Sunday, December 30, 2018

विदेशी नववर्ष एवं विधवा माँ


एक युवक अपनी विधवा माँ के साथ रहता था। उसके पिता की मृत्यु कुछ वर्ष पूर्व भाईयों के कलह में हो चुकी थी। कभी उसकी माँ सधवा थी तथा संसार में सर्वोच्च स्थान प्राप्त ज्ञान, विज्ञान, शक्ति व समृद्धि की प्रतीक थी। विधवा होने के उपरान्त भी माँ अपने पति की समृद्ध विरासत के बल पर उस युवक को पाल रही थी। तभी किसी बाहरी ठग व दुष्ट महिला ने उस विधवा से मित्रता का ढोंग करके उसके साथ रहने लगी। धीरे-2 उस विधवा को दुष्ट महिला ने बंधक बना लिया और उसका सारा धन लूट कर अपने घर भेेज दिया। उसने उस युवक को अपनी माँ से विमुख करके अपनी चमक दमक व चालाकी से मानसिक दास बना लिया। सब कुछ लूट कर वह किसी प्रकार अपने घर वापिस भी चली गयी परन्तु युवक अवश्य उस दुष्ट महिला की दासता में पागल हो गया। वह अपनी विधवा माँ को भूल ही गया। वह बंधक घर में ही पड़ी परन्तु वह युवक उस दुष्ट महिला को ही माँ मानने लगा। उसका आचार-व्यवहार अपना लिया। उसी का जन्म दिन तथा उसके सम्बंधियों के जन्मदिन, पुण्यतिथि व अन्य पर्वों को धूमधाम से उन्हीं की विलासिता व प्रदूषित शैली के साथ मनाने लगा। इधर उसकी माँ बंधक बनी अपने कुपुत्र के व्यवहार को देखकर आँसू बहाती रहती और अपनी अन्तिम सांसे ले रही थी परन्तु वह कुपुत्र स्वच्छन्द जीवन जी रहा था, दूर बैठी उसी दुष्ट महिला के संकेतों पर मदारी के बन्दर की भाँति नाच रहा था। यदि उसका कोई संबंधी वा पड़ौसी उसे अपनी माँ को बंधन मुक्त करके सेवा करने तथा दुष्ट महिला से दूर रहने का परामर्श देता, तो वह उस परामर्शदाता को मूर्ख व पिछड़ा मानता और अपनी माँ को गालियां देता व सताता तथा उसे मूर्खा व दुष्टा कहकर सम्बोधित करता।

मेरे प्यारे देशवासियो! कहीं आप उस दिग्भ्रमित पागल युवक के मार्ग के पथिक तो नहीं बन गये हैं? यहाँ भी हमारी प्यारी माँ भारती पारिवारिक कलह महाभारत में वेदधर्म रूपी पति के मारे जाने से विधवा हो गयी थी। वैदिक धर्म का स्थान नाना मत मतान्तरों ने ले लिया था। इतना होने पर भी अर्थात् वेदधर्म से विमुक्त हो जाने पर भी यह विधवा हो चुकी माँ भारती शक्ति, विद्या, चरित्र व धन की दृष्टि से विश्व में सर्वोच्च स्थान प्राप्त थी। धीरे-2 विदेशी कुसभ्यताओं ने पैर जमाने प्रारम्भ किये, हूण, यवन, मुगल कितने ही आये और लूटते चले गये। इस्लामी कुसभ्यताओं ने इस भारती को पैरों तले रौंदा परन्तु फिर भी यह माँ भारती जैसे-तैसे जीवित भी रही और समृद्ध भी रही।

