संसद न्यायालय का चीरहरण देखती रही, यह निश्चित ही घोर अन्याय है परन्तु यह सत्य है कि आज भी गरीब दलितों के साथ गाँवों में भेदभाव जारी है, अभी तक कई स्थानों पर उनके दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने नहीं दिया जाता है, उनका कहीं-2 शोषण भी होता है। दूसरी ओर यह भी सत्य है कि अनेक बार SC – ST Act का दुरुपयोग करके अन्य वर्गों को प्रताड़ित किया जाता है। सामाजिक अन्याय के बदले आज कानून शासकीय अन्याय कर रहा है, प्रतिभाओं का हनन वा पलायन हो रहा है, देश गृहयुद्ध की ओर जा रहा है। इसमें जहाँ अनेक विदेशी संस्थाओं का हाथ है वहीं मध्यकाल के नकली ब्राह्मणों द्वारा चलाई छूआछूत ही इसका मूल कारण है तथा राजनेताओं द्वारा इस गृहयुद्ध के बीजों को खाद पानी दिया जा रहा है। 2 अप्रैल 2018 को सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध जो गुण्डागर्दी हुई, उसे स्वयं विपक्ष प्रेरित कर रहा था, राहुल गाँधी को ट्वीट करके आन्दोलनकारियों को सलाम कहते मैंने देखा। ऐसी स्थिति में केवल मोदी सरकार को ही दोषी नहीं बनाया जा सकता परन्तु फिर भी यह मोदी सरकार की दुर्बलता व पक्षपाती नीति तो कही ही जायेगी।

प्रिय सुजीत चौहान! इतना सब होते हुए भी पाकिस्तान व आतंकवाद की भर्त्सना करने पर आपको मुझे भाजपा का एजेण्ट बता देना तथा आरक्षण जैसी घरेलू समस्याओं को बीच में लाना स्वयं ही बहुत बड़ा पक्षपात, नासमझी एवं दिशाहीनता है। मुझे नहीं पता कि आपने आरक्षण के विरुद्ध क्या किया है परन्तु मैंने इस मुद्दे पर समय-समय पर कई लेख लिखे। मेरे इस दृष्टिकोण को राजस्थान के एक दबंग भाजपा नेता श्री देवीसिंह जी भाटी जानते हैं। मैंने राजस्थान के अनेक पूर्व नरेशों को झकझोरा था, परन्तु वे सभी प्रसुप्त दिखाई दिए। श्री देवीसिंह भाटी व श्री लाकेन्द्र सिंह जी कालवी ही राजस्थान में सामाजिक न्याय मंच के माध्यम से अच्छा आन्दोलन कर रहे थे। यह मामला बहुत जटिल है। आज जो वर्ग एकता दर्शाने की क्षमता रखते हैं, वे ही राजनैतिक दलों को झुका पाते हैं, जबकि जो वर्ग परस्पर अहंभाव से ग्रस्त होकर बिखरे रहते हैं, उन्हें इस लोकतंत्र में कोई नहीं पूछता है। कथित सवर्णों की वर्तमान दुदर्शा का यही कारण है। मोदी जी ने उन्हें भी आर्थिक आधार पर कुछ दिया, अन्यों ने तो यह भी नहीं दिया। जो भी हो, आरक्षण के रहते भारत में सामाजिक समरसता कभी नहीं आ सकती और न कोई समरसता लाना चाहता। इस देश को गृहयुद्ध की ओर ले जाने के लिए सभी आतुर दिखाई दे रहे हैं, क्या राजनेता, सामाजिक कार्यकर्त्ता, कथित बुद्धिजीवी, जातिवादी नेता, कथित धर्माचार्य व विभिन्न संगठन आदि सभी अपराधी हैं।

मुझे कोई बताये कि मोदी आरक्षण को बढ़ावा दे रहे हैं, तो अन्य कौन है, जो इसका विरोधी है? 10 साल के लिए लागू किया गया आरक्षण अबतक किसने बढ़ाया? कांग्रेस पार्टी, आरक्षण को तो छोड़ें, एक ऐसा विधेयक संसद में लाने वाली थी, जो ‘साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक कानून’ नाम से जाना जाता। इसके तहत हिन्दू-मुस्लिम दंगों के समय किसी भी मुस्लिम के विरुद्ध कोई एफ. आई. आर. नहीं होती, केवल हिन्दू ही अपराधी माना जाता, चाहे अपराध दोनों ने किया हो। जरा विचारिये कि क्या यह कानून औरंगजेबी बर्बरता से यह कम बर्बर होता? सभी हिन्दु वर्ग के लोग जेलों में सड़ते। इसका प्रारुप श्रीमती सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रिय सलाहकार परिषद् ने बनाया था, जो श्री मनमोहनसिंह से भी ऊपर थी, सरकार से भी ऊपर थी, परन्तु हिन्दुओं में चेतना कहाँ? इस कानून से देश में गृहयुद्ध की ज्वालाएं जलने लगतीं। क्या भाजपा इससे भी बूरी है? लोकसभा में नेता प्रतीपक्ष श्री मल्लिकार्जुन खड़गे ने गृहमंत्री श्री राजनाथसिंह को विदेशी बताया था, क्योंकि खड़गे के अनुसार सभी सामान्य वर्ग वाले विदेशी सन्तान हैं। यह राष्ट्रविरोधी संगठन बामसेफ व कथित मूलनिवासी संगठन की विचारधारा है। जिसमें वेद, शास्त्र, विदेशी लुटेरे आर्य देवों, ऋषियों के ग्रन्थ हैं। क्या इस विचारधारा की अपेक्षा में भाजपा को अच्छा नहीं मानूं? मैं इस विचारधारा के कथित प्रबुद्धों को विद्या की दृष्टि से बालक मानता हूँ। इस विचारधारा पर भाजपा व R.S.S. मौन हैं। केवल मैंने ही इन्हें शास्त्रार्थ की चुनौती दी थी। वैसे भी आर्य समाज के अतिरिक्त इस विचारधारा को चुनौती कोई दे भी नहीं सकता।

