Sunday, February 10, 2019

आरक्षण, जातिवाद, निर्धनता का स्थायी सर्वोत्तम समाधान

Related image

दुःख को छोड़ना और सुख को पाना इस धरती पर प्रत्येक प्राणी चाहता है। मानवेतर प्राणी अपनी भूख को शान्त करने हेतु दुर्बल प्राणी को मारकर खा भी जाते हैं, परन्तु ऐसा ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार ही होता है। संसार का सर्वोत्तम प्राणी मनुष्य तो ईश्वरीय मर्यादा को भूलकर केवल अपने मनोरंजन व इन्द्रिय लोलुपतावश दूसरों को सताने का पाप करता रहता है। काम, क्रोध, लोभ, द्वेष, अहंकार के वशीभूत मानव ने इस संसार में कितने-2 भयंकर क्रूर कर्म किये हैं? आज यह सर्वोत्तम कहाने वाला प्राणी मानव दूसरों की टूटी-फूटी झोंपड़ियां जलाकर स्वयं भव्य भवनों में विलास करना चाहता है, अपने ही दुःखी निर्धन भाई के हाथ से सूखी रोटियां भी छीनकर स्वयं स्वर्ण पात्रों में सुन्दर सरस व सुस्वादु भोजन करना चाहता है, दूसरे भाइयों के तन से जीर्ण शीर्ण वस्त्र भी खींच कर बहुमूल्य वस्त्रों से फैशन की ललक पूरी करना चाहता है, दूसरों का गला काटकर स्वयं अमर एकाकी जीवन जीना चाहता है।

प्राचीन वैदिक काल में ‘अज्येष्ठासो अकनिष्ठासः, ईशावास्यमिदं सर्वम्....तेन त्यक्तेन भु४जीथा’ ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’’......की भावना के अनुसार सभी मानव परस्पर भाई-भाई का व्यवहार करते हुये कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था की सुन्दर तथा सर्वहितकारी मर्यादा में रहा करते थे। परस्पर सहयोग, सद्भाव, करुणा, प्रेम का सुन्दर शान्तिमय वातावरण था। कालगति से महाभारत के उपरान्त वह सुन्दर वर्ण व्यवस्था जन्म पर आधारित क्रूर जातिव्यवस्था में बदल गयी, जिसने इस विश्वविख्यात देश को अन्धकार, दुःख, दरिद्रता, अविद्या, वैमनस्य, चरित्रहीनता व पराधीनता के गहन गर्त में धकेल दिया। दुर्भाग्यवश यह सब पाप वेद, मनुस्मृति एवं प्राचीन ऋषियों के नाम पर हुआ। उनके ग्रन्थों में पापपूर्ण प्रक्षेप (मिलावट), वेद की मनगढ़न्त दूषित व्याख्यायें, इन पापों की पोषक बनीं। इससे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र जन्म के आधार पर माने जाने लगे तथा इस व्यवस्था में जन्मना शूद्र वर्ग व महिलाओं पर बीभत्स अत्याचार हुये। इससे वे अति निर्धन, अस्पृश्य व दासवत् जीवन जीने को विवश हुये।

