Wednesday, August 8, 2018

भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (12)


स्वर्ग मोक्ष का अधिकारी कौन?
 (3)

ग्रामे गृहे वा ये द्रव्यं पारक्यं विजने स्थितम्।
नाभिनन्दन्ति वै नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः।। 32।।


         गाँव या घरके एकान्त स्थान में पडे़ हुए पराये धन का जो कभी अभिनन्दन नहीं करते हैं अर्थात् उसका ग्रहण नहीं करते हैं, वे मानव स्वर्गगामी होते हैं।। 32।।

तथैव परदारान् ये कामवृत्तान् रहोगतान्।
मनसापि न हिंसन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः।। 33।।


          इसी प्रकार जो मनुष्य एकान्त में प्राप्त हुई कामासक्त परायी स्त्रियों को मनसे भी उनके साथ अन्याय करने का विचार नहीं करते, वे स्वर्गगामी होते हैं।। 33।।

शत्रुं मित्रं च ये नित्यं तुल्येन मनसा नराः।
भजन्ति मैत्राः संगम्य ते नराः स्वर्गगामिनः।। 34।।


          जो सबके प्रति मैत्रीभाव रखकर सबसे मिलते तथा शत्रु और मित्रों को भी सदा समान हृदय से अपनाते हैं, वे मानव स्वर्ग लोक में जाते हैं।। 34।।

श्रुतवन्तो दयावन्तः शुचयः सत्यसंगराः।
स्वैरर्थैः परिसंतुष्टास्ते नराः स्वर्गगामिनः।। 35।।
                                                               (महाभारत, अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अ. 144, गीताप्रेस)


          जो वेदादि शास्त्रों के ज्ञाता, दयालु, मनसावाचाकर्मणा पवित्र, सत्य का आचरण करने वाले और अपने ही धन से संतुष्ट होते हैं, अर्थात् पराये धन का कभी लोभ नहीं करते, वे स्वर्गलोक में जाते हैं।। 35।।

क्रमशः....

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Monday, August 6, 2018

भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (11)



स्वर्ग मोक्ष का अधिकारी कौन?
(2)


आत्महेतोः परार्थे वा नर्महास्याश्रयात् तथा।
ये मृषा न वदन्तीह ते नराः स्वर्गगामिनः।। 19।।

            श्रीमहेश्वर ने कहा- जो हँसी और परिहास का सहारा लेकर भी अपने या दूसरे के लिए कभी झूठ नहीं बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोक में जाते हैं।। 19।।


वृत्त्यर्थे धर्महेतोर्वा कामकारात् तथैव च।
अनृतं ये न भाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः।। 20।।


         जो आजीविका अथवा धर्म के लिए स्वेच्छाचार से भी कभी असत्य भाषण नहीं करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं।। 20।।

पिशुनां न प्रभाषन्ते मित्रभेदकरीं गिरम्।
ऋतं मैत्रं तु भाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः।। 23।।


           जो मित्रों में फूट डालने वाली चुगली की बातें नहीं करते हें, सत्य और मैत्री भाव से युक्त वचन बोलते हैं, वे मनुष्य स्वर्गलोक में जाते हैं।। 23।।

ये वर्जयन्ति परुषं परद्रोहं च मानवाः।
सर्वभूतसमा दान्तास्ते नराः स्वर्गगामिनः।। 24।।

                                                                   (महाभारत, अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अ. 144, गीताप्रेस)


          जो मानव दूसरों से तीखी बातें बोलना और द्रोह करना छोड़ देते हैं, सब प्राणियों के प्रति समान भाव रखने वाले और जितेन्द्रिय होते हैं, वे स्वर्गलोक में जाते हैं।। 24।।

क्रमशः....