तभी इंगलैण्ड से अंग्रेजयित रूपी दुष्ट व क्रूर महिला चमक-दमक के साथ यहाँ अतिथि बनकर आयी और माँ भारती ने अतिथि को देव मानकर उसका स्वागत किया परन्तु धीरे-2 उस अंग्रेजयित ने माँ भारती को बन्धक बनाकर उसके पुत्र व पुत्रियों को कोड़ों, डंडों व गोलियों से यातनाएं दी और धीरे-2 वह दुष्ट अंग्रेजयित महिला शासक बन गयी। यहाँ से सोना, चाँदी, धनसम्पत्ति सब लूट-2 कर इंग्लैण्ड भेज दिया और उसका गरीब देश इंग्लैंड आर्थिक महाशक्ति बन गया। महर्षि दयानन्द सरस्वती से लेकर वीर सावरकर तक रानी लक्ष्मी बाई, मंगल पोण्डे, तात्यां टोपे, कुवंर सिंह, नेताजी सुभाष, लाला लाजपतराय, तिलक, भगतसिंह, स्वामी श्रद्धानन्द, बिस्मिल, अशफाक उल्ला, रोशनसिंह, हरदयाल, भाई परमान्द, राजगुरु, सुखेदव, चन्द्रशेखर आजाद आदि अनेकों क्रान्तिकारियों के कारण अंग्रेजी सत्ता को जाना भी पड़ा परन्तु वह सत्ता अंग्रेजयित को यहीं छोड़ गयी। माँ भारती के दो टुकड़े कर गयी, जाति व मजहबों में उसकी संतान को बांट कर खण्ड-2 कर गयी। आज विधवा माँ अपने ही घर में अंग्रेजयित की बंधक है। इस माँ भारती के पुत्र व पुत्रियां अंग्रेजयित पर पागल हैं। अपनी ही माँ भारती की पीड़ा को देखकर क्रूर परिहास करते हैं। अपने वैदिक धर्म रूपी पिता को भूल गये हैं, उसकी निन्दा करते हैं। माँ भारती व पिता वेदधर्म से सम्बंधित पर्वों को भूल गये हैं, परम्परा, कानून, वेशभूषा, भाषा, शिक्षा, आचार व व्यवहार सब भूलकर दुष्ट अंग्रेजयित के ही रंग में रंग गये हैं। उसी लुटेरी के भाषा, वेशभूषा, शिक्षा, कानून, परम्परा व आचार व्यवहार को अपना कर अपने को प्रबुद्ध व प्रगतिशील मानने की मूर्खता कर रहे हैं। आज मध्यरात्रि को नये ईस्वी सन् के स्वागत में पार्टियां होंगी, मदिरा के दौर चलेंगे, अश्लील व कामुक नृत्य व आतिशबाजी होगी। दीपावली पर चिल्लाने वाले न्यायाधीश व पर्यावरणवादी कोई बोलने का साहस नहीं करेगा। कोई यह भी नहीं सोचेगा कि 1 जनवरी को क्या हुआ था?

ईस्वी सन् के मद में मस्त हे भटकते देशवासियो! जरा मेरे कुछ प्रश्नों के उत्तर तो दे दो-
(1) 1 जनवरी को कौनसी घटना घटी थी, जिसका सम्बंध भारत देश व माँ भारती से है?
(2) इस घटना का मानव समाज से क्या सम्बंध है?
(3) क्या इसका सम्बंध किसी प्राकृतिक घटना वा सृष्टि आदि से है?
(4) क्या इस घटना से सम्बंधित समाज ने इस देश वा संसार पर कोई उपकार किया है?