जब श्री वाजपेयी जी की सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री श्री मुरली मनहोर जोशी ने पाठ्य पुस्तकों में आर्यों के विदेशी होने की मिथ्या बातों को हटाने की पहल की, तब विपक्ष इसे भाजपा का भगवा एजेण्डा बताकर आक्रमण करने लगा। क्या मैं ऐसे विपक्ष का साथ दूं? प्रिय सुजीत जी मुझे पता नहीं आपकी आयु कितनी है? अनुभव कितना है? जरा सोचिये-
अब कांग्रेस कन्हैया कुमार, चन्द्रशेखर (भीम आर्मी अध्यक्ष), हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर व जिग्नेश मेवाणी जैसे अराजक व राष्ट्रविरोधी युवकों को अपने साथ ला रही है, देशद्रोह का कानून, जो वैसे भी बहुत कमजोर व लंगड़ा हैं, उसे भी समाप्त करने की बात सुनी जा रही है। अभी पता नहीं उसके बारे में अभी कांग्रेस के घोषणापत्र में क्या प्रावधान रखा है? कांग्रेस की सभा में ‘‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’’ के नारे लगतें हैं, पाकिस्तान की प्रशंसा करके आतंकवाद को प्रोतसाहित किया जा रहा है। जब संसार के सभी देश भारत के साथ हैं, उस समय विपक्ष पाकिस्तान के साथ है। ऐसे विपक्ष के पक्ष में भी यदि भारत की जनता है, तब यह अभूतपूर्व भंयकर स्थिति है, जो प्रत्येक देशभक्त को बेचैन कर देती है। हम पुलवामा हमले को आतंकवाद बताते हैं, तब कांग्रेसी नेता दिग्विजयसिंह उसे दुर्घटना बताते हैं, इससे पाकिस्तान में उत्साह की लहर उत्पन्न होती है। सेना के शौर्य पर सम्पूर्ण विपक्ष प्रश्न खड़े करता है, भारतीय सेनाध्यक्ष को सड़क का गुण्ड़ा तक कहा गया, भारतीय प्रधानमंत्री को बार-2 चोर कहा जा रहा है। हर संवैधानिक संस्था को अपमानित किया जा रहा है, उसको झूठ बताया जा रहा है, विश्व में भारत को बदनाम किया जा रहा है, ब्ण्ठण्प्ण् को अपराधी नेेताओं द्वारा बंधक बनाया गया और सम्पूर्ण विपक्ष कोलकाता में एकजुट हुआ। भ्रष्टाचार के आरोपी जमानत पर छूटे अथवा जेल में बैठे अथवा जेल की चौखट पर खड़े मोदी जी को चोर कह रहे हैं। सेना को राफेल जैसा विमान न मिलजाये, इसका पूरा प्रयास करके भारत को कमजोर करने का षड्यंत्र किसके संकेतों पर किया जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट के निर्णय, कैग की रिपोर्ट के बाद भी बार-बार निर्लतापूर्वक झूठ बोला जा रहा है। कोई मोदी को आतंकवादी बता रहा है, तो कोई कह रहा है कि मोदी के जीतने से 50 साल तक चुनाव ही नहीं होेंगे। क्या देशवासियों को नहीं लगता कि यह नेता बुद्धि भी रखते हैं? क्या आतंकवाद की गम्भीरता को जरा भी समझते हैं? क्या देश के सैनिकों के बलिदान का इनके हृदय में कुछ भी महत्व है? कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर बार-बार पाकिस्तान में जाकर यह कहते रहें कि मोदी को रास्ते से हटाने से ही भारत-पाकिस्तान सम्बंध सुधर सकते हैं। जरा सोचें! मोदी को रास्ते से हटाने का अर्थ क्या है? क्या आतंकवादियों से मोदी की हत्या करवाना अथवा चुनाव में पाकिस्तान की मदद लेना? इस समय कौनसा एजेण्डा चल रहा है, यह तो वे ही जानंे। विपक्षी नेताओं के पाकिस्तान के साथ कौन से गुप्त सम्बंध हैं? क्या यह जाँच का विषय नहीं? वैदिक संस्कृति के संरक्षक व प्रतिपालक मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम के इतिहास को कोर्ट में कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ने नकारा, 2019 तक कोर्ट फैसला न दे, यह भी पुकार लगायी। क्या ऐसे विपक्ष को मैं मोदी जी से अच्छा मानूं? क्या श्रीराम को अपना महापुरुष मानने वालों को यह नहीं सोचना चाहिए? क्या हमारे पूर्वजों की जड़ें काटना हमारे लिए कोई मुद्दा नहीं? कोई साहस करके देखे, जो हजरत मोहम्मद अथवा ईसा मसीह के अस्तित्व को नकारे, तब देखें संसार में क्या होता है?

यह सत्य है कि सभी नेता दोषी हैं, पापी हैं तथा भारत की सम्पूर्ण व स्थायी हित किसमें है, यह ज्ञान नहीं रखते। वेद विद्या से अनभिज्ञ विदेशी थोपे गये संविधान मानने वाले भला कैसे भारत का सम्पूर्ण हित कर पायेंगे? उन्हें पता नहीं कि स्वयं डॉ. भीमराव अम्बेड़कर ने इस संविधान की भारी निंदा की है। कोई चाहे, तो मुझसे प्रमाण मांग ले। इतना सब होते हुए भी देश में सरकार तो बनेगी, वैदिक काल तो मैं ला नहीं सकता। तब देश की वर्तमान दुर्दशा और जब सभी देशविरोधी व भ्रष्ट लोग मोदी के विरुद्ध एकजुट हो रहे हों, तब किसी भी वेदभक्त व राष्ट्रभक्त को मौन कदापि नहीं बैठना चाहिए। शासन की नीतियां देश की दिशा तय करती हैं। वर्तमान में मोदी जैसे भी हैं, उनके विरुद्ध में कौन नेता खड़ा हो सकता है? क्या राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी, अखिलेश यादव, मायावती, ममता बनर्जी, कोई कम्यूनिष्ट नेता, शरद पवार, शरद यादव, कनिमोझी, तेजस्वी यादव अथवा अरविन्द केजरीवाल आदि में से कोई भी नेता क्या मोदी से अच्छा है? देशवासी अपने हृदय पर हाथ रखकर देखें कि वर्तमान समय में इनमें से कौन नेता मोदी जी के अंशमात्र के बराबर है? कौन भारत को विश्व में गौरव दिला सकता है? कौन भारत की सीमाओं की रक्षा कर सकता है? कौन मोदी की अपेक्षा ईमानदार व गम्भीर व्यक्तिगत का धनी है? कौन विकास पुरुष माना जा सकता है? कौन सबका साथ सबका विकास मोदी की अपेक्षा अधिक कर सकता है? कौन मोदी अपेक्षा अधिक बुद्धिमान्, कर्मठ व कुशल है? कौन मोदी अपेक्षा अधिक देशभक्त है? देशवासी यह भी विचारें कि किसके प्रधानमंत्री बनने से पाकिस्तान व आतंकवादियों को प्रसन्नता होगी और भारत के देशभक्तों को दुःख होगा? वे यह विचारें कि वे अपनी पार्टी को बड़ा मानते हैं अथवा देश को? वे पाकिस्तान को प्रसन्न करना चाहते हैं वा भारत को? वे स्वयं को मूल भारतीय मानते हैं अथवा विदेशी लुटेरों की सन्तान? वे वेदादि शास्त्रों को विदेशी ग्रन्थ मानते है वा भारतीय? वे ब्रह्मा, महादेव, विष्णु, राम, कृष्ण, मनु आदि ऋषियों व देवों को विदेशी लुटेरा मानते हैं वा भारतीय? तब देखें कि उनकी पार्टी की इस बिन्दुओं पर नीति क्या हैं? उसके बाद ही वोट दें?

