Sunday, April 28, 2019

भटके नास्तिक युवकों के लिए सन्देश


जीव विज्ञान जहाँ समाप्त होता है, वहाँ भौतिक विज्ञान प्रारम्भ होता है, जहाँ भौतिक विज्ञान समाप्त होता है, वहाँ वैदिक भौतिकी का प्रारम्भ होता है और जहाँ वैदिक भौतिकी समाप्त होती है, वहाँ वैदिक अध्यात्म-विज्ञान प्रारम्भ होता है। डार्विन-विकासवाद के समर्थकों को जीव विज्ञान से आगे सोचने का प्रयास करना चाहिए, तभी उन्हें अपने नेचुरल सलेक्शन व रेण्डम परिवर्तन का मिथ्यापन अनुभव हो पायेगा। नेचुरल सलेक्शन की रट लगाने वाले नेचर को परिभाषित नहीं कर सकते। वे नहीं जानते कि एक ही शब्द की मिथ्या रट लगाने से वह शब्द सत्य नहीं बन जाता। इसके नियमों के तर्क देने वाले चेतन नियामक सत्ता को स्वीकार नहीं करते। वे यह भी नहीं बताते कि यह नेचुरल सलेक्शन क्या कोई जादू है अथवा कोई वैज्ञानिक प्रक्रिया है? यदि यह कोई वैज्ञानिक प्रक्रिया है, तो उसके क्रियाविज्ञान को क्या वे समझते हैं? रेण्डम से कोई भी प्रक्रिया बिगडती ही है, बनने की सम्भावना तो नगण्य ही होती है। डी.एन.ए. की बात करने वाले उसकी संरचना तथा उसके मूल अवयव, जो वास्तव में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के मूल अवयव हैं, के विषय में कुछ नहीं सोचते। बड़े-2 भौतिक वैज्ञानिक इन मूल कणों, फोटोन्स, स्पेस वा कथित स्ट्रिंग्स आदि की संरचना को नहीं समझ पाये हैं, ऐसी स्थिति में जीव विज्ञान की कुछ जानकारी रखने वाला कथित विकासवादी ईश्वर व जीवात्मा के अस्तित्व को नकारता है, यह न केवल नादानी है, अपितु मिथ्या दुराग्रह एवं बौद्धिक दासता भी है।

ये भटके युवक स्वयं कोई प्रयोग नहीं करते परन्तु कुछ वैज्ञानिकों के पूर्व में किये शोध को ही प्रमाण मान लेते हैं। इसके विपरीत बोलने वाले वैज्ञानिक उनके लिए प्रमाण नहीं हैं। ये नास्तिक युवक सोचते हैं कि डार्विन के सिद्धान्त को वे ही अच्छी तरह समझते हैं, डार्विन से असहमत वैज्ञानिक मूर्ख हैं। हजारों वर्ष पूर्व ऋषियों के अनुसंधान उनके लिए कल्पना है। मेरे भटके युवको! मैंने ऋषियों व वेदों के विज्ञान को कुछ अंशों में खोजा है। जो स्वयं को बड़ा वैज्ञानिक विचारक मानते हैं, वे मेरा ‘वेदविज्ञान-आलोकः’ ग्रन्थ पढ़ कर देखें, उनके मस्तिष्क की पूर्ण परीक्षा हो जायेगी। जो ग्रन्थ नहीं खरीद सकें, वे ‘वेदविज्ञान-आलोकः’ की कक्षा के वीडियोज् देख कर ही अपनी बुद्धि को तोल सकते हैं। उसके पश्चात् ही वे मुझसे संवाद करने के अधिकारी हैं। मैं भारत के प्रसिद्ध भौतिक वैज्ञानिकों से पिछले लगभग 14-15 वर्षों से संवाद करता रहा हूँ, कुछ विदेशीयों से भी। इस कारण मैं ऐसे भटके युवकों, जिनकी न अपनी कोई दृष्टि है और न सिद्धान्त, बल्कि जिनके पास थोड़ा कुछ है, वह भी उधार का है तथा जो प्रत्यक्ष चर्चा से घबराते हैं, के साथ वीडियों संवाद में समय व्यर्थ नहीं कर सकता। इन युवकों को इतना भी ध्यान नहीं है कि विश्व में वैज्ञानिकों के मध्य होने वाली काँन्फ्रेंस एवं सेमिनार प्रत्यक्ष चर्चा के साधन हैं, दूर बैठकर सोशल मीडिया के माध्यम से कभी सत्य के निर्णय नहीं होते हैं। जिनके पास अन्य कोई काम नहीं होता, वे ही केवल सोशल मीडिया के शूरमा बने रहते हैं। मेरा ध्यान संसार के महान् भौतिक वैज्ञानिकों को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जानने का महान् वैदिक विज्ञान देना है, इससे डार्विन का विकासवाद तो स्वतः धराशायी हो जायेगा।