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Sunday, August 5, 2018

भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (10)


स्वर्ग (मोक्ष) का अधिकारी कौन? 
(1)


वीतरागा विमुच्यन्ते पुरुषाः कर्मबन्धनैः।
कर्मणा मनसा वाचा ये न हिंसन्ति किंचन।। 7।।


         जो मन, वाणी और क्रिया द्वारा किसी की हिंसा नहीं करते हैं और जिनकी आसक्ति सर्वथा दूर हो गयी है, वे पुरुष कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाते हैं।। 7।।

ये न सज्जन्ति कसि्ंमश्चित् ते न बद्ध्यन्ति कर्मभिः।
प्राणातिपाताद् विरताः शीलवन्तो दयान्विताः।। 8।।
तुल्यद्वेष्यप्रिया दान्ता मुच्यन्ते कर्मबन्धनैः।


          जो कहीं आसक्त नहीं होते, किसी के प्राणों की हत्या से दूर रहते हैं तथा जो सुशील और दयालु हैं, वे भी कर्मों के बन्धनों में नहीं पड़ते, जिनके लिए शत्रु और प्रिय मित्र दोनों समान हैं, वे जितेन्द्रिय पुरुष कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।। 9।।

सर्वभूतदयावन्तो विश्वास्याः सर्वजन्तुषु।। 9।।
त्यक्तहिंसासमाचारास्ते नराः स्वार्गगामिनः।


          जो सब प्राणियों पर दया करने वाले, सब जीवों के विश्वासपात्र तथा हिंसामय आचरणों को त्याग देने वाले हैं, वे मनुष्य स्वर्ग में जाते हैं।। 10।।


परस्वे निर्ममा नित्यं परदारविवर्जकाः।। 10।।
धर्मलब्धान्नभोक्तारस्ते नराः स्वर्गगामिनः।

                                                                          (महाभारत, अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अ. 144, गीताप्रेस)

           जो दूसरों के धन पर ममता नहीं रखते, परायी स्त्री से सदा दूर रहते और धर्म के द्वारा प्राप्त किये अन्न का ही भोजन करते हैं, वे मनुष्य स्वर्ग लोक में जाते हैं।। 11।।

क्रमशः....

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (9)


वर्ण परिवर्तन (2)


ज्ञानविज्ञानसम्पन्नः संस्कृतो वेदपारगः।
विप्रो भवति धर्मात्मा क्षत्रियः स्वेन कर्मणा।। 45।।

इस प्रकार धर्मात्मा क्षत्रिय अपने कर्म से ज्ञानविज्ञानसम्पन्न, संस्कारयुक्त तथा वेदों का पारगंत विद्वान् ब्राह्मण होता है।। 45।।

एतैः कर्मफलैर्देवि न्यूनजातिकुलोद्भवः।
शूद्रोऽप्यागमसम्पन्नो द्विजो भवति संस्कृतः।। 46।।

देवि! इन कर्म फलों के प्रभाव से नीच जाति एवं हीन कुल में उत्पन्न हुआ शूद्र भी शास्त्र ज्ञान सम्पन्न और संस्कार युक्त ब्राह्मण होता है।। 46।।

न योनिर्नापि संस्कारो न श्रुतं च संततिः।
कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमेव तु कारणम्।। 50।।

ब्राह्मणत्व की प्राप्ति में न तो केवल योनि, न संस्कार, न शास्त्र ज्ञान और न संतति ही कारण है। ब्राह्मणत्व का प्रधान हेतु तो सदाचार ही है।। 50।।

यहाँ सर्वथा स्पष्ट हो गया है कि वर्ण जन्म से नहीं बल्कि कर्म से ही निर्धारित होता है। वेद तथा वेद के पश्चात् इस पृथ्वी का सबसे प्रथम ग्रन्थ मनुस्मृति का भी यही उपदेश है। इस कारण एक ही व्यक्ति अपने वर्ण के कर्तव्यों से भ्रष्ट हो जाने पर वह उस वर्ण से भ्रष्ट होकर अन्य निम्न. वर्ण को प्राप्त हो जाता है तथा एक व्यक्ति अन्य श्रेष्ठ वर्ण की योग्यता अर्जित कर ले, तो वह उस श्रेष्ठ वर्ण को निश्चित ही प्राप्त हो जाता है। दुर्भाग्य से आज कोई भी जन्म के स्थान पर कर्म से वर्ण व्यवस्था अपनाना नहीं चाहता। सब अपने-2 स्वार्थों में फंसे जन्मना जाति व्यवस्था में ही रहना चाहते हैं, जो कि अनुचित है, अधर्म है। आयें, हम महादेव जी के इन वचनों का आदर करते हुए एक सुन्दर वर्ण व्यवस्था के निर्माण का प्रयास करें, परन्तु इस कार्य में शासन का संरक्षण अनिवार्य है।

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Friday, August 3, 2018

भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (8)


वर्ण परिवर्तन (1)

