Tuesday, November 13, 2018

उतिष्ठत जाग्रत...




        संसार के सभी मानव एक परम पिता परमात्मा की सन्तान होने से परस्पर भाई हैं। जिस प्रकार उसके बनाये सूर्य, तारे, पृथ्वी, वायु, जल, चन्द्रमा, अन्न आदि सभी के लिये है। उसी प्रकार वेद ज्ञान भी प्राणि मात्र के हित के लिये है।

दुर्भाग्यवश वर्तमान में हिन्दू कहे जाने वालों के अतिरिक्त कोई भी सम्प्रदाय इस शाश्वत सत्य को स्वीकार नहीं करता। उससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह कि जो हिन्दू वेद को ईश्वरीय ज्ञान मानते हैं वे वेद को सर्वथा त्याग कर अन्य अनेकों ग्रन्थों - कुग्रन्थों की भूल भुलैयों में भ्रमित हैं। ऐसे में आर्य समाज का ही सबसे बड़ा दायित्व है कि वह इस सत्य सनातन वैदिक व आर्ष ज्ञान का संवाहक बनकर मानव जाति को बचाये। परन्तु जब आर्य समाज में भी वेद विरोधी असामाजिक तत्वों की घुसपैठ हो गयी। वे उच्च पदासीन व प्रतिष्ठित भी माने जाने लगे, तब वेद की रक्षा करना अति दुष्कर कार्य है। आज इस महाविपत्ति में देश व विश्व के समस्त वेद भक्तों को मिलकर वेद रक्षार्थ संगठित होना चाहिये अन्यथा विश्व से मानवता सदा के लिये मिट जायेगी और ऋषियों, वीरों और अन्य महापुरूषों का बलिदान व्यर्थ ही हो जायेगा। इसलिये ''उतिष्ठत जाग्रत स्वधर्म कर्तव्यं च चिन्तयत।'' 

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

विनाशकारी तकनीक




सूचना तकनीक वर्तमान काल की सबसे महत्वपूर्ण तकनीक है। अन्य तकनीकों की भांति इसका भी भयंकर दुरुपयोग हो रहा है। इसके कारण निकट भविष्य में इस मानव जाति के लिए घोर संकट आने वाला है। इसके विकिरण स्पेस को तथा इन तरंगों के साथ संवहित काम (यौन उच्छ्रंखलता) क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, वैर, हिंसा की सूक्ष्म तरंगें मनस्तत्व को प्रदूषित कर रही हैं। इससे मनुष्य कामी, क्रोधी, द्वेषी, हिंसक, ईर्ष्यालु, अहंकारी एवं हठी बनकर अपराधों की आग में निरन्तर झुलसता जा रहा है। 

यद्यपि मैं (अर्थात् मेरी संस्था) भी इसी के द्वारा अपने विचारों का प्रचार कर रहा हूँ परन्तु मुझे प्रबल आशंका है कि इससे विश्व का शीघ्र विनाश होने वाला है। सदाचार, संस्कृति, धर्म आदि विनष्ट होकर प्राणियों का अस्तित्व संकट में आ जाएगा।

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Thursday, November 8, 2018

​दिल्ली परेशान, किसान बदनाम!


राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वर्तमान प्रदूषण के लिए AC बंगलों में रहने वाला ऐश्वर्यसम्पन्न वर्ग केवल किसानों के द्वारा पराली जलाने को उत्तरदायी ठहराता है। यह वर्ग अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए पृथक्-पृथक् गाड़ियां रखने, AC का बेरोक प्रयोग करने जैसे कारणों पर विचार नहीं करता। उसे अन्नदाता किसान, जिसे महर्षि दयानंद सरस्वती राजाओं का राजा कहते थे, की विवशता, निर्धनता, कठोर परिश्रम के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है।

हाँ, किसानों को भी चाहिए कि वे पराली को जलाने के साथ के स्थान पर उससे खाद बनाने का प्रयास करें, जिससे जैव खाद भी मिलेगा तथा पर्यावरण प्रदूषण भी नहीं होगा।

शासन को चाहिए कि एक ही परिवार में अधिक गाड़ी रखने पर पाबंदी लगाए और उनकी अधिक गाड़ीयों को जब्त कर लें। इसके साथ ही ऊर्जा की खपत की भी एक सीमा निश्चित करनी चाहिए।

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वेदविज्ञान-आलोकः ग्रन्थ का इतना मूल्य क्यों?