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Saturday, April 13, 2019

जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड - विश्व इतिहास के क्रूरतम नरसंहारों में से एक


जलियांवाला कांड की शताब्दी पर सभी बलिदानी क्रांतिकारियों को विनम्र नमन एवं सभी देशवासियों से राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा के लिए क्रांतिकारियों के जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान।

हे वीर क्रांतिकारियो! यदि आपको पता होता कि इस भारत देश के लोग, आपके ही वंशज, कभी स्वतंत्र होकर अपने राष्ट्रीय गौरव को कथित जातिवाद, सांप्रदायिकता, व्यक्तिगत ईर्ष्या द्वेष, राजनीतिक भेदभाव, भाषावाद, भ्रष्टाचार आदि की भेंट चढ़ा देंगे, तो आप निश्चित ही डायर की गोलियों से मरने के लिए कदापि तैयार नहीं होते। आप तो महान् थे लेकिन आपके ये कृतघ्न आपके ही वंशज भारतीय आज अपने ही देश को तोड़ने के पूरे प्रयास कर रहे हैं और देश के विरुद्ध नारे लगाने वाले आज महानायक बन रहे हैं। आज देशभक्ति और राष्ट्रवाद की बात करने में भी किसी को राजनीति ही दिखाई देती है। अब ये लोग जनरल डायर तो क्या बाबर, औरंगजेब, अकबर, तैमूर आदि सभी विदेशी हमलावर को अपना आदर्श मानकर मूर्खतापूर्ण अट्टहास रहे हैं। इससे अधिक कृतघ्नता और देशद्रोह की बात क्या होगी?

आप एवं उस समय के सभी क्रांतिकारियों की आत्मा निश्चित ही रो रही होगी।

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Thursday, April 11, 2019

आर्यावर्त (भारतवर्ष) का प्राचीन गौरव

मेरे प्यारे देशवासियो एवं पावन सनातन वैदिक धर्मावलम्बियो! ईश्वर की कृपा से हम एक महान् देश में जन्मे, पले एवं बढ़ रहे हैं तथा विश्ववारा वैदिक संस्कृति एवं वैदिक मानव धर्म के अप्रतिम ज्ञान-विज्ञान की शीतल छाया में अखिल विश्व को एक ही परमपिता परमात्मा का प्यारा परिवार मानकर सनातन काल से ही सम्पूर्ण भूमण्डल के प्राणियों के सुख व शान्ति की कामना करते हुए सत्य, न्याय, करुणा, प्रेम, सदाचार जैसे महान् मानवीय मूल्यों का पावन सन्देश देते चले आ रहे हैं। इसी कारण तो कभी भगवान मनु ने कहा था-


‘‘एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्पृथिव्यां सर्वमानवाः।।’’ (मनु. 2.74)


हमने संसार के प्रथम राजा भगवान् मनु के पश्चात् महाप्रतापी महाराजा मान्धाता, महाराज अश्वपति, महाराज दिलीप, हरिश्चन्द्र, श्रीराम, से लेकर चक्रवर्ती भरत आदि भूमण्डलप्रसिद्ध राजाओं के त्रिविध तापविहीन अत्यन्त सुखी, समृद्ध ज्ञान विज्ञान के चरमोत्कर्ष को प्राप्त महान् राजव्यवस्थाओं को पढ़ा व सुना है। हमारा राष्ट्र चक्रवर्ती व जगद्गुरु के रूप में प्रसिद्ध रहा है। यद्यपि हमारा देश चक्रवर्ती था तथा भूमण्डल भर के सभी राष्ट्रों का संरक्षक था पुनरपि सभी राष्ट्र पूर्ण स्वतंत्र, सुखी, समृद्ध एवं सम्प्रभु थे। सर्वत्र, सर्वदा होने वाले यज्ञों के कारण इस भूमण्डल का पर्यावरण स्वस्थ सुरभित तथा सभी प्रकार की प्राकृतिक बाधाओं से मुक्त रहता था। रोग, शोक, भय, अज्ञान, अन्याय, अभाव एवं अधर्मादि दोषों से विमुक्त यह संसार हमारे देेश के ही निर्देशन व संरक्षण में भ्रातृत्व व प्रेम के सूत्र में बंधा रहता था। संसार प्रसिद्ध श्रीराम राज्य का वर्णन करते हुये तभी तो भगवान् वाल्मीकिजी ने जो कहा था, उसे गोस्वामी तुलसीदास ने केवल दो पंक्ति में गागर में सागर भरते हुए कहा-