स्थितो ब्राह्मणधर्मेण ब्राह्मण्यमुपजीवति।
क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा ब्रह्मभूयं स गच्छति।। 8।।


यदि क्षत्रिय अथवा वैश्य ब्राह्मण धर्म का पालन करते हुए ब्राह्मणत्व का सहारा लेता है तो वह ब्रह्मभाव को प्राप्त अर्थात् ब्राह्मण हो जाता है।। 8।।
यस्तु विप्रत्वमुत्सृज्य क्षात्रं धर्म निषेवते।
ब्रह्मण्यात् स परिभ्रष्टः क्षत्रयोनौ प्रजायते।। 9।।

जो ब्राह्मणत्व का त्याग करके क्षत्रिय धर्म का सेवन करता है, वह अपने धर्म से भ्रष्ट होकर क्षत्रिय योनि में जन्म लेता है अर्थात् व क्षत्रिय हो जाता है।। 9।।

वैश्यकर्म च यो विप्रो लोभमोहव्यपाश्रयः। 
ब्राह्मण्यं दुर्लभं प्राप्य करोत्यल्पमतिः सदा।। 10।।
स द्विजो वैश्यतामेति वैश्यो वा शूद्रतामियात्।
स्वधर्मात् प्रच्युतो विप्रस्ततः शूद्रत्वमाप्नुते।। 11।।

जो विप्र दुर्लभ ब्राह्मणत्व को पाकर लोभ और मोह के वशीभूत हो अपनी मन्दबुद्धिता के कारण वैश्य का कर्म करता है, वह वैश्य योनि में जन्म लेता है अर्थात् वह वैश्य ही हो जाता है अथवा यदि वैश्य शूद्र के कर्म को अपनाता है, तो वह भी शूद्रत्व को प्राप्त होता है। शूद्रोचित कर्म करके अपने धर्म से भ्रष्ट हुआ ब्राह्मण शूद्रत्व को प्राप्त हो जाता है।। 10-11।।
                                        ( महाभारत, अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अ. 143, गीताप्रेस )

यहाँ पाठक विचारें तो स्पष्ट होगा कि ब्राह्मणादि वर्ण जन्म से नहीं बल्कि कर्म व योग्यता से निर्धारित होते हैं। वर्तमान में तथाकथित जातियों में बंटे तथा वेदोक्त वर्णव्यवस्था की बिना विचारे, निन्दा करने वाले विचारें कि-
 क्या स्वयं ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य मानने वाला अपने-2 कर्मों से भ्रष्ट होकर तथा शूद्र के कर्म करने पर स्वयं को शूद्र मानने हेतु उद्यत है?

 क्या वे अपने पूर्वजों के नाम पर गर्व करते-2 अपने वर्तमान स्तर व कर्मों की उपेक्षा करेंगें?


 क्या स्वयं को शूद्र मानने वाले नेता, शिक्षक, अधिकारी, कृषक, व्यापारी व पशुपालक होकर भी स्वयं को
      शूद्र न मान कर सरकारी आरक्षण आदि लाभों को छोड़ने को उद्यत हैं?

यदि ऐसा नहीं, तो आप सभी शिवभक्त कहाने योग्य नहीं और न धार्मिक ही।

उल्लेखनीय है कि चारों ही वर्णों में सदाचार, जितेन्द्रियता, मन-वचन-कर्म से सत्य का पालन आदि गुण समान हैं। विद्या के स्तर के अनुसार कर्मों का विभाजन किया गया है, सभी परस्पर एक दूसरे का हित करने वाले हैं। जो व्यक्ति मांसाहारी, अण्डाहारी, मछली खाने वाले, किसी भी प्रकार का नशा करने वाले, चोरी, तस्करी, हिंसा, असत्य आचरण करने वाले, लम्पट, कामी, क्रोधी, ईर्ष्यालु, रिश्वत लेने वाले, ठगी करने वाले, वस्तुओं में मिलावट करने वाले, राष्ट्र वा समाज में फूट डालने वाले व्यक्ति हैं, वे वैदिक मतानुसार अनार्य अर्थात् दस्यु कहाते हैं। इस कारण वे न तो ब्राह्मण हैं, न क्षत्रिय, न वैश्य और न शूद्र, बल्कि वे पापी व अनाचारी लोग हैं, चाहे वे कितने ही लौकिक वैभव सम्पन्न क्यों न हों, उनसे सच्चा शूद्र अर्थात् श्रमिक श्रेष्ठ है।