मैं नहीं कहता कि सभी मेरी बातों को मानें परन्तु इतना आग्रह अवश्य करूँगा कि वे अपनी आत्मा की आवाज सुनें। मेरे प्रश्नों के उत्तर अपने आत्मा से ही पूछें कि क्या करना चाहिए? उसके पश्चात् अपने आत्मा की बात ही मानें। भारत के मुसलमान भाइयों से निवेदन है कि वे देखें कि भारत व पाकिस्तान में से कौन सा देश अच्छा है, सभ्य है, विकसित है, शान्तिप्रिय है, उसी की जीत सुनिश्चित करने में अपनी अहम भूमिका निभाएं। मजहबी लोगों वा राजनेताओं के हाथ का खिलौना न बनें। अशफाक उल्ला खां, वीर अब्दुल हमीद, ए. पी. जे. कलाम को आदर्श मानें। देश को बचाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। सभी दल व नेता बुरे हैं, तब उनमें जो सबसे कम बुरा हो, उसे ही प्रधानमंत्री बनाने में अपना योगदान करें, यही अपेक्षा है। देश की वर्तमान चिन्ताजनक परिस्थिति में मुझ जैसा वैदिक वैज्ञानिक वैदिक संस्कृति पर मंडराते खतरे को अनुभव करके ही यह सब लिखने को विवश हुआ हूँ? मेरा भाजपा के नेताओं से कोई विशेष सम्बंध नहीं। मेरे ट्रस्ट में दोनों ही पार्टियों के नेता जुड़े हुए हैं। मुझे दुःख है कि मेरे अति निकट हितैषी वरिष्ठ भाजपा नेता रहे एक प्रांतीय राजनेता भाजपा से अपमानित होकर कांग्रेस में सम्मिलित हो गये। मुझे वैदिक अनुसंधान के लिए अनेक प्रयत्न के उपरान्त भी भाजपा सरकार ने कोई सहयोग नहीं किया। इतने पर भी मैं सम्पूर्ण राष्ट्र एवं मानवता के स्तर पर सोचने वाला एक निष्पक्ष साधु वैज्ञानिक हूँ। मुझे लगता है कि वेद के कार्य में केवल मोदी जी ही कभी रुचि ले सकते हैं। विपक्षियों की दृष्टि में तो वेद शास्त्र साम्प्रदायिक ग्रन्थ हैं। भविष्य में भारत का विनाश निश्चित दिखाई देता है, परन्तु मुझे लगता है कि मोदी इस विनाश को कुछ समय तक टालने का प्रयास कर सकते हैं। यह अग्निव्रत किसी का भी एजेण्ट कभी नहीं बन सकता, न कोई मुझे कोई खरीद सकता और न दबा सकता। हाँ, मैं एजेण्ट हूँ परन्तु मैं निराकार ओंकार रूप ब्रह्म का एजेण्ट हूँ, विश्व मानवता का एजेण्ट हूँ, वैदिक ज्ञान विज्ञान व प्राचीन भारतीय व वैदिक संस्कृति का एजेण्ट हूँ, अन्य किसी का कभी नहीं हो सकता।