दैहिक, दैविक भौतिक तापा। रामराज नहिं काहू व्यापा।।
सब नर करत परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।। (रामचरितमानस)




अर्थात् उस काल में सम्पूर्ण दुःख दारिद्रय से मुक्त विश्व प्रेम के सूत्र में बंधा वेद पर पूर्णतया आरूढ़ था। यदि कहीं अवैदिकता, अधर्म, अन्याय का प्राबल्य होता था, तो हमारे धर्मरक्षक राजा दण्डनीति का आश्रय लेकर उसे दूर किया करते थे। सम्प्रदायों का कोई नामोनिशान नहीं था। कहीं कोई वर्गभेद, जातिभेद, भाषाभेद आदि नहीं था। देव, मनुष्य, राक्षस, असुर, गन्धर्व, किन्नर, वानर, ऋक्ष, पक्षि, गृध, नाग, दैत्य, दानव आदि वर्ग मानव नामक प्राणी के समाज के ही अंग थे, जो उनकी राष्ट्रियता वा वंष आदि के आधार पर इन नामों से प्रसिद्ध हुये। आर्य, अनार्य, दस्यु नाम का कोई वर्ग विष्वभर में कहीं नहीं था, बल्कि ये तीनों गुणवाची शब्द थे। यहाँ राक्षसी माता व मनुष्य ब्राह्मण पिता का एक पुत्र रावण अनार्य वा पापी कहलाया, तो उसी का अनुज विभीषण आर्य श्रेष्ठ कहाया। दैत्य प्रहलाद महान् आर्य हुआ, तो मन्थरा, शकुनि, दुर्योधन व धृतराष्ट्र जैसे मनुष्य अनार्यत्व के प्रतिरूप माने गये। हर अनार्य अर्थात् पापी दण्डनीय, तो हर आर्य (श्रेष्ठ) संरक्षणीय था। यहाँ जन्म नहीं बल्कि कर्म की पूजा थी। अपने पराये का भेद नहीं बल्कि विशुद्ध न्याय की व्यवस्था थी। सत्य एवं यथार्थ अहिंसा का साम्राज्य था, जो महाभारत युद्ध के कुछ काल पूर्व तक यथावत् चलता रहा।

(बोलो! किधर जाओगे? से उद्घृत पृष्ठ संख्या 15)

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Tuesday, April 9, 2019

देशहित में उचित मतदान करें


सभी देशवासी इस बार आप अपना सांसद चुनने नहीं, बल्कि भारत को देशभक्ति, ईमानदार, सुयोग्य, कर्मठ्, विश्वसम्मानित व सशक्त प्रधानमंत्री देने के लिए ही मतदान करें।

मतदान से पूर्व अपने आत्मा से अवश्य पूछें कि देश को कैसा प्रधानमंत्री चाहिए? आत्मा की आवाज ही परमात्मा की प्रेरणा का रूप होती है।

ध्यान रहे आत्मा के विरुद्ध किया गया कार्य ईश्वर की दृष्टि में घोर पाप है, अतः आत्मा की आवाज को अनसुना न करें और केवल भारत के लिए ही मतदान करें।

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

#Desh #Law #Congress #Bjp #Election #India #SankalpPatra #GhoshnaPatra

Thursday, April 4, 2019

उठो जागो और राष्ट्र को बचा लो!