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Thursday, August 2, 2018

भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (7)


शूद्र का धर्म
शूद्रधर्मः परो नित्यं शुश्रूषा च द्विजातिषु।। 57।।

स शूद्रः संशिततपाः सत्यवादी जितेन्द्रियः।
शुश्रूषुरतिथि प्राप्तं तपः संचिनुते महत्।। 58।।


        शूद्र का परम धर्म है तीनों वर्णों की सेवा। जो शूद्र सत्यवादी, जितेन्द्रिय और घर पर आये हुए विद्वान् अतिथि की सेवा करने वाला है, वह महान् तपका संचय कर लेता है। उसका सेवारूप धर्म उसके लिये कठोर तप है।। 57-58।।
नित्यं स हि शुभाचारो देवताद्विजपूजकः।
शूद्रो धर्मफलैरिष्टैः सम्प्रयुज्येत बुद्धिमान्।। 59।।

       नित्य सदाचार का पालन और ईश्वरभक्त तथा वेदज्ञ ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य का सम्मान करने वाला बुद्धिमान् शूद्र धर्म का मनोवाच्छित फल प्राप्त करता है।। 59।।
                                                            (महाभारत, अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अ. 141, गीताप्रेस )
         वेद व भगवान् मनु के मतानुसार श्रमिक को शूद्र कहा गया है। शूद्र का अर्थ अछूत व अधर्मी कभी नहीं रहा। वर्ममान विश्व में श्रमिक वही कर्म करता है, जिसका विधान यहाँ है। हां, शास्त्रों में शूद्र अर्थात् श्रमिक को अधिक सभ्य, शिक्षित व संस्कारी माना गया है। शिवभक्त श्रमिक विचार करें-
 क्या वे मन, वचन, कर्म से सत्य का पालन करते हैं?
 क्या वे अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाले हैं?
 क्या वे अपना कार्य निष्ठापूर्वक करते हैं?
 क्या वे अपने स्वामी के प्रति सम्मान का भाव रखते हैं?
 क्या वे ईश्वरभक्ति के साथ-2 यज्ञादि कर्मों व वेदादि शास्त्रों में श्रद्धा रखते हैं?
               यदि नहीं, तो वे शिवभक्त कहाने योग्य नहीं हैं।

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (6)


वैश्य का धर्म
वैश्यस्य सततं धर्मः पाशुपाल्यं कृषिस्तथा।

अग्निहोत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च।। 54।।

वाणिज्यं सत्पथस्थानमातिथ्यं प्रशमो दमः।
विप्राणां स्वागतं त्यागो वैश्यधर्मःसनातनः।। 55।।

            पशुओं का पालन करना, खेती, व्यापार, अग्निहोत्र में सदैव विशेष सक्रिय रहना, दान, अध्ययन, सदाचार में सदैव स्थित रहना, विद्वान् अतिथि सत्कार, मन व इन्द्रियों को सदैव वश में रखना, वेदज्ञ ब्राह्मणों का स्वागत और त्यागभावना से धन का उपभोग करना, ये सब वैश्यों के सनातन धर्मं हैं।। 54-55।।
सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य यथाशक्ति यर्थाहतः।। 56।।
            त्रिवर्ग अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं शूद्र, इन तीनों वर्णों का प्रत्येक वैश्य को सब प्रकार से यथाशक्ति यथायोग्य आतिथ्यसत्कार करना चाहिये ।। 57।।
                                         ( महाभारत, अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अ. 141, गीताप्रेस )
             वर्तमान में उद्योगपति, व्यापारी, कृषक व पशुपालन व मिस्त्री आदि कर्मों को करने वाले वैश्य वर्ग में माने जायेंगे, बशर्ते उनमें उपर्युक्त गुण भी हों। अब ऐसे सभी महानुभाव शिवभक्ति करने के साथ विचारें-
 क्या वे सदाचारपूर्वक अर्थात् ईमानदारी से व्यापार व उद्योग करते हैं?
 क्या वे अपने कर्मचारियों को उचित व पर्याप्त वेतन आदि सुविधाओं से सन्तुष्ट रखते हैं?
 क्या वे कर्तव्यभावना से सुपात्रों को दान देते हैं?
 क्या वे अपने मन व इन्द्रियों को वश में रखते वा रखने का प्रयत्न करते हैं?
 क्या वे त्यागपूर्वक उपभोग करते हैं?
 क्या वे राष्ट्र रक्षा व पालन में संलग्न ब्राह्मण, क्षत्रिय व शूद्रों का पालन करते हैं? अर्थात् राष्ट्र को इनके लिए पर्याप्त व उचित कर ईमानदारी से देते हैं?
            यदि नहीं तो आपकी शिवभक्ति मात्र दिखावा है और धर्म के नाम पर दिखावा करने से पाप होता है।
-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (5)


