Thursday, April 11, 2019

आर्यावर्त (भारतवर्ष) का प्राचीन गौरव

मेरे प्यारे देशवासियो एवं पावन सनातन वैदिक धर्मावलम्बियो! ईश्वर की कृपा से हम एक महान् देश में जन्मे, पले एवं बढ़ रहे हैं तथा विश्ववारा वैदिक संस्कृति एवं वैदिक मानव धर्म के अप्रतिम ज्ञान-विज्ञान की शीतल छाया में अखिल विश्व को एक ही परमपिता परमात्मा का प्यारा परिवार मानकर सनातन काल से ही सम्पूर्ण भूमण्डल के प्राणियों के सुख व शान्ति की कामना करते हुए सत्य, न्याय, करुणा, प्रेम, सदाचार जैसे महान् मानवीय मूल्यों का पावन सन्देश देते चले आ रहे हैं। इसी कारण तो कभी भगवान मनु ने कहा था-


‘‘एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्पृथिव्यां सर्वमानवाः।।’’ (मनु. 2.74)


हमने संसार के प्रथम राजा भगवान् मनु के पश्चात् महाप्रतापी महाराजा मान्धाता, महाराज अश्वपति, महाराज दिलीप, हरिश्चन्द्र, श्रीराम, से लेकर चक्रवर्ती भरत आदि भूमण्डलप्रसिद्ध राजाओं के त्रिविध तापविहीन अत्यन्त सुखी, समृद्ध ज्ञान विज्ञान के चरमोत्कर्ष को प्राप्त महान् राजव्यवस्थाओं को पढ़ा व सुना है। हमारा राष्ट्र चक्रवर्ती व जगद्गुरु के रूप में प्रसिद्ध रहा है। यद्यपि हमारा देश चक्रवर्ती था तथा भूमण्डल भर के सभी राष्ट्रों का संरक्षक था पुनरपि सभी राष्ट्र पूर्ण स्वतंत्र, सुखी, समृद्ध एवं सम्प्रभु थे। सर्वत्र, सर्वदा होने वाले यज्ञों के कारण इस भूमण्डल का पर्यावरण स्वस्थ सुरभित तथा सभी प्रकार की प्राकृतिक बाधाओं से मुक्त रहता था। रोग, शोक, भय, अज्ञान, अन्याय, अभाव एवं अधर्मादि दोषों से विमुक्त यह संसार हमारे देेश के ही निर्देशन व संरक्षण में भ्रातृत्व व प्रेम के सूत्र में बंधा रहता था। संसार प्रसिद्ध श्रीराम राज्य का वर्णन करते हुये तभी तो भगवान् वाल्मीकिजी ने जो कहा था, उसे गोस्वामी तुलसीदास ने केवल दो पंक्ति में गागर में सागर भरते हुए कहा-



दैहिक, दैविक भौतिक तापा। रामराज नहिं काहू व्यापा।।
सब नर करत परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।। (रामचरितमानस)




अर्थात् उस काल में सम्पूर्ण दुःख दारिद्रय से मुक्त विश्व प्रेम के सूत्र में बंधा वेद पर पूर्णतया आरूढ़ था। यदि कहीं अवैदिकता, अधर्म, अन्याय का प्राबल्य होता था, तो हमारे धर्मरक्षक राजा दण्डनीति का आश्रय लेकर उसे दूर किया करते थे। सम्प्रदायों का कोई नामोनिशान नहीं था। कहीं कोई वर्गभेद, जातिभेद, भाषाभेद आदि नहीं था। देव, मनुष्य, राक्षस, असुर, गन्धर्व, किन्नर, वानर, ऋक्ष, पक्षि, गृध, नाग, दैत्य, दानव आदि वर्ग मानव नामक प्राणी के समाज के ही अंग थे, जो उनकी राष्ट्रियता वा वंष आदि के आधार पर इन नामों से प्रसिद्ध हुये। आर्य, अनार्य, दस्यु नाम का कोई वर्ग विष्वभर में कहीं नहीं था, बल्कि ये तीनों गुणवाची शब्द थे। यहाँ राक्षसी माता व मनुष्य ब्राह्मण पिता का एक पुत्र रावण अनार्य वा पापी कहलाया, तो उसी का अनुज विभीषण आर्य श्रेष्ठ कहाया। दैत्य प्रहलाद महान् आर्य हुआ, तो मन्थरा, शकुनि, दुर्योधन व धृतराष्ट्र जैसे मनुष्य अनार्यत्व के प्रतिरूप माने गये। हर अनार्य अर्थात् पापी दण्डनीय, तो हर आर्य (श्रेष्ठ) संरक्षणीय था। यहाँ जन्म नहीं बल्कि कर्म की पूजा थी। अपने पराये का भेद नहीं बल्कि विशुद्ध न्याय की व्यवस्था थी। सत्य एवं यथार्थ अहिंसा का साम्राज्य था, जो महाभारत युद्ध के कुछ काल पूर्व तक यथावत् चलता रहा।

(बोलो! किधर जाओगे? से उद्घृत पृष्ठ संख्या 15)

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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