प्यारे देशवासियो! एक सजग राष्ट्रप्रहरी की भाँति मैं देश की वर्तमान राजनैतिक दुर्दशा पर कुछ लेख लिखने को विवश हुआ। कुछ समर्थक मिले, तो कुछ मुझे पक्षपाती बताने वाले। इस श्रंखला में मैं आगामी दो माह के लिए र्वतमान राजनीति पर अन्तिम लेख लिख रहा हूँ। मेरे जागरुक देशवासियो! भारतीय सनातन मान्यता के अनुसार यह देश दो अरब वर्ष से कुछ ही कम वर्ष पुराना है। यह देश कुछ हजार वर्ष पूर्व तक विश्व गुरु, चक्रवर्ती तथा विश्व का सर्वाधिक समृद्ध राष्ट्र था। यह देश विश्व भर के देशों को सन्मार्ग दिखाने वाला परन्तु किसी भी देश पर बलात् अतिक्रमण नहीं करने वाला रहा है। यहाँ की वैदिक विश्ववारा संस्कृति सदैव विश्व बंधुत्व तथा संपूर्ण मानवता ही नहीं, अपितु प्राणिमात्र की हितचिंतक के रूप में प्रसिद्ध रही है।

दुर्भाग्यवश वैदिक ज्ञानविज्ञान व चरित्र के पतन के चलते भाई-भाई के बीच स्वार्थजन्य वैर-विरोध का जन्म हुआ और इसी के कारण महाभारत जैसा भीषण व राष्ट्रघाती ही नहीं, अपितु विश्व के दुर्भाग्य को जगाने वाला घोर युद्ध हुआ। इससे आर्य्यावर्त (भारत) देश का वैदिक ज्ञानविज्ञान का ऐसा हृास हुआ कि महान् ऋषि-मुनियों व देवों के वंशज वेदादि शास्त्रों से अनभिज्ञ होते चले गये। इससे न केवल ज्ञान, विज्ञान, तकनीक व चरित्र गिरा, अपितु देश की समृद्धि एवं सुख-शान्ति भी छिन्न- भिन्न होती चली गयी, हमारी शक्ति भी क्षीण हो जाने से विदेशी, जो कभी हमारे ही शिष्य हुआ करते थे, हम पर आक्रमण करके शासक बन गये। एक वैदिक धर्म के स्थान पर पारसी, यहूदी, ईसाई, मुस्लिम आदि सम्प्रदाय जहाँ विदेशों में जन्मे, वहीं भारत में भी वैदिक धर्म के स्थान पर जैन, बौद्ध, शैव, शाक्त, वैष्णव, वाममार्ग, चारवाक आदि हजारों मत-पन्थ चल पड़े। इस दुर्भाग्यजनक विभाजन के साथ-साथ ऋषि-मुनियों के ग्रन्थों में देशविरोधी, स्वार्थी व दुष्ट लोगों ने नाना प्रकार की घृणित मिलावट करके समाज में सामाजिक, लैंगिक व साम्प्रदायिक भेदभाव को जन्म दिया।

स्वार्थ, फलित ज्योतिष आदि अंधविश्वास, विषयासक्ति आदि दोषों के कारण राजा परस्पर लड़ने लगे। ऐसे समय में विदेशी आक्रमणकारियों, जिनके पूर्वज कभी इस आर्यावर्त के सम्राटों की शरण व सत्संग में आने में गौरव समझते थे, ने इस देश पर आक्रमण करने का उचित अवसर समझा और वे हमारे शासक बन बैठे। उनके इस कुकृत्य में इसी देश के कुछ गद्दार राजाओं, कथित पण्डित पुजारियों वा अन्य लोगों का सहयोग रहा। उन्होंने लाखों ही नहीं, अपितु करोड़ों भारतीयों का धर्म व राजनीति के नाम पर रक्त बहाया, हमारे ग्रंथों को जलाया, चोटियों व जनेऊ को काटा, माताओं का शीलहरण किया, दुधमुहें बच्चों तक को हलाल कर करके मारा, हजारों मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनायीं परंतु फिर भी हम भारतीयों में बुद्धि नहीं आयी। इस देश के हजारों वीर क्षत्रियों ने अपने प्राणों की बलि दी, शत्रुओं से जमकर लोहा लिया, क्षत्राणियों ने जौहर किए, बच्चे अनाथ हुए, समाज के सभी वर्गों ने अपने-2 ढंग से शत्रुओं के साथ युद्ध में राजाओं का साथ दिया परंतु कुछ गद्दारों ने प्रलोभनों में फंसकर अथवा पारस्परिक ईर्ष्या द्वेषवश शत्रुओं की चरण वंदना में ही अपना अहोभाग्य समझा। उन धूर्त राष्ट्रघाती लोगों ने अपने स्वार्थ को राष्ट्र से बड़ा माना, उन्होंने अपने ही भाइयों व देशवासियों से अधिक विदेशी लुटेरों व हत्यारों को अपना हितैषी माना और वे कुछ मुद्रा व पद के लोभ में शत्रुओं के द्वारा खरीद लिए गये, उन्हें दासता में ही सुख दिखाई देने लगा।