अपने को बड़ा बुद्धिवादी मानने वाले महानुभावों को मैं ज्ञानयुद्ध के लिए आमन्त्रित कर रहा हूँ और साथ ही पूछ रहा हूँ कि इस अंग्रेजी कुसभ्यता वाले समाज ने हम पर कोड़े बरसाये, गोलियों से भूना, जेलों में निर्मम यातनाएं दीं, हमारी धन सम्पत्ति लूट ली, हमारी शिक्षा व सभ्यता को नष्ट कर दिया, हमारी माँ को बन्धक बनाया, उसी अंग्रेजयित के नव वर्ष के स्वागत में आप क्यों मदमस्त होकर नाच रहे हो? यह मूर्खता किसे प्रसन्न करने के लिए कर रहे हो? जरा अपनी विधवा माँ भारती के हाथ व पैरों में पड़ी हथकड़ी व बेड़ियों को तो देखो, वह पुकार-2 कर तुम्हारी ओर कातर दृष्टि से देख रही है और तुम इतने क्रूर बन गये कि अपनी माँ को छोड़कर लुटेरी विदेशी महिला को माँ मानकर पूज रहे हो। अहो! इससे बड़ी लज्जा की बात क्या होगी? अरे उस लुटेरी ने अनेक देशों को लूट कर, उन्हें दास बनाकर इस वर्ष को सम्पूर्ण संसार पर थोप दिया। उसे मानना यदि अन्तर्राष्ट्रिय विवशता है, तो भी उसके स्वागत में अपने स्वाभिमान को कुचलकर मदिरा व नृत्य का आजोयन क्यों? आतिशबाजी कर पर्यावरण विनाश का पाप क्यों? बोलो! मेरे देश के राजनेताओ! ब्यूरोक्रेट्स, सामाजिक कार्यकर्त्ताओ! धर्माचार्यो! बुद्धिजीवियो! छात्र-छात्राओ! बच्चो! किशोर-किशोरियो! युवक-युवतियो! वृद्ध-वृद्धाओ! अपने हृदय में झांक कर देखो, अपने मस्तिष्क की गहराइयों से सोचो! क्या आप उसी पागल व दास युवक की भाँति मूर्खता नहीं कर रहे हैं? अहो! मैं आपका आहवान करता हूँ। आओ! अपने धर्म व राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य को पहचानो। सबका आदर करो परन्तु अपने आत्मा का निरादर करके नहीं।