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Friday, March 15, 2019

गायत्री मन्त्र का वैज्ञानिक भाष्य



भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।। (यजु.36.3)
महर्षि दयानन्द भाष्य
भूः। भुवः। स्वः। तत्। सवितु। वरेण्यम्। भर्गः। देवस्य। धीमहि।। धियः। यः। नः। प्रचोदयादिति प्रऽचोदयात्।।
पदार्थ- (भूः) कर्मविद्याम् (भुवः) उपासनाविद्याम् (स्वः) ज्ञानविद्याम् (तत्) इन्द्रियैरग्राह्यं परोक्षम् (सवितुः) सकलैश्वर्यप्रदस्येश्वरस्य (वरेण्यम्) स्वीकत्र्तव्यम् (भर्गः) सर्वदुःखप्रणाशकं तेजःस्वरूपम् (देवस्य) कमनीयस्य (धीमहि) ध्यायेम (धियः) प्रज्ञाः (यः) (नः) अस्माकम् (प्रचोदयात्) प्रेरयेत्।।
भावार्थ- अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये मनुष्याः कर्मोपासनाज्ञानविद्याः संगृह्याखिलैश्वर्ययुक्तेन परमात्मना सह स्वात्मनो युंजतेऽधर्माऽनैश्वर्यदुःखानि विधूय धर्मैश्वर्यसुखानि प्राप्नुवन्ति तानन्तर्यामिजगदीश्वरः स्वयं धर्मानुष्ठानमधर्मत्यागं च कारयितुं सदैवेच्छति।।
पदार्थ- हे मनुष्यो! जैसे हम लोग (भूः) कर्मकाण्ड की विद्या (भुवः) उपासना काण्ड की विद्या और (स्वः) ज्ञानकाण्ड की विद्या को संग्रहपूर्वक पढ़के (यः) जो (नः) हमारी (धियः) धारणावती बुद्धियों को (प्रचोदयात्) प्रेरणा करे उस (देवस्य) कामना के योग्य (सवितुः) समस्त ऐश्वर्य के देनेवाले परमेश्वर के (तत्) उस इन्द्रियों से न ग्रहण करने योग्य परोक्ष (वरेण्यम्) स्वीकार करने योग्य (भर्गः) सब दुःखों के नाशक तेजःस्वरूप का (धीमहि) ध्यान करें, वैसे तुम भी इसका ध्यान करो।।
भावार्थ- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य कर्म, उपासना और ज्ञान सम्बन्धिनी विद्याओं का सम्यक् ग्रहण कर सम्पूर्ण ऐश्वर्य से युक्त परमात्मा के साथ अपने आत्मा को युक्त करते हैं तथा अधर्म, अनैश्वर्य और दुःख रूप मलों को छुड़ा के धर्म, ऐश्वर्य और सुखों को प्राप्त होते हैं उनको अन्तर्यामी जगदीश्वर आप ही धर्म के अनुष्ठान और अधर्म का त्याग कराने को सदैव चाहता (ते) है।।
इसका भाष्य Ralph T.H. Griffith ने इस प्रकार किया है-
“May we attain that excellent glory of Savitar the God. So may he stimulate our prayers.”
यह भाष्य आध्यात्मिक है परन्तु विज्ञ पाठक स्वयं इसकी तुलना महर्षि दयानन्द के भाष्य से करके ग्रिफिथ के वैदुष्य का स्तर जान सकते हैं।
मेरा भाष्य
यह मन्त्र (व्याहृति रहित रूप में) यजु.3.35; 22.9; 30.2; ऋ. 3.62.10; सामवेद 1462 में भी विद्यमान है। यह ऐतरेय ब्राह्मण में भी अनेकत्र आया है। इनमें से यजुर्वेद 30.2 में इस मन्त्र का ऋषि नारायण तथा अन्यत्र विश्वामित्र है। देवता सविता, छन्द निचृद् बृहती एवं स्वर षड्ज है। व्याहृतियों का छन्द दैवी बृहती तथा स्वर व्याहृतियों सहित सम्पूर्ण मन्त्र का मध्यम षड्ज है। महर्षि दयानन्द ने सर्वत्र ही इसका भाष्य आध्यात्मिक किया है। केवल यजुर्वेद 30.2 के भावार्थ में आधिभौतिक का स्वल्प संकेत भी है; शेष आध्यात्मिक ही है। एक विद्वान् ने कभी हमें कहा था कि गायत्री मन्त्र जैसे कुछ मन्त्रों का आध्यात्मिक के अतिरिक्त अन्य प्रकार से भाष्य हो ही नहीं सकता। हम संसार के सभी वेदज्ञों को घोषणापूर्वक कहना चाहते हैं कि वेद का प्रत्येक मन्त्र इस सम्पूर्ण सृष्टि में अनेकत्र vibrations के रूप में विद्यमान है। इन मन्त्रों की इस रूप में उत्पत्ति पृथिव्यादि लोकों की उत्पत्ति से भी पूर्व में हो गयी थी। इस कारण प्रत्येक मन्त्र का आधिदैविक भाष्य अनिवार्यतः होता है। त्रिविध अर्थ प्रक्रिया में सर्वाधिक व सर्वप्रथम सम्भावना इसी प्रकार के अर्थ की होती है। इस कारण इस मंत्र का आधिदैविक अर्थ नहीं हो सकता, ऐसा विचार करना वेद के यथार्थ स्वरूप से नितान्त अनभिज्ञता का परिचायक है।
मेरा आधिदैविक भाष्य
इस मंत्र का महर्षि दयानन्द द्वारा किया हुआ आध्यात्मिक भाष्य हमने ऊपर उद्धृत किया है। अब हम इसी मंत्र का आधिदैविक भाष्य करते हैं। इस ऋचा का देवता सविता है। सविता के विषय में ऋषियों का कथन है-
‘‘सविता सर्वस्य प्रसविता’’ (नि.10.31)
‘‘सविता वै देवानां प्रसविता’’ (श.1.1.2.17)
‘‘सविता वै प्रसवानामीशे’’ (ऐ.1.30)
‘‘प्रजापतिर्वै सविता’’ (तां.16.5.17), ‘‘मनो वै सविता’’ (श.6.3.1.13)
‘‘विद्युदेव सविता’’ (गो.पू.1.33)
‘‘पशवो वै सविता’’ (श.3.2.3.11)
‘‘प्राणो वै सविता’’ (ऐ.1.19)
‘‘वेदा एव सविता’’ (गो.पू.1.33)
‘‘सविता राष्ट्रं राष्ट्रपतिः’’ (तै.ब्रा.2.5.7.4)
इससे निम्नलिखित निष्कर्ष प्राप्त होते हैं-
  • सविता नामक पदार्थ सबकी उत्पत्ति व प्रेरणा का स्रोत वा साधन है।
  • यह सभी प्रकाशित व कामना अर्थात् आकर्षणादि बलों से युक्त कणों का उत्पादक व प्रेरक है।
  • यह सभी उत्पन्न पदार्थों का नियन्त्रक है।
  • ‘ओम्’ रश्मि रूप छन्द रश्मि एवं मनस्तत्व ही सविता है।
  • विद्युत् को भी ‘सविता’ कहते हैं।
  • विभिन्न मरुद् रश्मियां एवं दृश्य कण ‘सविता’ कहलाते हैं।
  • विभिन्न प्राण रश्मियां ‘सविता’ कहलाती हैं।
  • सभी छन्द रश्मियां भी ‘सविता’ हैं।
  • तारों के केन्द्रीय भाग रूप राष्ट्र को प्रकाशित व उनका पालन करने वाला सम्पूर्ण तारा भी ‘सविता’ कहाता है।
यह हम पूर्व में लिख चुके हैं कि देवता किसी भी मंत्र का मुख्य प्रतिपाद्य विषय होता है। इस कारण इस मंत्र का मुख्य प्रतिपाद्य ‘ओम्’ छन्द रश्मि, मनस्तत्व, प्राण तत्व एवं सभी छन्द रश्मियां हैं। इस ऋचा की उत्पत्ति विश्वामित्र ऋषि {वाग् वै विश्वामित्रः (कौ.ब्रा.10.5), विश्वामित्रः सर्वमित्रः (नि.2.24)} अर्थात् सबको आकृष्ट करने में समर्थ ‘ओम्’ छन्द रश्मियों से होती है।