अहो! मेरे अभागे भारत! तेरा भी कैसा दुर्भाग्य था, जो दुष्ट पापियों से पददलित हो गया। यहां गौरी, गजनवी, तैमूर, बाबर, अकबर, औरंगजेब, जनरल डायर आदि कितने ही विदेशी खूनी हत्यारे आये और हमारी हत्यायें करते-2 भी हमारे शासक ही नहीं बल्कि आदर्श भी बन गये। पृथ्वीराज चौहान, महाराणा कुंभा, महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप, राणा पूंजा, हकिम सूरी खां, वीर दुर्गादास राठौड़, गुरु गोविंद सिंह, बन्दा वैरागी, छत्रपति शिवाजी, दुर्गावती, लक्ष्मीबाई, झलकारी बाई, मंगल पांडे, तात्या टोपे, सुभाष बोस, भगत सिंह, वीर सावरकर, बिरसा मुंडा, बिस्मिल, अशफाक, रोशन सिंह, लाला लाजपतराय, स्वामी श्रद्धानंद, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद आदि कितने ही वीरों ने विदेशी दुष्टों से लड़ते-लड़ते अपने प्राणों की आहुति दे दी। इनके बलिदानों के कारण देश स्वतंत्र तो हुआ परंतु स्वतंत्रता के नाम पर काले अंग्रेजों को सत्ता का हस्तांतरण मात्र हुआ। हमारी शिक्षा, सभ्यता, संस्कृति, धर्म, संस्कार और गौरवपूर्ण इतिहास सबकी चिता जला दी। भूभाग के भी खंड-2 कर दिये गये परंतु सत्तासीन काले अंग्रेजों को सत्ता का स्वाद ऐसा लगा कि वे गोरे अंग्रेजों से भी अधिक लूटमार करने लगे, अपने ही महान् पूर्वजों को मूर्ख व दुर्बल मानने लगे, अपनी ही संस्कृति, सभ्यता का परिहास होने लगा। धीरे-धीरे ये पाप बढ़ते ही गये, आर्यों (हिन्दुओं, विशेषकर कथित सवर्णों) को विदेशी बताया जाने लगा, देवों, ऋषियों व श्रीराम, श्री कृष्ण आदि भगवन्तों को विदेशी लुटेरा बताया जाने लगा।

अहो! जिस देश के बहुसंख्यक हिंदू जिन देवताओं व इन महापुरुषों की पूजा करते हों, कोई इन्हें पूर्वज मानने में गर्व करते हों, अभिवादन में भी करोड़ों हिन्दू ‘राम-राम’, ‘जय श्रीराम’, ‘जय श्रीकृष्णा’, ‘जय शंकर’ की आदि शब्दों का प्रयोग करते हों, उसी देश में कोई इन्हें गाली दे, इन्हें विदेशी लुटेरा कहे, माता सीता व भगवती (पार्वती) को दुश्चरित्रशीला कहे, फिर भी इनके वंशज अथवा भक्त न केवल मौन बैठे रहें अपितु ऐसे राजनैतिक दलों को वोट देकर भारत का शासक भी बनाते रहें, यह इस पापी अभागे भारत में ही सम्भव है। जिन महर्षि दयानन्द सरस्वती ने स्वराज्य का सर्वप्रथम उद्घोष किया, वैदिक ज्ञान विज्ञान के उद्धार के साथ-2 भारतीय इतिहास व संस्कृति के पुनरुत्थान का बीज बोया, उन स्वामी दयानन्द सरस्वती को कोई अंग्रेजों का पिट्ठु तो कोई हिन्दू विरोधी कहें, यह इस मूर्ख व कृतघ्न बन चुके देश में ही संभव है।
मेरे प्यारे देशवासियो! इस अपने अभागे देश के दुःखद इतिहास पर अधिक आंसू न बहाकर वर्तमान घोर संक्रमण काल में आपको चेतावनी देना आवश्यक समझ रहा हूँ। यह देश अपने लगभग 72 वर्ष के लोकतंत्र में अंग्रजों की दासता से भी भयंकर अनेक कुकर्म कर रहा है। हमें ऐसे ही लोकतन्त्र में रहना व जीना पड़ रहा है। किसी भी राष्ट्र की सरकार राष्ट्र के नागरिकों के जीवन की दशा व दिशा को तय करने में अपनी बड़ी भूमिका निभाती है। सभी राजनैतिक दलों को अपने-2 ढंग से चुनाव लड़ने तथा सभी मतदाताओं, जो देश के भाग्यविधाता होते हैं, को अपनी-2 इच्छानुसार सरकार बनाने का अधिकार होता है। दुर्भाग्य से यदि मतदाता अपने विवेक से उचित चयन नहीं कर पाता, तो उसका दुष्परिणाम न केवल राष्ट्र अपितु विश्व को भी भोगना पड़ता है।

