Thursday, July 26, 2018

ईश्वर के अस्तित्व की वैज्ञानिकता - 15




अद्वैतवाद समीक्षा
इस संसार में जहाँ चार्वाक, बौद्ध व जैन मत आदि ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं करते हैं, वहीं कुछ अध्यात्मवादी मानते हैं कि इस सम्पूर्ण सृष्टि में मात्र ईश्वर तत्व की सत्ता है, जीव व प्रकृति आदि की कोई सत्ता नहीं है। यह विचार मध्यकाल में अनेक आचार्यों का रहा है। इन आचार्यों में से आद्य शंकराचार्य को प्रमुख स्थान दिया जाता है। अद्वैतवाद का आधार महर्षि कृष्ण द्वैपायन बादरायण व्यास (महर्षि वेदव्यास) का ब्रह्मसूत्र नामक महत्वपूर्ण ग्रन्थ माना जाता है। यह मत संसार के अनेक वैदिक व अवैदिक किंवा भारतीय व विदेशी मत मतान्तरों को प्रभावित करता रहा व कर रहा है। हम इसकी चर्चा न करके मात्र इसी विषय पर विचार करेंगे कि यह मत क्यों वेद विरुद्धस्वयं ब्रह्मसूत्रों क के विरुद्ध तथा विज्ञान व युक्तियों के विरुद्ध है? ब्रह्मसूत्रों में प्रथम दो सूत्रों से ही अद्वैतवाद खण्डित हो जाता है। वे दो सूत्र इस प्रकार हैं

“अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’’ (ब्र.सू. L१.१.१)
‘'जन्माषस्य यतः” (ब्र .सू.१.१.२)


इन दो सूत्रों से ब्रह्म विषयक चर्चा प्रारम्भ करते हुए कहा है-
"अब हम ब्रह्मा को जानने की इच्छा करते हैं। वह ब्रह्म कैसा व कौन है? यह बताते हुए कहते हैं कि जिससे जगत् का जन्मादि (जन्म, स्थिति व प्रलयादि) होता है ।”
जरा विचारें कि जिस जगत् का जन्म होता है, उसमें स्थिति होती है तथा समय आने पर ब्रह्म उसका प्रलय भी करता है, वह जगत् कभी मिथ्या नहीं हो सकता। न जाने क्यों, इस ब्रह्म प्रतिपादक महान् ग्रन्थ के आधार पर ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य सभी पदार्थों की सत्ता को नकारा जाता है? जबकि यह ग्रन्थ अपने प्रारम्भ में ही जगत् के सभी पदार्थों की वास्तविकता को प्रतिपादित कर रहा है। यह बात पृथक है कि जगत् ब्रह्म की भाँति नित्य नहीं है परन्तु जगत् मिथ्या (अवास्तविक) भी नहीं है। यहाँ जीव व प्रकृति रूपी मूल उपादान कारण के अस्तित्व का भी निषेध नहीं है। ब्रह्मसूत्र ग्रन्थ के विषय में यह बहुत बड़ी भ्रान्ति हो गयी है, हो रही है। हमने 'वर्ल्ड कांग्रेस ऑन वैदिक सायंसेज' बैंगलोर में अगस्त २००४ में अनेक वैदिक विद्वानों तथा वर्तमान भौतिक शास्त्रियों को ब्रह्मसूत्र की मिथ्या व्याख्या करते देखा है। अद्वैतवाद की शास्त्रीय समीक्षा हेतु पाठकों को महर्षि दयानन्द सरस्वती रचित ‘सत्यार्थ प्रकाश’ नामक क्रान्तिकारी ग्रन्थ अवश्य पढ़ना चाहिये। हम यहाँ उसका पिष्टपेषण करना आवश्यक नहीं समझते, बल्कि हम यहाँ वर्तमान विज्ञान का आश्रय लेकर अद्वैतवाद की पुष्टि के प्रयास की समीक्षा अवश्य करेंगे। इस पक्ष के विद्वान सर्वप्रथम आधुनिक विज्ञान के पदार्थ द्रव्य व ऊर्जा के पारस्परिक रूपान्तरण की चर्चा करते हुए अन्त में इन दोनों को चेतन ऊर्जा में परिवर्तनीय व उससे उत्पन्न सिद्ध करते हैं। सामान्यतः यह विचार वैज्ञानिक सत्य ही प्रतीत होता है परन्तु इस पर विशेष चिंतन करने पर इसकी असारता स्पष्ट हो जाती है। सर्वप्रथम इस बात का विचार करें कि परिवर्तनीय तत्व कौन-२ हो सकते हैं? स्पष्टतः जो पदार्थ विकारी होते हैं, वे ही विकार को प्राप्त होकर रूपांतरित होने में सक्षम होते हैं। अब प्रश्न उठता है कि विकारी पदार्थ क्या व कैसा होता है? हमारी दृष्टि में विकारी पदार्थ जड़ ही हो सकता है। यदि एक-२ सूक्ष्म कण वा क्वाण्टा को जड़ के स्थान पर चेतन मानें, तब प्रश्न यह उठेगा कि क्या प्रत्येक कण वा क्वाण्टा की चेतना पृथक्-२ है वा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की चेतना एक ही है? यदि प्रत्येक कण की चेतना पृथक्-२ है, तब ब्रह्माण्ड भर के सम्पूर्ण पदार्थ को कैसे एक प्रकार के नियमों में बंधा देखा जाता है? जिस प्रकार प्रत्येक प्राणी की ऐच्छिक क्रियाएं, विचार, संस्कार पृथक्-२ होते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक कण व क्वाण्टा को यदि चेतन मानें, तो उनकी क्रियाएं परस्पर समान ही हों, यह आवश्यक नहीं है। वे परस्पर संगत रहें वा नहीं, यह भी आवश्यक नहीं है। प्रत्येक कण की पृथक्-२ चेतन सत्ता होने पर भी वे परस्पर मिलकर इस सृष्टि की रचना हेतु परस्पर अपने नाना समूह बना सकें और सम्पूर्ण सृष्टि के असंख्य नियमों को बना सकें, यह सर्वथा असम्भव है? ऐसा कार्य कोई प्राणी नहीं कर सकता। सर्वाधिक बुद्धिमान माना जाने वाला प्राणी मनुष्य अपने समाज का निर्माण करता है परन्तु उन समाजों की संरचना ऐसी जटिल नहीं होती, जैसी कि विभिन्न जड़ पदार्थों में उन पदार्थों के अवयवभूत सूक्ष्मकण वा क्वाण्टाज निर्मित करते हैं। विभिन्न प्राणी अपनी सामाजिक संरचनाओं को समय-२ पर अपनी-२ रुचि व स्वभाव-संस्कार के अनुसार बदलते रहते हैं परन्तु विभिन्न कणों वा क्वाण्टाज के नियम कभी परिवर्तित नहीं होते।
नोटः  हमारी दृष्टि में आद्य संकराचार्य महाराज अद्वैतवादी नहीं थे। उन्हें समझने में उनके अनुयायियों ने कुछ भूल की है।

क्रमशः...

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक (वैदिक वैज्ञानिक)
( "वेदविज्ञान-अलोक:" से उद्धृत)

Thursday, July 12, 2018

ईश्वर के अस्तित्व की वैज्ञानिकता - 14



                                                  ईश्वर के कार्य कर​​ने की प्रणाली
ईश्वरीय सत्ता के अस्तित्व व स्वरूप की वैज्ञानिकता की चर्चा के उपरान्त हम इस बात पर विचार करते हैं कि ईश्वर इस सृष्टि की रचना, संचालन, धारण व प्रलय आदि प्रक्रियाओं में अपनी क्या व कैसी भूमिका निभाता है अर्थात् उसकी कार्यप्रणाली- क्रियाविज्ञान क्या है? संसार भर के ईश्वरवादी नाना प्रकार से ईश्वर की चर्चा तो करते हैं परन्तु इस बात पर विचार भी नहीं करते कि वह ईश्वर अपने कार्यों को सम्पन्न कैसे करता है? हम यह जानते हैं कि इस सृष्टि में जो भी क्रियाएं हो रही हैं, उनके पीछे चेतन तत्व ईश्वर की भूमिका है। वहीं प्राणियों के शरीरों में जीवात्मा रूपी चेतन तत्व की भी भूमिका होती है। हम यहाँ ईश्वर तत्च की भूमिका की चर्चा करते हैं। क्या ईश्वर छोटे-२ कण, क्वाण्टा आदि से लेकर बड़े-२ लोक लोकान्तों के घूर्णन व परिक्रमण, उनके धारण, आकर्षण, प्रतिकर्षण बलों का प्रत्यक्ष कारण है? नहीं, ईश्वर सूर्यादि लोकों व इलेक्ट्रॉन्स आदि कणों को पकड़कर नहीं घुमाता वा चलाता है, बल्कि ये सभी पदार्थ उन्हीं विभिन्न बलों, जिन्हें वर्तमान विज्ञान जानता वा जानने का यत्न कर रहा है, के द्वारा अपने-२ कार्य कर रहे हैं। हाँ, इन बलों की उत्पत्ति जिन प्राण व छन्दादि पदार्थों से हुई है, उन्हें वर्तमान विज्ञान किंचिदपि नहीं जानता। इसी कारण वर्तमान विज्ञान द्वारा माने जाने वाले मूलबलों की उत्पत्ति एवं क्रियाविधि की समुचित व्याख्या करने में यह विज्ञान अक्षम है। इन मूल बलों की उत्पत्ति एवं नियन्त्रण इन्हीं विविध प्रकार की प्राण व छन्दादि रश्मियों के द्वारा होती है। बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती, ये प्राण व छन्दादि रश्मियां भी मन एवं सूक्ष्म वाक् तत्व के मिथुन से उत्पन्न व नियन्त्रित होती हैं। इस कारण मन एवं सूक्ष्म वाक् तत्व के स्वरूप व व्यवहार को समझे बिना प्राण व छन्दादि रश्मियों एवं उनसे उत्पन्न विभिन्न कथित मूल बलों (गुरुत्व, विद्युत चुम्बकीय, नाभिकीय बल एवं दुर्बल बल) के स्वरूप व क्रियाविज्ञान का यथावत् बोध नहीं हो सकेगा।
             ध्यातव्य है कि मन व वाक् तत्व भी जड़ होने के कारण स्वतः किसी कार्य में प्रवृत्त होने का सामर्थ्य नहीं रखते। इन्हें प्रवृत्त करने वाला सबका मूल तत्व चेतन ईश्वर है। वही इन मन एवं सूक्ष्म वाक् तत्व को प्रेरित करता है। इनके मध्य एक काल तत्व भी होता है परन्तु वह भी जड़ होने से ईश्वर तत्व से प्रेरित होकर कार्य करता है। इस प्रकार कार्य करने किंवा प्रेरक एवं प्रेरित पदार्थ, नियामक व नियम्य तत्वों की श्रृंखला इस प्रकार है-
           चेतन ईश्वर तत्व काल को प्रेरित करता है। काल तत्व मन- वाक् को प्रेरित करता, पुनः मन एवं वाक् तत्व प्राण व छन्दादि रश्मियों को प्रेरित करते हैं। तदुपरान्त वे प्राण व छन्दादि रश्मियां आधुनिक कथित चार प्रकार के मूल बलों को उत्पन्न व प्रेरित करती हैं, उसके पश्चात् वे चारों बल (वस्तुतः बलों की संख्या बहुत अधिक है, जो सभी प्राणादि रश्मियों के कारण ही उत्पन्न होते हैं) समस्त सृष्टि को उत्पन्न व संचालित करने में सहायक होते हैं।
            इस प्रकार ईश्वर तत्व प्रत्येक क्रिया के समय केवल काल वा ओम् छन्द रश्मियों को ही प्रेरित करता है, वे अग्रिम प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हैं। ये इतने सूक्ष्म तत्व हैं कि मनुष्य कभी भी इन्हें किसी प्रयोग प्रेक्षण के द्वारा नहीं जान सकता। केवल उच्च कोटि का योगी ही इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को जान व समझ सकता है। इस ग्रन्थ में महायोगी महर्षि ऐतरेय महीदास ने इसी सम्पूर्ण प्रक्रिया को अपने महान् योग बल के द्वारा समझ कर इस महान् रहस्यपूर्ण ग्रन्थ में वर्णित किया है। परमेश्वर की असीम दया से हमने इस ग्रन्थ को समझने में सफलता पाई है। इसमें स्थान-२ पर ईश्वर तत्व की भूमिका का वर्णन किंवा उसके क्रियाविज्ञान का सांकेतिक वर्णन है, जिसे पाठक ग्रन्थ का अध्ययन करके ही जान सकेंगे। सारांशतः ईश्वर काल, ओम् रश्मि व प्रकृति को प्रेरित करके सृष्टि प्रक्रिया को प्रारम्भ व सम्पादित करता है। वह किसी क्रिया में जीवात्मा की भांति ऐसा भागीदार नहीं होता कि उसे अपने कर्मों का फल भोगना पड़े। वह सर्वथा अकाम है। केवल जीवों के लिए सब कुछ करता है, इस कारण वह कर्ता भी है और अकर्ता भी। वह सृष्टि का निमित्त कारण है। ईश्वर कैसे प्रेरित करता है? उस प्रेरणा वा जागरण का क्रियाविज्ञान क्या है? यह बात हमने आगे कालतत्व प्रकरण में संक्षिप्त रूप से समझायेंगे है, पाठक वहीं देख सकते हैं।

क्रमशः...