आधिदैविक भाष्य- (भूः) ‘भूः’ नामक छन्द रश्मि किंवा अप्रकाशित कण वा लोक, (भुवः) ‘भुवः’ नामक रश्मि किंवा आकाश तत्व, (स्वः) ‘सुवः’ नामक रश्मि किंवा प्रकाशित कण, फोटोन वा सूर्यादि तारे आदि से युक्त। (तत्) उस अगोचर वा दूरस्थ सविता अर्थात् मन, ‘ओम्’ रश्मि, सभी छन्द रश्मियां, विद्युत् सूर्यादि आदि पदार्थों को (वरेण्यम् भर्गः देवस्य) सर्वतः आच्छादित करने वाला व्यापक {भर्गः = अग्निर्वै भर्गः (श.12.3.4.8), आदित्यो वै भर्गः (जै.उ.4.12.2.2), वीर्यं वै भर्गऽएष विष्णुर्यज्ञः (श.5.4.5.1), अयं वै (पृथिवी) लोको भर्गः (श.12.3.4.7)} आग्नेय तेज, जो सम्पूर्ण पदार्थ को व्याप्त करके अनेक संयोजक व सम्पीडक बलों से युक्त हुआ प्रकाशित व अप्रकाशित लोकों के निर्माण हेतु प्रेरित करने मेें समर्थ होता है, (धीमहि) प्राप्त होता है अर्थात् वह सम्पूर्ण पदार्थ उस आग्नेय तेज, बल आदि को व्यापक रूप से धारण करता है। (धियः यः नः प्रचोदयात्) जब वह उपर्युक्त आग्नेय तेज उस पदार्थ को व्याप्त कर लेता है, तब विश्वामित्र ऋषि संज्ञक मन व ‘ओम्’ रश्मि रूप पदार्थ {धीः = कर्मनाम (निघं.2.1), प्रज्ञानाम (निघं.3.9), वाग् वै धीः (ऐ.आ.1.1.4)} नाना प्रकार की वाग् रश्मियों को विविध दीप्तियों व क्रियाओं से युक्त करता हुआ अच्छी प्रकार प्रेरित व नियन्त्रित करने लगता है।
भावार्थ- मन एवं ‘ओम्’ रश्मियां व्याहृति रश्मियों से युक्त होकर क्रमशः सभी मरुद्, छन्द आदि रश्मियों को अनुकूलता से सक्रिय करते हुए सभी कण, क्वाण्टा एवं आकाश तत्व को उचित बल व नियन्त्रण से युक्त करती हैं। इससे सभी लोकों तथा अन्तरिक्ष में विद्यमान पदार्थ नियन्त्रित ऊर्जा से युक्त होकर अपनी-2 क्रियाएं समुचित रूपेण सम्पादित करने में समर्थ होते हैं। इससे विद्युत् बल भी सम्यक् नियंत्रित रहते हैं।
सृष्टि में इस ऋचा का प्रभाव- इस ऋचा की उत्पत्ति के पूर्व विश्वामित्र ऋषि अर्थात् ‘ओम्’ छन्द रश्मियां विशेष सक्रिय होती हैं। इसका छन्द दैवी बृहती + निचृद् गायत्री होने से इसके छान्दस प्रभाव से विभिन्न प्रकाशित कण वा रश्मि आदि पदार्थ तीक्ष्ण तेज व बल प्राप्त करके सम्पीडित होने लगते हैं। इसके दैवत प्रभाव से मनस्तत्व एवं ‘ओम्’ छन्द रश्मि रूप सूक्ष्मतम पदार्थों से लेकर विभिन्न प्राण, मरुत् छन्द रश्मियां, विद्युत् के साथ-2 सभी दृश्य कण वा क्वाण्टाज् प्रभावित अर्थात् सक्रिय होते हैं। इस प्रक्रिया में ‘भूः’, ‘भुवः’ एवं ‘सुवः’ नामक सूक्ष्म छन्द रश्मियां ‘ओम्’ छन्द रश्मि के द्वारा विशेष संगत व प्रेरित होती हुई कण, क्वाण्टा, आकाश तत्व तक को प्रभावित करती हैं। इससे इन सभी में बल एवं ऊर्जा की वृद्धि होकर सभी पदार्थ विशेष सक्रियता को प्राप्त होते हैं। इस समय होने वाली सभी क्रियाओं में जो-2 छन्द रश्मियां अपनी भूमिका निभाती हैं, वे सभी विशेष उत्तेजित होकर नाना कर्मों को समृद्ध करती हैं। विभिन्न लोक चाहे, वे तारे आदि प्रकाशित लोक हों अथवा पृथिव्यादि ग्रह वा उपग्रहादि अप्रकाशित लोक हों, सभी की रचना के समय यह छन्द रश्मि अपनी भूमिका निभाती है। इसके प्रभाव से सम्पूर्ण पदार्थ में विद्युत् एवं ऊष्मा की वृद्धि होती है परन्तु इस स्थिति में भी यह छन्द रश्मि विभिन्न कणों वा क्वाण्टाज् को सक्रियता प्रदान करते हुए भी अनुकूलता से नियन्त्रित रखने में सहायक होती है। इस ग्रन्थ के खण्ड 4.32, 5.5 एवं 5.13 में पाठक इस ऋचा का ऐसा ही प्रभाव देख सकते हैं। हाँ, वहाँ व्याहृतियों की अविद्यमानता अवश्य है। इसके षड्ज स्वर के प्रभाव से ये रश्मियां अन्य रश्मियों को आश्रय देने, नियन्त्रित करने, दबाने एवं वहन करने में सहायक होती है। व्याहृतियों का मध्यम स्वर इन्हें विभिन्न पदार्थों के मध्य प्रविष्ट होकर अपनी भूमिका निभाने का संकेत देता है। छन्द व स्वर के प्रभाव हेतु पूर्वोक्त छन्द प्रकरण को पढ़ना अनिवार्य है।
मेरा आधिभौतिक भाष्य
आधिदैविक भाष्य व वैज्ञानिक प्रभाव को दर्शाने के पश्चात् हम इस मंत्र के आधिभौतिक अर्थ पर विचार करते हैं-
{भूः = कर्मविद्याम्, भुवः = उपासनाविद्याम्, स्वः = ज्ञानविद्याम् (म.द.य.भा.36.3)। सविता= योग पदार्थज्ञानस्य प्रसविता (म.द.य.भा.11.3), सविता राष्ट्रं राष्ट्रपतिः (तै.ब्रा.2.5.7.4)} कर्मविद्या, उपासनाविद्या एवं ज्ञानविद्या इन तीनों विद्याओं से सम्पन्न (सवितुः) (देवस्य) दिव्य गुणों से युक्त राजा, माता-पिता किंवा उपदेशक आचार्य अथवा योगी पुरुष के (वरेण्यम्) स्वीकरणीय श्रेष्ठ (भर्गः) पापादि दोषों को नष्ट करने वाले, समाज, राष्ट्र व विश्व में यज्ञ अर्थात् संगठन, त्याग, बलिदान के भावों को समृद्ध करने वाले उपदेश वा विधान को (धीमहि) हम सब मनुष्य धारण करें। (यः) ऐसे जो राजा, योगी, आचार्य वा माता-पिता और उनके विधान वा उपदेश (नः) हमारे (धियः) कर्म एवं बुद्धियों को (प्रचोदयात्) व्यक्तिगत, आध्यात्मिक, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रिय वा वैश्विक उन्नति के पथ पर अच्छी प्रकार प्रेरित करते हैं।
भावार्थ- उत्तम योगी व विज्ञानी माता-पिता, आचार्य एवं राजा अपनी सन्तान, शिष्य वा प्रजा को अपने श्रेष्ठ उपदेश एवं सर्वहितकारी विधान के द्वारा सभी प्रकार के दुःखों, पापों से मुक्त करके उत्तम मार्ग पर चलाते हैं। ऐसे माता-पिता, आचार्य एवं राजा के प्रति सन्तान, शिष्य व प्रजा अति श्रद्धा भाव रखे, जिससे सम्पूर्ण परिवार, राष्ट्र वा विश्व सर्वविध सुखी रह सके।
 आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