क्षत्रिय का धर्म
क्षत्रिस्य स्मृतो धर्मः प्रजापालनमादितः ।।47।।

क्षत्रिय का सबसे पहला धर्म है प्रजा का पालन करना।
तस्य राज्ञः परो धर्मो दमः स्वाध्याय एव च। 
अग्निहोत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च ।।49।।

यज्ञोपवीतधरणं यज्ञो धर्मक्रियास्तथा।
भृत्यानां भरणं धर्मः कृते कर्मण्यमोघता ।।50।।

सम्यग्दण्डे स्थितिर्धर्मो धर्मो वेदक्रतुर्क्रियाः।
व्यवहारस्थितिर्धर्मः सत्यवाक्यरतिस्तथा ।।51।।

                                                               (महाभारत, अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अ. 141, गीताप्रेस)
          राजा का धर्म है-इन्द्रियसंयम, वेदों का स्वाध्याय, अग्निहोत्र कर्म, दान, अध्ययन, यज्ञोपवीत-धारण, यज्ञानुष्ठान, धार्मिक कार्य का सम्पादन, पोष्यवर्ग का भरण-पोषण, आरम्भ किये हुए कर्म को सफल बनाना, अपराध के अनुसार उचित दण्ड देना, वैदिक यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान करना, व्यवहार में न्याय की रक्षा करना और सत्यभाषण में अनुरक्त होना। ये सभी कर्म राजा के लिये धर्म ही हैं।। 49-51।।
          स्वयं को क्षत्रिय समझने वाले तथा वेदमतानुसार राजनेता, प्रशासनिक, न्यायिक, पुलिस अधिकारी आदि यदि धर्मात्मा हैं, तो उन्हें क्षत्रिय कहना योग्य है। ये सभी भगवान् शिव के वचनों पर ध्यान दें। वे विचारें कि-
 क्या वे अपनी इन्द्रियों पर संयम रखने वाले हैं अर्थात् अपने काम, क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष व लोभ पर नियन्त्रण रखने वाले हैं? अथवा भ्रष्टाचार व दुराचार में डूबे हैं?
 क्या वे वेदादि शास्त्रों के ज्ञान-विज्ञान को समझते हैं?
 क्या वे प्रतिदिन हवन करते हैं?
 क्या वे सुपात्रों को दान देते हैं?
 क्या वे ईश्वरोपासना, वृद्धों की सेवा, राष्ट्र के सभी नागरिकों का पालन, पशु-पक्षियों एवं अतिथि विद्वानों का भरण-पोषण करने वाले हैं?
 क्या वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के हित का पूर्ण ध्यान रखते हैं?
 क्या वे दृढ़ संकल्प होकर राष्ट्र की रक्षा के कार्य में निष्काम भाव से संलग्न रहते हैं?
 क्या वे अपराधी को उचित दण्ड अवश्य देते व निरपराध की रक्षा करते हैं?
 क्या वे वैदिक कर्मों का सम्पादन करते हैं?
 क्या वे न्याययुक्त व्यवहार करते हैं अथवा जाति, मजहब, भाषा व क्षेत्र के नाम पर देश को बांटने में रत हैं?
 क्या वे मन, वचन व कर्म से सत्य का पालन करते हैं?
        यदि आप ऐसा नहीं करते, तो आपको क्षत्रिय अर्थात् देश का नेता, प्रशासनिक व सुरक्षा अधिकारी वा न्यायाधीश होने का कोई अधिकार नहीं है। आइये-आप सच्चे शिवभक्त बनने हेतु भगवान् शिव के इन उपदेशों पर आचरण करना प्रारम्भ करें।
-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (4)