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक (वैदिक वैज्ञानिक)
( "वेदविज्ञान-अलोक:" से उद्धृत)

Friday, July 6, 2018

वैदिक विज्ञान की ओर — 20


विभिन्न सम्प्रदायों के अनुयायियों से आत्मनिरीक्षण का निवेदन करने के पश्चात् मैं उन महानुभावों, जो सभी सम्प्रदायों को एक सत्य का प्रतिपादक मानकर सर्वमतसमभाव की वकालत करते हैं, से भी विनम्र निवेदन करना चाहता हूँ-
1. क्या वे यह मानते हैं कि ईश्वर, जीवात्मा व कर्मफल व्यवस्था जैसे विषय केवल आस्थाओं पर निर्भर हैं? तब क्या इन पर आस्था न रखने से इनका अस्तित्व समाप्त हो जायेगा?

2. यदि इनका अस्तित्व हमारी आस्था पर ही आश्रित है, तब क्यों आस्था रखी जाए? न आस्था रहेगी और न मजहबी आडम्बरों में हमारा समय नष्ट होगा। इसके साथ ही मजहबों के नाम पर मानव-मानव के बीच दीवार भी खड़ी नहीं होगी।

3. क्या आपने सभी सम्प्रदायों के दर्शनों को गहराई से पढ़ा है? यदि नहीं, तो आप यह कैसे निर्णय कर लेते हैं, कि सभी सम्प्रदाय सत्य के प्रतिपादक हैं?

4. क्या भौतिक पदार्थों के विषय में ऐसा कोई कह सकता है कि इन पदार्थों का विज्ञान अनेक प्रकार का भी हो सकता है और वे सभी मत सत्य होंगे। क्या सूर्य, तारे, पृथ्वी, गैलेक्सी, फोटोन, कण, तरंग, जल आदि के पृथक्-2 विरोधी विज्ञान हो सकते हैं? तथा आप उन सभी विरोधियों को सर्वमत समभाव का उपदेश कर सकते हैं?
यदि ऐसा नहीं है, तब आध्यात्मिक विज्ञान के क्षेत्र में ऐसी मिथ्या बातें क्यों की जाती हैं? क्यों सभी मतों का निष्पक्ष अध्ययन करके एक सत्य मत के ग्रहण का प्रयास नहीं किया जाता?

क्रमशः ………
आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर — 19



इस भय के पीछे नाना पन्थ, विचारधाराएं एवं नाना अन्य प्रकार के भेदभाव भी विशेष रूप से उत्तरदायी हैं। मैं नाना साम्प्रदायिक भेदभाव के पक्षधर महानुभावों से जानना चाहूँगा-

1. क्या आपने कभी सोचा है कि आप जिस सम्प्रदाय पर आस्था रखते हैं, क्या वह पूर्ण वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है? यहाँ वैज्ञानिक सत्य का तात्पर्य वर्तमान विज्ञान का अन्धानुगमन कदापि न समझा जाए।

2 क्या आपने अपनी मान्यताओं, भले ही वे कितनी ही पुरानी हों, पर कभी षान्त हृदय व प्रखर मस्तिष्क से तार्किक चिन्तन किया है?

3 क्या आपने कभी विचारा है कि आपके सम्प्रदाय के प्रवर्त्तक, पूर्वज किस सम्प्रदाय के मानने वाले थे और फिर सर्वप्रथम इस धरती पर कौन सी धार्मिक विचारधारा व धर्मग्रन्थ विद्यमान था?

4 क्या आप जिस ग्रन्थ को ईश्वरीय ग्रन्थ (धर्मग्रन्थ) मानते हैं, क्या उसमें सम्पूर्ण ईश्वरीय ज्ञान विद्यमान है? क्या उसमें सम्पूर्ण सृष्टि का विज्ञान तथा सार्वभौमिक व शाश्वत लोक व्यवहार का ज्ञान विद्यमान है?

5 क्या आपने कभी मनन किया है कि जिन ग्रन्थों में किसी व्यक्ति वा देश का इतिहास हो, किसी देश के भूगोल का इतिहास हो, वह ग्रन्थ कैसे ईश्वरीय हो सकता है?

6 क्या ईश्वरीय ग्रन्थ व ईश्वरप्रसूत धर्म की उत्पत्ति मानव सृष्टि के साथ ही नहीं होनी चाहिए। यदि कोई ग्रन्थ, जो अब से कुछ हजार वर्ष पूर्व ही लिखा गया हो, उसे ईश्वरीय ग्रन्थ मान लिया जाए, तब क्या उस ग्रन्थ की उत्पत्ति से पूर्व करोड़ों वर्षों तक चली आ रही मानव पीढ़ियों के साथ ईश्वर का अन्याय नहीं होगा? तब क्या कोई ईश्वरवादी ईश्वर को अन्यायी कहना चाहेगा?

7 क्या ईश्वरीय ज्ञान सम्पूर्ण मानव जाति के हित की ही बात नहीं करेगा? यदि ऐसा नहीं होवे, तब वह ग्रन्थ ईश्वरीय भी नहीं कहा जा सकेगा।

8 यदि यह माना जाये कि ईश्वर समय-2 पर देश, काल, परिस्थिति के अनुकूल ज्ञान देने हेतु नये-2 अवतार, पैगम्बर आदि को भेजता है, तब क्या आप यह मानते हैं कि ईश्वर के पूर्व ज्ञान में कोई कमी रह गयी थी, अथवा वह कुछ भूल गया था, जो उसे बताने के लिए दूसरा ज्ञान दिया। यदि ऐसा हुआ, तो किसी अल्पज्ञ को ईश्वर क्यों माना जाए? जो भूल करता है, वह इतनी विशाल सृष्टि का निर्माण, संचालन आदि कैसे कर सकता है?

9. जब सृष्टि का कोई भी पदार्थ हमारी आस्थाओं पर निर्भर नहीं है तब उन पदार्थों का निर्माता ईश्वर कैसे हमारी आस्थाओं पर निर्भर हो सकता है? इसी प्रकार सृष्टि के हर पदार्थ का अपना वैज्ञानिक स्वरूप एवं क्रियाविज्ञान है, तब ईश्वर का अपना वैज्ञानिक स्वरूप एवं क्रियाविज्ञान क्यों नहीं होगा?

आइये! मेरे संसार भर के मित्रो! आप इन प्रश्नों पर निष्पक्षता से एक बार अवश्य विचारें। मेरा विश्वास है कि आपका आत्मा अवश्य सत्य का समर्थन करने में समर्थ होगा।

क्रमशः …….

आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर-18


सत्य सरलता का एवं असत्य कुटिलता का मार्ग है अर्थात् सत्य सीधा, साफ, खुला रोड है तथा असत्य टेढ़ा-मेढ़ा, भीड़-भाड़ वाला मार्ग है। दुर्भाग्य है कि मनुष्य सरल मार्ग को त्याग कर टेढ़े-मेढ़े दुःख भरे मार्ग पर जाना पसन्द कर रहा है। यह बात विशेष विचार की है कि पशु, पक्षी एवं अबोध बालक प्रायः सत्य का ही अनुसरण करते हैं जबकि स्वयं को बुद्धिमान् मानने वाला मनुष्य सदैव छल, कपट वाले मिथ्या मार्ग पर चलने में गौरव समझता है। जब बालक जन्म लेता है, उस समय वह हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, पारसी, बौद्ध, जैन, सिख, कम्यूनिस्ट आदि किसी भी संकीर्णता से मुक्त होता है। उस समय वह नाना कथित जातियों के भेदभाव से भी दूर एक निर्दोष मनुष्य होता है। उसमें मिथ्या छल-कपट, बनावटीपन आदि कुछ भी विकार नहीं होते, परन्तु ज्यों ही वह बड़ा होने लगता है, उसमें माता, पिता व अन्य परिवारीजन एवं समाज, जो सभी स्वयं को सभ्य व बुद्धिमान् मानते हैं, उस बच्चे के अन्दर ईर्ष्या, द्वेष, छल-कपट, हिंसा, वैर, ऊँच-नीच का भाव, साम्प्रदायिक कट्टरता का ऐसा विष भर देते हैं कि वही पवित्र बालक इस समाज में अशान्ति व भय पैदा करने वाला बन जाता है, वह घृणा-फूट का बीज बोने वाला भयंकर मनुष्य बन जाता है। 

      मेरे मित्रो! जरा विचारें कि क्या परमात्मा द्वारा प्रदत्त बुद्धि का यही उपयोग है? इससे तो पशु, पक्षी ही अच्छे हैं, जो इन पापों से मुक्त रहते हैं। मांसाहारी पशु भी केवल भूख मिटाने के लिए शिकार करते हैं। वे घृणा, भेदभाव, छल-कपट आदि के वशीभूत होकर किसी की हिंसा नहीं करते हैं। 

     मेरे मत में इस सम्पूर्ण नासमझी का एक ही कारण है कि उन्हें यह ज्ञान नहीं है कि सम्पूर्ण सृष्टि एक ही समान पदार्थ से तथा एक ही क्रियाविज्ञान द्वारा बनी है। हमारे ये सारे भोग्य पदार्थ अनित्य हैं और हम जीवात्मा नित्य हैं। यदि ऐसा सभी विचारें, तो यह मानव परस्पर शत्रु नहीं हो सकते। आज मनुष्य यदि किसी से भयभीत व दुःखी हैं, तो वह केवल मनुष्य से ही है। यह इस अभागे संसार की विडम्बना है।

क्रमशः …….

आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर — 17


जहाँ तक मेरा मत है, असत्य को संसार का कोई भी सम्प्रदाय उचित नहीं मानता, परन्तु उस सम्प्रदाय के अनुयायी अपने सम्प्रदाय के प्रचार हेतु नाना मिथ्या कल्पनाओं व परम्परा का निर्वहन करते हैं। वे अपने सम्प्रदाय की मिथ्या धारणाओं तथा अन्य मत की सत्य-धारणाओं को स्वीकार करने के लिए कभी तैयार नहीं होते। इन सम्प्रदायों के प्रचारक व आचार्य नाना मिथ्या आडम्बरों को अपने सम्प्रदाय का अनिवार्य अंग मान लेते हैं, जिसके प्रति वे अत्यन्त संवेदनशील हो उठते हैं। वे अपने मजहबी ग्रन्थ के एक पन्ने को यदि कहीं भूमि पर पड़ा देख भी लें, तो संसार में आग लगाने को तैयार हो जाते हैं। कहीं रंगों का विवाद, कहीं ध्वज का विवाद आदि अनेकों संवेदनशील कारण इस संसार में अशान्ति व आतंक फैलाने व खूनी ताण्डव के कारण बन रहे हैं। 

       आज कट्टरपंथी मुस्लिमों का वश चले, तो वे उगते सूर्य व अग्नि को भी हरे रंग में रंग दें और इसी प्रकार यदि किसी अति कट्टरपंथी हिन्दू का सामर्थ्य हो, तो पृथ्वी की सम्पूर्ण वनस्पति को भगवे रंग में रंग दे। असहिष्णुता तेजी से बढ़ रही है। एक दूसरे की परम्पराओं को नीचा दिखाने का प्रयास हो रहा है। इसको ही धार्मिक दृढ़ता कहा जा रहा है। ये महानुभाव अपने-2 इष्ट की पूजा के लिए नानाविध कष्ट उठाते हैं। कोई सैकड़ों किमी पैदल, तो कोई लेट-लेटकर पदयात्रा करते हैं, कोई रमजान के महीने में भूख-प्यास को सहते हैं, कोई नवरात्राओं में भूख को सहन करते हैं, कोई अपनी पीठ पर बम बांधकर अपनी व दूसरों की मृत्यु के आह्वान को तैयार रहते हैं। अहो! कैसा त्याग, समर्पण व निर्भीकता होती है, इनके जीवन में। निश्चित ही ऐसे कट्टरपंथियों की दृढ़ता व अपने मत के प्रति आस्था श्लाघनीय है, इसके लिए उनका त्याग प्रशंसनीय है।