BOOKS, CHANGE YOUR LIFE: https://www.vaidicphysics.org/books
CONNECT WITH US: You can connect with me on different social platforms too:
Follow us on Twitter: http://twitter.com/vaidicphysics

Wednesday, March 13, 2019

लोकसभा चुनाव - हमारा दायित्व




लोकसभा चुनाव का शंखनाद हो चुका है। राजनैतिक दलों की सेनाएं सज रही हैं, ऐसे में मुझ जैसे वैदिक वैज्ञानिक साधु का क्या कर्तव्य है? यह विचारणीय है। कोई-कोई महानुभाव मुझे राजनीति से दूर रहने का परामर्श देते हैं, तो कोई मेरे द्वारा भारतीय सेनाओं की प्रशंसा तथा पाकिस्तान व आतंकवाद की निन्दा करने पर मुझ पर भाजपाई होने का आरोप लगा देते हैं। यह बात हमारे देश के युवाओं की दिशाहीनता को दर्शाती है। यह बात सिद्ध है कि सत्ता देश के हर नागरिक को प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूप से प्रभावित करती है। सत्ता द्वारा बनाए कानून व नीतियां देश की दिशा तय करती हैं, ऐसे में वैदिक अनुसंधान व प्रचार का कार्य कैसे सत्ता की नीतियों से अप्रभावित रह सकता है? वेद व देश विरोधी एक नीति ही हमारे सम्पूर्ण पुरुषार्थ को नष्ट कर सकती है, तब मैं कैसे ‘कोई नृप होय हमें क्या हानि’ की मूर्खता करूँ? ऋषि दयानन्द जी के समय भी विभिन्न कथित साधु-सन्त ऋषि दयानन्द को देश व समाज की चिन्ता से दूर रहकर केवल ब्रह्म की साधना का परामर्श देते थे, परन्तु इतिहास साक्षी है कि ऋषि दयानन्द इस भारत के भाग्यविधाता बनकर उभरे तथा अंग्रेजी क्रूर सरकार के विरोध में सबसे पहले स्वराज्य का मन्त्र देशवासियों को दिया। महाभारत का युद्ध जब किसी प्रकार भी रोका नहीं जा सका, तब योगेश्वर श्री कृष्ण जी महाराज के बड़े भाई बलराम जी मौन साध कर भ्रमण पर चले गये परन्तु श्री भगवान् कृष्ण जी ने धर्म का साथ दिया। यद्यपि जूए का कुछ अधर्म महाराज युधिष्ठर जी ने भी कर दिया पुनरपि दुर्योधन की अपेक्षा उनका पक्ष तुलनात्मक ढंग से अधिक धर्मयुक्त होने के कारण युद्ध में उनकी ओर से सर्वोच्च नीतिनिर्धारक की भूमिका निभाई। इन दो महापुरूषों का अनुयायी होने के कारण मेरा इतना कर्तव्य तो बनता ही है कि वर्तमान भ्रष्ट राजनीति में जो व्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक गम्भीर व देश का हितैषी दिखाई देेता है, जो भारत की रक्षा करने में सक्षम दिखाई देता है, उसकी यत्कि४िचत् सहायता तथा देशविरोधी शक्तियों का वैचारिक स्तर पर विरोध इतना किया जाए कि अपना अनुसंधान कार्य भी बाधित न होवे।