इस कारण प्रत्येक जागरूक प्रबुद्ध व देशभक्त नागरिक का परम कर्तव्य है कि वह राष्ट्र के नागरिकों में ऐसा विवेक जगाने का प्रयास करे, जिससे वे राष्ट्रहित में उचित व्यक्ति का चयन कर सकें। यद्यपि मैं इस बात से पूर्ण सहमत हूँ व दुःखी भी कि आज देश में कोई भी राजनैतिक दल व व्यक्ति ऐसा नहीं है, जो वैदिक भारत की सम्पूर्ण समझ रखता हो, जो वैदिक ज्ञान-विज्ञान व संस्कृति का वास्तविक हित चाहता वा ऐसा करने का साहस रखता हो, न कोई ऋषि दयानन्द का कृतज्ञ दिखाई देता है, पुनरपि देश को चलाना है, हमें देश में रहना ही है, तब इनमें से ही किसी एक को चुनना हमारी विवशता है। जो सभी को बुरा बताकर मुझे मौन रहने का परामर्श देते हैं, मैं ऐसे बन्धुओं से स्पष्ट निवेदन करना चाहता हूँ कि मैं योगश्वर भगवत्पाद श्रीकृष्ण जी का भक्त हूँ, न कि उनके बड़े भाई बलराम जी का। इस कारण धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र में भाइयों को लड़ता देख पलायन करना न तो मैं उचित मानता हूँ और न देशवासियों को ऐसा करने का परामर्श दे सकता हूँ। मैं तो इस पलायन को वर्तमान परिस्थिति में राष्ट्र के प्रति उदासीनता ही नहीं, अपराध भी मानता हूँ। आज मैं किसी नेता का दल से यह अपेक्षा नहीं करता हूँ कि वह इस राष्ट्र को पूर्ण गौरव प्रदान करेगा, तब मैं वर्तमान परिस्थिति में ये जो कर सकते हैं, उसी सीमा में अपने को सीमित करते हुए जानना चाहता हूँ कि क्या आप चाहते हैं-