      मेरे मित्रो! इतना सब होते हुए भी जरा इस बिन्दु पर विचार करें कि इस समर्पण व त्याग से संसार में कौन किसका कल्याण कर रहा है? स्वयं भी दुःखी होना व दूसरों को भी दुःख देना भला कैसा धर्म है? यह आस्था किस काम की? काश! इतनी आस्था अथवा त्याग, तप सत्य के लिए हो जाते, तो सम्पूर्ण मानव जाति सत्य के सूत्र में बंधकर एकत्व का मिलकर आनन्द भोगती। तब जाति, सम्प्रदाय, भाषा व क्षेत्रों के विवाद नहीं होते। परन्तु ऐसा नहीं हो रहा है। सत्य, ईमानदारी, न्याय पर ओजस्वी भाषण देने वाले स्वयं मिथ्या, पक्षपात व बेईमानी का बीज बो रहे हैं। स्मरण रहे कि सत्य कभी किसी को लड़ाता नहीं, जबकि मिथ्या केवल लड़ाने का ही कार्य करता है।
क्रमशः …….
आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Thursday, July 5, 2018

वैदिक विज्ञान की ओर — 16


आज संसार भर में समुदायों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है, उधर उसी अनुपात में मानव-2 के बीच साम्प्रदायिक कटुता व संघर्ष भी बढ़ता जा रहा है। जो व्यक्ति वा व्यक्तियों का समूह अपने समुदाय में जितनी अधिक आस्था रखता है, वह अन्य सम्प्रदायों के व्यक्तियों अथवा व्यक्तियों के समूूहों से उतनी ही अधिक घृणा वा शत्रुता का व्यवहार करता है। यह आस्था कभी-2 राष्ट्र की कानून व्यवस्था को चुनौती देने लगती है। वह अपने सम्प्रदाय के कथित गुरु के व्यभिचार, हत्या, आतंक, लूट, ठगी आदि किसी भी पाप को पाप मानने के लिए तैयार नहीं होता। वह अपने कथित गुरु के लिए मरने-मारने के लिए तैयार हो जाता है। वह हजारों मनुष्यों की हत्या कर सकता है परन्तु यह विचार करने को तैयार नहीं होता कि उसके सम्प्रदाय की मान्यताएं कितनी सत्य व कितनी मिथ्या है। वह सम्प्रदाय के नाम पर मूक पशुओं की हत्या करता है, उस मांस को प्रसाद समझकर खाता है। सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, ईमानदारी, परस्पर मैत्रीभाव, करुणा, त्याग जैसे मानवीय मूल्यों की बलि चढ़ाकर वह अपने मजहबी उन्माद मेें मस्त रहता है। 

       मेरे विश्वभर के मित्रो! जरा विचारें कि यदि ये गुण हमारे अन्दर नहीं हों, तब धर्म कहाँ से रहेगा? ऐसे धर्म को धिक्कार है, जो इन मानवीय मूल्यों की हत्या करे, जो विश्व में अशान्ति, हिंसा व वैर की आग लगावे। शोक है कि ऐसे दुष्ट कर्म करने वाले सभी यही सोचते हैं कि वे अपने अपने ईश्वर की आज्ञा का पालन कर रहे हैं, अपने ईश्वरीय ग्रन्थ के मार्ग पर चल रहे हैं, इससे उन्हें स्वर्ग मिलेगा आदि। आज संसार में इसी भ्रान्ति के कारण सम्पूर्ण विश्व बारुद के ढेर पर बैठा है।

क्रमशः …….

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर — 15



उधर विश्व भर के सम्प्रदायों के विद्वानों, पण्डित, पादरी, मौलवी अथवा अन्य साधुओं पर दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होता है कि विश्व में सर्वाधिक खून मजहब के नाम पर ही बहाया गया है। इस रक्तरंजित इतिहास की चर्चा करना यहाँ आवश्यक नहीं है। संसार के प्रबुद्धजन स्वयं इस विषय में निष्पक्ष चिन्तन करके देखें। इन धर्माचार्यों ने कभी यह विचारने का प्रयास नहीं किया कि जिस ईश्वर, खुदा या गॉड से वह अपने विरोधियों के विनाश की प्रार्थना करते हैं अथवा उन्हें नष्ट करने की शक्ति मांगते हैं, वे मनुष्य भी तो उसी ईश्वर, खुदा वा गॉड की ही सन्तान हैं। दोनों विरोधी पक्ष अपने-2 ईश्वर वा खुदा से एक-दूसरे के नाश की प्रार्थना करते हैं, तब वह ईश्वर अथवा खुदा किसकी सुनेगा? इसका कारण यही है कि वे नहीं जानते कि जिसे वह ईश्वर कहते हैं, वह क्या वास्तव में ईश्वर है? वे सृष्टि रचना के विषय में वैज्ञानिक दृष्टि से कुछ भी नहीं विचारते। 

         जब तक वे इस विषय में नहीं विचारेंगेे, तब तक वे यह जान ही नहीं पाएंगे कि ईश्वर अथवा खुदा कैसा है, कहाँ रहता है एवं क्या करता है? यदि वह सृष्टि रचयिता है, तो वह अपना यह कार्य कैसे करता है, उसका क्रिया विज्ञान क्या है? इसका तात्पर्य यह हुआ कि वे ईश्वर वा खुदा आदि को मानते तो हैं, पूजते भी हैं परन्तु उसके यथार्थ स्वरूप से नितान्त अनभिज्ञ हैं ऐसी स्थिति में उनकी पूजा, इबादत अथवा प्रार्थना सब कुछ भ्रान्त ही होगी। यही कारण है कि चोर, डाकू, लुटेरे, आतंकवादी सभी अपने-2 मिशन की सफलता के लिए अपने-2 ढंग से पूजा करते हैं और अपने ईश्वर से अपने दुष्ट मिशन को पूरा करने की प्रार्थना करते हैं। 
मेरे मित्रो! जरा विचारें कि ईश्वर के विषय में वैज्ञानिक सोच के अभाव में सम्पूर्ण मानव समाज मिथ्या आस्थाओं में फंसा कैसे-2 पाप कर रहा है? कैसे-2 संसार में दुःख, अशान्ति व आतंक का कारण बन रहा है।

क्रमशः ……..

आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर — 14



यही कारण है कि वैज्ञानिक एवं धर्माचार्य कहाने वाले परस्पर इतने दूर हैं कि उनका परस्पर कोई संवाद भी कभी नहीं होता। जन साधारण दोनों ओर दोलायमान होता हुआ संशय में पड़ा है। सर अल्बर्ट आइंस्टीन, रिचर्ड पी. फाइनमैन अथवा सर आइजक न्यूटन आदि अनेक शीर्ष वैज्ञानिक ईश्वर की सत्ता में विश्वास करते थे परन्तु वह ईश्वर कैसा है, इसके लिए वे कथित धर्माचार्यों (पादरियों) पर ही आश्रित थे। उन्होंने कभी यह नहीं विचारा कि जिसे धर्माचार्य ईश्वर कह रहे हैं तथा उसके द्वारा सृष्टि-रचना की जो प्रक्रिया उनके कथित धर्मग्रन्थों में वर्णित है, उसकी भौतिक विज्ञान से कहीं कुछ समानता है अथवा नहीं? यदि वे वैज्ञानिक ईश्वरवादियों द्वारा प्रचलित मान्यताओं पर कुछ भी प्रश्न खड़े करते, तो वे ईश्वरवादी भी कुछ सोचने को विवश होते। परन्तु ऐसा करने का साहस कभी किसी वैज्ञानिक ने नहीं किया।

       अभी हाल में ब्रिटिश वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने अवश्य अपनी पुस्तक “The Grand Design” में ऐसे मनगढ़न्त ईश्वरों का अच्छा खण्डन किया है। हाँ, इतना अवश्य है कि वे सिरदर्द दूर करने के लिए सिर को ही काटने की वकालत कर बैठे। उन्होंने मनगढ़न्त ईश्वर का खण्डन करते-2 वास्तविक ईश्वर को ही नकार दिया। मैं समझता हूँ कि उनकी भूल का कारण यह हैै कि उन्होंने सच्चे ईश्वर के बारे में कभी कुछ सुना ही नहीं। ऐसे अनीश्वरवादी वैज्ञानिक केवल अपने सामर्थ्य से प्राप्त प्रक्षेपण, प्रयोग व गणितीय व्याख्याओं को समझने का दावा करते हैं। इस अहंकार में सृष्टि रचयिता की भूमिका को नकार देते हैं तथा अनेकों परस्पर विरोधी मिथ्या निष्कर्षों को अपनी-2 थ्योरीज् कहकर प्रचारित करते रहते हैं। इस प्रकार ईश्वरवादी एवं अनीश्वरवादी दोनों ही प्रकार के वैज्ञानिक अर्धसत्य को ही संसार के समक्ष प्रस्तुत करके दुःखों के सागर में डुबोते रहते हैं।

क्रमशः ……..

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर — 13


वर्तमान में जो वैज्ञानिक ईश्वर की सत्ता को मानते हैं, वे वैज्ञानिक अनुसंधान करते समय तो अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा का प्रयोग करते हैं परन्तु ईश्वर के विषय में वे कुछ भी नहीं विचारते। वे सोचते हैं कि यह कार्य धार्मिक विद्वानों का है। ऐसा मानकर बड़े-2 वैज्ञानिक नाना अंधविश्वासों व रूढ़ियों के जाल में फंसे देखे जाते हैं। शायद वे सोचते हैं कि ईश्वर व जीवात्मा जैसे विषय विज्ञान का विषय नहीं है, क्योंकि इन पर कोई प्रयोग, प्रेक्षण व गणित कार्य नहीं करेगा। उधर, जो धार्मिक माने जाने वाले विद्वान् वर्तमान विज्ञान पढ़ते हैं, तब वे भी कॉलेज व विश्वविद्यालयों में तो वैज्ञानिक बुद्धि का उपयोग करते है, नाना प्रकार से तर्क व संवाद करते हैं परन्तु जब वे अपने सम्प्रदाय की चर्चा करते हैं अथवा पूजा-इबादत-प्रार्थना कर रहे होते हैं, उस समय वे अपनी बुद्धि का कुछ भी उपयोग नहीं लेते, क्योंकि वे मानते हैं कि धर्म विषय में वैज्ञानिक बुद्धि, तर्क व ऊहा की कोई आवश्यकता नहीं है। 
      धर्म केवल आस्था व विश्वास का ही विषय है, जो पृथक्-2 व्यक्तियों वा व्यक्तियों के समूहों के लिए पृथक्-2 हो सकता है। वे बाजार में सामान खरीदते समय दुकानदार से पर्याप्त तर्क-वितर्क करते हैं, शाक-सब्जी खरीदने में भी सतर्क रहते हैं कि कहीं कोई खराब सब्जी न आ जाए, परन्तु जीवन की सबसे महत्वपूर्ण वस्तु ‘धर्म’ के विषय में बुद्धि को सर्वथा बन्द करके अपने-2 कथित धर्मग्रन्थ, मौलवी, पादरी, पण्डित, साधु अथवा कोई भी धर्मगुरु की मिथ्या बातों को तुरन्त ही मान लेते हैं। वे उन मिथ्या बातों के प्रति ऐसे कट्टर हो जाते हैं कि उसके विपरीत एक शब्द भी सुनने को तैयार नहीं होते, बल्कि इसके लिये खून बहाने के लिए भी तैयार रहते हैं। वे अपने-2 कथित धर्मग्रन्थों, साम्प्रदायिक नियमों व धर्मगुरुओं पर कभी शंका ही नहीं करते बल्कि वे शंका करने, उन पर तर्क-वितर्क करने को पाप मानते हैं। यह दुर्दशा सभी सम्प्रदायों में देखी जाती है।

क्रमशः ……..

आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर — 12


आज संसार इसी भंवरजाल में फंसा आर्तनाद कर रहा है। हम वैज्ञानिकों एवं उनकी भ्रान्ति की चर्चा के उपरान्त विभिन्न सम्प्रदायों एवं उनकी दार्शनिक मान्यताओं पर भी कुछ चर्चा करते हैं। हम यह बात स्पष्टता से जानते हैं कि हर सम्प्रदाय एवं उनका आधार ग्रन्थ, जो ईश्वर की सत्ता में विश्वास करता है, ईश्वर को सृष्टि का रचयिता व संचालक मानता है। कोई सम्प्रदाय यह नहीं मानता कि उसका ईश्वर, जिसे वह खुदा, गॉड अथवा कुछ भी क्यों न कहता हो, उसी सम्प्रदाय के मनुष्यों को पैदा करता व पालता है, बल्कि वह उसे संसार का पिता-माता मानता है। किन्तु संसार में जब वह व्यवहार करता है, तब स्वयं को अपने मजहब, धर्म वा कथित जाति की जंजीरों में बांध कर अन्य मनुष्यों को सृष्टि से कोई बाहरी जीव जैसा मानकर व्यवहार करता है। यह दुर्गति संसार के सभी समुदायों में देखी जा रही है। ईसाई एक बाइबिल के अनुयायी होकर भी कैथोलिक व प्रोटेस्टेन्ट के वर्गों में बंटे हैं। एक कुरान के मानने वाले मुसलमान भी शिया-सुन्नी आदि अनेक फिरकों में खण्ड-2 होकर आपस में खून बहा रहे हैं। इधर हिन्दुओं में तो कोई सीमा नहीं है। हजारों प्राचीन शरीरधारी भगवान्, हजारों सम्प्रदाय, हजारों वर्तमान नकली भगवान्, अविद्या व पाप के भण्डार असंख्य गुरु, हजारों कथित जातियां-उपजातियां, उन जातियों के पृथक्-2 भगवान्, न जाने कैसा-2 विघटन, यह हिन्दू समाज की दुर्दशा के लिए उत्तरदायी है। यहाँ तो ईंट, पत्थर, नदी, सर्प, वृक्ष भी भगवान् हैं। वस्तुतः वह इन सबको पूजता है परन्तु वास्तव में पूजनीय सृष्टि रचयिता, सर्वव्यापक, निराकार, वास्तविक परमात्मा की उपासना नहीं करता। 

           ऐसी दुःखद स्थिति में ब्रह्माण्ड की बात क्या करें, इस पृथ्वी और यहाँ तक कि भारत व हिन्दू की एकता भी कैसे सम्भव है? धर्म व ईश्वर को मात्र आस्थाओं का विषय मानकर अविद्या अंधकार में डूबा यह समाज व संसार पूज रहा है। यथार्थ तर्क व विज्ञान का कोई स्थान धर्म में नहीं रहा है। वस्तुतः ये सभी ईश्वरवादी ईश्वर को मानते हुए भी यह स्वप्न में भी नहीं जानते कि वह ईश्वर कैसा है? वह सृष्टि की रचना व उसका संचालन कैसे करता है? उसका क्रिया-विज्ञान क्या है? इस यथार्थ ज्ञान के अभाव में सभी मनुष्य अविद्या अंधकार में भटक रहे तथा परस्पर दुःखों के बीज बो रहे हैं। 

         इन सब भटकते हुए मानवों, चाहें वे वैज्ञानिक हों वा ईश्वरवादी साम्प्रदायिक महानुभाव अथवा वामपंथी वा अनीश्वरवादी समुदायों के अनुयायी, सभी को सत्य का यथार्थ मार्ग सुझायेगा हमारा वैदिक विज्ञान।

क्रमशः ……..


-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Tuesday, July 3, 2018

वैदिक विज्ञान की ओर — 11


              आज विज्ञान एक टैक्नोलॉजी का आविष्कार करता है, फिर कुछ वर्षों तक उससे होने वाले दुष्प्रभावों पर अनुसंधान करता है। इसके पश्चात् कोई निरापद प्रतीत होने वाली दूसरी टैक्नोलॉजी का आविष्कार करता है, फिर कुछ काल पश्चात् उसके हानिकारक परिणामों की खोज होती है, यही श्रंखला अनवरत चलती रहती है और अरबों-खरबों डॉलर व श्रम का अपव्यय करने के पश्चात् स्टीफन हॉकिंग जैसा वैज्ञानिक कहता है कि अब धरती को छोड़ कर किसी अन्य लोक, अन्य गैलेक्सी में जाने के साधन बनाओ। कोई भी वैज्ञानिक इस समस्या के मूल कारण पर कभी विचार भी नहीं करता। 

            जहाँ तक मैं समझता हूँ वर्तमान थ्योरिटीकल फिजिक्स अपूर्णता अथवा अनेकत्र पथभ्रष्टता के कारण यह सब हो रहा है, वहीं वैज्ञानिकों के द्वारा ईश्वर व जीवात्मा जैसी सत्ताओं को सर्वथा भुलाना संसार में जीने की पद्धति को दूषित करने का सबसे प्रधान कारण है। अल्प बुद्धि विज्ञान का छात्र वा आधुनिकता के नषे में डूबा कथित प्रबुद्ध, ईश्वर, जीवात्मा, सदाचार, संयम, त्याग, कर्मफल व्यवस्था जैसी मान्यताओं का उपहास करता है। इन्हें पिछड़ेपन का चिह्न मानता है। टी.वी. चैनलों पर बैठा अथवा समाचार पत्रों में कलम चलाने वाला कथित आधुनिक व्यक्ति 21 वीं सदी के ज्वर से पीड़ित होकर न जाने क्या-2 कहता है? मैं ऐसी मिथ्या वैज्ञानिकता के अभिमानी महानुभावों से कहना चाहूँगा कि सबसे बड़ी अवैज्ञानिकता तो ईश्वर व जीवात्मा की सत्ता को नकारना है। हम थ्योरिटीकल फिजिक्स की गहराइयों में जितना अधिक जायेंगे, हमें ईश्वर की सत्ता उतनी ही स्पष्टता से अनुभूत होती जायेगी, परन्तु दुर्भाग्यवश वर्तमान वैज्ञानिकों ने स्वयं को स्वयं की सीमित सामर्थ्य पर आधारित टैक्नोलॉजी व गणित तथा विभिन्न मूल स्थिरांकों की सीमाओं में कैद कर रखा है। वे उनके बाहर बुद्धि ही नहीं लगाते, इसी कारण वे भौतिक विज्ञान की अधिकाधिक गहराइयों में प्रवेश नहीं कर पाते, तब ईश्वर व जीवात्मा के अस्तित्व व कर्मों का बोध कैसे होगा? ध्यान रहे कि ईश्वर व जीवात्मा को मानना ही पर्याप्त नहीं है अपितु इनके यथार्थ वैज्ञानिक स्वरूप को जानना नितान्त अनिवार्य है अन्यथा दूसरे भंवर में फंसना अवश्यम्भावी है।

क्रमशः …….

आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर — 10


               बढ़ती टैक्नोलॉजी न केवल सुख-सुविधाओं की अतृप्त इच्छा का परिणाम है, अपितु विज्ञान के व्यवसायीकरण का भी दुष्परिणाम है। व्यवसायी वृत्ति के लोगों ने जनमानस को सुख-सुविधाओं का ऐसा स्वप्न दिखाया है कि वह निरन्तर विलासी होकर नाना रोगों से ग्रस्त होती जा रही है और उन संसाधनों के निर्माण स्रोत उद्योगों के कारण पर्यावरण का भीषण संकट बढ़ता जा रहा है। आज विकास का पैमाना भी यह है कि जो जितनी ज्यादा ऊर्जा का खपत करता है, वह देश उतना ही अधिक विकसित माना जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि आज भोगी को विकसित तथा त्यागी को पिछड़ा माना जाता है। ऐसे में हमारे त्यागी तपस्वी महापुरुष किसके आदर्श रह पाएंगे? इन भोगों की भूख के कारण पारस्परिक भ्रातृत्व, प्रेम, करुणा, पारिवारिक व सामाजिक मूल्य नष्ट भ्रष्ट हो रहे हैं। जैसे भी बने, धन कमाकर सुविधा भोग के विकास को लक्ष्य बनाने वाला मानव मानवीय मूल्यों व सत्य धर्म के आदर्शों व कर्त्तव्यों से दूर चला गया है। फिर अपराधों को रोकने के नाना उपाय ढूंढने की मूर्खता की जा रही है। 
         आज यन्त्रों एवं रोबोट्स के बढ़ते वेग में मनुष्य बेरोजगार हो रहा है। धनी वर्ग इन यंत्रों के सहारे कम मूल्य पर अपना कारोबार चला सकता है परन्तु संसार के करोड़ों निर्धन श्रमिक, जो अपने भरणपोषण में भी समर्थ नहीं है, उनका रोजगार नष्ट हो जायेगा, तब उनका क्या होगा? यही कारण है कि गरीब, गरीबी की ओर एवं धनी समृद्धि की ओर बढ़ रहे हैं? वर्ग संघर्ष का यह एक बड़ा कारण है, कहीं-2 नक्सलवाद जैसे आतंकवाद का भी यह प्रमुख कारण है। चोरी, डकैती, लूटमार को इसी समस्या ने जन्म दिया है अथवा बढ़ाया है परन्तु विज्ञान के व्यवसायीकरण के उन्माद व कथित विकास की चकाचौंध में संसार के नीति निर्धारकों, जो स्वयं सर्वसुविधा सम्पन्न ऐश्वर्यशाली हैं, को दुःखियों की आवाज सुनाई नहीं देती।

क्रमशः ………

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर - 9


              वर्तमान विज्ञान के इन अन्तर्विरोधी परिणामों, सिद्धान्तों व मार्गों के कारण ही विश्वभर में नाना भयंकर दुष्परिणाम देखे जा रहे हैं। कहीं-2 आज का प्रबुद्ध मानव टैक्नोलॉजी को ही विज्ञान मानकर नाना प्रकार के सुविधा-साधनों की खोज को ही अपना लक्ष्य बनाए हुए है। मेरा मत है कि अन्तर्विरोधों से परिपूर्ण थ्योरिटीकल फिजिक्स के आधार पर विज्ञान की अन्य शाखाएं एवं टैक्नोलॉजी कभी भी पूर्ण सुखदायी नहीं हो सकतीं। जरा विचारें कि जिस कृषि वैज्ञानिक ने रासायनिक उर्वरकों का आविष्कार किया, उसने यह तो देखा कि इनके प्रयोग से कृषि उत्पादन बढ़ेगा परन्तु उसे आयुर्विज्ञान का कुछ भी ज्ञान नहीं था। इस कारण उसे यह लेशमात्र भी आशंका नहीं थी कि इस खाद से उत्पन्न फल, अनाज आदि मानव व पशुओं के शरीरों को रोगों का घर बना देंगे। उसे तो कृषि विज्ञान का भी पूरा ज्ञान नहीं था अन्यथा वह जान सकता कि उसके द्वारा आविष्कृत खाद भूमि को शनैः-2 बंजर बना देंगे। 
             आज हम सर्वत्र विष खा रहे हैं, जल में विष पी रहे हैं, वायु में विष ले रहे हैं। कोई एलोपैथी दवा ऐसी नहीं, जिसका कोई दुष्परिणाम न हो। आज जिस सूचना तकनीक एवं रोबोट तकनीक पर विश्व मोहित है, वह भी अपूर्ण विज्ञान का एवं सुविधाओं की भूख का पागलपन है। कोई इसको अनुभव करे या न करे परन्तु मैं संसार से कहना चाहता हूँ कि ये सभी तकनीकें विश्व को भयंकर विनाश की ओर ले जा रही हैं। दुर्भाग्यवश मैैं भी सूचना तकनीक से ही आपको अपने विचार देने के लिए विवश हूँ। दवाएं बढ़ने के साथ रोग, शारीरिक व मानसिक दुर्बलता में वृद्धि हुई, कृषि उत्पादन बढ़ने के साथ-2 उसकी गुणवत्ता में कमी आयी, मनोरंजन के साधनों ने चरित्र को नष्ट कर दिया। वर्तमान विज्ञान निरन्तर अपनी भूलों को खोज-2 कर बता भी रहा है परन्तु तब तक मानव उस विज्ञान तकनीक में ऐसा मदमस्त हो जाता है कि जीवन पर संकट को अनुभव करके भी उस साधन को त्यागने का साहस नहीं कर पाता।

क्रमशः ........


- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर - 8


               वर्तमान विज्ञान तकनीक की सुविधाओं एवं गणित की सीमाओं से परे कुछ नहीं विचारता। समय के साथ वह तकनीक व गणित का नूतन आविष्कार वा विस्तार करने का प्रयत्न कर रहा है। इस कारण उसके प्रेक्षण व परीक्षणों का सामर्थ्य भी बढ़ रहा है और इससे उसके निष्कर्ष भी निरन्तर परिवर्तित होते जा रहे हैं। मैं जब वैज्ञानिकों से इस पर चर्चा करता हूँ, तो वे इसे विज्ञान की शक्ति व dynamics कहते हैं। किसी का dynamic होना अर्थात् सत्य की ओर निरन्तर अग्रसर होना तो अच्छी बात है परन्तु भूल करने, सुधरने फिर भूल करने की श्रंखला पर गर्व करने जैसा कुछ विशेष नहीं हैै। इसका कारण यह है कि वर्तमान विज्ञान दार्शनिकों की तार्किकता व ऊहा पर व्यंग्य करता है। 
            वस्तुतः यथार्थ तर्क व ऊहा के अभाव में प्रयोग, प्रेक्षण व गणित भी यथार्थ निष्कर्ष देने में अनेक बार असफल ही होते हैं। यदि वैज्ञानिक मेरे कथन को स्वीकार न करें, तो मैं जानना चाहूँगा कि इन साधनों के रहते भी cosmology के विभिन्न मॉडल क्यों प्रचलित हैं? सभी पक्ष अपने-2 मॉडल को सत्य सिद्धान्त कहते हैं। क्या एक ही विषय में अनेक विरोधी तथ्य सत्य हो सकते हैं? यदि ऐसा मान लिया जाये, तब विज्ञान का कोई अर्थ नहीं रहेगा? पता नहीं क्यों संसारभर में यह स्वच्छन्दता विज्ञान के नाम पर भी चल रही हैै। मैं संसार के वैज्ञानिकों से निवेदन करना चाहूँगा कि वे मेरे इस मत पर भी विचार करें कि परस्पर विरोधी सिद्धान्त व निष्कर्षों में से कोई एक निष्कर्ष व सिद्धान्त ही वैज्ञानिक सत्य हो सकता है, सभी नहीं। जरा, विचारें कि वर्तमान विज्ञान कहीं मार्ग से कुछ भटक तो नहीं रहा? यदि हाँ, तो जानने का प्रयास करें कि वर्तमान अनुसंधान प्रणाली में क्या संशोधन होना चाहिए? मेरा वैदिक विज्ञान इस विषय में आपको पर्याप्त मार्गदर्शन दे सकता है। हाँ, मेरे इस लेख का तात्पर्य यह कदापि न समझा जाए कि मैं प्रेक्षण, प्रयोग व गणित की आवश्यकता को नकार रहा है, नहीं मेरा ऐसा यह कदापि नहीं है। मैं वैज्ञानिकों एवं उनके पुरुषार्थ व प्रयोग, प्रेक्षण व गणित आदि साधनों का पूर्ण समर्थक हूँ परन्तु इनके आवेश में यथार्थ तर्क, ऊहा वा विवेक को तिलांजलि नहीं देनी चाहिए, यही मेरा निवेदन है।

क्रमशः .........


- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर - 7


              वर्तमान वैज्ञानिक cosmology के अन्तर्गत गैलेक्सियों, तारों, ग्रहों, उपग्रहों आदि लोकों की चर्चा करते हैं। वे सृष्टि के प्रारम्भ तथा सृष्टि के मूल उपादान कारण पर विशेष चर्चा नहीं करते। Big Bang, Big Bounce आदि के समर्थक तत्काल विस्फोट कराकर लोकों के बनने की प्रक्रिया बताने लग जाते हैं। वे ब्रह्माण्ड के मूल कणों के बनने, उनकी संरचना आदि पर विशेष चिन्तन नहीं करते। इसके लिये वे Astrophysics, Particle physics, Quantum field theory, Atomic-Nuclear theory, String theory आदि अनेक शाखाओं को पृथक् से पढ़ने की बात करते हैं। 
            वस्तुतः इन सबके बिना cosmology का आधार ही क्या है? वे भवन की छत की बात तो करते हैं, जबकि नींव बनने की बात जल्दबाजी में बहुत संक्षिप्त कहकर आगे बढ़ जाते हैं। इन सभी विषयों के लिए कोई एक वैज्ञानिक विशेषज्ञ नहीं होता, तब cosmology विषय कैसे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के रहस्यों को समझा सकेगा? सब मिलकर बैठकर कभी इन विषयों पर चर्चा करते हैं वा नहीं, यह मैं नहीं जानता परन्तु जब तक एक व्यक्ति इन सभी विषयों की गहराई को नहीं समझेगा, तब तक वर्तमान भौतिक विज्ञान संसार को कोई निर्दोष physics नहीं दे सकता। इन सब विषयों के अध्ययन के समय ईश्वर की सत्ता की आवश्यकता पर कभी विचार नहीं करते और कोई ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करते भी हैं, वे यह नहीं विचारते कि वह ईश्वर कैसा है तथा वह सृष्टि की रचना व संचालन कैसे करता है? उसका क्रियाविज्ञान क्या है? इस कारण modern theory of universe नाम से कोई प्रामाणिक विज्ञान वर्तमान में है ही नहीं।

क्रमशः ..........

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर - 6


            आप यह सोच रहे होंगे कि वैदिक थ्योरी ऑफ यूनिवर्स की बात करते-2 मैं मत-पन्थों की चर्चा क्यों करने लगा? इस विषय में मैं संसार को अवगत कराना चाहता हूँ कि विश्व में कोई भी मत, पन्थ वा सम्प्रदाय ऐसा नहीं, जिसका अपना कोई दार्शनिक आधार न हो। और ऐसा कोई दर्शन नहीं, जहाँ सृष्टि तथा सृष्टि के रचयिता की चर्चा न हो। बौद्ध व जैन मत तथा अन्य नास्तिक मत अवश्य रचयिता की चर्चा नहीं करते परन्तु वे भी अपने ढंग से सृष्टि निर्माण व कर्मफल व्यवस्था की चर्चा अवश्य करते हैं। सभी सम्प्रदायों में दर्शायी सृष्टि प्रक्रिया में परस्पर अनेकों मतभेद हैं। मेरा मत है कि इन मतभेदों का होना ही मानव-2 के बीच खड़ी घृणा व वैमनस्य की दीवारों का सबसे प्रमुख व मूल कारण है। 
           उधर आधुनिक भौतिक विज्ञान अथवा कॉस्मोलॉजी, जो प्रयोग, प्रेक्षण व गणितीय व्याख्याओं का दम्भ भरता है, में भी वैज्ञानिकों की अनेकों परस्पर विरोधी थ्योरीज् खूब चल रही हैं। सर्वत्र कल्पनाओं का बाजार गर्म है। कोई भी इस बात पर विचार नहीं करता है कि जब सृष्टि एक है, तब उसके बनने की पृथक्-2 थ्योरीज् कैसे हो सकती हैं? फिर चाहे वे साम्प्रदायिक दर्शन हों अथवा आधुनिक विज्ञान। इतना अवश्य है कि वैज्ञानिक पृथक्-2 थ्योरी रहते हुए भी परस्पर खून नहीं बहाते हैं, एक-दूसरे की बात सुनते व कान्फ्रेंस करते हैं परन्तु समुदायों में बंटे विद्वान् परस्पर मार-काट मचाते वा ऊँच नीच, भेदभाव की दीवारें खड़ी करते हैं। इसी कारण मैं वैदिक थ्योरी ऑफ यूनीवर्स की भूमिका के रूप में इस पृथ्वी के मानव ही नहीं अपितु ब्रह्माण्ड के सभी बुद्धिमान् प्राणियों की एकता तथा अन्य सभी प्रकार के प्राणियों के कल्याण की बात करता हूँ, क्योंकि हम सभी इस सृष्टि रूपी मां तथा इसके रचयिता रूपी पिता की सन्तान हैं।
 
क्रमशः………..

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर - 5


            वर्तमान में सभी सम्प्रदायों, मत-पन्थों से जुड़े प्रबुद्धजन आधुनिक भौतिक विज्ञान को प्रमाण मानकर ही पढ़ रहे हैं। ऐसा करने में उनकी मजहबी वा अन्य किसी विचारधारा की दीवारें कोई बाधा नहीं बनतीं, परन्तु वे ही महानुभाव अपने-2 पूजा-इबादत स्थल पर जाकर अथवा अपने समुदाय में बैठकर अपने-2 मजहब के अनुसार सृष्टि उत्पत्ति की कल्पित कहानियां सुनने व सुनाने लग जाते हैं। वे यह जानते हुए भी कि सृष्टि सम्बन्धी उनकी मजहबी मान्यताएं विज्ञान की दृष्टि से सर्वथा भिन्न एवं हास्यास्पद भी हैं। वे उच्च प्रबुद्ध बनकर भी अपनी मजहबी व पंथाई ग्रन्थों से ऐसे बंधे रहते हैं कि उनके विरुद्ध बोलने व सोचने की इच्छा नहीं रखते हैं और कोई ऐसा सोचते भी हैं, तो उनमें ऐसा साहस नहीं होता। यदि कोई साहस करता भी है, तो उस समुदाय के कट्टरपंथी, जो स्वयं विज्ञान के विद्वान् भी हो सकते हैं, उसे नाना क्लेश पहुंचाते हैं। 

          यह दुर्भाग्य हिन्दू (वास्तव में हिन्दू कोई समुदाय नहीं बल्कि नाना मत-पंथों का एक समुदाय है), मुस्लिम, ईसाई, यहूदी आदि सभी मत पंथों के साथ जुड़ा हुआ है। इनमें कोई कट्टर अधिक होता है, तो कोई कम परन्तु अज्ञानता का अंधकार सर्वत्र है। आज विश्व में इस्लामी आतंकवाद इसका ज्वलन्त उदाहरण है। कोई-2 किसी मत-पन्थ से अलग स्वयं को वामपन्थी कहते हैं। शोक है कि वे स्वयं को बहुत बुद्धिमान् प्रगतिशील मानते हैं, उनकी चर्चा सुनने से उनमें प्रगतिशीलता तथा खुला मस्तिष्क जैसा कुछ न होकर हठी व दुराग्रही अधिक दिखाई देते हैं। भारत में तो ये अपने देश को तोड़ने की बात करने को ही प्रगतिशीलता का लक्षण मानते हैं। 


मेरा मत है कि ऐसा केवल इसी कारण हो रहा है कि सृष्टि विज्ञान का यथार्थ प्रकाश अभी किसी के मस्तिष्क में नहीं हो पा रहा
 है।

क्रमशः........

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर - 4


              विश्वभर के सभी बन्धुओ एवं भगिनियो! हम मिलकर विचारें कि हमारे नाशवान् शरीरों का निर्माण एक समान पदार्थ से हुआ है। पृथ्वी हम सबकी मां है, लेकिन यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में इतनी भी नहीं है, जितना समुद्र के सामने एक बूंद जल। यह हमारे अपने सौरमण्डल का छोटा सा ग्रह है। अपने सूर्य का मात्र 13 लाख वां भाग है, यह पृथिवी। हमारी मिल्की वे गेलैक्सी में हमारे सूर्य जैसे लगभग 200 करोड़ तारे हैं। इसके साथ ही इस ब्रह्माण्ड में हमारी जैसी लगभग 200 करोड़ गेलैक्सियां हैं। जरा सोचें कि इस ब्रह्माण्ड में हमारी पृथिवी की ही कोई गणना नहीं है, तब हमारे देशों, कथित सम्प्रदायों, जातियों अथवा कथित वर्गों की क्या स्थिति है? इसके पश्चात् हमारे शरीर की क्या स्थिति है? इस पर भी अज्ञानतावश हम अहंकार, काम, क्रोध, ईर्ष्या, हिंसा आदि के वशीभूत होकर स्वयं को बहुत बड़ा मान रहे हैं तथा दूसरों को सदैव नीचा गिराने का प्रयास करते रहते हैं। हम यह भी विचारें कि जहाँ हमारे शरीर एक पदार्थ से बने, वहीं हमारे शरीरों का रचयिता ईश्वर भी एक ही है। वही सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माता, संचालक व नियन्त्रक है। वही हमारा पिता, माता व गुरु है। तब, हम सब प्राणियों का पारस्परिक सम्बन्ध भाई-भाई वा बहिन-बहिन वा भाई-बहिन का रहा। तब, क्या हमें यह शोभा देता है कि हम परस्पर खून के प्यासे बनें।


           मेरे मित्रो! यदि हम सृष्टि विज्ञान को यथार्थ रूप में समझ लेंगे, तब हमें इस सत्य का आभास अवश्य होगा। शोक है कि वर्तमान भौतिक विज्ञान हमें सृष्टि का यथार्थ ज्ञान नहीं करा पा रहा, यही कारण है कि वैज्ञानिक ऊँचाइयों को प्राप्त करके भी विश्व पारस्परिक कलह, आतंक, हिंसा, कामुकता, क्रोध आदि में जलता हुआ अशान्त व दुःखी है। सृष्टि के यथार्थ ज्ञान से सभी मानवों को सुख व आनन्द का मार्ग प्राप्त कराने का कार्य मेरी Vaidic Theory of Universe करेगी, ऐसी मैं आशा करता हूँ।


क्रमशः.......