इन दिनों कुछ महानुभाव ‘वेदविज्ञान-आलोकः’ ग्रन्थ के मूल्य पर भी विवाद कर रहे हैं। मैं उन महानुभावों से निवेदन करता हूँ कि वे पहले उस ग्रन्थ को अच्छी तरह देख लें। उसकी विषयवस्तु, कागज, छपाई, रंग, आवरण, साज-सज्जा आदि की गुणवत्ता की स्वयं जाँच कर लें। मैं इस ग्रन्थ के बारे में कुछ जानकारी सार्वजनिक कर रहा हूँ-
1. इस ग्रन्थ को लिखने में मुझे लगभग 10 वर्ष लगे हैं। इस ग्रन्थ में चारों वेद, लगभग 68 आर्ष ग्रन्थ व अन्य संस्कृत ग्रन्थों को मिलाकर कुल 95 ग्रन्थों के साथ-2 वर्तमान भौतिकी के 30 विश्वस्तरीय ग्रन्थों वा रिसर्च पेपर्स को उद्घृत किया है।
2. इस अवधि में प्रायः 2-4 स्टाफ (लेखन सहायक, शोध सहायक, प्रूफ रीडर व टाइपिस्ट) को मानदेय पर रखा गया था, जो लगातार मेरे साथ केवल इसी अनुसंधान कार्य में लगे रहे।
3. लगभग 2 वर्ष उपाचार्य श्री विशाल आर्य ने मेरे साथ मानदेय पर वर्तमान भौतिकी पर कुछ संवाद, पुस्तक की साज-सज्जा, सम्पादन एवं दुर्लभ वैज्ञानिक चित्र (लगभग, 200-250 बहुरंगी चित्र) आदि के निर्माण का गुरुतर कार्य किया।
4. यह 4 भागों में कुल 2800 पृष्ठों में छपा हैै। बॉक्स सहित ग्रन्थ का वजन लगभग 11.50 किलोग्राम है। इस ग्रन्थ का कागज चिकना आर्ट पेपर, प्रिंटिग बहुरंगी, हार्ड कवर, ग्रन्थ को रखने का प्रिंटेड बॉक्स तथा पेपर का आकार A4 से भी बड़ा है। प्रायः इस आकार का ग्रन्थ बाजार में उपलब्ध नहीं होता।
5. इस ग्रन्थ में कागज अति उत्तम कोटि का इस कारण लिया गया, क्योंकि ऐसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ बार-2 नहीं छपते। प्रैस वाले के अनुसार यह कागज 100 वर्षों तक सुरक्षित रहने योग्य है।
6. इस ग्रन्थ को इस संस्थान में ही पूर्णतः तैयार करके प्रैस में दिया गया था। सभी कार्मिकों के मानदेय के अतिरिक्त पुस्तक की छपाई तथा इसके कॉपी राईट के लिए बार-2 दिल्ली व अहमदाबाद जाना, प्रैस जाना आदि का व्यय जोड़ें, तो 1000 सैट पर अनुमानित 1 करोड़ से कम व्यय इस ग्रन्थ के निर्माण पर नहीं हुआ होगा। यदि यह ग्रन्थ हम संस्थान में ही पूर्णतः तैयार नहीं करते, तो भारत का कोई भी प्रैस मेरी पाण्डुलिपियों से इस विशाल ग्रन्थ को छाप नहीं सकता था, ऐसा प्रैस वालों ने कहा भी था।
7 इस ग्रन्थ पर मुद्रित मूल्य 20,000/- जबकि vedrishi.com ग्राहक को हॉम डिलीवरी 15,000/- में करता है। उधर लागत व्यय ही लगभग 10,000 /- है। इस पर 500रु. से लेकर 1000रु. तक कॉरियर व्यय अतिरिक्त, जो ग्राहक से नहीं लिया जाता है। अब आप स्वयं अनुभव करें कि आपकी आलोचना कहाँ तक उचित है?
8. ग्रन्थ के अनेक सैट तो हमने निःशुल्क भेंट किये हैं एवं कर रहे हैं। कुछ को लागत मूल्य से भी कम पर दे देते हैं। हम स्वयं यह ग्रन्थ 12,000 /- या 13,000 /- दान देने वालों को घर बैठे उपलब्ध करवा देते हैं।
9. यह भी सबको अवगत रहे कि मैं स्वयं संस्था से एक रुपया भी न तो मानदेय लेता हूँ और न कोई रॉयल्टी आदि लाभ। मेरे भोजन, वस्त्र, आवास, आवागमन, चिकित्सा का व्यय ही संस्थान करता है। मेरा कोई बैंक खाता नहीं और न प्रायः कोई रोकड़ धन।

मैं स्वयं यह व्यय भी न्यूनतम ही करने का प्रयास करता हूँं। यह भी अवगत करा दूँ कि मैं यद्यपि संस्थान का अध्यक्ष हूँ परन्तु मैं प्रत्येक कार्य सर्वसम्मति से करता हूँ। मैं कोई अधिनायक नहीं हूँ बल्कि बिना वेतन का पूर्ण समर्पित एक कार्यकर्त्ता मात्र हूँ। बिना रशीद या वाउचर के इस संस्थान में छोटी से छोटी राशि का भी लेन-देन नहीं होता है। मेरे संस्थान में यदि कोई आकर देखे, तो ज्ञात होगा कि मैं कितने कम संसाधनों में कितना बड़ा कार्य कर रहा हूँ। जिन्हें ग्रन्थ के मूल्य से यह भ्रम हो जाये कि हमारा न्यास व्यापारी बन गया है, वह यहाँ आकर एक दिन रहने पर ही जान जायेगा।

मेरे महानुभावो! मैं आपको यहाँ आमंत्रित कर रहा हूँ। यहाँ आकर आप इस संस्था व मुझे सबसे अलग ही पाएंगे।

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

कहाँ है कोई रामभक्त?



चुनावों में प्रत्येक राजनैतिक दल अपने स्वार्थ में सत्य वा असत्य घोषणाएं करता है। मतदाता भी उन घोषणाओं के मिथ्या जाल में फंसा अपना स्वार्थ देखता है। कोई कथित जाति व सम्प्रदायों के कूंए के अन्दर ही रहना चाहता है। बड़े शोक की बात है कि देश के पापी दुराचारी व पक्षपातपूर्ण कानूनों को मिटाने की घोषणा न तो कोई राजनैतिक दल करता है और मतदाताओं को भी इन कानूनों के प्रति कोई कोई चिन्ता नहीं है।

अहो! हमारा महान् भारत इतना पापी हो गया कि सब शान्तमन होकर घृणित पापों को सहजता से पचा रहे हैं। प्रतीत होता है कि देश में कोई भी रामभक्त, कृष्णभक्त, शिवभक्त, हनुमान्-भक्त आज नहीं रहा है।


✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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