ब्राह्मणों का धर्म

स्वाध्यायो यजनं दानं तस्य धर्म इति स्थितिः।
कर्माण्यध्यापनं चैव याजनं च प्रतिग्रहः।।
सत्यं शान्तिस्तपः शौचं तस्य धर्मः सनातनः।


        वेदों का स्वाध्याय, यज्ञ और दान ब्राह्मण का धर्म है, यह शास्त्र का निर्णय है। वेदों का पढ़ाना, यज्ञ कराना और दान लेना, ये सभी ब्राह्मण के कर्म हैं। सत्य, मनोनिग्रह, तप, और बाहरी व आन्तरिक पवित्रता, यह उसका सनातन धर्म है।
विक्रयो रसधान्यानां ब्राह्मणस्य विगर्हितः।।
           अर्थात् रस और धान्य(अनाज) का विक्रय करना ब्राह्मण के लिये निन्दित है।
                                                             (अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अध्याय 141,गीताप्रेस)

          पाठक यहाँ भगवान् शिव के वचनों पर विचारें तो स्पष्ट है कि ब्राह्मणादि वर्ण जन्म से नहीं, बल्कि कर्म व योग्यता से होते हैं। इसका स्पष्टीकरण आगे करेंगे। यहाँ यह चिन्तनीय है कि क्या शिवभक्त कहाने वाला ब्राह्मण आज वेदादि शास्त्रों के महान् ज्ञान विज्ञान को समझता है अथवा भांग पीने में मस्त है? क्या वह दान देना भी जानता है अथवा लेना ही जानता है? क्या वह मनसा वाचा कर्मणा सत्य का पालन व अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला है? क्या वह धर्म के मार्ग में सुख-दुःख, हानि-लाभ, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी आदि द्वन्दों को सहन करने रूपी तप को करता है? क्या वह मन-वचन-कर्म से पवित्र आचरण करता है? क्या कोई स्वयं को ब्राह्मण अथवा साधु, संन्यासी कहाने वाला व्यापार व उद्योग आदि वैश्य-कर्मों से दूर है? यदि उसमें ये गुण नहीं है, तो वह भगवान् शिव की दृष्टि में ब्राह्मण नहीं हो सकता।

आइये, कथित ब्राह्मण बन्धुओ! सच्चे ब्राह्मण बनने का प्रयास करने का व्रत लें।

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (3)


धर्म का गृहस्थ स्वरूप

श्रीमहेश्वर उवाच-
अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतानुकम्पनम्।

शमो दानं यथाशक्ति गार्हस्थ्यो धर्म उत्तमः।। 25।।


श्रीमहेश्वरने कहा- देवी! किसी भी जीव की हिंसा न करना, सत्य बोलना, सब प्राणियों पर दया करना, मन और इन्द्रियों पर काबू रखना तथा अपनी शक्ति के अनुसार दान देना गृहस्थ-आश्रम का उत्तम धर्म है।। 25।।
परदारेष्वसंसर्गो न्यासस्त्रीपरिरक्षणम्।
अदत्तादानविरमो मधुमांसस्य वर्जनम्।। 26।।
एष प४चविधो धर्मो बहुशाखः सुखोदयः।
देहिभिर्धर्मपरमैश्चर्तव्यो धर्मसम्भवः।। 27।। 
(महाभारत अनुशासन पर्व, दानधर्म पर्व, अध्याय 141)

परायी स्त्री के संसर्ग से दूर रहना, धरोहर और स्त्री की रक्षा करना, बिना दिये किसी की वस्तु न लेना तथा मांस और मदिरा को त्याग देना, ये धर्म के पाँच भेद हैं, जो सुख की प्राप्ति कराने वाले हैं। इनमें से एक-एक धर्म की अनेक शाखाएँ हैं। धर्म को श्रेष्ठ मानने वाले मनुष्यों को चाहिये कि वे पुण्यप्रद धर्म का पालन अवश्य करें।। 26-27।।
          भगवान् शिव के इन वचनों पर सभी गृहस्थ शिवभक्त कहाने वाले गम्भीरता से विचारें कि क्या आप सभी जीवों के प्रति दया व प्रेम करते हैं। क्या शिवमंदिरों में अपने ही कथित दलित भाईयों के प्रति आत्मिक प्रेम व समानता का भाव रखते हैं? क्या आप जीवन भर मांस, मछली, अण्डा व सभी प्रकार के नशीले पदार्थों के परित्याग की प्रतिज्ञा करेंगे? क्या आप अश्लील कथाओं, मोबाइल, इण्टरनेट व पत्र-पत्रिकाओं की अश्लीलता से बचने का व्रत लेंगे? क्या आप सभी परायी स्त्रियों के प्रति कुदृष्टिपात से बच पायेंगे? क्या आप सत्य ही बोलते व उस पर आचरण करते हैं? क्या चोरी, तस्करी, रिश्वत, वस्तुओं में मिलावट तथा किसी के अधिकार छीनने की प्रवृत्ति का त्याग करेंगे? तथा अपने जीवन में श्रेष्ठ वेदानुकूल कार्यों में दान व त्याग की भावना जगायेंगे? यदि नहीं तो आपकी शिवभक्ति सर्वथा निरर्थक है, अज्ञानतापूर्ण है।