उन्नीसवीं सदी में कई समाज सुधारकों ने इस पाप के विरुद्ध आन्दोलन चलाये परन्तु प्राचीन वैदिक वर्णव्यवस्था का शुद्ध स्वरूप फिर से लाने का प्रयास नहीं हो सका। आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने वेद एवं वैदिक मनुप्रोक्त वर्ण व्यवस्था का शुद्ध एवं सर्वहितकारी स्वरूप भारत के समक्ष लाने का भारी पुरुषार्थ किया और इसी आधार पर अपने गुरुकुलों में सबको समान शिक्षा, समान भोजनादि व्यवस्था से जातिभेद व छुआछूत मिटाकर हजारों दलित कहाने वाले भाइयों को वेदपाठी ब्राह्मण व सर्वपूज्य संन्यासी बनाया। दुर्भाग्य से देश के नेता व समाजशास्त्री इस व्यवस्था को समझ नहीं पाये। कुछ ने तो छूआछुत व जातिभेद का दोष ही वैदिक वर्ण व्यवस्था के सिर पर मढ़ दिया। अंग्रेजी शिक्षा में पढ़े-बढ़े कथित विद्वानों व नेताओं से वैदिक संस्कृति के वास्तविक ज्ञान की आशा की ही कैसे जा सकती है? देश अन्ततः अंग्रेजों से स्वतन्त्र हुआ परन्तु अंग्रेजी शिक्षा सभ्यता व विचारों का और भी भयंकर रूप से दास बन गया। उस समय दलित वर्ग के नेता डॉ. भीमराव अम्बेडकर, जो स्वयं जातिगत भेदभाव व छुआछूत के दंश का दारुण दुःख भोग चुके थे, ने देश के उन करोड़ों जन्मना शूद्रों (दलितों) की दयनीय दशा को देखकर उन्हें कुछ सम्बल प्रदान करने हेतु दया व सद्भावनावश दस वर्ष के लिये आरक्षण व्यवस्था को लागू किया। यद्यपि सिद्धान्ततः वे इसे दलितोद्धार का स्थायी समाधान नहीं मानते थे तथा महात्मा गांधी, पं. नेहरू इस नीति के विरुद्ध थे, पुनरपि दस वर्ष के लिये व्यवस्था लागू की गयी। यद्यपि डॉ. अम्बेडकर की शिक्षा व जीवन के विकास में आर्य समाज से प्रभावित बड़ौदा व कोल्हापुर के नरेशों ने महती भूमिका अदा की पुनरपि डॉ. अम्बेडकर दलितोद्धार के कार्य में आर्य समाज के विचारों व कार्यों का कोई उपयोग नहीं कर पाये। मैं यह मानता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर ने उस आरक्षण व्यवस्था को अपने राजनैतिक स्वार्थवश लागू नहीं किया बल्कि वे वास्तव में दलितों के प्रति सद्भावना रखकर उन्हें सम्मानित जीवन प्रदान करना चाहते थे। खेद है कि 

प्रथम पीढ़ी के राजनेताओं के पश्चात् देश के नेताओं ने आरक्षण को दलित हित का बहाना बनाकर अपने वोट का हथियार बना लिया और अंग्रेजों की ‘फूट डालो-राज करो’ की नीति को ही अपनाया। यदि उन राजनेताओं में दलितों के हित की जरा भी भावना होती, तो वे दस वर्ष के बाद आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करके यह देखते कि कितने दलितों को इससे लाभ हुआ और कितने इससे वंचित रहे? वे यह भी देखते कि इससे देश की प्रतिभाओं के साथ कोई अन्याय तो नहीं हुआ? जिन दलितों का जीवन स्तर सामान्य हो गया था, उन्हें आरक्षण के लाभ से मुक्त करके अन्य नारकीय जीवन जीने वाले दलितों को इसका लाभ देते हुये प्रति पांच वर्ष बाद समीक्षा करते, तो अब तक कोई दलित गरीब रहता ही नहीं और सही अर्थों में कहें तो कोई दलित, दलित (दबा हुआ, शोशित) रहता ही नहीं। परन्तु ऐसा करने से चतुर नेताओं को वोट का उतना लाभ नहीं मिलता और न आरक्षण का लाभ उठाने वाले अपनी पीढ़ी दर पीढ़ी को सर्वदा के लिये अधिकतर सम्पत्तिसम्पन्न बना पाते। दुर्बल गरीब कभी आन्दोलन नहीं करता, बल्कि वह अपने नेताओं, विशेषकर अपने ही वर्ग के अमीरों का मुहरा बनकर अपनी हानि ही करता है। इस प्रकार दलित के साथ किसी ने सच्चा न्याय नहीं किया। श्री विश्वनाथ प्रतापसिंह के शासन में मण्डल कमीशन की सिफारिशें लागू करके देश के नेताओं ने अपने स्वार्थ के लिये अनेकों युवकों को जीवित जला डाला, परन्तु किसी भी राजनैतिक दल की आँखों में एक बून्द आँसू नहीं आया। उसके पश्चात् सारे देश में जातीय वैमनस्य की आग तेजी से फैलती रही और नेता लोग तमाशा देखते रहे। जाति के नाम पर संगठन, सेनाएं, विद्यालय, धर्मशालाएं, छात्रावास, मन्दिर बन रहे हैं। ईश्वर को भी जातियों में बांट दिया है। वोटों में जातिवाद सबसे बड़ा मुद्दा होता है। लाभ चन्द नेताओं व चतुर लोगों को होता है और सामान्य जन परस्पर अनावश्यक वैमनस्य की आग में जलते हैं। 