1. अपने देश के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान व गौरव बचा रहे।
2. हमारी शिक्षा हमारे राष्ट्रिय स्वाभिमान को बचाने वाली व रोजगार देने वाली हो?
3. हमारे इसरो आदि वैज्ञानिक संस्थान, डी आर डीओ आदि रक्षा अनुसंधान संस्थान व अन्य शोध संस्थान सरकार द्वारा पूर्ण संरक्षित होते हुए विश्व में नये-2 कीर्तिमान बनाएं।
4. हमारे वैज्ञानिक रहस्यमयी मृत्यु के ग्रास न बनते रहें।
5. हमारी सेना सुदृढ़, आधुनिक अस्त्र, शस्त्र व तकनीक से समृद्ध तथा दुष्टदमन हेतु स्वतंत्र अधिकार से युक्त हो।
6. हमारी सेना हमारी सीमाओं की सुरक्षा करने में सक्षम बनी रहे। उसे देश के सभी नागरिक पूर्ण सम्मान देवें।
7. हमारे देश का विश्वभर में सम्मान बढ़े तथा कोई भी दुष्ट देश व आतंकवादी संगठन हमारी सुरक्षा को चुनौती देने का साहस न कर सके। ऐसा होने पर हमारी सेना उसे उसके घर में घुसकर मारने की क्षमता व स्वतंत्रता रखने वाली हो।
8. हमारा देश अपने स्वतंत्रता सेनानियों, वीर महापुरुषों, ऋषि-मुनियों व सेना के बलिदानी वीरों का सम्मान करने वाला हो।
9. हमारे किसान, मजदूर, उद्योगपति, कर्मचारी, विद्यार्थी सभी सुखी रह सकें। इनके लिए दूरगामी योजनाएं बनें, न कि तात्कालिक लाभदायी प्रतीत होने वाले झूठे वा सच्चे वादे।
10. हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़े और उसे विश्व में सम्मानजनक स्थान प्राप्त हो।
11. हमारे देश के नेता की एक हुंकार से विश्व के दुष्ट देश के नेताओं के हृदय की धड़कनें बढ़ जाएं।
12. देश में स्वच्छ, पारदर्शी व ईमानदार प्रशासन होवे।
13. देश की आन्तरिक सुरक्षा बनी रहे। देशद्रोहियों को सार्वजनिक मृत्युदण्ड मिले।
14. देश की संवैधानिक संस्थाओं (चुनाव आयोग, न्यायालय आदि) व जाँच एजेंसियों (ईडी, सी.बी.आई, एन.आई.ए. आदि) को सम्मान मिले।
15. कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक तथा पंजाब से लेकर नागालैण्ड तक भारत एक रहे।
16. हमारे देश के विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालयों तक सभी शिक्षण संस्थान अर्न्तराष्ट्रिय स्तर के बन सकें।

इसके साथ ही क्या आप चाहते हैं कि-

1. देश का इतिहास व ज्ञान-विज्ञान का नाम मिटाने की बात भी कोई गद्दार अपने मुख से कह न सके।
2. हमारी शिक्षा हमें विदेशी दास बनाने वाली न हो और न समाज में विघटन पैदा करने वाली हो।
3. हमारे शिक्षण संस्थानों में कोई देशद्रोही भारतविरोधी नारे लगाने का दुस्साहस नहीं कर सके और कोई राजनेता उस देशद्रोही को प्रोत्साहित करने का स्वप्न भी न देख सके।
4. कोई राजनैतिक दल देश की अस्मिता से खिलवाड़ न स्वयं कर सके और न खिलवाड़ करने को अपराधयुक्त घोषित करने का वादा न कर सके।
5. कोई चुनावी झूठे वादों से मतदाताओं को खरीदने के लिए स्वतंत्र न हो। वादा करने वालों से वादा पूर्ति हेतु आय का स्त्रोत बताने का भी बाध्यता होवे।
6. कोई सेना को दुर्बल बनाने का षड्यंत्र करने का दुस्साहस न कर सके और न उसका अपमान ही कर सके। प्रत्येक देशवासी को सोचना होगा कि यह सेना ही है, जो बर्फीले तूफानों में, तपते रेगिस्तानों में, पहाड़ों, घाटियों व जंगलों में, बाढ़ तथा सुनामी आदि आपदाओं, में गोली व गोलों में अपने प्राणों को हथेली पर रखकर देश के नागरिकों व सीमा की रक्षा करती है। उसके जागरुक रहने पर भी हम सुख की नींद सो पाते हैं, ऐसी सेना का देश में सर्वोच्च सम्मान होना चाहिए जो सेना की आलोचना करते हैं, उन्हें इन परिस्थितियों में सेना की भूमिका निभाने का साहस करना चाहिए। सुख-ऐश्वर्य-भोगियों को सेना के अपमान का अधिकार नहीं मिलना चाहिए।
7. हमारा नेता संसद से लेकर सड़क तक, देश से लेकर विदेश में अपनी बचकानी व असभ्य हरकतों से देश को लज्जित करने वाला न हो और न कोई क्षेत्रीय वा जातीय संकीर्णता में फंसा स्वार्थी व्यक्ति देश का नेता बन सके।
8. हमारा नेता बेईमान, भ्रष्ट व भ्रष्टों का पोषक न हो।
9. हमारा एक ही सर्वमान्य प्रधानमंत्री हो, न कि प्रधानमंत्रियों की एक पूरी फौज।
10. हमारा नेता पाकिस्तान आदि शत्रु देशों के नेताओं तथा आतंकवादियों को प्रसन्न करने वाला तथा भारत की निन्दा करने वाला कदापि न हो और यदि कोई ऐसा करे, वह कठोर दण्डनीय हो।
11. हमारे नेता साम्प्रदायिक व जातीय विष घोलने वाले न हों तथा इस आधार पर पृथक्-2 कानूनों के पक्षघर न हों।
12. कोई नेता कश्मीर अथवा अन्य किसी भी राज्य वा भूभाग को भारत से पृथक् करने की धमकी देन को साहस न करे।
13. कोई भी वास्तविक भ्रष्ट नेता देश पर शासन करना तो दूर, चुनाव भी न लड़ सके।
14. कोई भी विदेशी मानसिकता वाला अथवा विदेशी डी. एन. ए. वाला व्यक्ति हमारा शासक न बने।
15. इस देश में कोई और पाकिस्तान न जन्म लें और न कोई पाकिस्तान जिन्दाबाद व भारत मुर्दाबाद के नारे लगाने की दुष्टता कर सके।