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (2)


भूमिका-2

भगवान् शिव के विषय में प्रायः शिव पुराण की कथा का वाचन होता है, जबकि महर्षि वेद व्यास जी कृत महाभारत को पढ़ने वाले अब रहे ही नहीं। उल्लेखनीय है कि महर्षि वेदव्यास जी द्वारा रचित माने जाने अठारह पुराण वास्तव में उनके द्वारा नहीं बल्कि अन्य आचार्यों द्वारा रचे थे और ये ग्रन्थ प्रामाणिक ग्रन्थ की कोटि में नहीं हैं। यद्यपि महाभारत में भी लगभग 95ः भाग ऐसा है, जो महर्षि वेदव्यास जीे के पश्चात् उनके शिष्यों एवं बाद के अनेक अप्रामाणिक विद्वानो ने लिखकर जोड़ दिया है। पुनरपि महाभारत ग्रन्थ अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। महर्षि दयानन्द कृत सत्यार्थप्रकाश एवं ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका के गम्भीर अध्ययन से प्राप्त प्रखर व नीर-क्षीर विवेक से युक्त प्रज्ञा के द्वारा हम किसी भी आर्ष ग्रन्थ को अच्छी प्रकार समझ सकते हैं। मेरा ‘वेदविज्ञान-आलोक’ ग्रन्थ भी इस प्रकार के अन्वेषण में परोक्ष सहयोग कर सकता है।

अब हम महादेव भगवान् शिव की चर्चा करते हैं-

महर्षि दयानन्द जी ने अपने पूना प्रवचन में महादेव जी को अग्निष्वात का पुत्र कहा है। अग्निष्वात किसके पुत्र थे, यह बहुत स्पष्ट नहीं है परन्तु वे ब्रह्माजी के वंशज अवश्य हैं। इधर महाभारत में महर्षि वैशम्पायन ने कहा है-

उमापतिर्भूतपतिः श्री कण्ठो ब्रह्मणः सुतः।।
उक्तवानिदमव्यग्रो ज्ञानं पाशुपतं शिवः।।
शान्तिपर्व। मोक्षधर्मपर्व। अ. 349। श्लोक 67 (गीतप्रैस)

यहाँ भगवती उमा जी के पति भूतपति, जो महादेव भगवान् शिव का ही नाम है, को महर्षि ब्रह्मा जी का पुत्र कहा है। इनका पाशुपत अस्त्र विश्व प्रसिद्ध था। इस अस्त्र को नष्ट वाला कोई अस्त्र भूमण्डल पर नहीं था। महाभारत के अनुशीलन से भगवान् शिव अत्यन्त विरक्त पुरुष, सदैव योगसाधना में लीन, विवाहित होकर भी पूर्ण जितेन्द्रिय, आकाशगमन आदि अनेकों महत्वपूर्ण सिद्धियों से सम्पन्न, वेद-वेदांगों के महान् वैज्ञानिक, सुगठित तेजस्वी व अत्यन्त बलिष्ठ शरीर व वीरता के अप्रतिम धनी दिव्य पुरुष थे। वे जीवन्मुक्त अवस्था को प्राप्त महाविभूति थे। उनके इतिहास का वर्णन तो अधिक नहीं मिलता परन्तु उनके उपदेशों को हम महाभारत में पढ़ सकते हैं। इस कारण हम इस पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे।

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक


भगवान् महादेव शिव उपदेशामृत (1)