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

अंधेर नगरी गर्वगण्ड राजा


राज्य की गहलोत सरकार ने सत्ता संभालते ही पंचायतों के चुनाव में शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता को समाप्त करके लोकतंत्र में नवप्राण फूंक दिए। वैसे भी लोकतंत्र में विधायक व सांसद का तो क्या कहें, राष्ट्रपति बनने के लिए भी शैक्षणिक योग्यता नहीं चाहिए, फिर पंचायतों चुनाव में योग्यता की आवश्यकता ही क्या है? लोकतंत्र की यही तो पहचान है कि विद्वानों पर मूर्ख शासन कर सकें। कानून बनाने वाले अनपढ़ और कानूनों का पालन करने वा करवाने वाले प्रशासनिक व पुलिस अधिकारी व न्यायाधीश विद्वान्। अपराधी को दंड देने के लिए कानून बनाया जाता है परंतु कानून बनाने वाले सांसद व विधायक गंभीर अपराध करके भी चुनाव लड़ सकते हैं। अब कुछ नियंत्रण हुआ है। ऐसे लोकतंत्र के रखवाले लोकतंत्र की रक्षा ऐसे ही करते हैं, जैसे बिल्ली से दूध की रखवाली करवाई जाए। ये कानून के बनाने वाले, जो अनपढ़ व अपराधी भी हो सकते हैं, सर्वाेच्च न्यायालय के फैसले को रद्दी की टोकरी में फैंकने का अधिकार रखते हैं। वे किसी निर्णय को अमान्य भी घोषित करके जे.पी.सी. अर्थात् अपने जैसे सांसदों, जिनमें अनपढ़ व अपराधी भी हो सकते हैं, से निर्णय करने की मांग करते हुए संसद को बंधक भी बना सकते हैं। वास्तव में लोकतंत्र में इनका अधिकार ईश्वर से कम नहीं, तब देश के सभी न्यायालयों को बंद कर देना चाहिए। बड़े अपराधों की जांच व सजा का काम सांसद, राज्य स्तर पर विधायक तथा जिला वा पंचायत स्तर पर इनकें प्रतिनिधि निर्णय व जांच कर लें। सभी जांच एजेंसियों को भी समाप्त कर देना चाहिए। इस लोकतंत्र में स्वयं उच्च शिक्षा प्राप्त न होने पर भी उच्च शिक्षा मंत्री बन सकते हैं तथा केंद्र में वे मानव संसाधन विकास मंत्री बन सकते हैं। जिसने तमंचा भी देखा ना हो, वह रक्षा मंत्री तथा जो वृक्ष व पौधे का अंतर भी न जाने, वह कृषि मंत्री बन सकता है। वास्तव में लोकतंत्र की महिमा ही निराली है। भला जब देश के कर्णधारों के लिए विद्या की कोई आवश्यकता नहीं है, तब उनके अधीनस्थों पर यह शर्त क्यों थोपी जाए? सभी विद्यालय, विश्वविद्यालय, एम्स, आईआईटी व रिसर्च सेंटर भी बंद कर दें, तो सरकारी धन कितना बच जाएगा। जनसंख्या के अनुसार सबको नौकरियों का बंदर बाँट कर दिया जाए? कोई रोगी बीमार पड़े, तो स्वास्थ्य मंत्री के पास जाओ, उनके सहयोग में कुछ विधायक व सरपंच आदि आ सकते हैं। न कोई आरक्षण के लिए लड़ेगा, न बेचारे बच्चे पढ़ने में आंखें खराब करेंगे। जो पाठक मेरे इस सुझाव का विरोध करें, वे स्वयं सोचे कि शासक अनपढ़ रहकर देश चला सकते हैं, तब फिर अन्य क्षेत्रों में अनपढ़ क्यों नहीं काम कर सकते? इसके पूर्व कांग्रेस सरकार ने यह भी कानून बनाया था कि आठवीं कक्षा तक किसी को अनुतीर्ण नहीं किया जाएगा। भला जब कुछ विधायक व सांसद बिना पढ़े सबमें उत्तीर्ण हैं, तब बच्चों को ही क्यों अनुतीर्ण करें? इस लोकतंत्र में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की योग्यता निर्धारित है, तब क्या लोकतंत्र में शासक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से भी अयोग्य चाहिए? कार्यालय में झाड़ू लगाने के लिए भी शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता है परंतु संपूर्ण राज्य और देश को चलाने के लिए कोई योग्यता की आवश्यकता नहीं?
ऐसा लोकतंत्र भला देश को गहरे अंधकार में नहीं डुबोयेगा? वास्तव में वेदविद्या व ऋषि मुनियों की विद्या विज्ञान की उज्जवल परंपरा के अभाव में ऐसे ही कानून बनेंगे। वैदिक परंपरा में भगवान् मनु जी महाराज ने राजा को चारों वेद, वेदांग, विज्ञान, योग-अध्यात्म का पूर्ण विशेषज्ञ व पूर्ण जितेन्द्रिय, सत्यवादी व महान् योद्धा होना अनिवार्य बताया है।
अहो। क्या हो गया है मेरे आर्यावर्त भारत राष्ट्र को? जहाँ मूर्ख विद्वानों को नाच नचा सकते हैं, है न देश में अंधेर नगरी गर्वगण्ड राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा?

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Wednesday, December 26, 2018