प्यारे देशवासियो! देश में चुनाव होते रहेंगे हैं व होते रहेंगे परन्तु यह चुनाव ऐतिहासिक हो गया है। इस बार विपक्षी दलों ने भारत के स्वाभिमान व सम्मान को जितनी ठेस पहुँचायी है, उतनी पहले कभी नहीं पहुँचायी। अपनी ही रक्षक भारतीय सेनाओं का जितना अपमान किया गया है, न्यायालय, चुनाव आयोग, कैग, सी. बी. आई, ईडी आदि संस्थाओं पर जितने प्रश्न खड़े किये, भ्रष्टाचार का पक्ष लिया गया, वैसा कभी किसी विपक्षी दल ने पहले कभी नहीं किया। इस बार पाकिस्तान व आतंकवाद का जितना समर्थन किया गया, वह प्रत्येक देशभक्त के आत्मा को हिलाने वाला है। इससे स्पष्ट हो गया है कि आज अधिकांश विपक्षी दल भारत में कई पाकिस्तानों का गर्भ पाल रहे हैं। पहले ही पाकिस्तान व बंगलादेश के रूप में भारतभूमि का विभाजन हो गया है, अब और विभाजन के षड्यन्त्र हो रहे हैं भारत् के टुकड़े करने के नारे लग रहे हैं, ऐसे देशद्रोहियों को कई विपक्षी दल प्रोत्साहित कर रहे हैं। देश विभाजन के खूनी तांडव का दर्द आज भी उन लाखों भारतीयों के हृदय में है, जिन्होंने उसको अनुभव किया है परन्तु वोट के लोभी नेताओं को इस बात की काई चिन्ता नहीं है। यदि ‘पाकिस्तान जिंदाबाद‘ के नाम से तथा आतंकवादियों को सम्मान देने से भारतीय मुसलमानों के वोट मिलने की आशा कोई करता है, तब निश्चित ही सभी भारतीय मुसलमानों को देशद्रोही मान कर अपमानित करता है। आज वैदिक संस्कृति एवं भारतीय सनातन गौरव का उपहास हो रहा है, वैसा कभी नहीं हुआ। ऐसी स्थिति में किसी भी वेदभक्त, सनातन संस्कृति व भारतीय प्राचीन गौरव पर अभिमान करने वाले देशभक्त का मौन रहना कदापि उचित नहीं है। यह न तो वेद के प्रति न्याय है और न देश के प्रति।

मेरे मित्रो ! इस बार का चुनाव पार्टियों वा गठबंधनों के बीच नहीं है, बल्कि इस बार आपको भारत व पाकिस्तान में से एक को चुनना है। धर्म व अधर्म में से एक को चुनना है, निर्भीक, ईमानदार, देशभक्त व विश्वस्तरीय नेतृत्व अथवा मूर्ख, चंचल, भ्रष्ट, साम्प्रदायिक, पाकिस्तानपरस्त में से एक को चुनना है। अपने व्यक्तिगत, जातीय, क्षेत्रीय, मजहबी स्वार्थ तथा राष्ट्र के दूरगामी हित में से एक को चुनना है। अपने तात्कालिक स्वाभिमान व राष्ट्रिय स्वाभिमान में से एक को चुनना है। इस बार आपको किसी सांसद को ही नहीं चुनना है, अपितु देश को सबसे उपयुक्त देशभक्त प्रधानमंत्री देना है। सांसद चुनना तो एक साधन मात्र है।

यदि आपके मन में विकास, रोेजगार, किसान, मजदूर, महिला सुरक्षा, शिक्षा, चिकित्सा, मंहगाई, साम्प्रदायिक दंगे, भ्रष्टाचार, बिजली, पानी एवं न्याय आदि ही प्रमुख मुद्दे हैं, तब भी आपको अबतक बनी सभी सरकारों के कार्यों की निष्पक्ष तुलना करनी चाहिए। वर्तमान में पार्टियों के वादों एवं घोषणाओं के भ्रम जाल में न फंसकर उनके अबतक किए कार्यों को ही देखना चाहिए। मैं यहाँ यह भी कहूँगा कि देश की सीमाओं की सुरक्षा किसी भी देश के लिए सर्वप्रथम आवश्यकता है, क्योंकि ऐसा न होने पर सभी मुद्दे अप्रासंगिक हो जाते हैं।

मेरे मित्रो! यद्यपि पाप सर्वत्र है परन्तु सरकार बनानी ही है, तब जहाँ पाप कम हो, उसे चुनने की विवशता है। सब्जीमण्डी में सभी आलू सड़े हैं और सब्जी बनानी ही है, तब आप क्या करेंगे? बोलो! क्या विवशता में छांटकर जो कम सड़े हैं, उन्हें ही खरीदेंगे न? इसी प्रकार चुनाव में भी यही करें, ऐसा मेरा सभी देशवासियों से विनम्र निवेदन है। मैं भी किसी को राजा हरिश्चन्द्र नहीं मानता परन्तु वर्तमान मंे योग्य को चुनना ही विवशता है। इसलिए सभी पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर वर्तमान परिस्थिति में देश को सबसे योग्य प्रधानमंत्री देना है। आप मेरे इस लेख पर एकांत में ईश्वर की साक्षी में ध्यानपूर्वक विचार करें। यदि आपको मेरे विचार निष्पक्ष, सत्य एवं देशहितकारी प्रतीत होवें, तो आप इस लेख को अधिक से अधिक प्रचारित करें।

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Sunday, March 10, 2019

प्रधानमंत्री से इतना द्वेष क्यों?



आज विपक्षी नेताओं को यह समझ नहीं आ रहा है कि आतंकवाद व पाकिस्तान की निन्दा करें अथवा मौन रहें? भारतीय सेनाओं की प्रशंसा करें अथवा उन पर अविश्वास जताएं? दुर्भाग्य से अनेक नेता मोदी जी के साथ-2 सेना व भारत के भी विरोधी हो चुके हैं। नाना प्रकार से सेना पर प्रहार करके पाकिस्तान में तालियां बजवा रहे हैं। कोई-कोई साहस करके वायु सेना की प्रशंसा करते हुए यह कहता है कि मोदी इसका श्रेय क्यों ले रहे हैं? मुझे आश्चर्य है कि ऐसा कहने वाले नेता क्या नितान्त मूर्ख हैं, जिन्हें यह भी नहीं पता कि सेना किसके आदेश से कार्य करती हैं?