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर - 3

            
वेद की चर्चा के प्रसंग में एक बात सबको ध्यान रखनी चाहिए कि वेद किसी वर्ग अथवा देश का ग्रन्थ नहीं है। यह न केवल समस्त भूमण्डलवासी मनुष्यों का विद्या व धर्म का ग्रन्थ है अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जहाँ भी मनुष्य जैसे बुद्धिमान् प्राणी निवास करते हैं, उन सबके लिए यही वेद है। उन प्राणियों की भाषा व आकृति हम पृथ्वीवासियों से भिन्न हो सकती है, परन्तु उनका धर्म (जीने का तरीका) एवं विज्ञान मूलतः एक ही होना चाहिए। दुर्भाग्य से यह हम पृथ्वीवासियों का भी एक धर्म नहीं रह गया है। हम देशों, भाषाओं, नाना विचारधाराओं, सम्प्रदायों की सीमाओं में ऐसे बंटे हुए हैं कि कोई अपने से दूसरे को घृणा व द्वेष की दृष्टि से ही देख रहा है। कहीं संकीर्ण एकता, छलबल, आतंकबल अथवा अन्य मिथ्या आचरण के द्वारा अपने-2 वर्गों की संख्या बढ़ाने का उद्योग किया जा रहा है। आज मनुष्य कहीं दिखाई नहीं देता बल्कि वे हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, पारसी, बौद्ध, कम्यूनिस्ट आदि में बंटा यह मानव परस्पर शत्रु बनता जा रहा है। 


      ऐसे विकट समय में केवल वेद तथा उसका विज्ञान ही संसार के मनुष्यों को मानवता के एकसूत्र में बांध सकता है। यदि कभी पृथ्वी से बाहर किसी अन्य लोक में रहने वाले बुद्धिजीवी प्राणियों से सम्पर्क हुआ, तो उन्हें भी वेद ही जोड़ सकता है। आज शोक है कि कोई वेदों को कथित जाति अथवा समुदाय से जोड़ रहा है, तो कोई वेद का मिथ्या अर्थ करके मात्र हिन्दू कर्मकाण्ड का ग्रन्थ मान रहा है। हाँ, आर्य समाज से जुड़े विद्वान् इसे कुछ अधिक व्यापक रूप में देखते हैं परन्तु वेद इससे बहुत अधिक विस्तृत, सार्वभौमिक व सार्वकालिक है।

      हाँ, इतना अवश्य है कि अनेक विरोधों के होते हुए इतना तो सम्पूर्ण संसार मानता है कि वेद संसार में सबसे पुराना ग्रन्थ है। मैं संसार के सभी सम्प्रदायों के बुद्धिमान् विद्वानों व प्रचारकों से निवेदन करता हूँ कि वे यह बात गम्भीरता से विचारें के जब उनका सम्प्रदाय इस धरती पर आया, उससे पहले मानवमात्र के लिए कौनसी विचारधारा व संस्कृति सर्वमान्य थी? कृपया संकीर्ण भावनाओं तथा समस्त पूर्वाग्रहों को त्यागकर इस पृथ्वी को बचाने में अपनी शक्ति, बुद्धि, धन व जनबल का सदुपयोग करने का प्रयास करें।



क्रमशः..........


- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर - 2



इस्लाम ने लगभग 700 वर्ष इस देश पर राज किया। लाखों हिन्दुओं का खून बहाया, हजारों मन्दिर तोड़े, चोटी व जनेऊ तोड़कर मुस्लिम बनाया परन्तु सब हिन्दुओं को वे इस्लामियत का दास नहीं बना सके। इसका कारण था कि वे हमें इस्लामी शिक्षा का भक्त नहीं बना पाये, भले ही उर्दू, फारसी भाषाएं हमने सीखीं। इधर अंग्रेजों ने केवल 200 वर्ष शासन किया परन्तु उन्होंने प्रत्येक भारतीय अथवा हिन्दू को अंग्रेजियत का पूर्णतः दास बना दिया। इसका कारण यह था कि अंग्रेजों ने हिन्दुओं को अपनी शिक्षा का पूर्णतः दास बना लिया और हमारी भारतीय शिक्षा नष्ट कर दी। उन्होंने हमें यह भी विश्वास दिला दिया कि अंग्रेज विश्व में सबसे सभ्य, शिक्षित एवं वैज्ञानिक प्रतिभासम्पन्न हैं, उन्होंने अपनी टैक्नोलॉजी व विज्ञान के सहारे हमें यह मानने को विवश कर दिया कि भारत विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में सदा से मूर्ख ही रहा है। इस विश्वास में आकर भारत के शिक्षित व अशिक्षित सभी व्यक्ति बौद्धिक रूप से उनके दास बन गये। आज भी देश के कथित प्रबुद्ध यही मानते हुए प्राचीन भारतीय इतिहास, वेद, देवों, ऋषियों व अन्य पूर्वज महापुरुषों की निन्दा करते हैं। 

         ऐसे कथित प्रगतिशील, प्रबुद्ध वा वामपंथी, जो टी.वी. चैनलों पर बैठकर अपने ही देश को जोश में भर कर गाली देते हैं, को बड़ी विनम्रता के साथ अपना प्रिय बन्धु मानकर बताना चाहता हूँ कि मेरा ग्रन्थ ‘वेदविज्ञान-आलोक’ जो तीन-चार महीने में बिक्री के लिये उपलब्ध हो जाएगा, न केवल आपके इस भ्रम को तोड़ने अपितु विश्व में विकसित देशों के प्रबुद्धों के साथ-2 शीर्ष वैज्ञानिकों को भी वेदों, देवों व ऋषि मुनियों के महान् ज्ञान-विज्ञान के सम्मुख नतमस्तक होने के लिए प्रेरित करेगा। तब अराष्ट्रीय, जातिवादी, साम्प्रदायिक व भाषावादी नेताओं के विषवमन तथा कथित हिन्दुओं के अन्दर से सामाजिक भेदभाव, जो अभी तक दूर नहीं हो पाया है, पर नियन्त्रण करने में सहयोग मिलेगा। इन जोशीले वक्ताओं तथा इनके साथ संवाद करने वाले राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रचारक, दोनों को ही गम्भीर अध्ययन व चिन्तन करके यथार्थ को जानना होगा। मैं इस कार्य में न केवल सभी भारतीय भाई-बहिनों का अपितु मानवता व सच्चे विज्ञान से प्रेम करने वाले मानवमात्र का सहयोग-सहकार चाहता हूँ।

क्रमशः.............

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

वैदिक विज्ञान की ओर - 1



किसी राष्ट्र अथवा विश्व मानवता को यदि रेलगाड़ी मानें, तब उस देश व विश्व की शिक्षा पटरी के समान है, जिस पर ही वह राष्ट्र वा विश्व चला करता है। दुर्भाग्यवश हमारा देश एक ऐसी विदेशी शिक्षा पद्धति पर चल रहा है, जहाँ वैदिक सत्य सनातन धर्म (विज्ञान), राष्ट्रीयता, सदाचार, त्याग-तप, अहिंसा, सत्य, ईमानदारी, ब्रह्मचर्य, पारस्परिक भ्रातृत्व का कोई स्थान नहीं है। विज्ञान अपूर्णता, संदिग्धता, अनेकत्र मिथ्यावाद एवं व्यावसायिकता की छाया तले अनेक अनावश्यक व हानिकारक तकनीक का जनक बनकर सम्पूर्ण भूमण्डल के लिये संकट उत्पन्न करता जा रहा है। आज भौतिकी के क्षेत्र में ही अनेक प्रकार के परस्पर विरोधी सिद्धान्त फल-फूल रहे हैं और उनके अनुसंधान पर विश्वभर में खरबों डॉलर प्रतिवर्ष व्यय हो रहा है। कोई नहीं विचारता कि परस्पर विरोधी विचार कैसे विज्ञान का रूप ले सकते हैं? भोग-विलास के आमोद में डूबा मानव अपने क्षणिक सुखों की लालसा में राष्ट्र व संसार में अराजकता उत्पन्न कर रहा है।

उधर धर्म सत्य-विज्ञान, तार्किकता, निष्पक्षता व सार्वभौमिकता से अति दूर अंधविश्वास, मिथ्या रूढ़िवाद व पाखण्ड़ों से ग्रस्त होकर मानव के बुद्धि-विवेक का हरण कर रहा है।

ऐसी स्थिति में हमारा वैदिक विज्ञान एवं ऐतरेय ब्राह्मण का हमारा वैज्ञानिक भाष्य ‘वेदविज्ञान-आलोक’, जो शीघ्र ही संसार के सम्मुख आने वाला है तथा अभी मुद्रण कार्य चल रहा है, वर्तमान विज्ञान व धर्म दोनों को ही कल्याणकारी एवं सत्य मार्ग का अद्भुत् प्रकाश प्रदान करेगा। मानवता के पोशक, सच्चे राष्ट्रभक्तों एवं उच्च वैज्ञानिक प्रतिभा वालों के लिये यह ग्रन्थ अत्यन्त उपादेय होगा।

क्रमशः.........

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Monday, July 2, 2018

ईश्वर के अस्तित्व की वैज्ञानिकता - 13



             जब जड़ जगत में कारण-कार्य का नियम सर्वत्र कार्य करता है, भले उसे हम पूर्णतः समझ न​ ​ पाएं​, ​ तब वह चेतन जगत् में क्यों नहीं कार्य करेगा? हमारा मत यह है कि यहाँ कर्मफल व्यवस्था ही​ ​ कारण कार्य के​ ​नियम के रूप में कार्य करती है। हम इसे पूर्णतः कभी नहीं जान सकते। ईश्वर भी​ ​ इस व्यवस्था को उपेक्षित नहीं कर सकता। उसकी प्रार्थना, उपासना आदि करने से भी वह किसी जीव​ ​ के कमों के​ अनिष्ट फल से उस जीव को नहीं बचा सकता​ ​ इसी में उसका न्याय व दया दोनों ही​ ​ समाहित है। यदि प्रार्थना से प्रभावित होकर वह जीवों को उनके पापों का दण्ड न दे, तो उसकी सम्पूर्ण ​ कर्मन्याय व्यवस्था अस्त व्यस्त हो जाये। किसी अपराधी के अपराध को क्षमा करना न्यायाधीश का​ ​ न्याय नहीं​ ​ बल्कि अन्याय ही होता है। इस क्षमा से वह अपराधी पाप करने हेतु और भी प्रोत्साहित​ ​ होता तथा इससे वह अनेक जीवों को और​ ​ भी अधिक दु:ख दे सकता है, जिसका फल स्वयं न्यायाधीश​ ​ को भी भोगना पड़ता है किंवा वही उस पापों का उत्तरदायी होता है। इस कारण सच्चा न्यायाधीश कभी​ किसी अपराधी को क्षमा नहीं करता और न क्षमा करना चाहिये। जब कोई सच्चा न्यायाधीश ऐसा नहीं​ ​ करता, तब वह परमात्मा रूप न्यायाधीश क्यों किसी के अपराध क्षमा करके अपनी न्याय व्यवस्था मंग​ ​ करेगा? ईश्वरीय व्यवस्था प्रणत व्यवस्थित व स्वाभाविक है, उसमें​ ​ कभी कोई स्खलन नहीं होता। इस​ ​ कारण जो ईश्वरवादी प्रार्थना, याग, तौबा, confession आदि के द्वारा अपने पापमोचन की कामना​ ​ करते हैं, वे ईश्वर तत्व के विशुद्ध स्वरूप को नहीं समझते। पाप के फल के​ ​ विषय में महादेव शिव​ ​ मगवती उमा से कहते हैं-

  ‘द्विधा तु क्रियते पापं सनिश्चासद्वि च। अभिसंधाय वा नित्यमन्यथा वा यदृच्छया।।
   अभिसंधिकृतस्पैव नैव नाशोकस्ति कर्मणः। अश्वमेधसहग्रेश्च प्रायश्चित्तशतैरपि।।
   अन्यथा यत् कृतं पाप प्रमादा वा यदृच्छया। प्रायश्चित्ताश्वमेधाभ्यां श्रेयसा तत् प्रणस्यति।’
                                       (महाभारत, अनु - पर्व दानधर्मपर्व। अध्याय १४५ दाक्षिणात्य संस्करण)


​            इसका भाव यह है कि जो पाप प्रमाद वा असावधानी पूर्वक हो जाये, वह प्रायश्चित्त आदि कुछ​ ​उपायों से मिट सकता है परन्तु, जो पाप जानकर वा प्रतिज्ञापूर्वक किया गया हो, वह कभी भी नाश​ ​ को प्राप्त नहीं होता अर्थात् उसका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। यही ईश्वर का सच्चा न्याय व​ ​ यही सच्ची दया है। दण्ड देने के पीछे भी ईश्वर का प्रयोजन होता है कि उस पापी प्राणी के पापों से​ ​ अन्य प्राणियों की रक्षा हो सके और वह पापी प्राणी स्वयं भी भविष्य में पाप में प्रवृत्त न होवे। वह​ ​ ईश्वर पापी जीव को इसी प्रकार दण्ड देता है, जैसे योग्य माता-पिता अपनी संतान को बुराइयों से​ ​ बचाने हेतु दयापूर्वक ताड़ना करते हैं, न कि वे क्रोधवश​ ​ ऐसा करते हैं। इसी प्रकार वही ईश्वर सभी​ ​ जीवों का सबसे बड़े माता-पिता के समान पालक, न्यायकारी व दयालु है।