देशद्रोही की परछाई


देशद्रोही की परछाई
एक गिद्ध किसी सड़े-गले मृत जानवर को खा रहा था। उसने अपने पंख फैलाकर उस मृत शव को ढक रखा था। तब किसी पथिक ने उस गिद्ध से कहा, ‘‘हे गिद्ध! तुम संसार के निकृष्ट पक्षी हो, जो सड़े-गले शवों को खाते हो। अब यह बताओ कि तुमने इस सड़े मांस को अपने पंखों से क्यों ढक लिया है? इससे भी गन्दा और कौन सा पदार्थ है, जिससे इस शव को बचाना चाहते हो?’’ इस पर उस गिद्ध ने कहा- ‘‘हे पथिक! यद्यपि मैं एक अधम प्राणी हूँ, जो अपने पूर्वकर्मों का फल इस जन्म में भोग रहा हूँ परन्तु फिर भी मैं घरती के सर्वश्रेष्ठ प्राणी माने जाने वाले कई मनुष्यों से श्रेष्ठ हूँ। मैं परमात्मा द्वारा बनाए नियमोें का पालन करता हूँ। मैं अपने घर की रक्षा करता हूँं, उससे विश्वासघात नहीं करता। इधर कुछ मनुष्यों को देखो! जो ईश्वरीय नियमों को तोड़कर क्या-2 कुकर्म कर रहे हैं? वे अपनों तथा अपनी मातृभूमि के साथ कैसे-2 विश्वासघात कर रहे हैं? वे इस देश में रहकर भी शत्रु देश की प्रशंसा और अपने देश की निन्दा करते हैं, वे विदेशी आक्रान्ताओं व आतंकवादियों की प्रशंसा तथा अपने महान् पूर्वजों की निन्दा करते हैं। वे अपने देश के टुकड़े-2 करने के लिए घातक प्रयास करते अथवा ऐसा प्रयास करने वालों को प्रोत्साहित करते हैं, वे सत्ता के लिए अपनों का ही खून बहाने की घृष्टता करते हैं, वे मानव समाज को जाति व मजहबों में बांटकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते तथा स्वार्थहित कुत्ते के समान परस्पर लड़ने व लड़ाने में ही लगे रहते हैं। वे अपने ही रक्षक सैनिकों को अपमानित करते रहते हैं, वे अपनी संस्कृति व सभ्यता से घृणा करते हैं।


हे धरती के सर्वश्रेष्ठ कहाने वाले मानव! मैं ऐसे गद्दार व देशद्रोही कथित मानव से स्वयं को श्रेष्ठ मानता हूँ। यदि ऐसा कोई देशद्रोही इधर से गुजरे, तो उसके पैर की घूल उड़कर इस सड़े-गले मांस पर न गिर जाये अथवा उस देशद्रोही की परछाई मेरे इस भोजन पर न पड़े, इस कारण मैं इस अपने पंखों से ढककर खा रहा हूँ।’’

यह सुनकर उस बेचारे सज्जन पथिक ने अपना सिर लज्जा से नीचे झुका लिया और मन ही मन सोचने लगा कि वास्तव में यह अधम प्राणी सत्य कह रहा है परन्तु वह दुःखी हो उठा कि मेरे देश के देशद्रोही, जो स्वयं को बहुत बुद्धिमान् व प्रगतिशील मानते हैं, भला क्या लज्जित होंगे।


✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

Friday, December 21, 2018

जाति व गोत्रों में पगलायी राजनीति


आज कुछ नेता महानुभाव विज्ञान के महान् ज्ञाता, अखण्ड ब्रह्मचर्यव्रती महावीर वज्रांगी श्रीमान् हनुमान् जी महाराज के वंश पर अनुसंधान करने में लगे हैं। कभी योगी आदित्यनाथ जी ने इन्हें दलित बता दिया। वैसे मुझे प्रतीत होता है कि योगी जी विद्वान् व राष्ट्रभक्त व्यक्ति हैं, उनके मुख से यह अकस्मात् मिथ्या बात निकल गयी, परन्तु उन्होंने इसका खण्डन भी नहीं किया। उसके पश्चात् एक महिला सांसद ने भी उन्हें दलित बताया। एक सांसद नबाव बुक्कल ने उन्हें मुसलमान, तो लक्ष्मी नारायण जी चौधरी ने जाट, श्री उदितराज ने आदिवासी, तो किसी ने ब्राह्मण बताया।

विशेष बात यह है कि यह रोग भाजपा के सांसदों में ही लगा है। श्री हनुमान् जी को दलित बता कर तीन राज्य खो दिए, अब ऐसा लगता है कि ये भाजपा नेता 2019 में लोकसभा चुनाव में श्री मोदी जी को हराने का व्रत लेकर चल रहे हैं। इन वक्तव्यों से श्री हनुमान् जी की दुर्गति तो कर रहे है परन्तु एक बात यह अवश्य है कि ये सभी नेता व मीडिया वाले यह तो मान गये कि श्री हनुमान् जी बन्दर नहीं थे। यह बात आर्य समाज कब से ही कहता रहा है, महर्षि वाल्मीकि स्वयं लिख गये परन्तु यह हिन्दू समाज अब तक पूंछ वाला बन्दर बताकर अपमानित करता रहा है। चलो बन्दर से मनुष्य तो माना।