जब 1971 की विजय के लिए श्रीमती इन्दिरा गांधी तथा 1965 में युद्ध में विजय के लिए श्रीमान् लाल बहादुर शास्त्री को श्रेय दिया जाता है, तब एयर स्ट्राइक के लिए मोदी जी को श्रेय क्यों नहीं? क्या विभिन्न सरकारी विभागों के कार्य के लिए सरकार व देश के नेता की कोई भूमिका नहीं होती? यदि ऐसा है, तो देश की किसी समस्या के लिए सरकार को दोष क्यों दिया जाए? योजनाओं का सम्पूर्ण क्रियान्वन सरकारी मशीनरी ही करती है। यदि कोई कहे कि सेना के कार्य के लिए रक्षा विभाग उत्तरदायी एवं श्रेय का भागी नहीं, किसानों की समस्या के लिए कृषि विभाग के अधिकारी ही उत्तरदायी हैं, कृषिमंत्री व प्रधानमंत्री नहीं, स्वास्थ्य समस्याओं के लिए डॉक्टरर्स उत्तरदायी हैं, सरकार नहीं, कानून व्यवस्था की समस्या के लिए पुलिस उत्तरदायी है, गृहमंत्री व प्रधानमंत्री नहीं, विदेशी सम्बंधों के लिए भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी उत्तरदायी हैं, विदेशमंत्री नहीं, तब सरकार की आवश्यकता ही क्या है। तब तो संसदीय लोकतंत्र को समाप्त कर देना चाहिए, क्योंकि नेता न तो अच्छे कार्य के लिए श्रेय के भागी हैं और न बुरे कार्य के लिए उत्तरदायी, तब सेना के शौर्य का श्रेय प्रधानमंत्री को कदापि नहीं मिले। ऐसा कहने वाले को स्वयं अपना पद त्यागकर कोई व्यापार वा कृषि आदि कार्य करने में लग जाना चाहिए।

पूर्ववर्ती सरकारों के समय भी यही सेना थी, उसके शौर्य में कोई कभी नहीं थी परन्तु तब कायर नेताओं के सत्ता में रहते कभी पाकिस्तान को कोई जवाब नहीं दिया गया। आज जब सेना को पूर्ण अधिकार मिला, तो इन नेताओं को बेचैनी हो रही है? क्या ये नेता यही चाहते हैं कि भारतीय सेना पराजित हो जाये, और फिर ये ही नेता दोष मोदी जी के सिर पर मढ़ते और त्यागपत्र मांगते। आज जिस प्रकार से मोदी जी पाकिस्तान को ललकार रहे हैं, उसको विश्व में अलग-थलग कर दिया है, क्या वैसा कभी मनमोहन सिंह जी कर सके? आप जरा यह भी सोचिए कि पाकिस्तान आज क्यों नहीं चाहता कि मोदी फिर प्रधानमंत्री बने? क्या आप और पाकिस्तान की सोच एक नहीं है? आप भारत के नेता हैं अथवा पाकिस्तान के? यह सब अपने मतदाताओं को बताते रहिए। मेरा इन नेेताओं व इनके भक्तों से विनम्र निवेदन है कि अपना चरित्र इतना मत गिराओ, जो  ऊँचा उठ ही न सके। देश है, तो हम हैं, देश नहीं होगा, तो हम सब भी मिट जायेंगे।

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Saturday, March 9, 2019

सेना व देश के विरुद्ध षड्यन्त्र




आज कुछ लोग मोदी जी के साथ-साथ अपनी ही अपनी ही सेना को गाली दे रहे हैं, उस पर अविश्वास कर रहे हैं, तो कोई उसका उपहास कर रहे हैं। ऐसे लोग अत्यन्त नीच व कृतघ्न हैं। जो सेना बर्फ में, तीव्र धूप में, गोलों व गोलियों की बौछार में अपने प्राण हथेली पर रख कर हमारी रक्षा करती है, उसके साथ यह दुर्व्यवहार शत्रुदेश के लोग ही कर सकते हैं, अपने देश के नहीं। क्या ऐसे पापी देशद्रोहियों को सेना के ही हवाले नहीं कर देना चाहिए? जिससे सेना उन्हें भी आतंकवादियों की भाँति सबक सिखा सके। क्या लोकतन्त्र में किसी को मनमानी करने वा बोलने की छूट होनी चाहिए? क्या ऐसे लोगों को मृत्युदण्ड जैसे कठोर दण्ड देने के लिए अध्यादेश नहीं लाना चाहिए? यदि ऐसा नहीं किया गया, तो ये लोग भारत-पाकिस्तान के मध्य युद्ध की स्थिति में पाक सेना का ही साथ देंगे। इस कारण इन पर नियन्त्रण करना समय की सर्वोच्च आवश्यकता है। भारत के इतिहास में विपक्षी नेताओं ने ऐसा पाप पहले कभी नहीं किया। यदि इस पाप को नहीं रोका गया, तो देश हार जायेगा, मिट जायेगा। प्यारे देशवासियो! सोचो, आप क्या ऐसे नेताओं को अपना नेता मानेंगे? क्या पाकिस्तान को जिताओगे और अपने ही भारत को मिटाओगे? बोलो! अपना भविष्य नष्ट करके भी क्या अपनी नेताभक्ति व पार्टीभक्ति का त्याग नहीं करोगे? यदि ऐसा नहीं करोगे, तो फिर आपको खून के आँसू बहाने के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलेगा।

अब यह बात भी समझ में आ रही है कि अपनी ही वायु सेना के स्ट्राइक से परेशान ये नेता क्यों राफेल जैसे विध्वंसक विमान को खरीदनें में बाधा डाल रहे हैं। वे हर तरह से हमारी सेना को कमजोर कर देश को नष्ट करना चाहते हैं। कोई तो है, जो इन्हें इसके बदले कुछ दे रहा है। क्यों इन नेताओं को पाकिस्तान प्रिय और भारत अप्रिय हो गया है? क्यों ये भारत में रहकर, भारत का खाकर भारत के शत्रुओं के एजेण्ट बन गये हैं? क्या इन्हें भारत में रहने का अधिकार हैं? सभी देशवासियों का कर्तव्य है कि ऐसे नेता, चाहे वे अपने निकट सम्बंधी ही क्यों न हों, उन्हें अपने गाँव और नगरों में घुसने ही न दिया जाए।

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Recent post