इस अभागे देश में समर्थ व दबंग कहाने वाले भी स्वयं को पिछड़ा मनवाने तथा आरक्षण को अधिकार बताकर देश में तोड़-फोड़, आगजनी, हिंसा व घृणा की आग लगाने का कार्य करते हैं। सरकारी सम्पति को क्षतिग्रस्त करके जनसाधारण को त्रस्त किया जाता है। नेता उन्हें भड़काने का कार्य करते हैं। कहीं पुलिस आन्दोलकारियों से पिटती है, तो कहीं उन पर गोली-लाठी चलाने को विवश होती है। नेता तमाशा देखते हैं। जिन्हें आरक्षण मिला हुआ है, वे विशेष आरक्षण की मांग करते हुए अपने जनबल के आधार पर देश को बंधक बना लेते हैं। रेल व बसों को आग लगाते हैं, रेल की पटरियां उखाड़ते, विद्यालयों, चिकित्सालयों को नष्ट करते हैं। यह सत्य है कि लोकतन्त्र में सबको अपनी मांग करने का अधिकार है परन्तु जातीय नेता इसके लिये तोड़फोड़ कराते रहें, देश व राज्य को बन्धक बना लें, देश व राज्य के आन्दोलनकारियों की अपेक्षा कई गुने बड़े जनसमूह को त्रस्त करें, पुलिस गोली चलाने को विवश हो और युवा मरते रहें, राजनैतिक दल तमाशा देखते रहें, तो कोई आरक्षण के पक्ष वा विपक्ष में भड़काऊ बयान देकर आग में घी डालते रहें, यह सब इस देश को कब तक जीवित रख पायेगा? इस देश में कुछ ऐसे खतरनाक विदेशी षड्यन्त्रकारी संगठन भी हैं, जो कथित सवर्णों को विदेशी बताकर शेष भारतीयों को गैर हिन्दू व देश का मूल निवासी कहकर भावी गृहयुद्ध की तैयारी में जुटे हैं। जिनकी योजनाएं गुप्त हैं, और यदि गुप्त नहीं हैं, तो और भी लज्जाजनक स्थिति है कि जानकर भी कोई कार्यवाही नहीं हो रही। 