मैं इन नेताओं के वक्तव्यों से यह तो स्पष्ट समझा हूँ कि वर्तमान कथित धर्माचार्य व हनुमान् भक्तों के साथ-2 ये नेता शास्त्रीय दृष्टि से नितान्त अनपढ़ हैं और लोकतन्त्र का चमत्कार देखिये कि इन अनाड़ी लोगों को देश का शासक बना दिया। भला विचारिये कि भगवान् श्री हनुमान् जी को उस समय के विख्यात पूज्य महर्षि वाल्मीकि से अधिक और कौन जान सकता है? वे महर्षि अपनी रामायण में भगवान् श्री हनुमान् जी को चारों वेद एवं उनके अंग व उपांगों का निष्णात विद्वान् तथा उच्च कोटि का वक्ता मानते हैं। इस प्रकार श्री हनुमान् जी महान् आध्यात्मिक व वैज्ञानिक पुरुष थे। वे महान् बलशाली, आकाश गमनादि अनेकों सिद्वियों को सहज सम्प्राप्त महान् योगी, महान् योद्धा, राजधर्म-विशारद एवं महान् मनोविज्ञानी थे। वे महाराज सुग्रीव के सुयोग्य महामंत्री थे। वे वानरवंश (बंदर नहीं) केसरी के औरस पुत्र तथा देव वर्ग के महापुरुष वायुदेव के नियोगज पुत्र थे। आज भी कुछ वंशों में ऐसे अनेक गोत्र मिलते हैं, जिनसे मनुष्य भ्रमित हो सकता है, जैसे नाग व हाथी आदि, वैसे ही वे क्षत्रियों में प्रसिद्ध वानर वंश में उत्पन्न हुए थे। रामायण में ‘लांगूल’ आदि शब्दों केा देखकर लोगों ने पूंछ अर्थ ग्रहण कर लिया। वस्तुतः रामायण काल में कर्म से वर्ण व्यवस्था थी, इस कारण श्री हनुमान् जी एक राजा के मंत्री होने के कारण आर्य क्षत्रिय थे परन्तु वेद विद्या के महान् विद्वान् होने के कारण वे ब्राह्मण के गुणों से भी परिपूर्ण थे। राष्ट्रियता से वे आर्य से गुणकर्म स्वभाव से भी आर्य थे। आज प्रचालित तथा कथित जातियों का कोई चिह्न तक नहीं था, परन्तु नासमझों को कौन समझाएं?

अब यह चर्चा तो व्यर्थ है, क्योंकि अब नेता उन्हें बन्दर नहीं, मनुष्य मानकर उनके नाम पर राजनीति कर रहे हैं। वे विचार कर रहे हैं कि श्री हनुमान् जी के ठेकेदार वे ही हैं, इस कारण हनुमान् जी दलित, जाट, मुसलमान, ब्राह्मण व आदिवासी बताकर इन वर्गों ने वोट उन्हें मिल जायेंगे। यह प्रयोग विधान सभाओं में तो उलटा पड़ा, अब पूरी नाव डुबोने में लगे हैं। जाग जाओं अन्यथा महापुरुष का अपमान आपको डुबो देगा।

यह तो रही भाजपा की बात, अब कांग्रेस की कथा सुनिये। इनके राष्ट्रिय अध्यक्ष श्री राहुल गांधी स्वयं को कौल ब्राह्मण कहते हैं। उन्हें अपना गोत्र अचानक याद आया। उनके सलाहकारों ने सलाह दी होगी कि अपना गोत्र कौल बता दो, और राहुल बताने लगें, अन्यथा कुम्भाराम जी को कुम्भकर्ण बताने वाले को क्या पता?

