Tuesday, March 26, 2019

शिकारियों के जाल



एक शिकारी प्रतिदिन पक्षियों का शिकार करने निकलता, उससे पूर्व कभी मन्दिर, तो कभी मस्जिद, कभी चर्च, तो कभी गुरुद्वारे में जाकर प्रार्थना करता कि मेरे जाल में आज अधिक से अधिक पक्षी फंसे। वह कभी गंगा नहाता, गंगाजल पीता, तो कभी कब्रों पर चद्दर चढ़ाता। यह देखकर पक्षी सोचते कि देखो! यह व्यक्ति कितना धर्मात्मा है! सभी धर्मस्थलों पर जा-जाकर भगवान् की पूजा कर रहा है, पवित्र गंगा में स्नान कर रहा है, आचमन कर रहा है। फिर वह शिकारी जंगल में जाकर अनाज के दाने बिखेरता और जाल बिछाता। अनाज के दाने देखकर पक्षी उसकी दयालुता के कायल हो जाते, और वह शिकारी कहीं छिप जाता।
पक्षी विचारते कि देखो! यह कितना निष्काम व्यक्ति है, जो हमें दाना डालकर स्वयं दूर चला गया है। हमारी कृतज्ञता लेने की इच्छा भी नहीं करता। पक्षी एक दूसरे से उस शिकारी की प्रशंसा करते और झुण्ड के झुण्ड उन दानों को चुगने आते। दाने चुगते और उसकी प्रशंसा करते जाते, उसके भक्त बन जाते। दाने चुग कर ज्यों ही वे उड़ने को तैयार होते, तो उड़ नहीं पाते, क्योंकि वे स्वयं को जाल में फंसा हुआ पाते। जब सब पक्षी जाल में फंस जाते, तब शिकारी आता और सबको पकड़ कर घर ले जाता। फिर सभी को गर्दन मरोड़-मरोड़ कर मारता। कभी झटके से मरोड़ देता, तो कभी हलाल करके तड़पा तड़पा कर मारता। उस समय उन मूर्ख व लोभी पक्षियों को उस शिकारी का वास्तविक रूप दिखाई देता और अपनी मूर्खता व लोलुपता पर पश्चाताप होता। परन्तु तब वे कुछ कर नहीं सकते, सिवाय मरने के। वे उस शक्तिशाली शिकारी से लड़ भी नहीं सकते, इस कारण मरते रहते।
आज देश में राजनेताओं द्वारा शिकारी की तरह ही इधर-उधर पूजा स्थलों पर पूजा, इबादत, प्रार्थनाएं की जा रही हैं। नदियों व सरोवरों में पवित्र होने का अभिनय हो रहा है, चुनावी घोषणाओं के दाने मतदातारूपी पक्षियों को लुभाने के लिए बिखेरे जा रहे हैं। ऐसे अनेक शिकारी विदेशी भी आये, इस्लामी शिकारी आये, अंग्रेज शिकारी आये। प्रारम्भ में उन्होंने भी शिकारी की भाँति दाने डाले, प्रलोभन दिये, जाल बिछाये, फिर जमकर जन संहार किया, धर्मान्तरण किया, परन्तु यह मन्दबुद्धि भारतीय फिर भी नहीं समझा और लगभग नौ सौ वर्ष गुलाम रहा, कोड़ों, लाठियों, लात व घूंसों की मार खाता रहा, फिर भी उनके तलुवे चाटता रहा। अपने देश के देशभक्त वीरों के साथ विश्वासघात करता रहा, विदेशियों के प्रलोभन में फंसता रहा, नहीं सुधरा। अनेक साधु-सन्त भी इसे सुधारने आए परन्तु उनकी भी बातें नहीं सुनीं। उनका भक्त भी बना, परमपिता परमात्मा की उपासना को छोड़कर उन सन्तों को ही ईश्वर मान कर चित्र पूजने में लग गया परन्तु उनकी बात कोई नहीं मानी और विदेशियों की दासता सहता रहा।
कहने को 1947 में देश स्वतन्त्र हुआ परन्तु रीति, नीति व संविधान वही रहा। वही शिकार का खेल देश के नेताओं द्वारा भी प्रारम्भ हो गया। देश के टुकड़े किए, लाखों हिन्दू व मुसलमानों का खून बहा, परन्तु शिकारियों को सत्ता का ही स्वार्थ था। उन्हें भारत विभाजन तथा लाखों नर संहार का कोई दुःख नहीं था। अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के नाम पर इन भारतीयों को बांटा, कथित जातियों के नाम पर विघ्वंसक कानून बने, महिला-पुरुष, बाल-युवा आदि के नाम पर परिवारों को तोड़ा। नेताओं ने सोचा कि कैसे भी भारतीय एकजुट न हो जाएं। वे देशभक्ति के संस्कारों को पास तक नहीं आने दें और ऐसा करके राजनैतिक शिकारियों द्वारा बिछाए जाल को मिलकर तोड़ न दें। इसके लिए जाल पर नाना प्रकार के दाने (लोभ) डालते रहे और भारतीय मदमस्त रहे। कभी गरीबी हटाओ के नारे लगे, कभी बेरोजगारी दूर करने के वादे हुए परन्तु न गरीबी हटी, न बेरोजगारी, 70-72 वर्ष हो गये, वादे आज भी दफन हुए पड़े हैं, परन्तु पक्षी अब तक भी नहीं समझे। वे शिकारियों के जाल तथा उनके उद्देश्य को आज तक नहीं समझे। अब 2019 चुनाव में यह खेल नाना रंगों में खेला जा रहा हैं। नेताओं को ज्ञात है कि यह भारतीय इतना लोभी व मूर्ख है, जो सदियों तक गुलाम रहने के पश्चात् भी अभी तक अज्ञानी व लोभी पक्षियों के स्तर की ही बुद्धि रखता है। इस कारण फिर सारे देश में जाल बिछ गया है, विभिन्न नेता शिकारी की भाँति अपने-2 ढंग से दाने डाल रहे हैं। शिकार अवश्य फंसेंगे। वस्तुतः कोई ऐसी पार्टी ही नहीं, जो झूठ के दाने न फैंकती हो, कोई कम तो कोई अधिक, तब भारतीय कहाँ जाएं? फिर आपसी ईर्ष्या द्वेष इतना है कि देश का भविष्य तो क्या, अपना भी भविष्य कौन सोचता है? उसे तो अपने-2 नेताओं में ही साक्षात् परब्रह्म दिखाई दे रहा है।