शोक है कि इस देश में वर्गविहीन सामाजिक समरसता की स्थापना हेतु आरक्षण आदि की अस्थायी व्यवस्था की गयी थी, उसी कुव्यवस्था ने देश में सामाजिक वर्ग संघर्ष की आग लगा दी है। जन्म के आधार पर विघटनकारी अन्यायपूर्ण जो जाति व्यवस्था मध्यकाल में थी, वही आज भी है, बस क्रम उलट गया है। जन्म, मृत्यु, विद्यालय, चिकित्सालय, छात्रावास, बैंक सर्वत्र जाति पूछी जाती है। कोई सरकारी कार्य बिना जाति पूछे व लिखे नहीं होता है। शोक है कि इस अभागे देश में कोयले की कालिख मिटाने हेतु साबुन के स्थान पर कोयलों को ही घिसा जा रहा है। आज इस देश में हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध पुनः जैन, सिख, ब्राह्मण, राजपूत, बनिया, जाट, राव, यादव, गुर्जर, लोधे, कुर्मी, रेबारी (बघेल), प्रजापत, घांची, चारण, विश्नोई, मेघवाल, जाटव, वाल्मीकि, भील, मीणा आदि कहाने वाले करोड़ों हैं परन्तु सारे भारत में एक भी भारतीय कहाने वाला दिखाई नहीं देता, तब मानव का पुतला तो कहाँ से आयेगा? परमात्मा ने तो सबको मानव बनाया था परन्तु यह मानव न बनकर पता नहीं क्या-क्या बन गया? इसने तो परमात्मा को भी जातियों में बांट दिया। काश! इस देश का नागरिक मानव न सही, तो भारतीय तो बन जाता, तो आज हमारा देश जाति और मजहबी आग में यों जल नहीं रहा होता। परन्तु देष की राजनीति भारतीयों के हित के लिये नहीं है, बल्कि चन्द राजनेताओं के लिये है। आप सोचेंगे कि समस्या को बताने मात्र से काम नहीं चलेगा अपितु उसका समाधान भी करना होगा। 

