Tuesday, July 23, 2019

हनुमान् जी वाले मेरे वीडियो पर उठाए गये प्रश्नों का उत्तर


श्री हनुमान् जी के उड़ कर न जा सकने की हठ से आर्यत्व का कोई भला होने वाला नहीं है। बिना गम्भीर स्वाध्याय के इस विषय पर बालवत् दुराग्रह उचित नहीं। वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड प्रथम सर्ग के श्लोक 211 व 212 में श्री हनुमान् जी के लंका प्रवेश से जुड़े दो श्लोक दिये हैं। वे इस प्रकार हैं-

ततः स लम्बस्य गिरेः समृद्धे विचित्रकूटे निपपात कूटे।
सकेतकोद्दालकनारिकेले महाभ्रकूटप्रतिमो महात्मा।। 211।।

ततस्यु सम्प्राप्य समुद्रतीरं समीक्ष्य लङ्का गिरिवर्यमूध्र्नि।
कपिस्तु तस्मिन् निपपात पर्वते विधूय रूपं व्यथयन्मृगद्विजान्।। 212।।

इन दोनों श्लोकों में ‘निपपात’ पद यह स्पष्ट घोषित करता है कि वे आकाश मार्ग से समुद्र के किनारे स्थित पर्वत पर उतर गये। यदि वे वहाँ तैर रहे होते, तो ‘निपपात’ पद का प्रयोग नहीं होता, बल्कि वहाँ समुद्र तल से पर्वत के ऊपर चढ़ने का वर्णन होता, जबकि कहीं भी चढ़ने का वर्णन नहीं, क्या यही दो प्रमाण पर्याप्त नहीं? यदि वे उड़ नहीं सकते थे, तब संजीवनी लेने क्या पैदल चल कर गये थे? पहाड़ उठा लाने व सूर्य को मुख में रख लेने जैसी बातें हमारे लिए प्रमाण नहीं। वे उड़े भी तैरे भी, इस पर भी प्रश्न? अरे यह तो बच्चे भी जानते हैं कि बतख उड़ती भी है, तैरती भी है और पैरों से चलती भी है। अब कोई बालक उसे पूछे कि जब वह उड़ सकती है, तो तैरती क्यों हैं, चलती क्यों है? तो बतख भी उस बच्चे पर हंसेगी। महर्षियों के ग्रन्थों का अनादर करके अपने मन से शंकाएं वा कुतर्क प्रस्तुत करना आर्यों को उचित नहीं। आर्य समाज के चतुर्थ नियम का पालन अब आर्यों में नहीं रहा। जो युवा वा प्रौढ़ विद्वान् अपने अहंकारवश इतना श्रम अनावश्यक हठ मेें करते हैं, उतना यदि वेदादि शास्त्रों के गम्भीर ज्ञान को समझने में करते, तो आर्य समाज आज कहाँ पहुँच गया होता?

कौन सिद्धियों का प्रयोग करता है, कौन नहीं, यह व्यक्ति पर निर्भर होता है। महर्षि दयानन्द विभूतियों को सत्य मानते थे परन्तु उनके प्रदर्शन को उचित नहीं मानते थे। वैसा ही ऋषियों के विषय में कहा जा सकता है। फिर महर्षि वाल्मीकि के प्रमाण के पश्चात् कुछ भी कहना उचित नहीं। वस्तुतः ये सिद्धियां प्राण विज्ञान का प्रायोगिक रूप प्रतीत होती हैं, कोई योगी अवश्य ही इन्हें करे, यह कोई अनिवार्यता नहीं है। दुर्भाग्य से आर्य समाज में इन विभूतियों को नकारने वाले भी हैं। योगदर्शन व महाभारत के सम्बंध की मेरी चर्चा पर प्रश्न उठाने वाले बच्चों के समान प्रश्न कर रहे हैं। क्या ‘योगदर्शन’ नामक ग्रन्थ लिखे जाने से पूर्व योगी नहीं थे? अतः यह प्रश्न निरर्थक है। हमने महर्षि वाल्मीकि को प्रमाण मानकर श्री हनुमान् जी का उड़ना माना, इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रक्षिप्त श्लोकों को भी प्रमाण मान लें। प्रक्षेप जानने की कसौटी के लिए हमारे ग्रन्थ ‘वेदविज्ञान-आलोकः’ की पूर्वपीठिका पढनीय है।