यदि आप ऐसा चाहते हैं, तो आप सभी दलों की घोषणाओं, वादों पर ध्यान न देकर आप पिछले 72 वर्ष में उनके कार्यकाल को ध्यान से देखें, सभी की निष्पक्ष तुलना करें और उसके पश्चात् अपने सभी प्रकार से पूर्वाग्रहों व स्वार्थों को त्यागकर अपने निष्पक्ष व पवित्र आत्मा की आवाज सुनकर पार्टी, कथित जाति, सम्प्रदाय वा पारिवारिक पृष्टभूमि से ऊपर उठकर एक शक्तिशाली, बुद्धिमान्, साहसी, अति परिश्रमी, अनुशासित, देशभक्त, विश्वभर में सम्मानित एवं गम्भीर व्यक्तित्व वाले दूरदृष्टा नेता को प्रधानमंत्री बनाने में अपने मतदान का उपयोग करें तथा दूसरों को भी ऐसा करने को प्रेरित करें। आप चाहें तो देश बच सकता है और आप चाहें तो देश डूब भी सकता है। आओ! भारत की नैया के नाविको! इसे बचा लो। यदि यह बचा, तो हम सब बच जायेंगे, अन्यथा सब डूब जायेंगे। निर्णय आपको करना है। आप अपने दर्द का रोना रोते हैं अथवा देश का दर्द समझते हैं, यह आपका अधिकार है। मुझे तो देश के दर्द को वास्तविक रूप से समझने वाला कोई नेता दिखाई नहीं देता। मेरे वैदिक विज्ञान के अनुसंधान कार्य को पूर्णतः समझने वाला कोई दल दिखाई अब तक तो नहीं दिया, पुनरपि जो देश व मेरे दर्द को कुछ भी अंश में समझ सकता है, उसे ही चुनने का विकल्प हमारे पास हैं। इसलिए उठो! जागो और देश को बचा लो अन्यथा सब कुछ समाप्त हो जायेगा।

( वर्तमान राजनैतिक परिस्थिति पर अन्तिम लेख)

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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Tuesday, April 2, 2019

अब तो चेत जाओ!


कांग्रेस ने देशद्रोहियों को खुली छूट देकर देश के टुकड़े करने का मार्ग परोक्षरूप से प्रशस्त करने की घोषणा की।

भारत के टुकड़े करने के नारे लगाने, आतंकवादियों व पाकिस्तान को प्रोत्साहन देने की की छूट देने, कश्मीर में अपनी सेना की दुर्दशा करने की कांग्रेस ने खुली घोषणा की।

देशद्रोही कानून हटाने की कांग्रेसी घोषणा को भी क्या देशवासी सामान्य मान कर मौन बैैठे रह कर क्या पाकिस्तान, आतंकवादियों एवं देश के गद्दारों को प्रसन्न करेंगे?

क्या अब भी यह समझना कठिन है कि इस देश में कौन-2 दल देशद्रोही हैं और कौन देशभक्त?

क्या कश्मीर को भारत से अलग करने तथा सम्पूर्ण भारत को पाकिस्तान बनाने में अपना सहयोग देने हेतु ही मोदी जी का विरोध करेंगे?

✍ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

#Desh #Law #Congress #Bjp #Election #India #Deshdroh

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