सुधी पाठकगण! मैं इसका पूर्ण व सर्वमान्य समाधान तो बताऊंगा ही परन्तु उससे पूर्व आपसे जानना चाहूँगा कि अब तक की आरक्षण व्यवस्था का परिणाम क्या रहा है? आज जब मैं महानगरों की झुग्गी झोंपड़ियों, फुटपाथों आदि में लाखों दीन दुःखियों, जिनकी आँतें भूख से सूख चुकी हैं, को नारकीय जीवन जीते देखता हूँ। देहाती क्षेत्रों में आज भी अनेक मेघवाल, पाऊआ, जोगी, नट, सपेरे, सफाई कर्मियों, भील, गरासिया आदि की दयनीय दशा को देखता हूँ (इनमें जाटव वा मेघवालों में से तो कुछ विकसित भी हुये हैं) तो सोचता हूँ कि क्या इन दलित कहाने वालों के लिये कोई आरक्षण व्यवस्था नहीं है? कथित पिछड़े वर्ग में कुछ समुदाय एकता की लाठी के बल पर आरक्षण पा चुके हैं। आश्चर्य है कि जो आरक्षण दया भावनावश सुविधा मात्र था, वह आज मूछों व पगड़ी की पहचान बन गया है। पहिले वीरता की पहचान स्वयं को उच्च कहलाने में थी, उसी में पगड़ी व मूछों की शान थी परन्तु आज स्वयं को पिछड़ा व दलित कहाने हेतु देश की व्यवस्था को ठप करने में शान समझी जाती है। पहिले मांगना बुरा समझा जाता था परन्तु आज यह अधिकार समझा जा रहा है। आज आई.ए.एस. अधिकारी से लेकर राष्ट्रपति बनने पर भी दलित, पिछड़े का अभिशाप नहीं छूट पा रहा है। ऐसे ही लोग जातीय आरक्षण की आग को बढ़ावा देते हैं। यदि कोई आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग करता है, तो ये गरीबों, मजदूरों, किसानों, छात्रों को जाति के नाम पर भड़का कर उपद्रव खड़ा कर देते हैं। गरीब दलित व पिछड़े बेचारे जानते ही नहीं हैं कि उनके नेता उनके हित के लिये नहीं, बल्कि अपनी सन्तानों व पीढ़ियों के स्वार्थवश आर्थिक आधार पर आरक्षण का विरोध करते हैं। क्रीमीलेयर को आरक्षण देने की मांग क्या देश में करोड़ों गरीब दलितों, पिछड़ों, किसानों, मजदूरों, अल्पवेतनभोगी कर्मचारियों के हित के लिये है अथवा उनके नाम पर आरक्षण की वकालात कर इनमें से बने अमीरों, नेताओं व उच्च अधिकारियों के स्वार्थ में लिये है। आरक्षण के लाभ से उच्च पदों पर आसीन ये जातीय नेता जानते हैं कि यदि आर्थिक आधार पर आरक्षण व्यवस्था हो गयी, तो आरक्षण का लाभ दीनहीन झुग्गी झोंपड़ी में रहने वाले लोग, मजदूर, किसान, गरीब ले जायेंगे और उनकी सन्तानों को इसका लाभ नहीं मिलेगा और वे गरीब भी शीघ्र सम्मानजनक जीवन जीने लगेंगे, फिर उनकी नेतागिरी कैसे चलेगी? जरा सोचें कि कोई दलित वा पिछड़ा नेता क्या गरीब भी है? कोई अधिकारी क्या गरीब है, तब वे क्यों आर्थिक आधार पर आरक्षण को स्वीकार करेंगे? आज जिन्हें पांच सितारा होटलों की सुविधाएं सन्तुष्ट नहीं कर पातीं तथा अपने जन्म दिन पर अरबों रुपयों की वसूली करते तथा अपने जीते जी अपनी ही मूर्तियों का अनावरण स्वयं करके करोड़ों रुपया बहायं वे भी स्वयं को दलित बताकर दलितों के हित की बात करें, यह इस अभागे व मूर्ख देश में ही सम्भव है। यह करोड़ों दलितों वा गरीबों के साथ क्रूर मजाक है। सत्ता उनके हाथ में है, गरीब के हाथ में तो वोट है, जिसे देना कहाँ है, यह भी वह नहीं जानता। बेचारा जाति के नाम पर भावुक होकर वोट देता जाता है और नरक में पड़े ही रहना उसके भाग्य में है। आज इस जातीय आरक्षण व्यवस्था ने देश में दलितों में दलित व पिछड़ों में पिछड़े पैदा कर दिये हैं। जाटों, पटेलों, गुर्जरों का आन्दोलन, भीलों द्वारा अनुसूचित जनजाति में अलग आरक्षण की मांग, रेबारी आदि समाजों द्वारा भी जनजाति में सम्मिलित होने की मांग, इसी पाप का परिणाम है। गुर्जर आदि ओबीसी में अपने आरक्षण को असुरक्षित अनुभव कर रहे हैं। वे पूर्वी राजस्थान के मीणा समाज के जीवन स्तर को अपने से अच्छा देख रहे हैं, इस कारण उनमें रोष स्वाभाविक है। इधर गुर्जर आदि के जनजाति में सम्मिलित होने से भील, मीणा आदि अपने अधिकार छिनने से भयभीत हैं। इस कारण वे विरोध का बिगुल बजा रहे हैं। सेनाएं बनाकर परस्पर युद्ध का आह्वान भी कभी कभी हो रहा है। इस सबका परिणाम क्या होगा, कोई सोचने वाला नहीं है। 
   
पाठकगण! अब मैं संक्षेप में सभी समस्याओं के समाधान हेतु दो उपाय बताता हूँ।

प्रथम समाधान- प्रथम यह कि सभी प्रकार की आरक्षण व्यवस्था को पूर्णतः तत्काल प्रभाव से समाप्त करके देश के सभी क्षेत्रों व सभी वर्गों का आर्थिक सर्वेक्षण होवे। जो गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने वाले हैं, उनको ही आरक्षण का लाभ मिले। इस देश में गरीब व अमीर दो ही वर्ग माने जायें परन्तु विशेष योग्यता वाले पदों पर आरक्षण न देकर गरीब को पढ़ने व बढ़ने हेतु सुविधाएं मिलंे, क्योंकि गरीब कभी भी धनी, तो क्या सामान्य स्तर की सुविधा पाने वालों से भी प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता।

