Friday, June 7, 2019

क्रूरता व निर्लज्जता की पराकाष्ठा


अलीगढ़ में ढाई वर्ष की बच्ची के साथ हुए नृशंस काण्ड ने दर्शा दिया कि मनुष्य शरीरधारी प्राणी भेड़ियों से भी अधिक क्रूर हो सकता है। ऐसी घटना शायद पहले कभी नहीं सुनी गयी। आश्यर्च है कि इस धटना पर सामाजिक कार्यकर्ता, मानवाधिकारवादी व बुद्धिजीवी कहाने वाले, जो बात-2 पर अपने सम्मान लौटाते, कैंडल मार्च निकालते एवं सड़कों पर कोहराम मचाते हैं, वे आज किस बिल में छुप कर बैठे हैं? क्या उस बच्ची का हिन्दू होना ही उनके मौन का कारण है? कठुआ की घटना पर आँसू बहाने वालों की आँखों में आज आँसू क्यों नहीं है?

अपराधी को सार्वजनिक रूप से ऐसा दण्ड देना कि कोई भी दुष्ट ऐसा पाप करने का दुःसाहस नहीं कर सके, यह तो अनिवार्य है, परन्तु आज इस प्रकार की घटनाएं क्यों हो रही हैं, इसको विचारने का न किसी के पास समय है और न सात्विकी बुद्धि। जिनके पास है, वे असमर्थ हैं। सर्वत्र कामुकता को बढ़ाने वाले साधन, चलचित्र व इण्टरनेट, पत्र-पत्रिकाएं, सभी कामुकता की आग को प्रज्ज्वलित करके निरन्तर बढ़ाते जा रहे हैं। आधुनिक शिक्षा ने मनुष्य को भोगवाद की आग में झोंक दिया है, स्वच्छन्दता अपना नग्न ताण्डव मचा रही है, मांस-मछली मदिरा एवं अन्य अनेक प्रकार के नशे, अति तीखे व तमोगुणी भोजन, जो न केवल स्वादलोलुपतावश खाये जाते हैं, अपितु अपनी कामवासना को तीव्र से तीव्रतम करने के लिए खाये जाते हैं। यह खान पान फिर टी.वी. पर अश्लील व हिंसक दृश्य व श्रव्य, उन्हें नरपिशाच बनाने का पूरा उद्योग कर रहे हैं। देश के नीतिनिर्धारकों, शिक्षाविदों, समाज शास्त्रियों व मनोवैज्ञानिकों को सद्बुद्धि देने वाले कहाँ हैं? धर्म के नाम पर दुकान चलाने वाले भी अनेक कथित धर्मगुरु यौन अपराध के कारण कुछ जेल में है, तो कुछ अभी छुपे हुये हैं। लोकतन्त्र की स्वच्छन्दता ने युवा पीढ़ी को कामी व पागल बना दिया है। सबको स्वतन्त्रता (वास्तव में स्वच्छन्दता) की भूख है।

उधर न्यायालयों में न्याय समय पर नहीं मिलता। पापी को क्रूर दण्ड देने पर मानवाधिकारवादी कोहराम मचाने को तत्पर रहते हैं। हमारे कानून व न्यायालयों के कुछ निर्णय भी जब कामुकी स्वच्छन्दता को संरक्षण देने वाले हो जायें, तब कौन रक्षा करेगा, इन पापों से? ऐसे में जब भाँग कूए में नहीं, अपितु समुद्रों में घोल दी गयी हो, तब धरती से पाप को मिटाना कैसे होगा? हे मानवता के प्रेमी जनो! आप क्या इस विषय में कुछ विचार करेंगे? जब तक वैदिक शिक्षा का प्रचार नहीं होगा, तब तक दानवता का खेल यूं ही चलता रहेगा। पुनरपि अपराधी को भयंकर दण्ड तुरन्त देना ही होगा। अपराधियों को सार्वजनिक रूप से अत्यन्त कष्टकारी मृत्यु दण्ड नहीं दिया जायेगा, तब तक अपराधियों में भय होगा ही नहीं। जो मजहब देखकर ही कैंडल मार्च निकालते हैं, उनकों भी दण्डित करना आवश्यक है।

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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