भूमिका

भगवान् महादेव शिव एक ऐतिहासिक महापुरुष थे, जो देव वर्ग में उत्पन्न हुए थे। कैलाश क्षेत्र इनकी राजधानी थी। आज श्रावणमास के प्रारम्भ से ही देश व विदेश के शिवालयों में पूजा, कीर्तन, कथाएं, शिवलिगं की अश्लील पूजा, जो शिवपुराण में वर्णित दारुवन कथा पर आधारित है तथा इस कथा को कोई सभ्य व सुसंस्कृत महिला वा पुरुष सुन भी नहीं सकते हैं। शिवलिंग पर दूध चढ़ाना, जो बहकर नालियों में जाकर पर्यावरण को प्र्रदूषित करता है, क्या सच्ची पूजा का स्वरूप है? कहीं आम्ररस का अभिषेक ग्रीष्म ऋतु में करते देखा व सुना है? आश्चर्य है कि भगवान् शिव के इस अभागे राष्ट्र में करोड़ों बच्चे वा बूढ़े भरपेट रोटी के लिए तड़पते हों, उस देश में इस प्रकार से दूध बहाना क्या स्वयं उन भूखे नर-नारियों के साथ स्वयं भगवान् शिव का अपमान नहीं है? कितने शिवभक्त भगवान् शिव के विमल व दिव्य चरित्र, शौर्य, ईश्वरभक्ति, योगसाधना एवं अद्भुत ज्ञान-विज्ञान से परिचित हैं? यह आप स्वयं आत्मनिरीक्षण करें। भगवान् शिव कैसे थे, उनकी क्या प्रतिभा थी, उनके क्या उपदेश थे, यह जानने-समझने का न तो किसी के पास अवकाश है और न समझ। इस कारण हम आज से सम्पूर्ण श्रावण मास तक एक श्रंखला के रूप में उनके गम्भीर उपदेशों व ज्ञान विज्ञान को महाभारत ग्रन्थ के आधार पर प्रस्तुत करना प्रारम्भ कर रहे हैं। यह वर्णन भीष्म पितामह के उन उपदेशों, जो उन्होंने शरशय्या पर धर्मराज युधिष्ठिर को दिए थे, में मिलता है। आज यह बड़ी विडिम्बना है कि पौराणिक (कथित सनातनी) भाइयों ने भगवत्पाद महादेव शिव को अत्यन्त अश्लील, चमत्कारी व काल्पनिक रूप में चित्रित किया है, जबकि आर्य समाजी बन्धुओं ने मानो उन्हें कचरे पात्र में फेंक दिया है। ऐसे में उनका यथार्थ चित्रण संसार सम्मुख नितान्त ओझल हो गया है।

           पौराणिक बन्धु धर्म नाम से प्रचालित विभिन्न मान्यताओं व कथाओं को बुद्धि के नेत्र बन्द करके अक्षरशः सत्य मान लेते हैं और कोई मिथ्या बातों का खण्डन करे, तो उसे हिन्दूविरोधी कह कर झगडे़ को उद्यत रहते हैं। वे यह भी नहीं सोचते कि मिथ्या कथाओं व अंधविश्वासों के कारण इस भारत और हिन्दू जाति की यह दुर्गति हुई है, भारत का इतिहास और ज्ञान-विज्ञान नष्ट हुआ है, भारत सैकड़ों वर्षों तक विदेशियों का दास रहा है। उधर आर्य समाजी बन्धु बिना गम्भीर चिन्तन व स्वाध्याय के पुराणों के साथ साथ महाभारत, वाल्मीकि रामायण की भी सभी अथवा अधिकांश बातों को गप्पें मानकर खण्डन करने में तत्पर रहते हैं, भले ही उन्हें महादेव, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र जैसे भगवन्तों को ही भूलने का पाप क्यों न करना पड़े, वे खण्डन करने को ही आर्यतव समझ लेते हैं। व नहीं सोचते कि यदि मिथ्या कथाओं का खण्डन करना है, तो इन देवों का सत्य इतिहास तो जाना व जनाया अनिवार्य है।

         पाठकों से आग्रह है कि वे इन्हें पढ़ें, विचारें तथा उन पर आचरण करके वास्तविक शिवभक्त बनने का प्रयास करें। ईश्वर हम सबको ऐसा सच्चा शिवभक्त बनने की बुद्धि व शक्ति प्रदान करें, यही कामना है।

क्रमशः....

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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