यह भी ध्यातव्य है कि देश के निर्धन वर्गों वा व्यक्तियों के सर्वेक्षण के समय इस बात की भी जाँच की जावे कि वे निर्धन क्यों हुये हैं? कई बार देखा जाता है कि कामचोरी, आलस्य, प्रमाद, नशाखोरी, जुआ, फिजूलखर्ची, अधिक सन्तान पैदा करके अपने वोट बढ़ाने तथा फिर संख्या के बल पर अधिकारों के लिये संघर्ष करने की भावना रखना आदि दोष भी निर्धनता के कारण होते हैं। अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिम वर्ग में सन्तानों व पत्नियों की बहुलता एक आम रोग है, जिसे वे मजहबी कारणों से उचित मानते हैं। ऐसे सभी कारणों को दूर करने का उपाय साम, दान, दण्ड, भेद आदि सभी विधियों से करने का यत्न किया जाना चाहिए। जो व्यक्ति सुधार का विरोध करें, उन्हें कोई भी राजकीय सहायता नहीं दी जानी चाहिये। यदि वे लोग इन दोषों के साथ जनसंख्या वृद्धि करके राष्ट्रिय एकता व अखण्डता को चुनौती देने की भावना रखते हों, तो उन्हें तत्काल कड़ा दण्ड देना चाहिये। हमें अपने इतिहास की भूलों व गौरव दोनों से ही शिक्षा लेकर राष्ट्र को सशक्त, अखण्ड व समृद्ध बनाने का प्रयास करना चाहिए।

द्वितीय परन्तु सर्वोत्तम समाधान- इससे भी उत्तम बल्कि सर्वोत्तम स्थायी उपाय यह है कि देश में अनिवार्य शिक्षा लागू होवे। जो माता पिता बच्चों को नहीं पढ़ायें, उन्हें दण्ड मिले। अति गरीब माता पिता, जो बालकों की भीख व मजदूरी पर ही आश्रित हैं, उन्हें वृद्धावस्था पेंशन वा वृद्धाश्रम की सुविधा मिले। राष्ट्रपति से लेकर गरीब भिखारी, दलित, पिछड़ा, सवर्ण, उद्योगपति सभी के बच्चों के लिये सर्वत्र एक समान सुविधा वाले विद्यालय होवें। सब छात्रों का खान पान, रहन सहन समान होवे। निजी रूप से किसी भी छात्र को कुछ भी सुविधा पाने का अधिकार नहीं हो। निजी शिक्षण संस्थान व निजी छात्रावासों पर पूर्ण प्रतिबन्ध होवे। किसी भी सरकारी कार्य में जन्मना जाति का कोई भी स्थान न हो। वर्तमान में सर्वशिक्षा तथा पोषाहार के नाम पर शिक्षा व्यवस्था का सर्वनाश कर डाला है? केवल साक्षर करने वा इसके भी फर्जी आंकड़े भरने व पोषाहार चोरी करने हेतु विदेशों से भीख मांग-मांग कर देश के कुछ अधिकारी व नेता पूंजीपति बनते जा रहे हैं, जो गरीब बच्चों के ग्रास को भी छीनकर क्रूर अपराध कर रहे हैं। हा हन्त! परन्तु इस मनुप्रणीत व्यवस्था में ऐसा नहीं होगा। फिर विद्यालयों से निकलकर योग्यतानुसार काम मिले। तब गरीब-अमीर, पिछड़ा-दलित-सवर्ण का भेदभाव समाप्त हो जायेगा। कोई भी आरक्षण की मांग नहीं कर सकेगा। नेताओं को उपद्रव कराने का अवसर नहीं मिलेगा। कोई पूछेगा कि इतना व्यय शासन कैसे करेगा, उसका उत्तर यह है कि जब माता पिता को बच्चों के पालन पोषण, शिक्षा व चिकित्सा आदि की चिन्ता से मुक्ति मिल जायेगी, तो वे प्रसन्नता से शासन को अधिक कर देंगे। कर व्यवस्था चुस्त हो। सारे देश में केवल भारतीय, उससे भी आगे बढ़कर मानव ही दिखाई देंगे। जातीय व साम्प्रदायिक संघर्ष बन्द हो जायेंगे। गरीब व अमीर का भेद समाप्त होकर अनेक प्रकार के आतंकवाद से भी देश मुक्त होकर यह राष्ट्र एकता, अखण्डता, समरसता, सुख, समृद्धि एवं विद्याबल से विश्व में एक महाशक्ति बन सकेगा। सबकी पगड़ी व मूंछों का सम्मान बचेगा। देश का गौरव बढ़े, यह पुनः जगदगुरु व चक्रवर्ती देश बने, इसके लिये प्रत्येक देशवासी को उठने की आवश्यकता है। देश बचेगा, तो सब बचेंगे और देश मर गया, तो सब मिट जायेंगे। आयें, हम अपने धर्म व कर्तव्य को समझ कर इस देश को पुनः महान् बनायें।