अब कोई यह पूछे कि गोत्र मां से मिलता है अथवा पिता से? यदि मां से मिलता है, तो राहुल ईसाई हुए, कौल ब्राह्मण कैसे हो गये? यदि कहें कि गोत्र मां से नही, बल्कि पिता से मिलता है, तब उनके पिता श्री राजीव गांधी का गोत्र क्या था? उनके पिता तो श्री फिरोज खां थे, तब श्री राजीव गांधी भी ब्राह्मण नहीं हुए। कांग्रेसी लोग भी कैसे भांग के नशे में डूबे अथवा अपने नेता के ऐसे अंधभक्त बने कि इतनी सी बात समझ में नहीं आयी कि गोत्र कभी पिता के नाना से भी मिलता है, क्या? हाँ, मैं श्री जवाहरलाल नेहरु के गोत्र के विषय में कुछ नहीं कहूँगा अन्यथा कांग्रेसी उलझ पड़ेंगे और मैं ऐसी बातों से दूर भी रहता हाँ, राहुल जी के गोत्र की बात तो हनुमान् जी की चर्चा में कर दी और साथ ही इसलिए भी क्योंकि हनुमान् जी त्रेता युग के थे, कोई उन्हें अधिक समझता नहीं है, इसकारण कुछ भी कह लो परन्तु राहुल गांधी तो स्वयं जानते हैं कि उनका वास्तविक गोत्र क्या है? उनकी मां कौन हैं? उनके दादा कौन थे? तब ऐसा सफेद झूठ बोलना क्या उनके बचपने का प्रतीक नहीं है? कोई बात नहीं, यह लोकतंत्र (भीड़तंत्र) है, कोई कुछ भी बोलने के लिए स्वतंत्र हैं?

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

राष्ट्रिय सुरक्षा सर्वोपरि


आज निजता व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर संसद में हुड़दंग जारी है। आज संसद कुछ हुड़दंगे लोगों की भीड़ बन कर रह गयी है। जो शिष्ट हैं, वे इनके समक्ष विवश हैं। जब देश को चलाने वाले, कानून बनाने वाले ऐेसे हुड़दंगे होंगे, तब यह देश कहाँ जायेगा? आज देश में सोशल मीडिया के माध्यम से विष घोला जा रहा है, देशद्रोही तत्त्व किन-2 देशों के किन-2 लोगों से सम्पर्क करते हैं, यह कौन जानता है? जब चुनावी सभाओं में पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगते हैं, राष्ट्रिय नेताओं का मौन समर्थन रहता है, विश्वविद्यालयों में भारत को तोड़ने तथा पाकिस्तान समर्थक नारे लगते, काश्मीर में IS के झण्डे फहराते, सेना पर पत्थर फेंकते, विश्वविद्यालयों में आतंकवादियों को शहीद मानकर शहादत दिवस मनाते, ओसामा व हाफिज सईद जैसे खूंखार आतंकवादियों को ‘साहब’ कहकर पुकारते, आतंकी सोहराबुद्दीन के मरने पर बड़े-2 पुलिस अधिकारियों को जेल भेेजा जाता हो, पाकिस्तान में जाकर कुछ भारतीय नेता भारत के विरुद्ध विषवमन करते हों, तब यह अनिवार्य है कि ऐसे लोेगों की पूरी छानबीन की जाये। ये सब कार्य जब खुलेआम हो रहे हैं, तब ये तथा अन्य अनेकों लोग इण्टरनेट के माध्यम से क्या-2 कुकर्म करते होंगे और राष्ट्र के लिए कैसे-2 विघटन के बीज बो रहे हैं, इसकी जाँच अवश्य होनी चाहिए। जो इसका विरोध कर रहे हैं, यदि वे आपत्तिजनक कुछ कार्य नहीं करते हैं, तब वे क्यों डरते हैं? सभी देशभक्तों को तो राष्ट्ररक्षाहित इस कार्य का समर्थन ही करना चाहिए। अब कड़े निर्णय लिए बिना देश बच नहीं पायेगा। राष्ट्र विरोधी तत्त्वों पर दृष्टि रखने का और कोई उपाय भी दिखाई नहीं देगा।

✍️ आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक

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