​​           आज संसार में एक सत्य सनातन वैदिक धर्म को त्यागकर​ मनुष्य समाज नाना सम्प्रदायों में​ ​ विभाजित होकर नाना ईश्वरों की कल्पना कर रहा है। प्रायः सभी सम्प्रदाय पापों से मुक्ति के कई सरल​ ​ उपाय बताते हैं। सभी प्रायः ईश्वर को पाप क्षमा करने वाला मानते हैं। एतदर्थ ईश्वर को प्रसन्न करने​ ​ हेतु नाना प्रकार के पूजाडम्बर, नदी स्नान, नाम स्मरणकथा स्मरण, व्रत, उपवास, रोजा, प्रार्थना,​ ​ नमाज, नाना मूर्तियों, पेड़ पौधों वा पशुओं आदि की पूजा आदि अनेकों साधन प्रचारित कर रखे हैं।​ ​ इनसे पाप तो क्षमा नहीं होते किन्तु इन आडम्बरों के प्रचारकों की आजीविका अवश्य चल रही है। ये​ ​ आडम्बर जितनी मात्रा में बढ़ रहे हैं, पाप भी उतनी ही मात्रा में निरन्तर बढ़ते जा रहे हैं। इससे​ ​ सामान्य प्रबुद्ध व्यक्ति का विश्वास न​ ​ केवल ईश्वर व उसकी कर्मफल व्यवस्था से उठता जा रहा है,​ ​अपितु नैतिक मूल्यों का भी निरन्तर क्षरण होता जा रहा है। इस कारण ईश्वर के दयालु व न्यायकारी​ ​ दोनों ही विशेषणों का समन्वित वैज्ञानिक स्वरूप समझना नितान्त आवश्यक है।​ ​

           इस प्रकार ईश्वर तत्व के अनन्त गुण, कर्म स्वभाव हैं। हमने यहाँ कुछ गुणों की विवेचना की ।​ ​महर्षि दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज के दूसरे नियम में ईश्वर तत्व के स्वरूप का​ ​ अत्यन्त सुन्दर​ ​ विवेचन करते हुए गागर में सागर भर दिया है। वे लिख​​ते हैं​ -

‘ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त,​ ​ निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर,​ ​ सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य,​ ​ पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना करनी योग्य है।"​ ​ 

              ईश्वर के स्वरूप का इससे सुन्दर विवेचन कदाचित् ही कहीं मिले। आज संसार में प्रचलित​ ​ विभिन्न मत सम्प्रदायों में ईश्वर के मिथ्या कल्पित रूपों की। ऐसे ही ईश्वरों के अस्तित्व का​ ​ भरमार है​ ​ Stephen Hawing ने The Grand Design नामक पुस्तक में उपहासपूर्वक खण्डन किया है और​ ​ करना भी चाहिये। यदि Hawking के समक्ष ईश्वर तत्व का यह वैदिक वैज्ञानिक स्वरूप विद्यमान​ ​ होता, तो उन्हें ईश्वर तत्व की मान्यता को खण्डित करने की आवश्यकता नहीं होती। यह आश्चर्य ही​ ​ है कि कोई भी ईश्वरवादी Hawking के विचारों को पढ़कर ईश्वर के सत्य स्वरूप को जानने हेतु​ ​ प्रवृत्त होता नहीं दिखाई दिया, बल्कि ईश्वर की सत्ता को ही नकारने पर जोर दिया गया। आशा है । कि​ ​ आधुनिक वैज्ञानिकों को हमारे ईश्वर विषयक इस​ ​ प्रकरण से ईश्वरीय सत्ता व स्वरूप का अवश्य बोध​ ​ होगा और वे Hawking जैसी भूल नहीं दोहराएंगे।

क्रमशः....

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक (वैदिक वैज्ञानिक)
 ("वेदविज्ञान-अलोक:" से उद्धृत)

Sunday, July 1, 2018

ईश्वर के अस्तित्व की वैज्ञानिकता - 12




सृष्टिकर्ता- इस सृष्टि के रचयिता, नियन्त्रक व संचालक के रूप में चेतन तत्व ईश्वर की सिद्धि के उपरान्त हम यह विचार करते हैं कि वह वैज्ञानिक दृष्टि से सिद्ध किया हुआ ईश्वर स्वयं कैसा है? इस पर भी वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करते हैं-

सत् स्वरूप- सर्वप्रथम वह ईश्वर नित्य होना चाहिये। यदि वह ईश्वर अनित्य हो गया, तब उसे बनाने वाली कोई उससे भी महती चेतन सत्ता विद्यमान होनी चाहिये, जो किसी अनित्य ईश्वर नामक पदार्थ को उत्पन्न कर सके। यदि ऐसा हो भी, तब वह महती चेतन सत्ता अवश्य अनादि, नित्य होनी चाहिये। यदि ऐसा मानें, तो उस अनादि चेतन सत्ता को ही ईश्वर नाम दिया जाये, न कि अनित्य सत्ता को अनादि माना जाये। इस कारण ईश्वर सत् स्वरूप सिद्ध होता है। ध्यातव्य है कि कोई भी चेतन सत्ता कभी किसी के द्वारा नहीं बनाई जा सकती और न स्वयं ही बनती है, बल्कि वह निश्चित रूप से अनादि ही होती है। 

चित् स्वरूप- वह ईश्वर सत् स्वरूप होने के साथ चेतन भी होना चाहिये, क्योंकि चेतन सत्ता ही इच्छा, ज्ञान व प्रयत्न इन तीनों गुणों से युक्त होकर नाना प्रकार की रचनाओं को सम्पादित कर सकती है। 

आनन्द स्वरूप- इसके साथ वह सत्ता आनन्द स्वरूप भी होनी चाहिये। इसका कारण यह है कि सम्पूर्ण सृष्टि को रचने में उसे किचित् भी क्लेश, दुख आदि नहीं होना चाहिये। यदि वह सत्ता दुख व क्लेश से युक्त होने की आशंका से ग्रस्त हो जाये, तब वह सृष्टि रचना जैसे महान् कर्म को नहीं कर सकेगी। इसलिए ईश्वर तत्व की परिभाषा करते हुए महर्षि पतंजलि ने कहा है-

                              "क्लेशकर्मविपाकाशयैपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वर:" (यो. द. १.२४) 

अर्थात् अविद्यादि क्लेश, पाप-पुण्य आदि कर्म एवं उसके फलों, वासनाओं से पृथक् पुरुष अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में शयन करने वाला अर्थात् व्याप्त रहने वाला चेतन तत्व ईश्वर कहाता है। इस कारण वह सदैव आनन्द स्वरूप ही है। इसीलिए महर्षि दयानन्द ने ईश्वर को सच्चिदानन्द कहा है। 

सर्वव्यापक- हम जानते हैं कि हमारी सृष्टि में वर्तमान वैज्ञानिक कदाचित् दो अरब गैलेक्सियों को देख या अनुभव कर चुके हैं। हमारी ही गैलेक्सी में लगभग दो अरब तारे हैं। वैज्ञानिक अब तक देखे गये ब्रह्माण्ड की त्रिज्या 10^26 m मानते हैं। दो गैलेक्सियों के मध्य अरबों-खरबों किलोमीटर क्षेत्र में कोई लोक नहीं होता, पुनरपि सम्पूर्ण रिक्त स्थान में सूक्ष्म हाइड्रोजन गैस अत्यन्त विरल अवस्था में भरी रहती है। उसके मध्य भी Vacuum Energy भरी रहती है। सारांश यह है कि इतने बड़े ब्रह्माण्ड में नितान्त रिक्त स्थान कहीं नहीं है। इसमें हमारे सूर्य से करोड़ों गुने बड़े तारे भी विद्यमान हैं, तो सूक्ष्म लेप्टॉन, क्वार्क एवं क्वाण्टाज् भी विद्यमान हैं। इनके अतिरिक्त इनसे भी सूक्ष्म प्राण, छन्द व मनतत्वादि पदार्थ विद्यमान हैं। इन सभी स्थूल व सूक्ष्म पदाथों में गति व बल की विद्यमानता है। सबमें सृजन व विनाश का खेल हो रहा है। इस कारण जहाँ -२ यह खेल चल रहा है, वहाँ -२ ईश्वर तत्व भी विद्यमान होना चाहिये। इसका आशय यह है कि ईश्वर सूक्ष्म से सूक्ष्म पदार्थों में भी विद्यमान है तथा स्थूल से स्थूलतम पदार्थों में भी विद्यमान है। इसी कारण कठ उपनिषद् के ऋषि ने कहा

                                   "अणोरणीयान् महतो महीयान्" ( कठ.उ.२.२०) 

अर्थात् वह परमात्मा सूक्ष्म से सूक्ष्म और महान से महान् है। इस कारण वह सर्वव्यापक है। 
यजुर्वेद ने कहा है-
                                  "ईशावास्यमिद्ँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्" (यजु. ४०.१ ) 

अर्थात् वह ईश्वर इस सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त होकर उसे आच्छादित किये हुए है। इस प्रकार वह ईश्वर सर्वव्यापक सिद्ध होता है। वह एकदेशी कभी नहीं हो सकता। 

सर्वशक्तिमान्- इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को बनाने, चलाने व नियन्त्रित करने वाला सर्वव्यापक ईश्वर तत्व सर्वशक्तिमान् ही होना चाहिये। आज का विज्ञान इस बात से अवगत है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड कितना विशाल है? सूक्ष्म कणों से लेकर विशाल लोकों की रचना करना, उन्हें गतियां प्रदान करना, सभी बलों व ऊर्जाओं को भी बल व ऊर्जा प्रदान करना, किसी सामान्य शक्ति वाले तत्व का सामर्थ्य नहीं है, इस कारण वह ईश्वर तत्व सर्वशक्तिमान् ही हो सकता है। यहाँ ध्यातव्य है कि ‘सर्वशक्तिमान्' का अर्थ यह नहीं है कि ईश्वर बिना किसी उपादान पदार्थ के शून्य से सृष्टि रचना कर सकता है अथवा वह बिना किसी नियम के चमत्कार-पूर्वक कुछ भी कर सकता है, उसके लिए किसी भी कार्य का करना असम्भव नहीं है, ऐसा कथन उचित नहीं है। ईश्वर स्वयं नियामक है, जो अपने ही नियमों के अनुसार कार्य कर सकता है, अन्यथा कार्य नहीं कर सकता। उसकी सर्वशक्तिमत्ता तो इस बात में है कि वह इतनी बड़ी सृष्टि को बिना किसी की सहायता से बनाता, चलाता व समय आने पर उसका प्रलय भी करता है। 

निराकार- अब इस बात पर विचार करें कि जो पदार्थ सर्वशक्तिमान् अर्थात् अनन्त ऊर्जा व बल से युक्त एवं सर्वव्यापक होगा, उसका आकार क्या होगा? हम यह समझते हैं कि इस विषय में सामान्य बुद्धि वाला भी यही कहेगा कि सर्वव्यापक व सर्वशक्तिमती सत्ता का कोई आकार नहीं होगा। वस्तुतः ऊर्जा व बल जैसे गुण किसी साकार पदार्थ में होते ही नहीं है। इस संसार में साकार पदार्थों में जो भी बल या ऊर्जा दिखाई देती है, वह वस्तुतः उस साकार पदार्थ के अन्दर विद्यमान अन्य निराकार पदार्थ की ही होती है। विभिन्न विशाल वा लघु यन्त्रों में विद्युत्, जो निराकार ही होती है, आदि का ही बल विद्यमान होता है। प्राणियों के शरीरों में चेतन जीवात्मा का भी बल कार्य करता है। निराकार विद्युत् आदि पदार्थों में चेतन परम तत्व ईश्वर का बल कार्य करता है, यह बात हम पूर्व में ही लिख चुके है। जो ईश्वर तत्व प्रत्येक सूक्ष्म व स्थूल पदार्थों में व्याप्त होकर उन्हें बल व ऊर्जा प्रदान कर रहा है, वह केवल निराकार ही हो सकता है, साकार कदापि नहीं। 

सर्वज्ञ- ईश्वरतत्व की सर्वशक्तिमत्ता के पश्चात् उसकी सर्वज्ञता पर विचार करते हैं। यह सामान्य बद्धि की बात है कि आधुनिक जगत् में एक-२ यन्त्र बनाने वाला इंजीनियर तथा ब्रह्माण्ड के कुछ रहस्यों को जानने वाला एक वैज्ञानिक बहुत बुद्धिमान् माना जाता है। ऐसी स्थिति में जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को रचता और चलाता है, वह कितना ज्ञानी होगा? वस्तुतः वह ईश्वर सर्वज्ञ ही होता है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिसे जानने का प्रयास, यह धरती का सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानव करोड़ों वर्षों से करता रहा है और जब तक सृष्टि रहेगी, वह ऐसा प्रयास करता भी रहेगा परन्तु उसे कभी पूर्णतः नहीं जान सकेगा। वह ऐसा ब्रह्माण्ड जिसने बनाया है, जो उसे चला रहा है, वह निश्चित ही सर्वज्ञ अर्थात अनन्त ज्ञान वाला ही होगा। 

पवित्र- वह ऐसा ईश्वर कभी भी सृष्टि के उपादान कारण रूप पदार्थ में मिश्रित नहीं होता, इसी कारण उसे पवित्र भी कहते हैं अर्थात् वह सदैव विशुद्ध रूप में विद्यमान रहता है, इसी कारण ईश्वर को सृष्टि का निमित्त कारण माना जाता है, जबकि प्रकृति रूपी मूल पदार्थ इस सृष्टि का उपादान कारण माना जाता है। यही यथार्थता है। इसके साथ ही यह भी तथ्य है कि ईश्वर कभी किसी भी प्रकार के दोष से किचिदपि ग्रस्त नहीं हो सकता। 