मैं अपने बहुत बड़े अभियान में लगा हूँ, इस कारण बच्चों के साथ अनावश्यक विवाद में पड़ना नहीं चाहता। ये युवा जो अच्छा कार्य कर रहे हैं, इसकी मैं सराहना भी करता हूँ। जिस कार्य को करने के बारे में अभी तक किसी ने साहस करना तो दूर, सोचा भी नहीं, उसे मैंने किया और आगे भी इसी दिशा में बढ़ रहा हूँ। मैं तो सभी आर्य समाजियों से आग्रह करता हूँ कि वे अनावश्यक खण्डन से बचें, वैदिक विज्ञान को कुछ समझने का प्रयास करें, हाँ, आवश्यक होने पर मिथ्या का खण्डन अवश्य करें। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो हम वेद व आर्य समाज की हानि ही करेंगे, लाभ नहीं।

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

1 comment:

Anonymous said...

Sir Me Kanhaiya Chaudhary

meri aapse ek baar baat hui thi

aapne sahi kaha ki arya samaj hi swayam itna bhatak gaya hai ki arya samaj ka swayam hi nash karta hai sir maine yogsastra pada to usme pata laga ki ramayan aur mahabharat me jo vilakshan shaktiya batayi jaati hai unse bhi adhik shakti ke baare me bola gaya hai parantu na to unhone aapki ved vigyan aalok padi hai aur na hi ramayan aur na hi unhone vedo aur upnishdon ko pada hai bas apni bahas ko siddh karne ke liye har ek cheej ko mithya bata ker wo ved vyas aur valmiki aur tulsi das aadi jaise mahapurushon ka apmaan karte hai jinme ki shree krishna aur shree ram ji ka bhi

ye log kahate to apne aap ko arya hai parantu musalmaano se phaltu bahas ke chakkar me inki bhi maansikta bhi musalmaano jaise ho gayi hai jaise musalmaan kuch bhi samajhne ko taiyyar nahi hote ese y bhi nahi hote.


jaisa ki aapne kaha ki kya yog sastra ke likhe jaane se pahale bhi yogi the aur ayurved ke likhe jaane se pahale bhi ayurved pahale se tha

isliye shree krishna ji ko yogeshwer kahate hai yaani ki yogiyon ka ishwer

to iska matlab unke barabar koi bhi yogi nahi hoga isse siddh hota hai jabki patanjali to unke baad hye aur unhone yog sastra likha

ek aur jhoot bolte hai ye arya samaji
ki jo vedo ka gyata hota hai use bramha kahate hai yaani ki ham hindu ye maante hai ki bramha sristi ke aadi me sabse pahale hua yha aur wo sristi ke aadi se hai aur treta me bhi the aur unhone hi valmiki ji ko kaha tha ki aap ram charitra likhen

to maine arya samajiyon se poocha tha ki aap log to kahate hai ki manushya jyada se jyada 200 saal tak jivit rah sakta hai to phir bramha ji kaise jeevit rae to unka rata rataya uttar ye aaya ki bramha ek upadhi hai na ki koi dev jo chaaro vedo ka gyata hota hai vahi bramha hota hai

to phir maine uske baad unse y prashna poocha ki ye batao shree ram bhi to chaaro vedo ke gyata the aur hanumaan bhi charo vedo ke gyata the aur shree krishna bhi to chaaro vedo ke gyata the to unko to braha ki upadhi nahi mili aur to aur yogeshwer shree krishna ji ko bhi nahi aur aapke swami dayanand ji ko bhi nahi mili upadhi

to aap hi bataye ki aapke arya samaj ke logo ne hi kitan bhram phiala rakha aur phir ye niruttar ho jaate hai aur phir inhi prashno aur debate ko ye youtube pe bhi daalte hai apna kachra karwane ke liye aur phir musalmaan bhi in debate ko sunta hai aur wo bhi in prashno ko uthata hai to maharaj ji aap hi in aryasamajiyon ko sahi raste per la sakte hai varna ye arya samaj ka sabse bada khatra khud arya samaji hi hai

me aapse bahut adhik prabhavit hu me vastav me aapko arya samaji maanta hu baaki jitne bhi arya samaji hai jaise ki ankur arya, om arya, ashish chaurasiya aur mahendra pal arya ye sabi logo ne hi hindu dharm pe kuthara ghat kiya hai ki apne hi mahapurusho ka majak udwa rahe hai

mera no hai 9045226997

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