नोट- वर्तमान विवेकहीन आरक्षण व्यवस्था में परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने वाले भी चयनित हो जाते हैं और अति उच्च योग्यता वाले सवर्ण रह जाते हैं। न केवल अनुत्तीर्ण अपितु शून्य अंक वाले भी विज्ञान, गणित जैसे विषयों के अध्यापक बन जाते हैं। जरा विचारें! कि ऐसे शिक्षक क्या पढ़ायेंगे? उनसे पढ़ने वाले देश के कितने बच्चों का भविष्य नष्ट होगा? उन नष्टभविष्य बच्चों में से कितने बच्चे आरक्षित वर्ग वाले भी होंगे, तब इन चालक, स्वार्थी नेताओं ने एक व्यक्ति को लाभ दिलाने के लिये हजारों जीवन बलिदान कर दिये। इसी प्रकार अयोग्य डॉक्टर, इंजीनियर, अन्य अधिकारी आदि बनने से देश को विनाश की आग में झोंककर राजनैतिक रोटियां सेकी जा रही है। 

निवेदन- क्या हमारी सर्वहितकारिणी व्यवस्था पर ये स्वार्थी नेता कभी विचार कर पायेंगे अथवा वर्तमान की स्वार्थ, अन्याय, पक्षपात, सामाजिक विध्वंस एवं राष्ट्र की पतनकारिणी अव्यवस्था को ही तब तक ढोते रहेंगे, जब तक कि यह राष्ट्र समाज पूर्णतः नष्ट-भ्रष्ट न हो जाये। बोलो मेरे कथित समाजवादी, समरसतावादी पाठक! हृदय पर हाथ रखकर बोलो! आप किधर जाओगे? उत्थान के मार्ग वा पतन की राह पर? निर्णय आपको करना है। हाँ, निर्णय करते समय अपने स्वार्थों को दूर रखना। केवल राष्ट्र व समाज का स्थायी हित ही देखना। 


आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक, वैदिक वैज्ञानिक
अध्यक्ष, श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास



2 comments:

शैलेश कुमार पाण्डेय said...

💐💐सही कहा आपने पर स्वयं जो मूर्ख नेता है कभी भी नहीं मानेंगे क्योंकि वे जितने लोगों को मूर्ख बनाते हैं उतने बड़े नेता बनते हैं अधिकतर ऐसे ही हैं बस छिपकली की तरह छिपने की लिए किसी महापुरुष के चित्र का सहारा देते हैं🙏🙏🙏

Unknown said...

जनकल्याण हेतु इस व्यवस्था को ठीक करना बहुत जरूरी है लेकिन मार्ग बताए हम समविचारी व्यक्ति संगठित होकर विरोध करे

Recent post