सर्वाधार- ऐसा वह ईश्वर ही इस ब्रह्माण्ड को बनाता, चलाता हुआ उसे धारण भी कर रहा है, इस कारण वह सर्वाधार कहलाता है। वर्तमान विज्ञान इसके धारण में गुरुत्वाकर्षण बल एवं डार्क मैटर की भूमिका मानता है। यह सत्य भी है परन्तु इन धारक पदार्थों का धारक स्वयं ईश्वर तत्व ही है। 

न्यायकारी-दयालु- ऐसा वह ईश्वर तत्व निश्चित ही सर्वदा सर्वथा पूर्ण व तृप्त वा अकाम होना चाहिये। तब वह इस सृष्टि की रचना स्वयं के लिए नहीं बल्कि किसी अन्य अपूर्णकाम चेतन तत्व के उपभोग व मोक्ष हेतु करता है। वह अपूर्णकाम चेतन तत्व ही जीवात्मा कहाता है। यहाँ 'अपूर्ण' अर्थ का यह समझना चाहिये कि वह बल, ज्ञान व आयतन आदि की दृष्टि से ईश्वर की अपेक्षा अत्यन्त लघु है। क्योंकि वह ईश्वर अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता, बल्कि जीवों की भलाई के लिए ही सष्टि रचना करता है, इस कारण वह दयालु कहलाता है। वह सदैव जीवों को उनके कर्मों के अनुसार ही फल देता है, न उससे अधिक और न्यून, इसी कारण उसे न्यायकारी भी कहा जाता है। कर्मानुसार फल का मिलना चेतन पदार्थ जगत् में कारण कार्य के नियम के समान है। जड़ जगत् में हम सर्वत्र कारण कार्य का नियम देखते हैं। वर्तमान विज्ञान भी जड़ जगत् में कारण कार्य के नियम को स्वीकार करते हैं। Arthur Beiser लिखते हैं- 

"cause and effects are still related in quantum mechanics, but what they concern needs careful interpretation" (Concepts of Modern Physics- P. 161)
क्रमशः.... 

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक (वैदिक वैज्ञानिक) 
("वेदविज्ञान-अलोक:" से उद्धृत)

ईश्वर के अस्तित्व की वैज्ञानिकता - 11


सामान्यतः ईश्वर का अनुभव क्यों नहीं होता?
यहाँ आप यह प्रश्न कर सकते हैं कि सृष्टि की विभिन्न क्रियाओं के कर्त्ता के रूप में हमें ईश्वर का अनुभव क्यों नहीं होता? आइये इस प्रश्न पर विस्तार से विचार करते हैं-
यहाँ सर्वप्रथम हम विचारें कि किसी क्रिया के संचालक वा कर्त्ता का अनुभव किन-२ परिस्थितियों में होता है?
(१) कर्त्ता के साकार होने पर किसी को भी उसका प्रत्यक्ष हो सकता है।
(२) क्रिया के प्रारम्भ व समाप्ति के लक्षणों का अनुभव होने पर ही कर्ता का बोध सहज होता है।
(३) कर्ता स्वयं में किसी हलचल विशेष से भी उसके कर्त्तापन का अनुभव होता है।
(४) कर्त्ता के अनुभव के लिए क्रिया की विविध गतिविधियों वा लक्षणों को पहचानने का ज्ञान अनिवार्य है। 
(५) कर्ता के निराकार होने पर सिद्धान्त निरूपण के उपाय के पांचों अवयवों का सम्यग् ज्ञान अनिवार्य है।

अब उपयुक्त बिन्दुओं पर क्रमशः विचार करते हैं-
(१) कर्त्ता के साकार होने पर उसका प्रत्यक्ष होना सरल है । हम लोक में विभिन्न क्रियाओं के संचालक, नियन्त्रक एवं विभिन्न वस्तुओं के निर्माताओं को प्रत्यक्ष देख सकते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है। सृष्टि का कर्त्ता ईश्वर तत्व साकार नहीं होने से नेत्रों से प्रत्यक्ष नहीं होता। इसी प्रकार वह स्वाद, गन्ध, स्पर्श व शब्द का विषय नहीं होने से रसना, प्राण, त्वचा व श्रोत्र से भी प्रत्यक्ष नहीं होता।
(२) लोक में होने वाली अनेक क्रियाओं को प्रारम्भ व समाप्त होते हम प्रत्यक्ष देखते हैं, इस कारण उन क्रियाओं के प्रारम्भ व समापन के कर्त्ता का बोध सहजता से हो जाता है। सृष्टि की वे क्रियाएं, जिनको प्रारम्भ होते अथवा समाप्त होते, हम देख नहीं सकते अर्थात् जिन क्रियाओं को हम अपने जन्म से लेकर मरण तक यथावत् देखते व सुनते हैं, उन क्रियाओं के प्रारम्भ व समाप्त होने का हमें विचार ही नहीं आता। आकाश में विभिन्न लोकों का भ्रमण, प्रकाशन, अणु वा परमाणुओं की गतियां आदि हमने जन्म से ही जैसी देखी व सुनी हैं, वैसी ही अब तक चल रही हैं और हमारे जीवन काल में वैसी ही बनी रहेंगी। इस कारण इनके कर्त्ता, नियन्त्रक, संचालक आदि गुणों से युक्त किसी चेतन कर्त्ता की साधारणतः कल्पना ही नहीं होती। यदि कोई अत्यल्पायु जीव किसी वाहन को केवल चलता हुआ ही देखे, उसको कभी विराम अवस्था में नहीं देखे, तब उसके मन में यह विषय ही नहीं आयेगा कि इसे किसी कर्त्ता ने चलाया वा चला रहा भी है । 
(३) जब कोई साकार कर्त्ता भी यदि किसी वाहन आदि यन्त्र के पास बैठा रहे परन्तु अपने शरीर में कोई हलचल भी न करे, तब भी किसी प्रत्यक्षदर्शी को ऐसा बोध नहीं हो सकता कि वह कर्त्ता (चालक) उस वाहन को चला रहा है, बल्कि उसे ऐसा प्रतीत होगा कि वाहन स्वतः ही चल रहा है।
(४) जब तक किसी को क्रिया के आदि, अन्त व मध्य में प्रतीत होने वाले नाना लक्षणों का ज्ञान न हो सके, तब तक उसे कर्त्ता बोध नहीं हो सकता। किसी पशु को इस बात का बोध नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति बस, रेल, हवाई जहाज आदि को चलाता है। वह इन वाहनों को चलते व रुकते भी देख सकता है, उसमें बैठे चालक को भी देख सकता, पुनरपि उसे यह बोध नहीं हो सकता कि वह चालक ही इन वाहनों को चला रहा वा रोक रहा है।
(५) उपर्युक्त चारों बिन्दु साकार कर्मों से ही सम्बन्धित हैं। यदि कर्त्ता निराकार हो, तब उस स्थिति में सिद्धान्त निरूपण के सभी पांचों अवयवों को समझने हेतु प्रतिभा का होना भी अनिवार्य है, अन्यथा ईश्वर तत्व के अस्तित्व का बोध नहीं हो पायेगा। वर्तमान विज्ञान केवल प्रयोग, प्रेक्षण व परीक्षणों में ही विश्वास करता है, गणितीय व्याख्याओं में विश्वास करता है, इस कारण उसे ईश्वर के अस्तित्व का बोध नहीं होता। जहाँ उसकी सीमा समाप्त हो जाती है, वहाँ वह कह देता है कि यह हम नहीं जानते। यह बात तो सत्य है कि आप नहीं जानते परन्तु क्या आपको जानने का यत्न भी नहीं करना चाहिये? क्या आपको यहाँ वैदिक विज्ञान वा दर्शन का आश्रय नहीं लेना चाहिये? आप यह क्यों समझते हैं कि जो वर्तमान विज्ञान से सिद्ध होने योग्य है, वही सत्य है, अन्य सब मिथ्या है। इस विषय में Richard P. Feynman ने उचित ही लिखा है

‘Mathematics is not a science from our point of view, in the sense that it is not a natural science. The test of its validity is not experiment. We must incidentally, make lt clear from the beginning that if a thing is not scienceit is not necessarily bad. For example, love is not a science. So, if something is said not to be a science, it does not mean that there is something wrong with it, it just means that it is not a science.” (Lectures on Physics- P. 27)
अर्थात जिसे वर्तमान विज्ञान की सीमा में नहीं माना जा सकता, वह मिथ्या है, यह मानना उचित नहीं है। उसे मात्र यह कहना चाहिये कि यह विज्ञान नहीं है।

वस्तुतः फाइनमैन ने Modern Science की परिभाषा के आधार पर ही यह बात कही है, पुनरपि वे विज्ञान से बाहर के विषयों को मिथ्या व अनावश्यक नहीं मानते। हम वर्तमान विज्ञान एवं दर्शन दोनों की ही परिभाषाओं को स्पष्ट कर चुके हैं। अब हम वैदिक दृष्टि से विज्ञान की परिभाषा पर विचार करते हैं। महर्षि दयानन्द सरस्वती लिखते हैं-
"विज्ञान उसको कहते हैं कि जो कर्मउपासना और ज्ञान इन तीनों से यथावत् उपयोग लेना और परमेश्वर से लेकर तृण पर्यन्त पदार्थों के साक्षात् बोध का होना, उनसे यथावत् उपयोग का करना।” 
(वेद विषय विचार- ऋग्वेदादिमाष्यभूमिका)

इसके संस्कृत भाग में ‘‘पृथिवीतृणमारम्य प्रकृतिपर्यन्तानां पदार्थानां ज्ञानेन यथावदुपकाग्रहण..." कहकर प्रकृतिपर्यन्त अर्थात् स्थूलतम से लेकर सूक्ष्मतम पदार्थों के यथावत् ज्ञान को विज्ञान कहा है। इसमें ईश्वर व जीव का भी यथार्थ ज्ञान सम्मिलित है। यह यथार्थ ज्ञान कैसे प्राप्त करना, इस विषय में कहा है कि ज्ञान, कर्म व उपासना से यथार्थ विज्ञान प्राप्त होता है। इसका तात्पर्य है कि सत्यशास्त्रों क गम्भीर अध्ययन के पश्चात् उसे कर्म अर्थात् प्रयोग, प्रेक्षण व परीक्षणों से पुष्ट करना, जिसे आज का विज्ञान भी करता है। जो विषय प्रयोग वा प्रेक्षणों से सिद्ध वा साक्षात् नहीं हो सकते, उनके लिए उपासना को विशेष साधन रूप बतलाया है। योग साधना से प्राप्त अन्तर्दृष्टि वैदिक ऋषियों की वह विशिष्ट देन है, जिसके बल पर उन ऋषियों ने सृष्टि के साथ-२ जीव व ईश्वर जैसे निराकार चेतन पदार्थों का साक्षात् करके यथार्थ विज्ञान को प्राप्त किया था। यह ज्ञान प्रायः निर्भ्रान्त होता है। इसी अन्तर्दृष्टि के द्वारा प्राप्त यथार्थ विज्ञान को उन महर्षियों ने कल्प सूत्रों, ब्राह्मण ग्रन्थों, मनुस्मृति, षड्दर्शनों, उपनिषदों, रामायण व महाभारत आदि ग्रन्थों में लिपिबद्ध किया। वे परमयोगिजन अपनी उपासना=समाधि के द्वारा बड़े-लोक लोकान्तरों से लेकर सूक्ष्म मूलकणों व क्वाण्टाज् एवं इनसे भी सूक्ष्म प्राणछन्द व मरुद् आदि पदार्थों में अपने मन वा बुद्धितत्व को प्रविष्ट कराकर उनका अनुभव बिना किसी बाह्य तकनीक के किया करते थे। इससे आगे वे स्वयं अपने आत्म स्वरूप एवं सबसे सूक्ष्म व अनन्त तत्व ईश्वर का साक्षात् अनुभव किया करते थे। इस प्रकार वैदिक विज्ञान का क्षेत्र वर्तमान विज्ञान की अपेक्षा बहुत व्यापक है। हमने ऐतरेय ब्राह्मण के वैज्ञानिक व्याख्यान करते समय महर्षि ऐतरेय महीदास की योगदृष्टि से जाने गये सृष्टि के गूढ़ रहस्यों को स्वयं अनुभव किया है। आश्चर्य होता है कि कैसे महर्षि भगवन्त अपनी अन्तदृष्टि से सृष्टि विज्ञान के सूक्ष्म व गम्भीर रहस्यों को साक्षात किया करते थे। यह अन्तदृष्टि भी बिना ईश्वर कृपा के नहीं मिल पाती। इस सम्पूर्ण ग्रन्थ में ईश्वरीय सत्ता के संकेत देने वाले अनेक प्रसंग आगे आएंगे।

क्रमशः...
- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक (वैदिक वैज्ञानिक) 
( "वेदविज्ञान-अलोक:" से उद्धृत)

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