इन भारतीयों को इतना ज्ञान कहाँ है कि सबको जाल में फंसाकर कुछ नेता जब सत्ता प्राप्त करने में सफल होंगे, तब यहाँ साम्प्रदायिक हिंसा व वैमनस्य को बढ़ाने वाले तथा बहुसंख्यक को नष्ट करने वाले, ऐसे कानून बनेंगे, जो भारत के भाग्य को नष्ट करने में अपनी दुर्भाग्यपूर्ण भूमिका निभाएंगे। कथित जातियों को परस्पर लड़ाने वाले और अधिक घातक व पक्षपाती कानून बनेंगे, जगह-2 पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगेंगे और राज्यों की ओर से विद्रोही आवाज उठेगी, भाषा के नाम पर वैमनस्य होगा, राष्ट्रिय एकता की भावना समाप्त करने वाले कानून बनेंगे। देश के गांव-गांव, नगर-नगर एवं विद्यालयों से लेकर विश्वद्यिालयों, अनुसंधान संस्थानों, मीडिया एवं साहित्य के विभिन्न मंचों पर निर्ममतापूर्वक वेदादि शास्त्रों, सनातन वैदिक धर्म एवं हमारे महान् पूर्वजों, देवी-देवताओं एवं ऋषि-मुनियों को अपमानित किया जाएगा। देशद्रोह का कानून समाप्त किया जाएगा। आतंकवाद, पाकिस्तान व चीन इन सबसे बहुत आनन्दित होंगे। देश के विश्वविद्यालयों के हजारों कन्हैया कुमार जैसे देशद्रोही भारत के टुकड़े करने के मात्र नारे ही नहीं लगाएंगे, अपितु सांसद बनकर संसद में ऐसे नारे लगाएंगे। तब देश के टुकड़े करने के कानून बनाने से कौन रोकेगा? तब दानों के लोभ से जाल में फंसे भारतीयों को मेरी चेतावनी याद आयेगी, परन्तु वे कुछ कर नहीं सकेंगे।
उस समय भगतसिंह, सुभाष, बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद, रोशनसिंह, लाला लाजपतराय, ऊधमसिंह, अशफाक उल्ला जैसे क्रान्तिकारियों को आतंकवादी तथा हाफिज सईद, मसूद अजहर, दाऊद इब्राहीम जैसे आतंकवादियों को मासूम व निर्दोष बताया जायेगा। भारत पर चार बार आक्रमण करने वाले तथा आतंकवाद के माध्यम से हजारों-लाखों निर्दोष भारतीयों की हत्या करने वाला पाकिस्तान भारत सरकार को शान्तिप्रिय देश दिखाई देगा। भारतीय सेना के आत्मबल को नष्ट करके देश कई पाकिस्तानों का गर्भ, जो आज पल रहा है, जन्म लेकर कई पाकिस्तानों का जन्म होगा। भारतीय सेना के हाथ बांध दिए जाएंगे और वे देशद्रोहियों द्वारा पत्थर खाने को विवश होंगे, कोई उनके बलिदान को सम्मान नहीं देेगा, न कोई पाकिस्तान को दण्ड देगा, तब कौन माता अपने बैटे को सेना में भेजना चाहेगी, तब देश की सीमाएं कैसे सुरक्षित रहेंगी। पाकिस्तान व चीन के साथ सीमा पर तनाव के दिनों में चुप-चुप इन दोनों से सम्पर्क साधने वाले जब देश के कर्णधार बनेंगे, तब चीन व पाकिस्तान को भारत के टुकड़े करने के अभियान में कितनी सहायता मिलेगी?
यह सब सोचकर ही ऐसा प्रतीत होेता है कि यह देश पुनः अपने गुलामी के इतिहास को दोहरा सकता है। महर्षि दयानन्द व स्वामी श्रद्धानन्द जैसे महान् संन्यासियों के अनुयायी कहलाने वाले अनेक कथित आर्य आज इन्हें भूलकर कथित संन्यासी अग्निवेश के अनुयायी बन कर मेरे इन विचारों का भी विरोध करेंगे? मैं ऐसे महानुभावों से विनम्र निवेदन करता हूँ कि वे ईश्वर की साक्षी में विचारें कि क्या वे निष्पक्ष, सत्य व न्याय के मार्ग पर चलते रहे हैं? क्या वे कभी मिथ्या भाषण व पक्षपात नहीं करते हैं, क्या वे मेरी भाँति जीवन में स्वयं को सत्य वक्ता होने का दावा कर सकते हैं? यदि हाँ, तभी मेरे लेखों पर कोई विपरीत प्रतिक्रिया दें, अन्यथा मेरे विचारों पर गम्भीरता से विचार करें अन्यथा यह देश माँ-भारती के किसी भी उपासक के लिए रहने योग्य नहीं रहेगा। ईश्वर सब पर कृपा करें और भारतीयों में सद्बुद्धि आवे और यह देश बचा रहे, यही ईश्वर से प्रार्थना और आप सब से निवेदन है।

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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